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सर्वकोश
निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

महर्षि यास्क मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ

पृष्ठ 18, कुल 1282 में से

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पृष्ठ 18

हिन्दी निरुक्त । १७
वह गुणभूता है, और उसका भाव सिद्धिसे ही परोक्ष होने पर
अनुमान होता है ।
क्रियाकी परोक्षता ।
इन्द्रियोंमें किसी इन्द्रियसे भी अपने स्वरूपमें रहती हुई
क्रिया भी प्रत्यक्ष नहीं होती। किन्तु उसके अन्तमे जो भाव
सिद्धि होती है, उस से वह अनुमित होती है-(अनुमान) निश्चय ही
क्रिया हो चुकी, जिससे कि यह भाव सिद्ध हो गया । यदि
क्रिया न होचुकी होती तो जैसे कि-पहिले इस क्रियाके बिना
यह भाव कभी नहीं हुआ था, ऐसे ही अब भी नहीं होता, और
अब यहां भाव है, इससे क्रिया होचुकी, यह अनुमिति होती है ।
फलितार्थ ।
यद्यपि आख्यात क्रिया और भाव दोनोंका वाचक है, तथापि
भाव के ही लिए क्रिया होती है, इससे भावकी प्रधानता मानी
जाती है ।
भाव-प्रधानताका व्याख्यान्तर ।
कोई आचार्य भावप्रधान शब्दका प्रकृत्यर्थ प्रधान अर्थ करते
हैं । अर्थात्, आख्यातमें दो भाग होते हैं, प्रकृति और प्रत्यय,
प्रकृतिका अर्थ जो भाव है वह प्रधान, और प्रत्ययका अर्थ जो
साधन या कारक हैं, वे गौण रहते हैं । इस मतमें भाव, कर्म,
क्रिया और धात्वर्थ एक ही वस्तु है । (यह व्याख्या पहिली
व्याख्याका स्पष्टीकरणमात्र है) ।
व्युत्पत्ति ।
आख्यायन्ते स्त्रीपुन्नपुंसकानि,
क्रियागुणभावेन वर्तमानानि अनेन,
क्रिया च तेषामुपरि प्राधान्येन
वर्तमाना-इत्याख्यातम् ॥
३