निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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मिलित होकर प्रतीत हों, और उन धातुओकी क्रियाओ का उसके
अर्थमें सम्बन्ध भी हो, तो उस शब्दका निर्वचन अनेक धातुओंसे
एक साथही करना—
ऐसा ही वार्तिककार ने कहा है:—
“यावतामेव धातूनां लिङ्ग रूढिगतं भवेत् ।
अर्थश्चाप्यभिधेयस्य-स्तावद्भिर्गुणविग्रहः”
जितने धातुओका लिङ्ग ( चिन्ह ) रूढि शब्दमें पाया जाय, और
अभिधेयमें उनका अर्थ हो, उतने ही धातुओसे उसकी व्युत्पत्ति
करना ।
यदि धातुके अक्षर रूढि शब्दमें हों, और उसकी क्रिया उसके
वाच्यया अर्थमें न हो, तो उस धातुसे उस रूढि शब्दका निर्वचन
( व्याख्यान ) न हो सकेगा ।
देखो, निगमन समाहनन और समाहरण तीनो ही क्रियाएं गमे
आदि शब्दोंमें ( जो निघण्टु शब्दके वाच्य हैं ) विद्यमान हैं, उनके
वाचक, 'गम्' 'हन्' और 'हृ' धातु निघण्टु शब्दके निर्वचन
करनेके समय अहम्पूर्विकासे आगे बढकर कहते हैं कि-मेरे समान
है, मुझसे इसका निर्वचन कर, मुझसे इसका निर्वचन कर ।
यहां निघण्टु शब्दमें 'गम्' धातु अपने गकारको घकार रूपमें
देखता है, तथा 'हन्' और 'हृ' धातु अपने हकारको घकार बना
हुआ देखते हैं । इसी कारणसे अनेक धात्वर्थों द्वारा निघण्टु
शब्दका निर्वचन किया गया है कि ऐसे ही अन्यनामोंका निर्वचन
कर लिया जाय ।
समाम्नायका अर्थतत्व ।
समाम्नाय शब्दका पर्याय ( समानार्थक ) निघण्टु शब्द है, तथां
निघण्टु शब्द, जो पर्यायके प्रसङ्गमें आया हुआ है, उसकी इस