नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)
Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary
महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा
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३२५ १३ पिछले अध्याथ में पिछले अध्याय में
३४१ २३ स्वर महाराष्ट्री की रचना में स्तर महाराष्ट्री की रचना में
३४२ १९ चेतानां राजपुत्राणां चेतानां राज-पुत्राणां
३५५ ४ प्रेष्या इक्षेति प्रेष्या हक्षेति
३५७ १९ बतलाए परन्तु इनके बतलाए गये हैं परन्तु इनके
३५९ २, ३ जैसे मानव ये शरीर में हैं जैसे मानव के ये शरीर में स्थित
उसी प्रकार होते हैं उसी प्रकार
३५९ १२ पाठ्य स्वर के पाठ के समय पाठ्य-स्वर को पाठ के समय
३६० १५ आशय इन्हीं बातों से आशय इन्हीं दो काकुओं से
३६० २८ तत्र साकाङ्क्षा नाम तन्न साकाङ्क्षा नाम
३६१ १५ स्वरों के छः अलङ्कार जो स्वरों के छः अलङ्कार हैं जो
३६३ १२ परोक्षाद्धयने चैव परोक्षाह्वयने चैव
३६५ १२ जैसे कार्य अध्यन्तगुप्त बात जैसे कार्य तथा अत्यन्त गुप्त बात
३६६ ११ करुणरस में 'विल