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सर्वकोश
नारद पञ्चरात्र (भारद्वाज संहिता - वैष्णव आगम एवं प्रपत्ति-धर्म सटीक)

नारद पञ्चरात्र (भारद्वाज संहिता - वैष्णव आगम एवं प्रपत्ति-धर्म सटीक)

Narada Pancharatra Bharadwaja Samhita with Commentary

महर्षि भारद्वाज / देवर्षि नारद द्वारा

DevanagariHindipublished176 पृष्ठ

पृष्ठ 7, कुल 176 में से

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पृष्ठ 7

प्रस्तावना
नारदपञ्चरात्र तथा इसी के अनुगत भारद्वाजसंहिता के महत्व तथा उसकी उपयोगिता
वैष्णव-आगम में अपना विशिष्ट स्थान रखती है। जिसमें सर्वाधिक प्रमुखता के साथ दास्यभक्ति के
द्वारा भवबन्धन से मुक्ति एवं गोलोकप्राप्ति के उपाय एवं आचार का परम्परागत प्रतिपादन है।
पञ्चरात्रागम वैष्णव-आगम का एक प्रमुख प्रभेद है। आगम को श्रुतिमूलक तथा प्रमाणभूत
मानने की आस्था का कारण इसके प्रतिपाद्य एवं उपास्य साक्षान्नारायण तथा वक्ता भी श्री
परमेश्वर का होना है। नारदपञ्चरात्र तथा इसके अनुगत ग्रन्थ संहिताओं के रूप में वैष्णव तन्त्र(या
आगम के रूप) में प्रसिद्ध तथा प्रतिष्ठित हैं। आगम का एक पर्याय तन्त्र भी है, इसी कारण
पाञ्चरात्र को भी तन्त्र शब्द से अभिहित कर इसे वैष्णव-तन्त्र के रूप में माना जाता है। यहां हम
तन्त्र तथा इसके वाङ्मय की भी इस प्रसंग में चर्चा कर रहे हैं।
तन्त्र साहित्य
संस्कृत साहित्य के व्यापक क्षेत्र रहने के कारण धर्म तथा दर्शन के क्षेत्र के साथ साथ इसे आगम
या तन्त्र का एक ऐसा क्षेत्र भी प्राप्त है जो भारतीय चिन्तन, योग तथा उपासना का एक साथ
निदर्शक है। तन्त्र के अन्तर्गत एक ऐसा विस्तीर्ण क्षेत्र आता है जिसके ग्रन्थों की अपरिमित सम्पत्ति
भारत के विभिन्न प्रदेशों में सुरक्षित, प्रचलित तथा परम्परा के कार्यरूप में सम्पन्न होकर अवस्थित
है। तान्त्रिक वाङ्मय की खोज करनेवाले मनीषिगण के सर्वेक्षण के आधार पर यह तथ्य उभर कर
आता है कि ऐसे ग्रन्थों के वर्गीकरण में दो हजार ग्रन्थों को तो इस वर्ग के अन्तर्गत रखा जा सकता
ह। इनमें से अनेक ग्रन्थों का प्रकाशन हो चुका है किन्तु इनमें अनेक ऐसे ग्रन्थ भी हैं जो आज भी
अप्रकाशित हैं तथा महत्वपूर्ण भी। ऐसे ग्रन्थों की संख्या प्रकाशित ग्रन्थों की तुलना में बहुत अधिक
है। यदि इन ग्रन्थों का सामान्यतः इनके विषयों के आधार पर विभाजन करें तो इन्हें चार मुख्य
वर्गों में रखा जा सकता है। ये हैं-(१) ज्ञान (२) योग (३) क्रिया तथा (४) चर्या। इनमें
“ज्ञान'' के अन्तर्गत इसके निदर्शक तथा इसकी प्राप्ति आदि के विवेचक ग्रन्थ आते हैं। “योग" के
अन्तर्गत वे ग्रन्थ हैं जिनमें चित्त के नियमन तथा उसकी एकाग्रता के विषय में विचार तथा उपाय
तथा उसके वशीकरण हेतु दिखलाई जानेवाली क्रियाओं आदि का विवरण रहता है। “क्रिया" के
अन्तर्गत उपास्य इष्ट देव, उनके निवासभूत मन्दिरों के निर्माण तथा इसमें चलने वाले कार्यों का
विधान सहित विवरण होता है। “चर्या" एक प्रकार से इनकी प्रासंगिकता के अनुगत धार्मिक
आचार तथा सामाजिक पर्यवेक्षा के बिन्दु पर विश्लेषण या विवेचन को लक्ष्य बनाकर रचे गये
ग्रन्थ होते हैं। कभी कभी इन वर्गों के एक या दो मुद्दों को लेकर भी ये ग्रन्थ रचित होते हैं परन्तु
ग्रन्थकार इनके लिये सर्वथा स्वतंत्र है तथा ग्रन्थ भी जिनको आधार या लक्ष्यबिन्दु बनाकर रचित
हुए हों, यह भी स्पष्टतः परिशीलन के आधार पर प्रतीत होता है। परन्तु कुछ गन्थ इस लक्ष्यबिन्दु पर
हों केन्द्रित होकर रचना में प्रवृत्त हुए हों, यह भी स्पष्ट नहीं है।
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