नागानन्दम् (सम्राट हर्षवर्धन - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)
Nagananda Nataka of Emperor Harsha with Commentary
सम्राट हर्षवर्धन द्वारा
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का बीज 'अनुकरण' अथवा नकल है । आदि काल से ही मनुष्य में
नकल करने की प्रवृत्ति रही है । ज्यों ही यह प्रवृत्ति नाट्य का रूप
धारण करती है । त्यों ही मानों रूपक का बीजारोपण होता है । बस
यही नाट्य-कला का आरम्भ है ।
रूपक के विकास के मुख्य साधन महाकाव्य और गीतकाव्य हैं ।
ऋतुओं के परिवर्तन को देख कर डर के कारण लोग ईश्वर से प्रार्थना
करते थे, जिसमें नाट्य के दो अंग— नाचना और गाना— होते थे ।
धार्मिक उत्सवों में भी नृत्य, गीतादि होते थे । (आज भी होली आदि
के अवसरों पर हम इस प्रथा के अवशेष देखते हैं ) । गेहूँ आदि की
फ़सल हो जाने पर भी लोग नाच और गाने के साथ ईश्वर का धन्यवाद
करते थे । इसके साथ साथ स्वांग भी निकालते थे । ये सब वास्तव में
रूपक (अथवा नाटक ) के पूर्व रूप ही हैं ।
महाभारत में भी 'नट' शब्द का उल्लेख मिलता है । नाटक के
अभिनेता या नृत्य करने वाले को ही नट कहते हैं । नट और नाटक
दोनों नट् अथवा नृत्त धातु से निकले हैं :— "नटति नृत्यति वा यः स
नटः" । हरिवंश (जो कि महाभारत का ही परिशिष्ट है) में रामायण से
कथा लेकर नाटक खेलने का उल्लेख है । परन्तु इसका अपना रचना-
काल भी संदिग्ध है ।
३०० ई० पूर्व पाणिनि ने अपने व्याकरण में नाट्य-शास्त्र के
'कृशाश्व' और 'शिलालिन' इन दो आचार्यों के नाम दिए हैं । इसके
१५० वर्ष पश्चात् पतंजलि ने 'कंस-वध' और 'बलि-बन्ध' का उल्लेख
किया है, जिस से पता चलता है कि उस समय रंगशालाओं में नाटक
होते थे और दर्शक लोग देखने जाते थे ।
आर पिशचल के विचार में भारत में सब से पहिले
कठपुतलियों का नाच आरम्भ हुआ था । इस का उल्लेख महाभारत,
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कथा-सरित्सागर और बाल-रामायण आदि में मिलता है। पुतलियों को
रंगमञ्च पर यथा-स्थान रखने या सजाने वाला स्थापक कहलाता था
और जो व्यक्ति कठपुतलियों के तागे हाथ में पकड़ कर उन को नचाता
था वह 'सूत्रधार' कहलाता था। कहते हैं संस्कृत नाटक में 'स्थापक'
और 'सूत्रधार' शब्द इन्हीं पुतलियों के खेल से लिए गए हैं। (और
धीरे धीरे नाटक से स्थापक का लोप हो गया; उस का काम भी सूत्रधार
ही करने लग गया।) परन्तु प्रो० हिलीब्रां का विचार है कि कठपुतलियों
के नाच से कहीं पहले नाटक का आरम्भ हुआ होगा, क्योंकि नाटक तो
स्वयं कठपुतलियों के नाच का आधार है।
प्रो० ल्यूडर्ज़ ने कहा है कि छाया नाटकों में नाटक के बीज
मिलते हैं। यह छाया नाटक ही सम्भवतः आजकल के सिनेमा के मानों
मूल आधार थे। चमड़े की कठपुतलियां बना कर प्रकाश के आगे नचाते
थे। उनकी छाया आगे टंगे हुए पर्दे पर पड़ती थी। परन्तु, उल्टे इन
का भी आधार नाटक ही हो सकता है।
तो आख़िर नाटक आया कहां से ? इसके बीज हम किधर ढूंढें ?
इस का उत्तर यही है कि वेद तथा वैदिक यज्ञ, रामायण तथा
महाभारत, कठपुतलियों के नाच अथवा छाया नाटक, धार्मिक उत्सव
तथा लौकिक क्रियाओं सब में नाटक के अंश वर्तमान हैं। कोई एक मत
इसके भिन्न भिन्न उपकरणों की गुत्थी को सुलझा नहीं सकता। नाटक
को अपने असली रूप में आने में कई शताब्दियां लगीं। जो भी नई
चीज़ इसके आगे आई उसे इसने अपने अन्दर समा लिया—परन्तु
अपनी वैयक्तिक विशेषताओं को नहीं छोड़ा।
विण्डिश आदि कई महानुभावों का विचार है कि भारतीय
नाट्यकला पर यूनानी प्रभाव पर्याप्त रूप में पड़ा है। वे कहते हैं यूनानी
नाटक से ही संस्कृत नाटक का जन्म हुआ है। संस्कृत नाटक के 'यवनिका'
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तथा 'यवनी' आदि शब्दों पर बड़ा ज़ोर दिया गया है कि ये यवनों अर्थात्
यूनानियों से ही लिए गए हैं। परन्तु संस्कृत नाटक में 'यवनियां' राजा
की अंग-रक्षक हैं जो कि यूनानी नाटक में नहीं हैं। और यवनिका का
अर्थ 'पर्दा' है। परन्तु यूनानी नाटक में तो पर्दा था ही नहीं। शायद
पर्दे के लिए कपड़ा विदेश से मंगाया जाता हो। और विदेशियों के
लिए भारतीय प्रायः यवन शब्द का प्रयोग करते हों। वैसे भी संस्कृत
नाटक की आत्मा यूनानी नाटकों से सर्वथा विभिन्न है। यूनानी नाटकों
में दुःखान्त और सुखान्त दोनों प्रकार के नाटक मिलते हैं। परन्तु
हमारे यहां तो ऐसा कोई झगड़ा ही नहीं। संस्कृत नाटकों में हत्या,
युद्ध आदि के दृश्य वर्जित हैं, यूनानी नाटकों में नहीं।
भारत वासियों ने तो यूनानी भाषा कभी अच्छी तरह सीखी
ही नहीं। और फिर हम ने तो उस समय भी अच्छे अच्छे नाटक
तैयार कर लिए थे जिस समय यूनानियों में नाट्य कला का विकास
अभी आरम्भ ही हुआ था। अतः सिद्ध है कि संस्कृत नाट्यकला पर
कोई यूनानी प्रभाव नहीं। ये दोनों नाट्यकलाएँ पृथक् पृथक् स्वतः
समृद्ध हुईं।
नागानन्द-कथावस्तुः—
'नागानन्द' पाञ्च अंकों का नाटक है। इस की कथा एक बौद्ध
कथा है। इस में जीमूतवाहन का आत्मत्याग दर्शाया है। नाटक की
प्रस्तावना में यह बताया है कि इस की कथा विद्याधर जातक से ली गई
है। जातकमाला में कहानी रूप में श्री बुद्ध के पूर्वजन्मों में किए गए
सत्कर्मों का वर्णन है। इस समय इस जातकमाला में 'विद्याधर जातक'
नामी कोई कहानी नहीं। सम्भवतः वह हस्तगत नहीं हुई।
यह कथा सर्व-प्रथम वृहत्कथा में मिलती है। परन्तु अब यह
ग्रन्थ भी प्राप्य नहीं है। वहां से यह कथा 'कथासरित्सागर' तथा
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बृहत्कथा मञ्जरी में उद्धृत हुई। जीमूतवाहन की कथा इन दोनों ग्रन्थों
में दो बार मिलती है— पहिली बार संक्षेप में और दूसरी बार विस्तार
से । प्रस्तुत नाटक की कथावस्तु इस संक्षिप्त रूप से अधिक मिलती है ।
यहां कहीं कुछ भेद अवश्य हैं, यथा, तृतीय अङ्क पूर्णतया हमारे
नाटककार की अपनी कल्पना है ।
जीमूतवाहन एक विद्याधर राजकुमार है । उसके पिता महाराज
जीमूतकेतु राजकार्य छोड़ कर वन में शान्त जीवन व्यतीत करने आते
हैं, तो स्वयं जीमूतवाहन भी, राज्य का भार मन्त्रियों को सौंप, माता-
पिता की सेवा करने के लिए वन में ही आ रहता है । पिता के कहने
पर जीमूतवाहन अपने साथी विदूषक के साथ उनके निवासार्थ कोई
और अच्छा स्थान खोजने के लिए मलय पर्वत पर आता है । यहां
किसी वीणा की गुञ्जार उनके कानों में पड़ती है । यह ध्वनि गौरी के
मन्दिर की ओर से आ रही होती है । दोनो मन्दिर की ओर बढ़ते हैं ।
क्या देखते हैं कि एक सुन्दर सिद्ध कन्या वीणा बजा रही है और उस
की सखी पास बैठी है । वीणा वादन के पश्चात् वह कन्या अपनी
सहेली को बताती है कि देवी गौरी ने मुझे स्वप्न में दर्शन देकर वर
दिया है कि तेरा पति विद्याधर सम्राट् होगा । चतुर विदूषक नायक
को बलात् मन्दिर में ले जाकर वहां दोनो का परस्पर साक्षात्कार
कराता है । एक दूसरे को देखते ही दोनों को परस्पर प्रेम हो जाता है।
परन्तु दोनो प्रेमी भीरु हैं और हैं लज्जाशील । ज्यों त्यों करके परस्पर
प्रेम प्रकट करते ही हैं कि आश्रम से एक तपस्वी आता है और
नायिका को लेकर चला जाता है ।
दूसरे अङ्क में नायिका मलयवती प्रेम-विह्वल दिखाई गई है ।
वह चन्दनलता गृह में एक शिलामञ्च पर बैठी है । तभी राजा
(जीमूतवाहन) प्रवेश करता है । वह भी उतना ही व्याकुल है । वह
विदूषक से कहता है कि मैं स्वप्न में अपनी प्रिया को इस चन्दनलतागृह
में मिला हूँ । अतः आओ इधर ही चलें । उनके आने का शब्द सुन
कर दोनों कन्याएँ उठ कर चली जाती हैं और एक अशोक वृक्ष के
पीछे जा छुपती हैं । नायक विदूषक को अपने स्वप्न की वार्ता सुनाता
है और नायिका सुन रही है । नायक अपनी प्रिया का चित्र बनाता है ।
वहीं मित्रावसु आता है और अपनी बहिन के साथ विवाह का प्रस्ताव
रखता है । परन्तु जीमूतवाहन इसे स्वीकार नहीं करता । उसे नहीं
मालूम कि जिसे वह प्यार करता है वही मित्रावसु की बहिन है और
अज्ञानवश उसी का हाथ वह ठुकरा रहा है । मित्रावसु चला जाता है ।
मलयवती, जो छुपे छुपे यह सब देख और सुन रही है, निराशा से इस
अपमान को न सह सकती हुई आत्महत्या का निश्चय करती है ।
मित्रावसु को देखने के बहाने वह अपनी चेटी को भेज देती है । परन्तु
चेटी भांप जाती है और जाने की बजाए समीप ही छुप जाती है। अपने
आप को अकेली जानकर मलयवती अपने गले में फन्दा डालती है,
परन्तु चेटी उसे रोक लेती है और सहायता के लिए पुकारती है ।
जीमूतवाहन वहीं पहुँचता है और अपना बनाया चित्र दिखा कर उसे
विश्वास दिलाता है कि वह उसी से प्रेम करता है । तभी दासी आकर
सूचना देती है कि जीमूतवाहन के पिता ने यह सम्बन्ध स्वीकार कर
लिया है और क्योंकि विवाह आज ही होना निश्चित हुआ है अतः
राजकुमारी को शीघ्र बुलाया है ।
तीसरे अंक में विवाहोत्सव का वर्णन है । इस अंक का
विष्कम्भक अत्यन्त हास्यप्रद है । मक्खियों से बचने के लिए विदूषक
विवाह में प्राप्त वस्त्र ओढ़े हुए है । परन्तु विट ग़लती से उसे इस
वेश में अपनी प्यारी नवमालिका समझता हैं । और उस से आलिङ्गन
करता है । तभी नवमालिका आ जाती है और हँसी मज़ाक बढ़ जाता है ।
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विष्कम्भक के पश्चात् हम प्रेमियों को बगीचे में प्रसन्नता
पूर्वक घूमते देखते हैं । यहां बड़ी सजीव वार्तालाप मिलती है । नायक
कई सुन्दर पद्यों में अपनी नवोढा प्रियतमा की सुन्दरता का वर्णन
करता है । फिर 'वर्ण' शब्द पर श्लेष मिलता है:—
“श्रुतं त्वया भर्तृदारिकां कथं वर्णयति ?”
“अद्य पुनरहं त्वां वर्णयामि ।”
परन्तु वर्णन करने के स्थान चेटी विदूषक के मुख को तमाल
के पत्तों के रस से काला कर देती है ।
यहीं मित्रावसु द्वारा जीमूतवाहन को समाचार मिलता है कि
उस का राज्य मतङ्ग ने हस्तगत कर लिया है । परन्तु वह इस से ज़रा
विचलित नहीं होता । उदासीनता की बजाए उस के मुख पर पूर्ववत्
प्रसन्नता ही दिखाई देती है । मित्रावसु उसकी अनुमति मांगता है कि
सिद्ध सेना ले जाकर वह उसके शत्रु को परास्त करके उस का राज्य
लौटा लाए, परन्तु जीमूतवाहन यह कह कर उसे रोक देता है कि —
“स्वशरीरमपि परार्थे यः खलु दद्यादयाचितः कृपया
राज्यस्य कृते स कथं प्राणिवधक्रौर्यमनुमन्ये ।”
अन्तिम दो अङ्क कथावस्तु को सर्वथा बदल देते हैं । प्रेम का
स्थान त्याग ले लेता है । एक दिन मित्रावसु के साथ समुद्र के किनारे
भ्रमण करते करते जीमूतवाहन को हड्डियों का एक ढेर दृष्टिगोचर
होता है । पूछने पर उसे पता लगता है कि यह उन साँपों की हड्डियां
हैं जो प्रतिदिन गरुड को आहारार्थ भेंट दिये जाते हैं । यह सुनकर वह
निश्चय करता है कि मैं अपना जीवन दान करके भी इन सांपों की रक्षा
करूँगा । इसी समय एक सन्देशवाहक मित्रावसु को बुला ले जाता है
और जीमूतवाहन अकेला रह जाता है । किसी का करुण रोदन उसके
कानों में पड़ता है। यह शङ्खचूड की माता है। आज उस के बच्चे की
बारी है। जीमूतवाहन उसको ढारस बन्धाता है और शङ्खचूड की
जगह मरने के लिए अपने आप को प्रस्तुत करता है। परन्तु मां-बेटा
इसे नहीं मानते और उसकी वीरता, साहस तथा दक्षिणता की बड़ी
सराहना करते हैं। जब वे दोनों मन्दिर में पूजा के लिए प्रवेश करते
हैं तो गरुड़ देव पधारते हैं। जीमूतवाहन अपने आप को भेंट करता है
और गरुड़ उसे ही लेकर चला जाता है। स्वर्ग से देवता लोग पुष्पवृष्टि
करते हैं और दुन्दुभियां बजाते हैं।
अन्तिम अंक जीमूतवाहन के श्वशुर की चिन्ता के साथ प्रारम्भ
होता है। गरुड़ के आने का समय हो गया है और दामाद अभी तक
समुद्र-तट से लौटा नहीं। वह द्वारपाल सुनन्द को जीमूतकेतु के पास
यह जानने के लिए भेजते हैं कि शायद जीमूतवाहन उधर पहुँच गया
हो। पस्न्तु वह वहां भी नहीं है। जीमूतकेतु की बाईं आंख फरकती
है—बड़े अपशकुन की बात है। उसी समय एक मुकुट-मणि उन के
आगे आ गिरता है। वृद्धा कहती है कि यह तो मेरे पुत्र का ही दीखता
है, परन्तु सुनन्द कहता है कि यह किसी नाग का हो सकता है।
सुनन्द को यह पता लगाने के लिए लौटा दिया जाता है कि कुमार
अपने श्वसुराल पहुंच गये हैं कि नहीं। तभी शङ्खचूड़ आकर गरुड़
द्वारा जीमूतवाहन के उठाए जाने की वार्ता सुनाता है। सब रोने लगते
हैं और अग्नि प्रवेश करने का निश्चय करते हैं। परन्तु शङ्खचूड़ प्रार्थना
करता है कि पहिले गरुड़ को ढूंढना चाहिए। सम्भव है कि अभी तक
उस ने जीमूतवाहन को न मार डाला हो! उधर गरुड़ नायक के धैर्य
को देख विस्मित है और जानना चाहता है कि उस का आज का
शिकार कौन है। तभी शङ्खचूड़ आकर उसे बताता है कि यह विद्याधर
कुलमणि जीमूतवाहन हैं। अपनी ग़लती जान कर गरुड़ को बड़ा
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पश्चाताप होता है। वह आत्महत्या करना चाहता है। उसी समय
नायक के माता पिता तथा पत्नी भी वहां पहुंचते हैं। कितना करुणा-
जनक दृश्य है ! गरुड़ नायक से ही पूछता हैं कि मेरे पापों का
प्रायश्चित क्या है। जीमूतवाहन उसे उपदेश देता है कि किए पाप का
पश्चाताप और भविष्य में जीव हत्या न करना। इतने में नायक को
पीड़ा बढ़ जाती है। उस की आंखें बन्द हो जाती हैं और वह गिर
पड़ता है। फिर रोदन तथा विलाप होने लगता है। गरुड़ बड़ा लज्जित
होता है। वह नायक को जिलाने के लिए अमृत लाने स्वर्ग को चला
जाता है। जीमूतकेतु शङ्खचूड़ को चिता रचने के लिए कहते हैं। सब
का एक साथ मरने का निश्चय है। तभी मलयवती के आह्वान पर देवी
गौरी प्रकट होती हैं। जीमूतवाहन को पुनर्जीवित करके उसे खोए हुए
राज्य पर प्रतिष्ठापित कर देती हैं। उधर गरुड़ स्वर्ग से अमृत लाता
है जिस की वर्षा से उसी के द्वारा मारे गए सब सांप जी उठते हैं और
गरुड़ प्रतिज्ञा करता है कि अब मैं सांपों से ऐसा क्रूर बदला नहीं लूंगा।
इसी लिए इस नाटक का नाम 'नागानन्द' पड़ा है—
अर्थात् "नागों का आनन्द"।
नाटक का कर्ता
श्री हर्ष के नाम से तीन नाटक — रत्नावली, प्रियदर्शिका तथा
नागानन्द — दो स्तोत्र और कुछ फुटकल कविता हमें प्राप्त हुई है।
तीनों नाटक एक ही हाथ की कृतियां हैं। इस पक्ष के समर्थन
में हमारे पास कई प्रमाण हैं। सब की प्रस्तावना में श्री हर्ष को सिद्ध-
हस्त कवि बताया गया है। प्रियदर्शिका के दो श्लोक नागानन्द में भी-
मिलते हैं और एक श्लोक रत्नावली में। कई गद्यांश भी मिलते जुलते
हैं और कई स्थितियां भी एक जैसी हैं तीनों नाटकों में भाव, रस और
शैली की इतनी समानता है कि एक को दूसरे से अलग करना असम्भव
है।
फिर वह कर्ता कौन है ? इस विषय में मम्मट की उक्ति ने
संशय उत्पन्न कर दिया है, जिस से साहित्यकों में मत-भेद है। अपने
ग्रन्थ 'काव्य प्रकाश' के आरम्भ में उन्होंने लिखा है— "काव्यं
यशसेऽर्थकृते। कालिदासादीनामिव यशः। श्रीहर्षादेर्धावकादीनामिव
धनम्।" कहीं कहीं 'धावक' के स्थान पर 'बाण' का भी नाम है।
जिस से पिशल आदि कई विद्वान 'धावक' को और हॉल तथा व्यूह्लर
आदि कई महानुभाव 'बाण' को इन नाटकों का कर्ता मानते हैं।
"अर्थकृते" ही उनके इस निश्चय का आधार है। उन का कहना है कि
इन्होंने लिखकर धन के लिए इन को राजा हर्ष के पास बेच दिया,
जिस ने अपने नाम के नीचे प्रकाशित किए। परन्तु ऐसा समझना
भ्रान्ति है। मम्मट की उक्ति तो श्री हर्ष की उदारता और दानशीलता
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की ओर ही संकेत करती है। धावक के बारे में तो हम कुछ जानते ही
हो नहीं; और इन नाटकों को बाण द्वारा रचित बताना तो सर्वथा भूल
है। इन नाटकों की शैली बाण के हर्षचरित से इतनी विभिन्न है कि ये
उसी लेखनी के हो ही नहीं सकते। और फिर ब्राह्मण होते हुए बाण
भला बौद्ध कथा 'नागानन्द' कैसे लिख सकता था।
सम्भवतः यह संशय इस लिए भी उठा हो कि कोई राजा
कवि अथवा नाटककार कैसे हो सकता है ? परन्तु यह कोई असम्भव
बात नहीं है। और इतिहास में केवल हर्ष ही नहीं और भी कई राजा-
लोग अच्छे लेखक हुए हैं। यथा- शातवाहन हाल, समुद्रगुप्त,
प्रवरसेन वाकाटक, महेन्द्रविक्रमवर्मन, यशोवर्मन्, मुञ्ज, भोज,
विग्रहराजदेव, मयूरराज और शूद्रक इत्यादि कई राजालोग साहित्यकार
भी हुए हैं। अतः किसी राजा का लिखारी होना किसी आधुनिक
समालोचक के लिए आश्चर्यजनक नहीं होना चाहिए। अतः हम इस
निश्चय पर पहुंचते हैं कि ये नाटक राजा हर्ष की ही कृतियां हैं। बाण ने
भी उसके अच्छे कवि होने की प्रशंसा की है। मधुसूदन ने कहा है कि
रत्नावली श्री हर्ष ने लिखी। इत्सिंग ने नागानन्द के अभिनय होने का
उल्लेख किया है। सोड्ढल ने हर्ष को राजा-कवियों में गिना है।
जयदेव ने भी भास और कालिदास आदि के साथ हर्ष का नाम लिया
है और सुभाषितावलियों में भी कई पद्य हर्ष के बताए हैं। उनमें से
कई इन नाटकों में से है। ताम्रपत्रों में भी हर्ष की कविता के दो
उदाहरण मिलते हैं।
अब प्रश्न उठता है कि यह हर्ष कौन था? इतिहास में ऐसे चार
नाम मिलते हैं—
(i) काश्मीर-राज हर्ष;
(ii) धारानरेश भोज का पितामह हर्ष;
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(iii) मातृगुप्त का आश्रय-दाता उज्जयिनी-नरेश हर्ष
विक्रमादित्य;
(iv) कान्य कुब्ज का राजा हर्ष वर्धन ।
विल्सन ने रत्नावली काश्मीर नरेश हर्ष (१११३-२५ ई०) की
बताई है । परन्तु यह ठीक नहीं है, क्योंकि पञ्च बार क्षेमेन्द्र
(११वीं शताब्दी) और एक बार दामोदर गुप्त (८वीं शताब्दी) ने
इस नाटिका का उल्लेख किया है । इस लिए रत्नावली का कर्ता ८वीं
शताब्दी से कहीं पहिले का होना चाहिए ।
इसी कारण से ही हम धारानरेश भोज के पितामह हर्ष को
भी इन नाटकों का कर्ता नहीं मान सकते क्योंकि उन का समय ९४८
से ९७२ ई० था । और उज्जयिनीनरेश हर्ष विक्रमादित्य के तो
ऐतिहासिक व्यक्ति होने में भी सन्देह है ।
अतः कान्यकुब्ज के राजा हर्ष वर्धन ही इन नाटकों के रचयिता
हो सकते हैं। इस विषय में इत्सिंग की साक्षी उल्लेखनीय है । उस ने
कहा है कि राजा शिलादित्य (हर्षवर्धन का दूसरा नाम) ने बोधिसत्व
जीमूतवाहन की कथा लिख कर उसका अभिनय करवाया और इस
प्रकार इस कथा को लोकप्रिय बनाया । बाण ने भी हर्ष की विद्वत्ता की
प्रशंसा की है और विशेषतः काव्यकला में उसकी मौलिकता की
सराहना की है।
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श्री हर्ष वर्धन
श्री हर्ष थानेसर के राजा प्रभाकर वर्धन के द्वितीय पुत्र थे।
उन का जन्म ५६० ई० के लग भग हुआ। उन की माता का नाम
यशोवती था। राज्यवर्धन उनके बड़े भाई थे और राज्यश्री छोटी
बहिन, जिस का विवाह कन्नौज के मौखरी राजकुमार ग्रहवर्धन से हुआ
था। ६०५ में पिता की मृत्यु के पश्चात् राज्यवर्धन राजा बने।
मालवा नरेश ने गौडराज शशाङ्क के साथ ग्रहवर्मन् पर आक्रमण
कर के उसे मार दिया, राज्यश्री को कैद कर लिया और थानेसर की
ओर बढ़ने लगे। राज्यवर्धन ने उनको परास्त किया। परन्तु शशाङ्क
ने धोके से राज्यवर्धन को मार डाला और विधवा राज्यश्री विन्ध्याचल
के जङ्गल की ओर भाग गई।
हर्षवर्धन राजा घोषित हुए। वे अपनी बहिन की खोज में
निकले और ठीक उस समय उसे जा मिले जबकि वह आत्महत्या करने
ही लगी थी। अब वे अपने शत्रुओं को परास्त कर अपना राज्य
विस्तार करने लगे। राज्य के कुछ ही वर्षों में उन्हों ने समस्त उत्तर
भारत को अपने राज्य में मिला लिया। और ६१२ ई० में महाराजा-
धिराज बन गए।
अब दक्षिण भारत में भी अपने राज्य का विस्तार करने के
लिए वे सेना को दक्षिण की ओर ले चले। परन्तु चालुक्यवंशी
पुलकेशिन द्वितीय से ६२० के लगभग परास्त हुए। परन्तु उत्तर भारत
पर उनका निष्कण्टक आधिपत्य बना रहा। कहते हैं १८ राजा लोग
उन के आधीन थे। आसाम तथा वलभि के नरेशों ने भी उन से
मित्रता बना रखी थी।
स्वयं महावीर तथा विजेता होते हुए भी श्री हर्ष प्रजा को
धार्मिक सहिष्णुता सिखाते थे। उन के राज्य में बौद्धों तथा ब्राह्मणों
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में परस्पर द्वेष भाव नहीं था। स्वयं वे शैव थे परन्तु सूर्य तथा बुद्ध की
भी पूजा करते थे। ह्यूनसांग बताते हैं कि वृद्धावस्था में वे बौद्ध ही
हो गए थे।
ह्यूनसांग ने हर्ष के राज्य की एक और रोचक घटना का उल्लेख
किया है। कन्नौज तथा प्रयाग में उन्होंने कई धार्मिक समारोह किए।
एक अवसर पर इनके अधीन सारे राजा लोग और मित्र नरेश सम्मि-
लित हुए। यह ६४३ ई० की वसन्त ऋतु की वार्ता है। बुद्ध तथा
अन्य देवताओं की मूर्तियों के जलूस निकाले गए, सोने तथा मोतियों
के दान किए गए, कई भोज हुए और धार्मिक वादविवाद।
इस के अतिरिक्त श्री हर्ष प्रयाग में प्रति पांच वर्ष गङ्गा तथा
यमुना के संगम पर भारी सम्मेलन किया करते थे और अपना सारा धन
बांट दिया करते थे।
सम्भवतः इन्हीं अवसरों पर इनके नाटकों का भी अभिनय
हुआ करता था; क्योंकि प्रस्तावना में नाना दिशाओं से आए हुए राज-
समूहों का उल्लेख है:— “नाना दिग्देशागतेन राज्ञः श्रीहर्षदेवस्य
पादपद्मोपजीविना राजसमूहेनोक्तः” इत्यादि।
श्री हर्ष स्वयं कवि तथा नाटककार थे। साथ ही कई कवियों के
आश्रयदाता भी थे, वे बड़े गुणग्राही थे। उनके दरबार में बाण, मयूर,
मतङ्ग, दिवाकर आदि कई प्रशस्त कवि रहा करते थे जिन्हें वे अनेक
उपहार दिया करते थे।
६४६ ई० के अन्त में अथवा ६४७ ई० के आरम्भ में श्री
हर्ष की मृत्यु हुई। सम्भवतः वे अविवाहित थे। अपने पीछे वे कोई
उत्तराधिकारी नहीं छोड़ गए।
महाकवि बाण ने “हर्षचरित” लिख कर उन्हें अमर कर
दिया है।
श्री हर्ष की नाट्यकला
आधुनिक काल में श्री हर्ष के नाटकों की जितनी श्लाघा होनी
चाहिए थी उतनी नहीं हुई। इस का एक मात्र कारण यही है कि ये
नाटक कालिदास के नाटकों की तुलना नहीं कर सकते। रत्नावली
तथा प्रियदर्शिका दोनों नाटिकाओं की मौलिकता सम्भवतः महत्वपूर्ण
नहीं है, परन्तु दोनों की कथावस्तु प्रभावशाली अवश्य है। दोनों में
सरलता तथा विचक्षणता है। रत्नावली में जादूगर के करतब हास्य
और उल्लास से भरे हुए हैं। तोते का अपसरण और चहचहाना बड़ी
सरसता से चित्रित किया है। प्रियदर्शिका का गर्भांक भी आनन्ददायी
है। चौथे अङ्क में षड्यन्त्र भी क्या सफ़ाई से निभाया है !
श्री हर्ष का वत्सराज उदयन और वासवदत्ता दोनों भास के
नायक और नायिका से कहीं विभिन्न हैं और निकृष्ट भी। रत्नावली की
सुसङ्गता एक विनोदप्रिय बालिका है जो नायिका से खूब उपहास
करती है। हर्ष ने विदूषक को बड़ा लालची चित्रित किया है, परन्तु
उस में पर्याप्त विनोदप्रियता नहीं है। हां, अपने स्वामी के लिए उस
का प्रेम अवश्य सच्चा है — यहां तक कि रत्नावली में तो वह उस के
साथ मरने को भी तैयार है।
नागानन्द में श्री हर्ष ने आत्मत्याग, दान, दक्षिाणता और
मृत्यु के सन्मुख भी धीर बने रहने के शुभ गुणों को चित्रित किया है
और वह भी बड़ी सफलता के साथ। जीमूतवाहन बौद्ध विचारों का
एक आदर्श है, जिस का यह निश्चय है कि दूसरों के लिए आत्म-त्याग
मनुष्य का प्रमुख कर्त्तव्य है। शङ्खचूड़ और उसकी माता का चरित्र
भी श्रेष्ठ दिखाया है।
( ३६ )
विदूषक आत्रेय मूर्ख और ग्राम्य है। वह मक्खियों से बचने
के लिए आवरण ओढ़े हुए है। विट शेखरक उसे अपनी कान्ता
नवमालिका समझ कर उससे आलिङ्गन करता है। परन्तु जब
नवमालिका आती है तो उसे विदूषक पर बहुत क्रोध आता है; और
चाहे वह ब्राह्मण है फिर भी उसे नवमालिका के आगे झुकाता है और
बलात् मद्यपान भी करवाता है। कुछ देर पश्चात् नव-विवाहित जोड़े
के सम्मुख नवमालिका विदूषक के मुख पर तमालरस मल कर उस का
उपहास करती है।
मित्रावसु के कथन में कितना ओज और उत्साह भरा है जब
वह जीमूतवाहन से कहता है कि आप के "हां" कहने की देर है, बस
आप के सब शत्रुओं का शीघ्र ही समूलनाश हो जाएगा। परन्तु
जीमूतवाहन के अपने कर्त्तव्य के प्रति और ही विचार हैं। वह कहता
है-
स्वशरीरमपि परार्थे यः खलु दद्यामयाचितः कृपया।
राज्यस्य कृते स कथं प्राणिवधक्रौर्यमनुमन्ये ?
अर्थात्- "करुणा से, मैं बिना मांगे ही दूसरे के लिए ख़ुशी
ख़ुशी अपना जीवन ही दे दूँ। फिर (केवल मात्र) राज्य के लिए मैं
प्राणियों के वध की अनुमति कैसे दे सकता हूँ?" यह उक्ति अति
महत्त्वपूर्ण है, क्योंकि यह हमें नायक के त्याग के लिए तैयार कर
देती है। मरते समय वह गरुड़ को इसी विषय पर उपदेश देता है।
नागानन्द के अन्तिम दो अङ्कों में श्री हर्ष नए रूप में दृष्टि-
गोचर होते हैं। यहां हमें उस की अद्भुत तथा अलौकिक में रुचि
मिलती है। चाहे नाटक की प्रेरणा बौद्ध सिद्धान्तों से मिली है, फिर भी
जीमूतवाहन को पुनर्जीवित करने के लिए भगवती गौरी का समावेश
किया गया है।
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पांचवें अङ्क में नायक के माता पिता तथा पत्नी को लाने से
नायक का बलिदान और भी अधिक प्रभावोत्पादक हो गया है। इस से
करुणा रस की वृद्धि हुई है। अन्तिम दृश्य में नायक के लिए उस के
माता पिता तथा पत्नी के द्वारा किए गए विलाप कितने करुणा-जनक
हैं !
यह मानना पड़ेगा कि नागानन्द के दो विभिन्न भाग हैं और कि
दोनों में निश्चय ही कोई समस्वरता नहीं। पहिले तीन अंकों में
शृंगारिक तथा हास्यजनक दृश्य हैं और अन्तिम दोनों में करुणाजनक।
परन्तु नाटक में शृंगार अथवा करुणा दोनों में से कोई भी रस प्रधान
नहीं दीखता। प्रधानता तो वीर रस की है। वीरता केवल युद्ध करने
और विजय प्राप्त करने में ही नहीं होती। वीरता जीमूतवाहन के
त्याग में हैं, राज्य छोड़ कर माता-पिता की सेवा के लिए वन जाने में
है, वीरता दूसरे की रक्षा के लिए अपना जीवन अपर्ण करने में है, और
वीरता दुःख तथा कष्ट में भी शान्त रहने में है। स्वयं गरुड़ भी नायक
की इस वीरता से प्रभावित होता है।
हां, हम कह रहे थे नागानन्द कई भावों तथा रसों की एक मिश्रित
कृति है। फिर भी सामूहिक प्रभाव असफल नहीं है। तीसरे अङ्क के
प्रभावशील प्रहसन ने अन्तिम भाग की गम्भीरता का पर्याप्त सन्तुलन
किया है।
श्री हर्ष का विशेष गुण शृङ्गार पद्यों में दृष्टिगोचर होता है जैसे
नागानन्द में नव विवाहिता वधू की लज्जाशीलता के वर्णन में और
रत्नावली में धनुर्धारी कामदेव के अचूक निशाने के वर्णन में।
नागानन्द में अपनी प्रियतमा की शारीरिक सम्पूर्णता अथवा अदोषता
के बारे में हर्ष का वर्णन ठीक भारतीय रुचि के अनुसार ही है।
श्री हर्ष को प्राकृत वर्णन भी प्रिय है। कल्पना तथा लालित्य में
वह कालिदास से कहीं पीछे है, परन्तु उस के पास सरलता तथा,
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भाव-व्यञ्जना के महान गुण हैं। उसकी संस्कृत आदर्श तथा नियमबद्ध
है। उसका शब्द तथा अर्थालङ्कारों का प्रयोग संयमित है जिससे
रसानुभूति कहीं शिथिल नहीं होती।
हर्ष की प्राकृत प्रायः शौरसेनी प्राकृत है। श्लोकों में महाराष्ट्री
प्राकृत का प्रयोग है। नौकर द्वारा बोली गई प्राकृत मागधी है। इन
प्राकृत रूपों को देखकर हम निःसंशय कह सकते हैं कि श्री हर्ष ने बड़ी
सावधानी से प्राकृत व्याकरण का अध्ययन कर रखा था।
उसके प्रयुक्त छन्दों को देखने से ऐसा लगता है कि उस ने अपने
पूर्व के नाटककारों के सरल छन्दों को नहीं अपनाया, अपितु कठिन और
विस्तृत छन्दों का प्रयोग किया है। ऐसे छन्द अभिनय के लिए इतने
प्रयुक्त नहीं, परन्तु वर्णन के लिए अधिक अवसर प्रस्तुत करते हैं।
शार्दूलविक्रीडित उस को अधिक अभीष्ट है। स्रग्धरा, श्लोक और आर्या
इस से कम प्रयुक्त हुए हैं। और शालिनी तथा हरिणी सब से कम।
श्री हर्ष की शैली विशेष रूप से सरल है। उस का गद्य अलंकारों
से अछूता है। और आश्चर्य की बात यह है कि ऐसी सरलता उस
समय अपनाई गई जब कि साहित्यकार बाण की ओज पूर्ण शैली का
अनुकरण कर रहे थे। पद्यों में भावुकता पूर्ण वर्णन अवश्य हैं परन्तु
वे सीमा-बद्ध हैं और उपयुक्त हैं। उस की शैली लगातार एक जैसी
अच्छी है। न कभी वह इस स्तर से बहुत ऊँचे ही उठ पाए हैं और
न ही कभी इस से नीचे ही गिरे हैं।
श्री हर्ष ने कहीं नाट्यशास्त्र के सिद्धान्तों का उल्लंघन नहीं किया।
कई बार तो ऐसा लगता है जैसे उनके नाटक जीवन की अनुभूति
से नहीं वरन् नाट्य शास्त्र के ज्ञान से उत्पन्न हुए हों। यदि
नाट्य-शास्त्र में भरतमुनि ने कहा है कि उसने सर्वप्रथम अभिनय
इन्द्रोत्सव पर किया तो हर्ष का नागानन्द भी इन्द्रोत्सव के दिन ही
अभिनेत हुआ है। इसी प्रकार नाटिकाओं का अभिनय वसन्तोत्सव
पर बताया है तो श्री हर्ष की दोनों नाटिकाएँ वसन्तोत्सव पर ही खेली
गईं। इसी कारण ही साहित्यकारों ने रत्नावली की बहुत श्लाघा की है।
नाट्यशास्त्र में इस बात की मनाही है कि कोई मरा हुआ
मनुष्य रङ्गमञ्च पर दिखाया जाए। परन्तु यदि उस पुरुष ने फिर से
जीवन प्राप्ति कर लेनी हो (जैसे जीमूतवाहन ने की) तो उसे दिखाने
में कोई दोष नहीं।
जीमूतवाहन के आत्म-त्याग से तो वास्तविक दुःखान्त नाटक की
सूचना मिलती है। परन्तु नाट्य शास्त्र में दुःखान्त नाटकों का निषेध
है। इस लिए गौरी के हस्त-क्षेप का आवाहन किया गया है ताकि
आत्म-त्याग का पूर्ण फल शीघ्र ही इसी जन्म में ही मिलता दिखाया
जा सके। कितनी चतुर और विलक्षण युक्ति है।
यह सच है कि श्री हर्ष का आदर्श कालिदास था। उस के नाटकों
का इन के नाटकों पर विशेष प्रभाव पड़ा है। नाटिकाओं में कई स्थलों
पर मालविकाग्निमित्र के स्मारक मिलते हैं जैसे रत्नावली के बन्दर में
मालविकाग्निमित्र के डराने बन्दर की याद आ जाती है। और
साङ्कृत्यायनी तो साक्षात् कौशिकी का ही मानो अवतार है। प्रियदर्शिका
में नायिका का मधुकरों से त्रस्त हो कर नायक से साक्षात्कार होना
कालिदास के शाकुन्तला के पहिले दृश्य का अनुकरण मात्र प्रतीत होता
है।
नागानन्द में भी कालिदास का प्रभाव कई स्थलों पर दिखाई देता
है। प्रथम अङ्क में जब नायक विदूषक के साथ मलय पर्वत पर
पहुंचता है तो उस की दाईं आंख फरकती है:—
"दक्षिणं स्पन्दते चक्षुः फलाकाङ्क्षा न मे क्वचित् "
१. प्रथम अङ्क: मलयवती दर्शन एवं अनुराग
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यह राजकुमारी मलयवती से मिलने की ओर संकेत हैं, जो
कालिदास के अभिज्ञान-शाकुन्तल में आई निम्न उक्ति का अनुकरण
प्रतीत होता है:—
“शान्तमाश्रम पदं, स्फुरति च बाहुः, कुतो फलमिहास्य” इत्यादि।
तृतीय अंक में नायक कहता है:—
दृष्टा दृष्टिमधो ददाति कुरुते नालापमाभाषिता,
शय्यायां परिवृत्य तिष्ठति बलादालिङ्गिता वेपते ।
निर्यान्तीषु सखीषु वासभवनान्निर्गन्तुमेवेहते,
याता वामतयैव मेऽद्य सुतरां प्रीतयै नवोढा प्रिया ॥
अब इस उक्ति का यह कोई उपयुक्त अवसर नहीं है । उन का
विवाह अभी ही हो कर हटा है। स्पष्ट है कि कवि ने कालिदास के
कुमारसम्भव में आए निम्न पद्य का अनुकरण किया है:—
व्याहृता प्रतिवचो न संदधे गन्तुमैच्छदवलम्बितांशुका ।
सेवते स्म शयितं पराङ्मुखी सा तथापि रतये पिनाकिनः ॥८,२॥
फिर भी, चाहे श्री हर्ष कालिदास आदि अपने पूर्व कालीन कवियों
तथा नाटककारों का ऋणी है, परन्तु हम यह नहीं कह सकते कि उस
में मौलिकता है ही नहीं । रत्नावली में उपवन के दृश्य में बन्दर के मैना
को उड़ाने की बात हमारे नाटककार की अपनी है । और प्रियदर्शिका
में दिया गर्भाङ्क तो अपनी किसम का सर्व प्रथम उदाहरण है ।
नागानन्द के दोष
किसी भी मानव कृति का सर्वथा दोष रहित होना असम्भव है !
नागानन्द में भी कई दोष दृष्टिगोचर होते हैं, यथा:—
१. पहिले तीन अंकों तथा अन्तिम दो अंकों की कथावस्तु में परस्पर
कोई सम्बन्ध नहीं। इस सम्बन्ध को बनाने के लिए कहीं कहीं
नायक के आत्म-त्याग के उल्लेख घुसेड़े से गए लगते हैं। परन्तु
एकता का प्रभाव बन नहीं पड़ा। एक भाग को पढ़ते समय हम
दूसरे भाग की कहानी भूल से जाते है। एक का अस्तित्व दूसरे
के विकास के लिए आवश्यक नहीं।
२. प्रथम अंक में भगवती गौरी के मन्दिर में नायक तथा नायिका
मिलते हैं और परस्पर प्रेमालाप करके बिछुड़ जाते हैं। यह
जानने का प्रयत्न नहीं करते कि दूसरा व्यक्ति है कौन ?
हालांकि मित्रों द्वारा बड़े सुभीते से यह काम लिया जा सकता
था। आगामी दृश्य के लिए यह परस्पर अज्ञान चाहे आवश्यक
है परन्तु है कितना अस्वाभाविक ?
३. चतुर्थ अंक में शङ्खचूड़ तथा उस की माता का मन्दिर में चले
जाना भी स्वाभाविक नहीं लगता। इस से शङ्खचूड़ के चरित्र में
न्यूनता आ गई है। वह नायक को अपनी जगह प्राण देने की
अनुमति नही देता। परन्तु गरुड़ के आने के समय उस के
चले जाने से तो ऐसा लगता है कि ऊपर से वह चाहे जो कहे
परन्तु भीतर से मानो वह अपने प्राण बचाना ही चाहता है।
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