नागानन्दम् (सम्राट हर्षवर्धन - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)
Nagananda Nataka of Emperor Harsha with Commentary
सम्राट हर्षवर्धन द्वारा
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का बीज 'अनुकरण' अथवा नकल है । आदि काल से ही मनुष्य में
नकल करने की प्रवृत्ति रही है । ज्यों ही यह प्रवृत्ति नाट्य का रूप
धारण करती है । त्यों ही मानों रूपक का बीजारोपण होता है । बस
यही नाट्य-कला का आरम्भ है ।
रूपक के विकास के मुख्य साधन महाकाव्य और गीतकाव्य हैं ।
ऋतुओं के परिवर्तन को देख कर डर के कारण लोग ईश्वर से प्रार्थना
करते थे, जिसमें नाट्य के दो अंग— नाचना और गाना— होते थे ।
धार्मिक उत्सवों में भी नृत्य, गीतादि होते थे । (आज भी होली आदि
के अवसरों पर हम इस प्रथा के अवशेष देखते हैं ) । गेहूँ आदि की
फ़सल हो जाने पर भी लोग नाच और गाने के साथ ईश्वर का धन्यवाद
करते थे । इसके साथ साथ स्वांग भी निकालते थे । ये सब वास्तव में
रूपक (अथवा नाटक ) के पूर्व रूप ही हैं ।
महाभारत में भी 'नट' शब्द का उल्लेख मिलता है । नाटक के
अभिनेता या नृत्य करने वाले को ही नट कहते हैं । नट और नाटक
दोनों नट् अथवा नृत्त धातु से निकले हैं :— "नटति नृत्यति वा यः स
नटः" । हरिवंश (जो कि महाभारत का ही परिशिष्ट है) में रामायण से
कथा लेकर नाटक खेलने का उल्लेख है । परन्तु इसका अपना रचना-
काल भी संदिग्ध है ।
३०० ई० पूर्व पाणिनि ने अपने व्याकरण में नाट्य-शास्त्र के
'कृशाश्व' और 'शिलालिन' इन दो आचार्यों के नाम दिए हैं । इसके
१५० वर्ष पश्चात् पतंजलि ने 'कंस-वध' और 'बलि-बन्ध' का उल्लेख
किया है, जिस से पता चलता है कि उस समय रंगशालाओं में नाटक
होते थे और दर्शक लोग देखने जाते थे ।
आर पिशचल के विचार में भारत में सब से पहिले
कठपुतलियों का नाच आरम्भ हुआ था । इस का उल्लेख महाभारत,