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नागानन्दम् (सम्राट हर्षवर्धन - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

नागानन्दम् (सम्राट हर्षवर्धन - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

Nagananda Nataka of Emperor Harsha with Commentary

सम्राट हर्षवर्धन द्वारा

DevanagariHindipublished309 पृष्ठ

पृष्ठ 17, कुल 309 में से

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पृष्ठ 17

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की ओर ही संकेत करती है। धावक के बारे में तो हम कुछ जानते ही
हो नहीं; और इन नाटकों को बाण द्वारा रचित बताना तो सर्वथा भूल
है। इन नाटकों की शैली बाण के हर्षचरित से इतनी विभिन्न है कि ये
उसी लेखनी के हो ही नहीं सकते। और फिर ब्राह्मण होते हुए बाण
भला बौद्ध कथा 'नागानन्द' कैसे लिख सकता था।
सम्भवतः यह संशय इस लिए भी उठा हो कि कोई राजा
कवि अथवा नाटककार कैसे हो सकता है ? परन्तु यह कोई असम्भव
बात नहीं है। और इतिहास में केवल हर्ष ही नहीं और भी कई राजा-
लोग अच्छे लेखक हुए हैं। यथा- शातवाहन हाल, समुद्रगुप्त,
प्रवरसेन वाकाटक, महेन्द्रविक्रमवर्मन, यशोवर्मन्, मुञ्ज, भोज,
विग्रहराजदेव, मयूरराज और शूद्रक इत्यादि कई राजालोग साहित्यकार
भी हुए हैं। अतः किसी राजा का लिखारी होना किसी आधुनिक
समालोचक के लिए आश्चर्यजनक नहीं होना चाहिए। अतः हम इस
निश्चय पर पहुंचते हैं कि ये नाटक राजा हर्ष की ही कृतियां हैं। बाण ने
भी उसके अच्छे कवि होने की प्रशंसा की है। मधुसूदन ने कहा है कि
रत्नावली श्री हर्ष ने लिखी। इत्सिंग ने नागानन्द के अभिनय होने का
उल्लेख किया है। सोड्ढल ने हर्ष को राजा-कवियों में गिना है।
जयदेव ने भी भास और कालिदास आदि के साथ हर्ष का नाम लिया
है और सुभाषितावलियों में भी कई पद्य हर्ष के बताए हैं। उनमें से
कई इन नाटकों में से है। ताम्रपत्रों में भी हर्ष की कविता के दो
उदाहरण मिलते हैं।
अब प्रश्न उठता है कि यह हर्ष कौन था? इतिहास में ऐसे चार
नाम मिलते हैं—
(i) काश्मीर-राज हर्ष;
(ii) धारानरेश भोज का पितामह हर्ष;