सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
संग्रह पर लौटें

नागानन्दम् (सम्राट हर्षवर्धन - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

Nagananda Nataka of Emperor Harsha with Commentary

सम्राट हर्षवर्धन द्वारा

DevanagariHindipublished309 पृष्ठ

( २७८ )
५. काञ्चुकीय (कंचुकी) —यह शब्द कञ्च् धातु से निकला है
जिस का अर्थ है बान्धना या चमकना। काञ्चुकीय का अर्थ है
कंचुक को धारण करने वाला। अन्तःपुर के विशेष वृद्ध ब्राह्मण
सेवक को काञ्चुकीय कहते हैं। इस का वर्णन इस प्रकार से
किया गया है:—
“अन्तःपुरचरो वृद्धो विप्रो गुणगणान्वितः ।
सर्वकार्यार्थकुशलः कंचुकीत्यभिधीयते ॥”
मातृगुप्त ने इस का लक्षण यह बताया है:—
“ये नित्यं सत्यसंपन्नाः काम-दोष-विवर्जिताः ।
ज्ञान-विज्ञान-कुशलाः कंचुकीयास्तु ते स्मृताः ॥”
अर्थात् कञ्चुकी सदा सत्य बोलता है, कामदोषों से रहित
होता है और ज्ञान तथा विज्ञान में कुशल होता है।
६. प्रवेशक — यह एक ऐसा दृश्य है जिसे दो अंकों के बीच में
रखा जाता है। इस में नीच पात्र (भृत्य आदि) काम करते हैं
जो प्राकृत बोलते हैं। इस से दो अङ्कों को परस्पर जोड़ा
जाता है। इसके द्वारा उन घटनाओं का उल्लेख किया जाता
है जो रङ्गमञ्च पर नहीं दिखाई गईं या नहीं दिखाई जा
सकतीं ! दो अङ्कों के बीच में आने के कारण प्रथम अङ्क में
इस का प्रयोग निषिद्ध है:—
“नासूचितस्य पात्रस्य प्रवेशः क्वचिदिष्यते ।
प्रवेशं सूचयेत्तस्मादमुख्याङ्के प्रवेशकात् ॥”

( २७६ )
नीच पात्रों द्वारा प्रयुक्त होने के कारण इस में उक्तियां
उत्कृष्ट अथवा रमणीय नहीं होतीं:—
“प्रवेशकोऽनुदात्तोक्त्या नीचपात्रप्रयोजितः ।”
७. विदूषक — जो अपने विकृत अङ्गों से, ऊटपटांग बातों से
और अनोखे वेष से सामाजिकों को हंसाता है उसे विदूषक-
कहते हैं ।
८. स्वगतम् (अथवा आत्मगतम्) —
“अश्राव्यं खलु यद्वस्तु तदिह स्वगतं मतम्” ।
जो बात रङ्गमञ्च पर ठहरे हुए शेष पात्रों को सुनाने योग्य
नहीं होती उसे 'स्वगतम्' कहते हैं। ऐसी बात को एक पात्र
दूसरे पात्र अथवा पात्रों से नहीं कहता वरन् अपने मन में ही
कहता है; परन्तु इस प्रकार कहता है कि सामाजिक सुन सकते
हैं।
६. प्रकाशम् — “सर्वश्राव्यं प्रकाशं स्यात् ।”
'स्वगत' के पश्चात् जो बात सब को सुनानी होती है उसे.
'प्रकाशम्' अथवा 'प्रकट' कहते हैं ।
१०. मिश्रविष्कम्भक—
वृत्तवर्तिष्यमाणानां कथांशानां निदर्शकः ।
संक्षिप्तार्थस्तु विष्कम्भ आदावङ्कस्य दर्शितः ॥
मध्येन मध्यमाभ्यां वा पात्राभ्यां सम्प्रयोजितः ।
शुद्धः स्यात् स तु सङ्कीर्णो नीचमध्यमकल्पितः ॥
बीती हुई और आगे होने वाली कथांशों का सूचक अङ्क के-

( २८० )
आरम्भ में आने वाला विष्कम्भक कहलाता है। एक या अधिक
मध्यम पात्रों के द्वारा प्रयोग किया गया विष्कम्भक ‘शुद्ध
कहलाता है और नीच तथा मध्यम दोनों प्रकार के पात्रों द्वारा
प्रयोग किए हुए को ‘मिश्र विष्कम्भक’ कहते हैं। प्रवेशक तथा
विष्कम्भक में यह अन्तर है कि ‘प्रवेशक’ में सब पात्र नीच होते
हैं और ‘विष्कम्भक’ के मध्यम या नीच और मध्यम। दूसरे,
‘विष्कम्भक’ के प्रथम अङ्क के आरम्भ में भी आने के लिए
कोई निषेध नहीं परन्तु ‘प्रवेशक’ प्रथम अङ्क के आरम्भ में
नहीं आ सकता।
११. भरत-वाक्य — नाटक के अन्त में, आशीर्वचन युक्त अथवा
शुभकामना सूचक श्लोक अथवा श्लोकों को भरतवाक्य कहते हैं।
नाट्यशास्त्र के जन्मदाता भरत मुनि के सम्मान में भरतवाक्य का
प्रयोग होने से इस का नाम भरतवाक्य पड़ गया है। इस में
राष्ट्र और जाति आदि केलिए मंगल-कामना की जाती है।
भरतवाक्य से पहिले ‘तथापीदमस्तु’ वाक्य का प्रयोग प्रायः
होता है।
III प्राकृत—
प्राकृत संस्कृत से ही निकली कही जाती है: —
“प्रकृतिः संस्कृतम्। तत आगतं प्राकृतम्॥
कई कहते हैं कि संस्कृत और प्राकृत दो बहिने हैं। जिस समय
शिक्षित समाज के बोलने की भाषा अथवा साहित्यिक भाषा
संस्कृत थी, उस समय साधारण लोगों की भाषा उस से भिन्न
थी जिसे प्राकृत के नाम से पुकारा जाता था: —
“प्रकृतानां (प्राकृत जनानां) भाषा प्राकृतम्”

( २८१ )

प्राकृत के भी कई रूप हैं- महाराष्ट्री, शौरसेनी, मागधी,
पैशाची, अवन्ति इत्यादि । प्राचीन साहित्यिक प्राकृत के नमूने
हमें ईसा-पूर्व तीसरी शताब्दी में अशोक के शिलालेखों में
मिलते हैं। इस से पूर्व बौद्ध धर्म-ग्रन्थ थे। इन शिलालेखों की
भाषा पाली थी। यदि हम प्राकृत को विस्तृत अर्थ में लें तो हमें
पाली को अत्यन्त महत्वपूर्ण स्थान देना पड़ता है। परन्तु
साधारणतया पाली-साहित्य प्राकृत-साहित्य में नहीं लिया
जाता। अतः यदि पाली साहित्य को पृथक् लिया जाए तो
हम देखते हैं कि प्राकृत साहित्य का प्रधान अंश जैन साहित्य
है जो अर्ध मागधी, महाराष्ट्री तथा जैन शौरसेनी में लिखा
गया।
काव्यों के लिए, प्राचीन काल से ही सर्व प्रधान प्राकृत
महाराष्ट्री ही रही। यही प्राकृत-महाकाव्यों तथा गीतों की
भाषा थी। और प्राकृत के वैयाकरणों ने अपना कार्य इसी के
आधार पर प्रारम्भ किया। महाकाव्यों में सब से अधिक प्रसिद्ध
‘सेतु-बन्ध’ है। रावणवहो (अथवा, दहमुहवहो), गौडवहो
तथा हेमचन्द्र के कुमारपालचरित के नाम भी उल्लेखनीय हैं।
परन्तु महाराष्ट्री के अध्ययन के लिए अत्यन्त महत्वपूर्ण कृति
हाल की सत्तसई है।
इन के पश्चात् हम नाटकीय प्राकृत के तीन रूप देखते हैं-
महाराष्ट्री, शौरसेनी तथा मागधी। प्राकृत के विभिन्न रूपों का
प्रयोग ‘मृच्छकटिकम् ’ में प्रचुर मात्रा में मिलता है।
‘कर्पूरमञ्जरी’ में तो सभी पात्र प्राकृत ही बोलते हैं।
विदूषक तथा स्त्री पात्रों की साधारण बोलचाल की भाषा
शौरसेनी होती है। इन्हीं के द्वारा बोले जाने वाले पद्यों की
भाषा महाराष्ट्री होती है। और मागधी का प्रयोग प्रायः

भृत्य, वामन, वैदेशिक आदि करते हैं; यथा अभिज्ञानशाकुन्तल
में दोनों रक्षी तथा धीवर की भाषा मागधी ही है ।
प्राकृत साहित्य का एक विशेष भाग प्राकृत व्याकरण हैं।
भारतीय नाट्य शास्त्र सब से पुराना प्रमाण है । प्राचीनतम
प्राकृत व्याकरण जो हस्तगत हुआ है वह वररुचि कात्यायन का
'प्राकृत प्रकाश' है, परन्तु इस विषय का सब से श्रेष्ठ निरूपण
जैन-आचार्य हेमचन्द्र (१०८८-११७२) ने अपने व्याकरण
"सिद्ध हेम-चन्द्र" के आठवें अध्याय में किया है ।
संस्कृत से प्राकृत और प्राकृत से संस्कृत बनाने की रीति
जानने के लिए प्राकृत की विशेषताएँ जानना बहुत आवश्यक
है । आगे हम यही विशेषताएँ देते हैं: —
१. द्विवचनस्य बहुवचनम्ः — प्राकृत में दो ही वचन होते हैं:-
एक वचन और बहु वचन । इस में द्विवचन नहीं होता ।
द्विवचन के स्थान पर बहुवचन ही कर दिया जाता है ।
२. चतुर्थ्याः षष्ठी — प्राकृत में चतुर्थी के स्थान में षष्ठी होती
है ।
३. प्राकृत में आत्मनेपद नहीं होता । प्रत्येक धातु परस्मैपद में
होती है ।
४. प्राकृत में निम्न लिखित स्वर होते ही नहीं: —
ऋ; ॠ; ऌ; ॡ; ऐ; औ; अः ।
(i) संस्कृत के 'ऋ' के स्थान में अगले वर्ण का स्वर आ
जाता है:— तृण से तण; ऋषि से इसि इत्यादि ।
अपवाद — वृद्ध से वुढ्ढ और ऋण से रिण ।

( २४३ )
(ii) ‘लृ’ को ‘इलि’ हो जाता है जैसे: —क्लृप्त से किलित्त।
(iii) ऐ; औ के स्थान में क्रमशः ए, ओ आते हैं:—
शैल से सेल; औरस से ओरस; सौम्य से सोम्य ।
ऐ को अ + इ और औ को अ + उ भी होता है: — दैव
से दइव; दैत्य से दइच्च; भैरव से भइरव; कौरव से कउरव
इत्यादि ।
५. 'नो णः सर्वत्र' । प्राकृत में सब स्थान पर न को ण होता-
है:— नदी से णई इत्यादि ।
६. 'शषयोः स'— श् तथा ष् के स्थान में स् हो जाता है:—निशा
से णिसा; कषाय से कसाय ।
७. "आदेर्यो जः"—संस्कृत में जिन शब्दों के आदि में य् होता है
प्राकृत में य् के स्थान पर ज् होता है:— यशः से जसो; यदि
से जइ; यज्ञ से जक्खो । अपवाद— यष्टि से लट्ठी ।
८. परन्तु यदि 'य्' आदि में न होकर मध्य अथवा अन्त में हो तो
इसके स्थान में 'अ' हो जाता है:— जय से जअ ।
९. "मो बिन्दु"ः— पदान्त 'म्' को अनुस्वार हो जाता है:—
भद्रम् से भद्दं ।
१०. अकारान्त— शब्द के अन्त में यदि विसर्ग आए तो उस विसर्ग
को 'उ' हो जाता है। यह 'उ' पहिले 'अ' से मिलकर 'ओ' हो
जाता है :—
पुरुषः से पुरिसो ।

( २८४ )
११. “अन्ते हल्”— पदान्त में हलन्त का लोप हो जाता है :—
देवात् से देवा; जगत् से जग; मनस् से मन इत्यादि ।
१२. “पो वः”— पदान्त अथवा पद के बीच के प् को व् हो
जाता है :— शापः से सावो ।
१३. “टो डः”; “ठो ढः”— ट् और ठ् को क्रमशः ड् और ढ्
हो जाता है ;— नटः से णडो; पठ से पढ ।
१४. “डस्य लः”— ड् को ल् हो जाता है :—तडागः से तलाओ ।
१५. यदि क्, ग्, च्, ज्, त्, द्, प्, य्, और व् आरम्भ में न
हों तो प्रायः इन का लोप हो जाता है:— लोकः से लोओ;
सागरम् से साअरं; वातः से वाओ; कपि से कइ; जीव से जीअ;
वायु से वाउ; नयन से णअण इत्यादि ।
१६. यदि ख्, घ्, थ्, ध् और भ् आरम्भ में न हों तो इन के
स्थान में ‘ह्’ आ जाता है:—
मुखम् से मुहं; मेघ से मेह; गाथा से गाहा; नभसः से णहसो ।
१७. (क) “उपरिलोपः—क्, ग्, ड्, त्, द्, प्, ष्,
सां”— संयुक्त अक्षरों में इन व्यंजनों में से कोई आदि में हो
तो उस का लोप हो जाता है और आगे के वर्ण को द्वित्व हो
जाता है:— भक्त से भत्त; अद्य से अज्ज; स्निग्ध से सिणिद्ध;
उत्पल से उप्पल; मुद्गर से मुग्गर; सुप्त से सुत्त; हस्त से हत्थ ।
(ख) “अधो मनयां”:—संयुक्त अक्षरों में म्, न्, य् में
से कोई अन्तिम हो तो इनका लोप हो जाता है और पहिले
व्यंजन को द्वित्व हो जाता है:—
युग्म से जुग्ग; विघ्न से विग्ध; योग्य से जोग्ग ।

( २८५ )
(ग) “सर्वत्र ल्वरां” :—संयुक्त अक्षर में ल्, व्, र् का
सदा लोप हो जाता है और दूसरे अक्षर को (चाहे वह पहिले
ही या पीछे) द्वित्व हो जाता है :—
विप्लव से विक्कव; उज्ज्वल से उज्ज्ल ।
१८. 'त्य', 'थ्य' तथा 'द्य' के स्थान में क्रमशः च्च, छ् अथवा च्छ;
और ज्ज हो जाता है. – नित्य से णिच्च; सत्य से सच्च; वैद्य से
वेज्ज
१९. ध्य और ह्य के स्थान में ज्झ हो जाता है । अध्ययन से
अज्झयण इत्यादि ।

( २८५ )
(ग) "सर्वत्र लवरां" :— संयुक्त अक्षर में ल्, व्, र् का
सदा लोप हो जाता है और दूसरे अक्षर को (चाहे वह पहिले
ही या पीछे) द्वित्व हो जाता है :—
विप्लव से विक्कव, उज्ज्वल से उज्जल ।
१८. 'त्य' 'ध्य' तथा 'द्य' के स्थान में क्रमशः च्च, छ् अथवा च्छ;
और ज्ज हो जाता है — नित्य से णिच्च; सत्य से सच्च; वैद्य से
वेज्ज
१६. ध्य और ह्य के स्थान मे ज्झ हो जाता है। अध्ययन से
अज्झअण इत्यादि ।