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नागानन्दम् (सम्राट हर्षवर्धन - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

नागानन्दम् (सम्राट हर्षवर्धन - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

Nagananda Nataka of Emperor Harsha with Commentary

सम्राट हर्षवर्धन द्वारा

DevanagariHindipublished309 पृष्ठ

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पृष्ठ 304

( २८१ )

प्राकृत के भी कई रूप हैं- महाराष्ट्री, शौरसेनी, मागधी,
पैशाची, अवन्ति इत्यादि । प्राचीन साहित्यिक प्राकृत के नमूने
हमें ईसा-पूर्व तीसरी शताब्दी में अशोक के शिलालेखों में
मिलते हैं। इस से पूर्व बौद्ध धर्म-ग्रन्थ थे। इन शिलालेखों की
भाषा पाली थी। यदि हम प्राकृत को विस्तृत अर्थ में लें तो हमें
पाली को अत्यन्त महत्वपूर्ण स्थान देना पड़ता है। परन्तु
साधारणतया पाली-साहित्य प्राकृत-साहित्य में नहीं लिया
जाता। अतः यदि पाली साहित्य को पृथक् लिया जाए तो
हम देखते हैं कि प्राकृत साहित्य का प्रधान अंश जैन साहित्य
है जो अर्ध मागधी, महाराष्ट्री तथा जैन शौरसेनी में लिखा
गया।
काव्यों के लिए, प्राचीन काल से ही सर्व प्रधान प्राकृत
महाराष्ट्री ही रही। यही प्राकृत-महाकाव्यों तथा गीतों की
भाषा थी। और प्राकृत के वैयाकरणों ने अपना कार्य इसी के
आधार पर प्रारम्भ किया। महाकाव्यों में सब से अधिक प्रसिद्ध
‘सेतु-बन्ध’ है। रावणवहो (अथवा, दहमुहवहो), गौडवहो
तथा हेमचन्द्र के कुमारपालचरित के नाम भी उल्लेखनीय हैं।
परन्तु महाराष्ट्री के अध्ययन के लिए अत्यन्त महत्वपूर्ण कृति
हाल की सत्तसई है।
इन के पश्चात् हम नाटकीय प्राकृत के तीन रूप देखते हैं-
महाराष्ट्री, शौरसेनी तथा मागधी। प्राकृत के विभिन्न रूपों का
प्रयोग ‘मृच्छकटिकम् ’ में प्रचुर मात्रा में मिलता है।
‘कर्पूरमञ्जरी’ में तो सभी पात्र प्राकृत ही बोलते हैं।
विदूषक तथा स्त्री पात्रों की साधारण बोलचाल की भाषा
शौरसेनी होती है। इन्हीं के द्वारा बोले जाने वाले पद्यों की
भाषा महाराष्ट्री होती है। और मागधी का प्रयोग प्रायः