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नागानन्दम् (सम्राट हर्षवर्धन - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

नागानन्दम् (सम्राट हर्षवर्धन - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

Nagananda Nataka of Emperor Harsha with Commentary

सम्राट हर्षवर्धन द्वारा

DevanagariHindipublished309 पृष्ठ

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पृष्ठ 306

( २४३ )
(ii) ‘लृ’ को ‘इलि’ हो जाता है जैसे: —क्लृप्त से किलित्त।
(iii) ऐ; औ के स्थान में क्रमशः ए, ओ आते हैं:—
शैल से सेल; औरस से ओरस; सौम्य से सोम्य ।
ऐ को अ + इ और औ को अ + उ भी होता है: — दैव
से दइव; दैत्य से दइच्च; भैरव से भइरव; कौरव से कउरव
इत्यादि ।
५. 'नो णः सर्वत्र' । प्राकृत में सब स्थान पर न को ण होता-
है:— नदी से णई इत्यादि ।
६. 'शषयोः स'— श् तथा ष् के स्थान में स् हो जाता है:—निशा
से णिसा; कषाय से कसाय ।
७. "आदेर्यो जः"—संस्कृत में जिन शब्दों के आदि में य् होता है
प्राकृत में य् के स्थान पर ज् होता है:— यशः से जसो; यदि
से जइ; यज्ञ से जक्खो । अपवाद— यष्टि से लट्ठी ।
८. परन्तु यदि 'य्' आदि में न होकर मध्य अथवा अन्त में हो तो
इसके स्थान में 'अ' हो जाता है:— जय से जअ ।
९. "मो बिन्दु"ः— पदान्त 'म्' को अनुस्वार हो जाता है:—
भद्रम् से भद्दं ।
१०. अकारान्त— शब्द के अन्त में यदि विसर्ग आए तो उस विसर्ग
को 'उ' हो जाता है। यह 'उ' पहिले 'अ' से मिलकर 'ओ' हो
जाता है :—
पुरुषः से पुरिसो ।