नागानन्दम् (सम्राट हर्षवर्धन - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

नागानन्दम् (सम्राट हर्षवर्धन - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)
Nagananda Nataka of Emperor Harsha with Commentary
सम्राट हर्षवर्धन द्वारा
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कष्टकर है क्योंकि मैंने उस महानुभाव का वाणीमात्र से भी
सम्मान नहीं किया । वह भी सत्कार न करने वाली मुझे
व्यवहार-ज्ञान-शून्य (ही) समझेंगे !
(यह कह कर रो पड़ती है)
चेटी - राजकुमारी ! रोओ मत । अथवा कैसे न रोए । इसके हृदय
का अधिक सन्ताप और अधिक कष्ट दे रहा है । तो अब क्या
करूँ ? अच्छा तब तक चन्दनलता के पत्तों का रस (ही) उसके
हृदय पर लगाती हूं । (उठ कर चन्दन का पत्ता ले कर, उसे
निचोड़ कर हृदय पर लगाती है) । राजकुमारी ! मैं कहती हूँ
रोओ मत । यह चन्दन का रस इन लगातार गिरने वाली आंसू
की बूंदों से गर्म हुआ हुआ आप के मन के सन्ताप के दुःख को
नहीं हटा सकता ।
(केले का पत्ता लेकर पंखा करती है ।)
नायिका - (हाथ से हटाते हुई) सखी, पंखा मत कर । यह केले के
- चातुरीशून्य; व्यवहार-ज्ञान-शून्य; धर्म-कार्य में मूढ़; भूर्णा;
अल्हड़, फूहड़ ।