नागानन्दम् (सम्राट हर्षवर्धन - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

नागानन्दम् (सम्राट हर्षवर्धन - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)
Nagananda Nataka of Emperor Harsha with Commentary
सम्राट हर्षवर्धन द्वारा
DevanagariHindipublished309 पृष्ठ
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( ३७ )
ठहरा हुआ वर(ही) प्रदान कर दिया है
विदूषक— (यह सुनकर) मित्र, हमारे लिए देवी के दर्शन करने का
यही (उचित) अवसर है । तो आओ, समीप चलें ।
नायक-- मैं तो नहीं जाऊँगा ।
विदूषक— (न चाहते हुए भी नायक को ज़बरदस्ती खींच कर, उनके
पास जाकर) श्रीमती जी, आपका कल्याण हो । चतुरिका सच
ही कहती है । देवी ने यह वर ही दिया है।
नायिका— (घबराहट से उठती हुई, नायक के बारे में, अलग) सखी,
यह कौन है ?
चेटी— (नायक को देखकर, अलग) इस असाधारण आकृति से तो
मेरा विचार है कि (यही) भगवती गौरी का वर है !
[नायिका रुचि और लज्जा के साथ नायक को देखती है]
- वरः= 'वरदान' अथवा 'पति,
चेटी सम्भवतः 'वरदान' के अर्थ में प्रयोग करती है; परन्तु
विदूषक इसे 'पति' अर्थ में लेकर कहता है । - 'स्वस्ति' के साथ चतुर्थी आती है ।
- साध्वस=डर; घबराहट,
- अनन्यसदृशी = जो किसी के साथ नहीं मिलती । असाधारण ।
अद्वितीय ।