नागानन्दम् (सम्राट हर्षवर्धन - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)
Nagananda Nataka of Emperor Harsha with Commentary
सम्राट हर्षवर्धन द्वारा
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कन्याओं के लिए अति कठिन नियम और उपवासों से आराधना
करने पर भी अभी तक तुम्हारे ऊपर कोई कृपा नहीं दिखाती ।
विदूषक — मित्र, यह तो कन्या है । हम क्यों न देखें ?
नायक — हाँ क्या दोष है ? कन्याओं को देखने में कोई दोष नहीं
होता । परन्तु कदाचित् हमें देखकर बालिकाओं की स्वाभाविक
लज्जा और भय से देर तक यहां न ठहरे । अतः इसी लताकुञ्ज
की ओट से ही देखते हैं ।
विदूषक — अच्छा, ऐसा ही करते हैं ।
[दोनों देखते हैं]
विदूषक — (देखकर, आश्चर्य के साथ) मित्र ! देखो, देखो । क्या ही
हैरानी की बात है ? यह केवल वीणा बजाने की कुशलता से
ही आनन्दित नहीं कर रही, (वरन्) वीणा विज्ञान¹ के अनुरूप
अपने सौन्दर्य से भी आंखों को आनन्द देती है । तो फिर
कौन है ? क्या यह देवी है ? या नागकन्या ? या विद्याधर
कन्या ? या सिद्धकुल प्रसूता है ?
- विज्ञान = कुशलता, प्रवीणता ।