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नागानन्दम् (सम्राट हर्षवर्धन - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

नागानन्दम् (सम्राट हर्षवर्धन - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

Nagananda Nataka of Emperor Harsha with Commentary

सम्राट हर्षवर्धन द्वारा

DevanagariHindipublished309 पृष्ठ

पृष्ठ 57, कुल 309 में से

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पृष्ठ 57

( २३ )
नायक- (आश्चर्य के साथ देखकर) अहो यह तपोवन कितना शान्त
और सुन्दर है, जहां प्रसन्न मुनिगण सन्दिग्ध वेदवाक्यों पर
विचार कर रहे हैं, जहां पढ़ने वाले ब्रह्मचारी गीली गीली
समिधाएँ (हवनार्थ लकड़ियां) काट रहे हैं, और जहां ऋषि
कन्याएं छोटे छोटे वृक्षों की क्यारियों को (जल से) भर रही
हैं। यहां निश्चय से-
वृक्ष भौरों की गुंजार से मानों मधुर स्वागत (के शब्द) का
उच्चारण कर रहे हैं; फल भार से झुके हुए सिरों से मानों यह
प्रणाम कर रहे हैं; और फूलों की वर्षा करते हुए मानों (हमें)
अर्घ्य दे रहे हैं। क्या वृक्ष भी (यहां) अतिथि पूजा (करने की
विधि) सिखाए गए हैं ?
अतः यह तपोवन (हमारे) रहने योग्य है। मेरा विचार है कि
यहां रहते हुए हमें अत्यन्त सुख प्राप्त होगा।
विदूषक- (इधर उधर देखकर) मित्र, ये हरिण अपनी गरदनों को
थोड़ा घुमाए हुए हैं, इन के निश्चल मुखों से अर्ध-चर्वित
कुश के कौर गिर रहे हैं, ये ऊपर उठा कर कान लगाए हुए

  1. "अहो नु खलु" आश्चर्य द्योतक है।
  2. जिन के अर्थ अनिश्चित हैं, स्पष्ट नहीं, (सन्देहयुक्त)।
  3. क्यारी।
  4. शान्त सुन्दरता-तपोवन शान्त भी है और सुन्दर भी।
  5. नति = सिर झुका कर प्रणाम करना।
  6. सपर्या = पूजा। 7. तृप्ति, सुख, आनन्द। (परा = बहुत)
  7. मोड़ना, घुमाना।
    9, थोड़ा चबाए हुए।