नागानन्दम् (सम्राट हर्षवर्धन - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

नागानन्दम् (सम्राट हर्षवर्धन - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)
Nagananda Nataka of Emperor Harsha with Commentary
सम्राट हर्षवर्धन द्वारा
DevanagariHindipublished309 पृष्ठ
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( २१ )
विदूषक- (देख कर) मित्र ! देखो, देखो, निश्चय ही यह अत्यन्त
घने और चिकने वृक्षों से सुशोभित तपोवन सा दिखाई दे रहा
है, जहां सुगन्धित हवि की सुगन्ध से युक्त बहुत सा धूआं
निकल रहा है और जहां पशुओं के शिशु बिना किसी डर के
सुख से बैठे हैं।
नायक- (तुमने) ठीक देखा है। यह तपोवन ही है। क्योंकि-
(यहां) वस्त्रों के लिए वृक्षों की छाल मानों दया के कारण
थोड़ी थोड़ी ही छीली गई है; आकाश के समान स्वच्छ झरने
के जल में टूटे हुए अनेक पुराने कमण्डलु पड़े हैं; कहीं कहीं
मूंज की बनी हुई मेखलाएँ दिखाई दे रही हैं जिन्हें ब्रह्म-
चारियों ने टूट जाने के कारण फेंक दिया है; प्रति दिन
सुनने से तोता भी सामवेद का यह मन्त्र पढ़ रहा है।
तो आओ, भीतर जाकर देखते हैं।
[प्रवेश करने का अभिनय करते हैं]
- असाधारण अथवा विशेष रूप से ।
- चिकने, चमकते हुए ।
- भरा हुआ, युक्त ।
- न डरे हुए, न घबराए हुए ।
- जीर्ण ।
- निर्झर (पहाड़ी चश्मे) का (पानी) ।
- वटुः = ब्रह्मचारी; वेदपाठी विद्यार्थी । ब्रह्मचारी ब्राह्मण ।
- मुञ्ज घास की (बनी हुई)
- कमर पर बान्धने की रस्सी ।
- शब्द, पंक्ति अथवा मन्त्र ।