नागानन्दम् (सम्राट हर्षवर्धन - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)
Nagananda Nataka of Emperor Harsha with Commentary
सम्राट हर्षवर्धन द्वारा
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विदूषक — (मन में) वाह बुजुर्गों की सेवा में इसका लगाव ! (सोच-
कर) अच्छा, तो ऐसा हो सही, इसे दूसरी तरह से कहूंगा ।
(प्रकट) मित्र, मैं केवल राज्य-सुख के लिए ही ऐसा नहीं कह
रहा, बल्कि इसलिए भी कि आपको और भी तो (कुछ)
करना है ।
नायक — (मुस्कराते हुए) जो मेरे करने योग्य था वह सब निश्चय
ही मैं कर चुका हूं । देखो—
प्रजाजनों को न्याय के मार्ग में लगा दिया है । सज्जनों को
सुखपूर्वक बसाया है । अपने सम्बन्धियों को अपने ही समान
बना दिया है । राज्य में रक्षा स्थापित कर दी है । मनोरथ से
भी अधिक फल देने वाला कल्पवृक्ष भी याचकों को दे दिया
है । बताओ, इस से अधिक और कौनसा कर्तव्य (शेष) है.
जिसके बारे में तुम सोच रहे हो ?
विदूषक — मित्र, तुम्हारा शत्रु नीच मातङ्गदेव बड़ा साहसी है ।
- प्रजाजन ।
- नीच, दुष्ट । 'हतक' शब्द समास के अन्त में ही आता है ।