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नागानन्दम् (सम्राट हर्षवर्धन - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

नागानन्दम् (सम्राट हर्षवर्धन - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

Nagananda Nataka of Emperor Harsha with Commentary

सम्राट हर्षवर्धन द्वारा

DevanagariHindipublished309 पृष्ठ

पृष्ठ 261, कुल 309 में से

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पृष्ठ 261

( २३७ )
वृद्धा — महाराज, मैं कृतार्थ हो गई। जो मैं ने स्वस्थ शरीर वाले पुत्र
का मुख देख लिया।
मलयवती — मैं आर्यपुत्र को देखती हुई भी, इसे असम्भव जान कर,
विश्वास नहीं कर रही।
जीमूतकेतु — (पास जा कर) आओ, पुत्र, आओ। मुझे आलिङ्गन
करो।
[नायक उठना चाहता है; परन्तु चादर गिर जाती है और वह
अचेत हो जाता है]
शङ्खचूड — होश में आओ, कुमार होश में आओ।
जीमूतकेतु — हाय पुत्र, क्या मुझे देखकर भी छोड़ कर चले गए हो ?
वृद्धा — हाय पुत्र, क्या केवल वचन से भी तुमने मेरा सम्मान नहीं
किया।
मलयवती — हाय नाथ, क्या आप ने गुरुजनों का भी ध्यान नहीं करना
था ? [सब मूर्च्छित हो जाते हैं]
शङ्खचूड — हाय रे अभागे शङ्खचूड ! तू गर्भ में ही क्यों नहीं मर
गया। जो इस प्रकार प्रतिक्षण मरण से भी अधिक दुःख
अनुभव कर रहा है।
गरुड — यह सब मुझ पापी के बिना विचारे काम करने का फल है।
तो ऐसा करता हूँ। (पंखों से हवा करता हुआ) हे महात्मन्,
१. हतक = अभागा; नीच; घातक। २. नृशंस = क्रूर; पापी।
३. प्रकट होना; फल।