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नागानन्दम् (सम्राट हर्षवर्धन - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

नागानन्दम् (सम्राट हर्षवर्धन - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

Nagananda Nataka of Emperor Harsha with Commentary

सम्राट हर्षवर्धन द्वारा

DevanagariHindipublished309 पृष्ठ

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पृष्ठ 251

( २२७ )
मैं ने तो अपनी चोंच से आपके हृदय से रक्त ही निकाला है ;
पर आपने तो इस धैर्य से हमारा हृदय ही हर लिया है (वश
में कर लिया है) । अतः मैं यह सुनना चाहता हूँ कि आप कौन
हैं।
नायक — इस प्रकार भूख से पीड़ित तुम (अभी) सुनने योग्य नहीं हो ।
अतः (पहिले) मेरे मांस तथा रक्त से अपनी तृप्ति कर लो ।
शङ्खचूड— (सहसा पास जा कर) हे गरुड़ ! मत करो, ऐसा साहस
मत करो । यह नाग नहीं है । इसे छोड़ दो । मुझे
खाओ । मैं ही वासुकि के द्वारा तुम्हारे भोजन के लिए भेजा
गया हूँ । [यह कहकर अपनी छाती भेंट करता है]
(शङ्खचूड़ को देखकर, दुःख के साथ, मन ही मन) — हाय, शङ्खचूड
ने आकर मेरे मनोरथ को निष्फल कर दिया !
गरुड— (दोनों को देखकर) तुम दोनों के वध्यचिह्न है । तो कौन
(वस्तुतः) नाग है यह मैं नहीं समझ सका ।
शङ्खचूड़—आप का भ्रम उचित नहीं । (क्योंकि—)

  1. निकालना; वश में करना; हरना ।