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नागानन्दम् (सम्राट हर्षवर्धन - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

नागानन्दम् (सम्राट हर्षवर्धन - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

Nagananda Nataka of Emperor Harsha with Commentary

सम्राट हर्षवर्धन द्वारा

DevanagariHindipublished309 पृष्ठ

पृष्ठ 151, कुल 309 में से

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पृष्ठ 151

( ११६ )
चेट— जो स्वामी की आज्ञा ।
विट— (विदूषक को छोड़ कर चेटी के पैरों पड़ता है)-प्रसन्न हो,
नवमालिका ! प्रसन्न हो ।
विदूषक- (मन ही मन)- यही मेरे भागने का मौका है ।
[ भागना चाहता है ]
विट— (विदूषक को यज्ञोपवीत से पकड़ता है, यज्ञोपवीत टूट जाता है)
कहाँ, भूरे बन्दर, कहाँ भागता है ?
[ उसी की चादर से गले से बाँधकर खींचता है ]
विदूषक- देवी नवमालिका ! प्रसन्न हूजिएं । मुझे छुड़ाइए ।
चेटी-- (हँसकर) यदि भूमि पर सिर रख कर मेरे पैरों पर गिरे तो
(छुड़ाऊंगी) ।
विदूषक-- (क्रोध से कांपता हुआ) अरे क्या राजा का मित्र और ब्राह्मण
होकर तुझ राँड के पावों पहूँगा ?
चेटी-- (अंगुली से डराती हुई, मुस्कराहट के साथ) अब (तुम्हें अपने
पैरों पर ) गिराऊँगी । शेखरक ! उठो, मैं तुम पर प्रसन्न हूँ ।

  1. तर्ज् + शतृ + स्त्री० ।