नाड़ी परीक्षा एवं नाड़ी विज्ञान (महर्षि कणाद एवं रावण - वैद्यप्रभा हिन्दी व्याख्या सहित)
Nadi Pariksha and Nadi Vijnana with Hindi Commentary
महर्षि कणाद एवं रावण द्वारा
१२ नाड़ीपरीक्षा
जिसमें बात, पित्त, कफ ये तीनो पूर्ण वृद्धि होते हैं तिस नाड़ीको
आयुर्वेदके जाननेवाले कष्टसाध्य अथवा असाध्य कहते हैं ॥४९॥
कंदमध्ये स्थिता नाड़ी सुषुम्नेति प्रकीर्तिता ।
तिष्ठन्ते परितः सर्वाश्चक्रेऽस्मिन्नाडिकास्ततः ॥५०॥
सूंडी (नाभि) के बीचमें सुषुम्नानाड़ी स्थित कही है और
एक नाड़ीके सब भागों विषे सूंडी अर्थात् नाभीचक्रमें सब नाड़ी
स्थित हैं ॥५०॥
सार्द्धत्रिकोट्योनाड्योहिस्थूलाःसूक्ष्माश्चदेहिनाम् ।
नाभिकन्दनिबद्धास्तास्तिर्यगूर्ध्वमधः स्थिताः ॥५१॥
देहधारियोंके शरीरमें साढ़े तीन करोड़ स्थूल और सूक्ष्म नाड़ी
हैं और सब नाड़ी नाभीके मूलमें बंधी हुई और टेढ़ी, ऊपरको नीचे
को ऐसे स्थित हैं ॥५१॥
तिस्रः कोट्यर्द्धकोटी च यानि लोमानि मानुषे ।
नाडीमुखानि सर्वाणि घर्मबिंदुं क्षरंति च ॥५२॥
मनुष्योंके शरीरमें साढे तीन करोड़ रोम हैं वे सब नाड़ियोंके
मुख हैं तिन्होंके द्वारा पसीना निकलता है ॥५२॥
नानानाडीप्रसवजं सर्वभूतान्तरात्मनि ।
ऊर्ध्वमूलमधःशाखं वायुमार्गेण सर्वगम् ॥५३॥
सब मनुष्योंके अंतरात्मामें ऊपरको मूलवाला ब्रह्म है, नीचेका
शाखावाला हिरण्यगर्भादि हैं, सो प्राण आदि वायुके मार्गके द्वारा
सर्वव्यापी हैं ॥५३॥
द्विसप्ततिसहस्राणि नाड्यः स्युर्वायुगोचराः ।
तर्पयन्ति रसं देहं नद्यस्तोयैरिवार्णवम् ॥
द्विसप्ततिसहस्रन्तुतासांस्थूलाःप्रकीर्तिताः ॥५४॥
१००२ नाडी वायुके अनुकूल हैं सब नाड़ीरसोंकरके देहको
तृप्त करती है, जैसे नदी जलसे समुद्रको । तिन्हें में १०७२ स्थूल नाड़ी
कही हैं ॥५४॥
हिंदीटीकासहिता १३
देहे धमन्यो धन्यास्ताः पंचेन्द्रियगुणावहाः ।
नाभिकंदस्थितास्तास्तुनाभीचक्रेप्रवेष्टिताः ॥५५॥
शरीरमें सब धमनी नाड़ी धन्य हैं, पांचों इन्द्रियोंके गुणको
वहती हैं, नाभिमूलमें स्थित हैं और नाभिचक्रमें प्रवेष्टित हो
रही हैं ॥५५॥
इडा च पिङ्गला चैव सुषम्ना च सरस्वती ।
वारुणी चैवपूषा च हस्तिजिह्वा यशस्विनी ॥५६॥
इडा, पिंगला, सुषुम्ना, सरस्वती, वारुणी, पूषा, हस्तिजिह्वा
यशस्विनी ॥५६॥
विश्वोदरी कुहुश्चैव शंखिनी च पयस्विनी ।
अलंबुषा च गांधारी मुख्याश्चैताश्चतुर्दश ॥५७॥
विश्वोदरी, कुहु, शंखिनी, पयस्विनी, अलंबुषा, गांधारी ये
चौदह नाड़ी प्रधान हैं ॥५७॥
इडा च पिंगला चैव सुषम्ना च सरस्वती ।
गांधारी हस्तिजिह्वा च कुहुःपूषायशस्विनी ॥५८॥
इडा, पिंगला, सुषुम्ना, सरस्वती, गांधारी, हस्तिजिह्वा, कुहु,
पूषा, यशस्विनी ॥५८॥
चारनालम्बुषा विश्वा शंखिनी च पयस्विनी ।
एताः प्राणवहानाड्योजीवकोशे प्रतिष्ठिताः ॥५९॥
चारना, अलंबुषा, विश्वा, शंखिनी, पयस्विनी ये नाड़ी प्राणोंको
वहनेवाली जीवकोशमें स्थित हैं ॥५९॥
तत्र प्रधाना नाड्यस्तु दश वायुप्रवाहिकाः ।
इडा च पिंगला चैव सुषम्ना चोर्ध्वगामिनी ॥६०॥
उनमें प्रधान दश नाड़ी वायुको वहती हैं, इडा पिंगला सुषुम्ना
ये नाड़ी ऊपरको गमन करती हैं ॥६०॥
गांधारी हस्तिजिह्वा च प्रसारगमना स्थिता ।
अलम्बुषा यशा चैव दक्षिणाङ्गे समन्विता ॥६१॥
१४ नाड़ीपरीक्षा
गांधारी और हस्तिजिह्वा ये नाड़ी फैलकर गमन करती हैं,
अलंबुषा और यशस्विनी नाड़ी दाहिने अंगमें लगी हुई हैं ॥६१॥
कुहुश्च शंखिनी चैव वामाङ्गे चावलम्बिता ।
एतासु दशनाडीषु नानाकार्य प्रसूतिका ॥६२॥
कुहू और शंखिनी नाड़ी वाम अंगमें लगी हुई हैं, इन दश नाड़ियों-
में प्रसूतिक नाड़ी अनेक कार्यमें कुशल है ॥६२॥
इडा च वामनासायां दक्षिणे पिंगला मता ।
सुषुम्ना ब्रह्मरन्ध्रे च गान्धारी वामचक्षुषि ॥६३॥
नासिकाके वाम भागमें नाड़ी इडा स्थित है, और दक्षिण भागमें
पिंगला नाड़ी स्थित है. शिरविषे सुषुम्ना नाड़ी स्थित है, बामनेत्रमें
गांधारी नाड़ी स्थित है ॥६३॥
दक्षिणे हस्तिजिह्वा च पूषा कर्णेऽथ दक्षिणे ।
वामे यशस्विनी ज्ञेया मुखे चालंबुषा मता ॥६४॥
दाहिने नेत्रमें हस्तिजिह्वा नाड़ी स्थित है. दाहिने कानमें पूषा
नाड़ी स्थित है. वाम कानमें यशस्विनी नाड़ी स्थित है. मुखमें अलंबुषा
नाड़ी स्थित है ॥६४॥
कुहुश्च लिङ्गमूले स्याच्छङ्खिनी शिरसोपरि ।
एवं द्वारं समाश्रित्य तिष्ठंति दशनाडिकाः ॥६५॥
लिंगकी जड़में कुहु नाड़ी स्थित है, शिरके ऊपर शंखिनी नाड़ी
स्थित है, इस प्रकार द्वारोंके आश्रित होके दश नाड़ी स्थित हो रही हैं॥६५
प्राणोऽपानः समानश्च उदानो व्यान एव च ।
नागः कूर्मोऽथ कृकरो देवदत्तो धनञ्जयः ॥६६॥
प्राण, अपान, समान, उदान, व्यान, नाग, कूर्म, कृकर, देवदत्त,
धनंजय ॥६६॥
एते नाडीषु सर्वासु चरन्ति दश वायवः ।
एतेषु वायवः पंचमुख्याः प्राणादयः स्मृताः ॥६७॥
३. द्वन्द्वज व सन्निपातज नाड़ी गति, साध्यासाध्य विवेक व उपसंहार
हिंदीटीकासहिता १५
ये दश वायु सब नाड़ियोंमें विचरते हैं इन्होंने प्राण आदि पांच
वायु प्रधान कहे हैं ॥६७॥
तेषु मुख्यतमावेतौ प्राणापानौ नरोत्तमे ।
प्राण एव तयोर्मुख्यः सर्व प्राणभृतां सदा ॥६८॥
और उन पांच वायुओंमेंभी प्राण और अपान ये दोनों प्रधान और
इन दोनोंमेंभी सब प्राणियोंके सब कालविषे प्राणवायु प्रधान है ॥६८॥
शब्दग्रहाश्रुतौ नाडी रूपग्रहा च लोचने ।
गंधग्रहा नासिकायां रसनायां रसावहा ॥६९॥
कानमें नाड़ी शब्दको ग्रहण करती है, नेत्रमें नाड़ी रूपको ग्रहण
करती है, नासिकामें नाड़ी गंधको ग्रहण करती है, जीभमें नाडी रसको
ग्रहण करती है ॥६९॥
एवं त्वक्षु स्पर्शवहा शब्दकृद्धृद्यान्मुखे ।
मनो बुद्ध्यादिकं सर्वं हृदयेषु प्रतिष्ठितम् ॥७०॥
इस प्रकार स्वचामें नाड़ी स्पर्शका ग्रहण करती है, हृदयसे
मुखके द्वारा नाड़ी शब्दों को उच्चारण करती है, मन और बुद्धि आदि
सब हृदय में प्रतिष्ठित है ॥७०॥
गान्धारी हस्तिजिह्वाख्या सपूषालंबुषा मता ।
यशस्विनी शंखिनी च कुहुःस्युःसप्तनाडयः ॥७१॥
गांधारी, हस्तिजिह्वा, पूषा, अलंबुषा, यशस्विनी, शंखिनी ये
सात नाड़ी हैं ॥७१॥
इडापृष्ठे तु गान्धारी मयूरगलसन्निभा ।
सव्यपादादिनेत्रांता गांधारी परिकीर्तिता ॥७२॥
इडा नाड़ीके पृष्ठ भागमें गांधारी नाडी मोरके गलेके समान
कांतिवाली है और (बायें) पैरसे लेके नेत्रपर्यन्त स्थित है ॥७२॥
हस्तिजिह्वोत्पलप्रेक्षा नाड़ी तस्याः पुरः स्थिता ।
सव्यभागस्य मूर्द्धादिपादांगुष्ठांतमाश्रिता ॥७३॥
हस्तिजिह्वा नाड़ी कमलके समान है और इडा नाड़ीके आगे
१६ नाड़ीपरीक्षा
स्थित और वाम भागके मस्तक आदिसे लेकर पैरके अंगुठेके अंततक
आश्रित है ॥७३॥
पूषा तु पिंगलापृष्ठे नीलजीमूतसन्निभा ।
याम्यभागस्य नेत्रांता यावत्पादतलङ्गता ॥७४॥
पिंगला नाड़ीके पृष्ठभागमें बादलकें समान कांतिवाली और
दाहिने पैरके तलुएसे लेके नेत्रपर्यन्त स्थित पूषा नाड़ी हैं ॥७४॥
यशस्विनी शंखवर्णा पिंगला पूर्वदेशगा ।
गांधार्याश्च सरस्वत्या मध्यस्था शंखिनी मता ॥७५॥
शंखके समान वर्णवाली और पिंगला नाड़ीसे पूर्व भागमें स्थित
यशस्विनी नाड़ी है, गांधारी नाड़ी और सरस्वती नाड़ी के मध्यमें
शंखिनी स्थित है ॥७५॥
सुवर्णवर्णा पादादिकर्णांता सव्यभागके ।
पादांगुष्ठादिमूर्द्धांता याम्यभागे कुहुर्मता ॥७६॥
यह सुवर्णके समान वर्णवाली और वाम पैरसे लेके कान पर्यंत
है, दाहिने पैरके अंगुठेसे आदि लेके मस्तकपर्यन्त कुहुनाड़ी स्थित
है ॥७६॥
मुक्तिमार्गे सुषम्ना सा ब्रह्मरन्ध्रेति कीर्तिता ।
अव्यक्तासाचविज्ञेयासुषम्नावैष्णवीस्थिता ॥७७॥
सुषम्ना नाड़ी मुक्तिमार्गमें स्थित है, शिरमें अव्यक्त रूप वैष्णवी
नाड़ी स्थित है ॥७७॥
तासां तिस्रः प्रधानास्तु तिसृष्वेकोत्तमा मता ।
इडा च पिंगला चैव सुषम्ना च तृतीयका ॥७८॥
सब नाड़ियोंमें इडा पिंगला सुषम्ना ये तीन नाड़ी प्रधान हैं
और तीनोंमें एक सुषम्ना नाड़ी प्रधान है ॥७८॥
तत्रैका वामतो याति द्वितीया दक्षिणे तथा ।
मध्ये वायुपथं विद्यास्त्रिभिस्तुल्यंगतागतम् ॥७९॥
तहां एक नाड़ी वामावर्तमें गमन करती है और दूसरी नाड़ी
हिंदीटीकासहिता १७
दक्षिणावर्तमें गमन करती है और तीसरी नाड़ी मध्यमें गमन करती है.
इन तीनोंके द्वारा तुल्य गमन और आगमनवाला वायुमार्ग जानना ॥७९॥
इडा च शंखचंद्राभा तस्या वामे व्यवस्थिता ।
पिंगला सितरक्ताभा दक्षिणं पार्श्वमाश्रिता ॥८०॥
शंख और चंद्रमाके समान प्रकाशवाली इडा नाड़ी सुषुम्नाके
वाम भागमें व्यवस्थित है, सफेद और लाल कांतिवाली पिंगला नाड़ी
सुषुम्नाके दक्षिण भागमें व्यवस्थित है ॥८०॥
चन्द्रः सूर्यो मरुच्चैव त्रयस्तिसृष्ववस्थिताः ।
तथा रजस्तमः सत्त्वं राज्यहःकाल एव च ॥८१॥
चंद्रमा, सूर्य, वायु ये तीन इन तीनों नाड़ियोंमें व्यवस्थित हैं.
रजोगुण, तमोगुण सत्त्वगुण, रात्रि, दिन काल ये भी युक्त जानने ॥८१॥
इडा दोषमयी प्रोक्ता पिंगला वह्निरूपिणी ।
वाय्वाग्नेयीसुषुम्ना च ब्रह्मद्वारपंथानुगा ॥८२॥
इडा नाड़ी दोषोंवाली. है, पिंगला नाड़ी अग्निरूपवाली है,
सुषुम्ना नाड़ी वायु और अग्निरूपवाली है और ब्रह्मद्वारके मार्गमें
गमन करती है ॥८२॥
पद्मकोषप्रतीकाशं सुषिरैश्च विभूषितम् ।
हृदयं तद्विजानीयाद्विश्वस्यायतनं हि तत् ॥८३॥
पद्म कोशके समान और छिद्रोंसे विभूषित हृदय जानना यह
विश्वका स्थान है ॥८३॥
दक्षिणा पिंगला नाडी वह्निमंगलगोचरा ।
देवयानमिति ज्ञेया पुण्यकर्मानुसारिणी ॥८४॥
शरीरके दक्षिण भागमें पुण्यकर्मानुसारिणी और अग्निमंडलमें
प्राप्त और मूलाधारसे दक्षिणावधि सहस्रदलपर्यन्त जो पिंगला नाड़ी
है तहां देवयान नाम नाड़ी जानना ॥८४॥
इडा च वामनिःश्वासः सोममण्डलगोचरा ।
पितृयानमिति ज्ञेया वाममाश्रित्य तिष्ठति ॥८५॥
१८
नाड़ीपरीक्षा
वाम नासापुटके द्वारा चंद्रमण्डलमें प्राप्त और मूलाधारावधि
सहस्रदलपर्यन्त जो इडा नाड़ी है तिसको पितृयान कहत हैं ॥८५॥
गुदस्य पृष्ठ भागेऽस्मिन्वीणादण्डस्य देहभृत् ।
दीर्घास्थिमूध्नि पर्यन्तं ब्रह्मदण्डेति कथ्यते ॥८६॥
इसी शरीरमें मूलाधारके पृष्ठभागमें वीणादंडके समान स्थित
मस्तकपर्यन्त ब्रह्मदंडा नाड़ी कही जाती है ॥८६॥
तस्यान्ते सुषिरं सूक्ष्मं ब्रह्मनाडीति सूरिभिः ।
इडापिंगलयोर्मध्ये सुषुम्ना सूक्ष्मरूपिणी ।
सर्वं प्रतिष्ठितं यस्मिन्सवंगं सर्वतोमुखम् ॥८७॥
तिस ब्रह्मदंडा नाड़ीके अंतमें एक महीन छिद्र है तिसको पंडित
ब्रह्मनाड़ी कहते हैं इडा और पिंगलाके मध्यमें सूक्ष्म रूपवाली सुषुम्ना
नाड़ी है जिसमें सर्वरूप और सर्वव्यापी और सब तरफको मुखवाला ब्रह्म
प्रतिष्ठित है ॥८७॥
तस्या मध्यगताः सूर्यसोमाग्निपरमेश्वराः ।
भूतलोका दिशः क्षेत्रं समुद्राः पर्वताः शिलाः ॥८८॥
सुषुम्ना नाड़ीके मध्यमें सूर्य, चंद्रमा, अग्नि, परमेश्वर ये चार
देव, पंचभूत, चौदह लोक, दशोदिशा, काशी आदि धर्मक्षेत्र, सात
समुद्र, सात पर्वत ॥८८॥
द्वीपाश्च निम्नगा वेदाः शास्त्रविद्याकुलाक्षराः ।
स्वरमंत्रपुराणानि गुणाश्चैतानि सर्वशः ॥८९॥
सब द्वीप, नदी, सब वेद, मीमांसा आदि शास्त्रविद्या, ककार
आदि अक्षर, अकार आदि स्वर, गायत्री आदि मंत्र, अठारह पुराण,
तीनों गुण ॥८९॥
बीजजीवात्मकस्तेषां क्षेत्रज्ञः प्राणवायवः ।
सुषुम्नांतर्गतं विश्वं तस्मिन्सर्वं प्रतिष्ठितम् ॥९०॥
महादादि जीवात्मक जीव, प्राण आदि पंच, नाग आदि पंच
वायु ये सब स्थित हैं और सुषुम्ना नाड़ीके अंतर्गत ही संपूर्ण जगत है ९०॥
हिंदीटीकासहिता १९
क्वचिच्चक्रं च कोशश्च क्वचिज्जीवगृहं स्थितम् ।
अस्मिंश्चक्रेस्थितोजीवःपुण्यापुण्यप्रदेशिताम् ॥९१॥
कहीं चक्र है, कहीं कोषके आकार है, कहीं जीवका घर है ऐसे
जीवका पुण्य और पाप इस चक्ररूपमें स्थित जानना ॥९१॥
प्राणांश्च सममारूढो देहे भ्रमति सर्वदा ।
तंतुपंजरमध्यस्था यथा भ्रमति लूतिका ॥९२॥
वह जीव सब प्राणोंका आरोहण कर देहविषे सब काल भ्रमता
है, जैसे सूतपिंजरके मध्यमें मकड़ी भ्रमती है ॥९२॥
यस्तमभ्यारुते नित्यं तच्च तेनान्तरात्मना ।
न तस्य जायते मृत्युरिति सर्वागमोदितम् ॥९३॥
जो मनुष्य जीवगत मनके द्वारा तिस नित्य ब्रह्मका अभ्यास
करता है तिसकी मृत्यु नहीं होती ऐसे सब शास्त्रमें प्रकाशित है ॥९३॥
नाभिरोजो गुदं शुक्रं शोणितं शंखकौ तथा ।
मूर्द्धा स कांडहृदयं प्राणस्यायतनं दश ॥९४॥
नाभि, ओज, गुदा, वीर्य, रक्त, दोनों कनपटी, मस्तक, कण्ठ
और हृदय ये दश प्राणके स्थान हैं ॥९४॥
त्रिंशद्धस्तप्रमाणा तु विश्वोदरी द्वयाधिका ।
एकहस्तप्रमाणा स्यात्कण्ठदेशस्यनाडिका ॥९५॥
बत्तीस हाथ प्रमाणवाली विश्वोदरी नाड़ी सर्व मनुष्योंके पेटमें
स्थित है. एक हाथ प्रमाणवाली नाड़ी कंठदेशमें स्थित है ॥९५॥
दशहस्ता ततः पश्चादामाशये प्रकीर्तिता ।
पच्यमानाशया ज्ञेया दशहस्ता ततः परम् ॥९६॥
तिसके पीछे दश हाथ प्रमाणवाली नाड़ी आमाशयमें है तिससे
परे दश हाथ प्रमाणवाली नाड़ी पच्यमान आशयमें स्थित है ॥९६॥
पक्वाशयात्ततः पक्वादशहस्ता प्रकीर्तिता ।
एकहस्ता गुह्यदेशे शंखावर्त्ता त्रिनाडिका ॥९७॥
तिससे पर दश हाथ प्रमाणवाली नाड़ी पक्वाशयमें स्थित है,
२० नाड़ीपरीक्षा
एक हाथ प्रमाणवाली और शंखकी आंटीके सदृश नाड़ी गुदामें
स्थित है ॥९७॥
भुक्तमामाशये तिष्ठेत्पच्यमानाशये पचेत् ।
पक्वं पक्वाशये तिष्ठेद्वह्निः पक्वाशयोपरि ॥९८॥
भोजन किया आमाशयमें स्थित रहता है और पच्यमाना शयमें
जाके पकता है और पककर पक्वाशयमें ठहरता है. पक्वाशयके ऊपर
अग्नि है ॥९८॥
पच्यमानाशये पक्वं मलपक्वाशये व्रजेत् ।
रसो भुक्तादिकानां च नाभिनाड्याकलेवरम् ।
सकलं याति मरुता नीयमानः स्वमाश्रयम् ॥९९॥
पच्यामानाशयमें पके हुए मलको पक्वाशयमें प्राप्त करता है
आहार आदि रस नाभिकी नाड़ीके द्वारा वायुसे प्राप्त होके संपूर्ण
शरीरमें गमन करते हैं ॥९९॥
नाभिस्तु कूर्मरूपःस्यान्महानाड्यष्टपाद्द्भवेत् ॥
चतस्रः पृष्ठदेशे स्युश्चतस्रः क्रोडदेशतः ॥१००॥
कछुएके आकार नाभि है तहां आठ पैरवाली महानाड़ी है
पृष्ठभागमें चार नाड़ी और छाती देशमें चार नाड़ी स्थित हैं ॥१००॥
इति हिंदीटीका सहित नाड़ीपरीक्षा संपूर्ण ।