सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
संग्रह पर लौटें

नाड़ी परीक्षा एवं नाड़ी विज्ञान (महर्षि कणाद एवं रावण - वैद्यप्रभा हिन्दी व्याख्या सहित)

Nadi Pariksha and Nadi Vijnana with Hindi Commentary

महर्षि कणाद एवं रावण द्वारा

DevanagariHindipublished20 पृष्ठ

१. नाड़ी-उत्पत्ति, स्थान एवं परीक्षा-समय विधान

४ नाड़ीपरीक्षा
रोगीके दाहिने हाथ के अंगूठे के मूल के नीचे वैद्य अपने दाहिने हाथसे
रोगको जाननेके लिये नाड़ीको छुवे ॥५॥
स्थिरचित्तः प्रशांतात्मा मनसा च विशारदः ।
स्पृशेदंगुलिभिर्नाडीं जानीयाद्दक्षिणे करे ॥६॥॥
स्थिर चित्तवाला प्रसन्न आत्मा और मनसे अच्छा विचार करनेवाला
बुद्धिमान् वैद्य तीन अंगुलियों से रोगीके दाहिने हाथ में नाड़ीको
जाने ॥६॥
प्रायः स्फुटा भवति वामकरे वधूनां
पुंसां च दक्षिणकरे तदियं परीक्षा ।
ईषद्विना मितकरं विततांगुलीयं
बाहुं प्रसार्य रहितं परिपीडनेन ॥७॥
प्रायः करके स्त्रियोंके बायें हाथमें और पुरुषोंके दाहिने हाथ में
नाड़ी स्फुट होती है यह परीक्षा है कछुक नवे ( झुके ) हुए हाथसे संयुक्त
और फैली हुई अंगुलियोंवाला परिपीडनसे रहित बाहुको प्रसारित
करके ॥७॥
ईषद्विन्नम्रकृतकूर्परवामभागहस्ते प्रसारितसदंगुलिसंधिकेच ।
अङ्गुष्ठमूलपरिपश्चिमभागमध्ये नाडीं प्रभातसमये प्रथमं परीक्षेत ८
कछुक नई कुहनीके वाम भागवाले और फैली हुई अंगुलियोंकी
संधियोंवाले और अंगूठेके मूलसे पश्चिम भागवाले हाथमें प्रभात-
समय नाड़ीकी प्रथम परीक्षा करे ॥८॥
वारत्रयं परीक्षेत धृत्वा धृत्वा विमुञ्चयेत् ।
विमृश्य बहुधा बुद्ध्या रोगव्यक्तिं विनिर्दिशेत ॥९॥
तीन तीन वार परीक्षा करे और पकड़ पकड़कर नाड़ीको छोड़ता
जाय और बुद्धिसे बहुत प्रकारसे विचारकर रोगकी प्रगटताको कहे॥९॥

हिंदीटीकासहिता ५
अंगुलीभिस्त्रिभिः स्पृष्ट्वा क्रमाद्दोषत्रयोद्भवाम् ।
मंदांमध्यगतांतीक्ष्णां त्रिभिर्दोषैस्तु लक्षयेत् ॥१०॥
तीन अंगुलियोंसे नाड़ीको स्पर्श कर पीछे क्रमसे वात, पित्त, कफ
इन्होंके योग से मंद, मध्य, तीक्ष्ण नाड़ीको तीन दोषोंसे लक्षित करे॥१०॥
वातं पित्तं कफं द्वन्द्वं त्रितयं सान्निपातिकम् ।
साध्यासाध्यविवेकं च सर्वं नाडी प्रकाशते ॥११॥
वात, पित्त, कफ, वातपित्त, वातकफ, पित्तकफ, सन्निपात और
साध्य असाध्यकी विवेचना इन सबोंको नाड़ी प्रकाश करती है ॥११॥
स्नायुर्नाडी तथा हिंस्रा धमनी धारिणीधरा ।
तंतुकी जीवनज्ञाना शब्दाःपर्यायवाचकाः ॥१२॥
स्नायु, हिंस्रा, धमनी, धारिणी, धरा, तंतुकी, जीवनज्ञाना ये सब
नाड़ीके नाम हैं ॥१२॥
सद्यः स्नातस्य भुक्तस्य तथा स्नेहावगाहिनः ।
क्षुत्तृषार्तस्य सुप्तस्यनाडीसम्यङ् न बुध्यते ॥१३॥
तत्काल न्हाये हुए की और भोजन किये हुए की और तेल घृत
आदि स्नेह लगाकर स्राव करनेवाली की भूख और तृषासे पीडित
हुएकी और निद्रामें सोते हुएकी नाड़ी अच्छी तरह नहीं जानी जाती
है ॥१३॥
अङ्गुष्ठमूलभागे या धमनी जीवसाक्षिणी ।
तच्चेष्टया सुखं दुःखं ज्ञेयं कायस्य पंडितैः ॥१४॥
अंगूठेके मूल भागमें जो जीवसाक्षिणी धमनी है, तिसकी गतिसे
पंडितोंको शरीरका सुख दुःख जानना चाहिये ॥१४॥
स्त्रीणां भिषग्वामहस्ते वामे पादे च यत्नतः ।
शास्त्रेण संप्रदायेन तथा स्वानुभवेन वै ॥१५॥
परीक्षेदत्नवच्चा सावभ्यासादेव ज्ञायते ॥१६॥

६ नाड़ीपरीक्षा
शास्त्रकी संप्रदायकरके तथा अपने अनुभवसे वैद्य स्त्रियोंके बायें
हाथमें और बायें पैरमें रत्नकी समान नाड़ीकी परीक्षा करे, यह नाड़ी
अभ्याससे जानी जाती है ॥१५॥१६॥
वातनाडी भवेद् ब्रह्मा पित्तनाडी च शंकरः ।
श्लेष्मनाडी भवेद्विष्णुस्त्रिदेवांनाडिदेवताः ॥१७॥
वायुकी नाड़ी के ब्रह्मा देवता है, पित्त की नाड़ी के महादेव, कफकी
नाड़ी के विष्णु देवता हैं, ऐसे ये तीनों देवता नाड़ी के हैं ॥१७॥
अग्रे वातवहा नाडी मध्ये भवति पित्तला ।
अंते श्लेष्मविकारेण नाडी ज्ञेया बुधैः सदा ॥१८॥
वायुको बहनेवाली नाड़ी अग्र भागमें होती है, पित्त को बहने-
वाली नाड़ी मध्य भागमें होती है और कफको बहनेवाली नाड़ी अंतमें
होती है, ऐसे वैद्यको सब कालमें नाड़ी जाननी चाहिये ॥१८॥
वाताद्वक्रगतिर्नाडी पित्तादुत्प्लुत्य गामिनी ।
कफान्मंदगतिर्ज्ञेया संनिपातादतिद्रुतम् ॥१९॥
वायुके कोपसे नाड़ी टेढ़ी गतिवाली होती है, पित्तके कोपसे नाड़ी
कूद कूदकर चलती है, कफके कोपसे नाड़ी मंद गतिवाली जाननी,
सन्निपातके कोपसे नाड़ी अति शीघ्र चलती है ॥१९॥
सर्पजलौकादिगतिंवदंति विबुधाः प्रभंजननाडीम् ।
पित्तेन काकलावकमंडूकादेस्तथा चपलाम् ॥२०॥
वैद्यजन वायुके कोषमें सर्प जलौका आदिके समान चलनेवाली
नाड़ी होती है ऐसा कहते हैं और पित्तके कोपमें काक, लावा, मेंडक
आदिके समान चलनेवाली और चपल नाड़ी होती है ऐसा कहते हैं ॥२०॥
राजहंसमयूराणां पारावतकपोतयोः ।
कुक्कुटस्य गतिं धत्ते धमनी कफसंगिनी ॥२१॥
कफके कोपमें राजहंस, मोर, परेवा, कपोत, मुरगा इन्होंके समान
चलनेवाली नाड़ी होती है ॥२१॥

हिण्डोकासंहिता ७
पित्ते व्यक्ता मध्यमायां तृतीयांगुलिगा कफे ।
वातेऽधिके भवेन्नाडी प्रव्यक्तातर्ज्जनीतले ॥२२॥
पित्तके कोपमें मध्यमा अंगुलीमें नाड़ी प्रकट होती है, कफके कोपमें
अनामिका अंगुलीमें नाड़ी प्रकट होती है और वायुके कोपमें तर्जनी
अंगुलीमें नाड़ी प्रकट होती है ॥२२॥
मुहुः सर्पगतिर्नाडी मुहुर्भेकगतिस्तथा ।
तर्जनीमध्यमामध्ये वातपित्तेऽधिकेस्फुटा ॥२३॥
वातपित्तकी अधिकतामें वारंवार सर्पकी तरह चलनेवाली और
वारंवार मेंडकके समान चलनेवाली नाड़ी तर्जनी और मध्यमा अंगु-
लीके मध्यमें प्रकट होती है ॥२३॥
वक्रमुत्प्लुत्य चलति धमनी वातपित्ततः ।
सर्पहंसगतिं तद्वद्वातश्लेष्मवतीं वदेत् ॥२४॥
वातपित्तके कोपसे टेढ़ी होती हुई और कूदती हुई नाड़ी चलती है
सर्प और हंसके समान चलनेवाली नाड़ी वातकफकी अधिकतासे
होती है ॥२४॥
अनामिकायां तर्जन्यां व्यक्ता वातकफे भवेत् ।
वहेद्वक्रं च मन्दं च वातश्लेष्माधिके त्वतः ॥२५॥
वातकफकी अधिकतामें अनामिका और तर्ज्जनी अंगुलीमें नाड़ी
प्रकट होती है, वातकफकी अधिकतासे टेढ़ेपने और मंदपनेकी नाड़ी
बहती है ॥२५॥
हरिहंसगतिं धत्ते पित्ते श्लेष्मान्विता धरा ।
मध्यमानामिकामध्ये स्फुटा पित्तकफेऽधिके ॥२६॥
कफपित्तसे युक्त हुई नाड़ी मेंडक और हंसके समान चलती है,
पित्तकफकी अधिकतामें मध्यमा और अनामिकाके मध्यमें नाड़ी
प्रकट होती है ॥२६॥
उत्प्लुत्य मन्दं चलति नाडी पित्ते कफेऽधिके ।
काष्ठकुट्टो यथा काष्ठं कुट्टते चातिवेगतः ॥२७॥

८ नाड़ीपरीक्षा
पित्तकफकी अधिकतामें कूदकूदके मंद होती हुई नाड़ी चलती
है और जैसे खातोचिड़ा (कठफोरा) काष्ठको अतिवेगसे कूटता है
तैसे चलती है ॥२७॥
स्थित्वा स्थित्वा तथा नाडी सन्निपाते भवेद्ध्रुवम् ।
अंगुली त्रितयेऽपि स्यात्प्रव्यक्तासन्निपाततः ॥२८॥
सन्निपातमें निश्चय ठहरके ठहरके नाड़ी चलती है और सन्नि-
पातसे तीनों अंगुलियोंमें नाड़ी प्रगट होती है ॥२८॥
स्पन्दते चैकमानेन त्रिंशद्वारं यदा धरा।
स्वस्थाने न तदा नूनं रोगी जीवति नान्यथा ॥२९॥
जो एक स्थानमें नाड़ी तीस (३०) बार फरके तब निश्चय रोगी
न जीवता है यह निश्चय जानना ॥२९॥
स्थित्वास्थित्वावहति या सा ज्ञेया प्राणघातिनी ।
तस्यमृत्युं विजानीयाद्यस्येदं नाडिलक्षणम् ॥३०॥
जो नाड़ी ठहर ठहरके चलती है वह प्राणोंको नाशनेवाली जान
लेना चाहिये जिसकी नाड़ीके ये लक्षण होवें तिसकी मृत्यु जान लेना
चाहिये ॥३०॥
मन्दं मन्दं शिथिलशिथिलं व्याकुलं व्याकुलं वा
स्थित्वा स्थित्वा वहति धमनी याति सूक्ष्माच सूक्ष्मा ।
नित्यं स्कन्धे स्फुरतिपुनरप्यंगुलीः संस्पृशेद्वा भावैरे-
वंबहुविधतस्सन्निपातादसाध्या ॥३१॥
हौले हौले (धीरे २) और शिथिल शिथिल और व्याकुल व्याकुल
होती हुई नाड़ी ठहर ठहरके चले अथवा मिहीन मिहीन हुई नाड़ी कंधेमें
फुरे, फिर अंगुलियोंको स्पर्श करे, इन भावोंसे सन्निपातकी नाड़ी
असाध्य होती है ॥३१॥
पूर्वं पित्तगतिं प्रभञ्जनगतिं श्लेष्माणमाबिभ्रती
स्वस्थानाद्भ्रमणं मुहुर्विदधती चक्राधिरूढेव या ।
भीमत्वं दधती कदाचिदपि वा सूक्ष्मत्वमातन्वती
नोसाध्यांधमनींवदंतिमुनयोनाडीगतिज्ञानिनः ॥३२॥