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नाड़ी परीक्षा एवं नाड़ी विज्ञान (महर्षि कणाद एवं रावण - वैद्यप्रभा हिन्दी व्याख्या सहित)

Nadi Pariksha and Nadi Vijnana with Hindi Commentary

महर्षि कणाद एवं रावण द्वारा

DevanagariHindipublished20 पृष्ठ

२. वात-पित्त-कफ त्रिदोष नाड़ी गति व लक्षण

हिंदीटीकासहिता ९
पहले पित्तकी गतिको धारनेवाली, पीछे वायुकी गतिको धारने
वाली, पीछे कफकी गति को धारनेवाली, अपने स्थानसे वारंवार
भ्रमती हुई और चक्रपै चढ़ी हुई की भांति फिरती हुई और भयानकपने-
को धारण करती हुई और कदाचित् सूक्ष्म अपनेको प्राप्त होती हुई
नाड़ीको नाड़ीकी गतिको जाननेवाले मुनिजन असाध्य कहते हैं ॥३२॥
गंभीरा या भवेन्नाडी सा भवेन्मांसवाहिनी ।
ज्वरवेगेन धमनी सोष्णा वेगवती भवेत् ॥३३॥
जो नाड़ी गंभीर होवे वह मांस में बहनेवाली होती है और ज्वरके
वेगसे नाड़ी गर्मी के सहित और वेगवाली होती है ॥३३॥
कामक्रोधाद्वेगवहा क्षीणा चिन्ताभयान्विता ।
मंदाग्नेःक्षीणधातोश्च नाडी मंदतरा भवेत् ॥३४॥
काम और क्रोधसे नाड़ी शीघ्र बहनेवाली होती है चिंता और
भयसे नाड़ी क्षीण होती है, मंदाग्नि और क्षीण धातुवालेकी नाड़ी
अति मंद होती है ॥३४॥
असृक्पूर्णा भवेत् सोष्णा गुर्वी सामां गरीयसी ।
लघ्वी भवति दीप्ताग्नेस्तथा वेगवती मता ॥३५॥
रक्तसे पूरित हुई नाड़ी गरम और भारी होती है और आमसे
पूरित हुई नाड़ी अति भारी होती है, दीप्त अग्निवाले की नाड़ी हल्की
और वेगवाली कही है ॥३५॥
चपला क्षुधितस्यापि तृप्तस्य वहति स्थिरा ।
मरणे डमर्वाकारा भवेदेकदिनेन च ॥३६॥
भूखवालेकी नाड़ी चपल होती है, तृप्त हुएकी नाड़ी स्थिर होती है,
मरनेके समय नाड़ी एक दिन करके डमरूके आकारवाली हो जाती
है ॥३६॥
कंपतेस्पन्दतेऽत्यन्तं पुनः स्पृशति चांगुलीः ।
तामसाध्यां विजानीयान्नाडीं दूरेण वर्जयेत् ॥३७॥

१० नाड़ीपरीक्षा
जो नाड़ी कम्पे और फुरे और वारंवार अंगुलियोंको छुवे तिस नाड़ी
को असाध्य जानना ऐसी नाड़ी को वैद्य दूरसे वर्जित करे ।।३७।।
स्थिरा नाडी भवेद्यस्य विद्युद्द्युतिरिपेक्षते ।
दिनैकं जीवितं तस्य द्वितीयं मृत्युरेव च ॥३८॥
जिसकी नाड़ी स्थिर रहके बिजलीकी भांति गति दर्शावे वह एक
दिन जीवे, दूसरे दिनमें मृत्यु होती है ऐसे नाडीको जाननेवालोंने कहा
है ॥३८॥
शीघ्रा नाडी मलोपेता शीतला वाऽथ दृश्यते ।
द्वितीये दिवसे मृत्युर्नाडी विज्ञातृभाषितम् ॥३९॥
मलसे युक्त हुई नाड़ी शीघ्र चले वा शीतल दीखे वह एक दिन
जीवता है पीछे दूसरे दिन मृत्युको प्राप्त होता है ॥३९॥
मुखे नाडी भवेत्तीव्रा कदाचिच्छीतला वहेत् ।
आयाति पिच्छिलस्वेदःसप्तरात्रं न जीवति ॥४०॥
मुखमें शीघ्र चलती हुई नाड़ी कदाचित् शीतल हुई वहे और
जिस रोगी को सचिक्कन पसीना आवे वह रोगी सात रात्रि नहीं
जीवता ॥४०॥
देहे शैत्यं मुखे श्वासो नाडी तीव्रा विदाहिनी ।
मासार्द्धजीवितं तस्यनाडी विज्ञातृभाषितम् ॥४१॥
जिसके देहमें शीतलपना हो, मुखमें श्वास चले, दाडवाली हुई
नाड़ी शीघ्र चले वह रोगी १५ दिन जीवता है ऐसे नाडियोंके जानने-
वालोंने कहा है ॥४१॥
मुखे नाडी यदा नास्ति मध्ये शैत्यं बहिःक्लमः ।
यदा मंदा वहेन्नाडी त्रिरात्रं नैव जीवति ॥४२॥
जब अग्र भागमें नाड़ी न हो तो और मध्यभागमें शीतल बहे
और शरीरमें ग्लानि हो तो इस अवस्था में नाड़ी मंद होनेसे ऐसा रोगी
तीन रात्रि नहीं जीवता ॥४२॥
अतिसूक्ष्मातिवेगा च शीतला च भवेद्यदि ।
तदावैद्योविजानीयात् स रोगीत्वायुषःक्षयी ॥४३॥

हिंदीटीकासहिता ११
जो कदाचित् अति सूक्ष्म अतिवेगवाली और शीतल नाडी होवे
तो वैद्यको जानना चाहिये कि इस रोगीकी आयुका क्षय हो चुका ॥४३॥
विद्युद्रोगिणो नाड़ी दृश्यते न च दृश्यते ।
अकालविद्युत्पातेव स गच्छेदद्यमसादनम् ॥४४॥
जिस रोगीकी नाडी बिजलीकी तरह दीखे तथा अकालमें
बिजली के पड़नेकी तरह नहीं दीखे, वह रोगी यमपुरको जाता है ४४॥
तिर्यगुष्णा च या नाडी सर्पगा वेगवत्तरा ।
कफपूरितकंठस्य जीवितं तस्य दुर्लभम् ॥४५॥
कफसे पूरित हुए कंठवाले मनुष्यकी नाड़ी तिरछी और गरम
सर्पके समान चलनेवाली और अति वेगसे चलनेवाली होवे तिसका
जीना दुर्लभ है ॥४५॥
चला चलितवेगा च नासिकाधारसंयुता ।
शीतला दृश्यते या च याममध्ये च मृत्युदा ॥४६॥
चलती हुई, चलित वेगवाली और नासिकाके आधारसे संयुत
हुई शीतल नाड़ी दीखे तब एक प्रहरमें मृत्यु जानना ॥४६॥
शीघ्रा नाड़ी मलोपेता मध्याह्नेऽग्निसमोज्वरः ।
दिनंकंजीवितंतस्य द्वितीयेऽह्निम्ब्रियेति सः ॥४७॥
जिसकी नाड़ी मलसे युक्त होके शीघ्र चले और मध्याह्नमें
अग्निके समान ज्वर उपजे तिसका जीवना एक दिन है वह दूसरे
दिन मर जाता है ॥४७॥
दृश्यते चरणे नाड़ी करे नैवाधिदृश्यते ।
मुखं विकासितं यस्य तं दूरं परिवर्जयेत् ॥४८॥
जिसके चरणमें नाड़ी दीखे और हाथमें नहीं दीखे और खिला
हुआ मुख होवे तिस रोगीको दूरसे वर्जे ॥४८॥
वातपित्तकफाश्चापि त्रयो यस्यां समाश्रिताः ।
कृच्छ्रसाध्यामसाध्यांवाप्राहुर्वैद्यविशारदाः ॥४९॥

१२ नाड़ीपरीक्षा
जिसमें बात, पित्त, कफ ये तीनो पूर्ण वृद्धि होते हैं तिस नाड़ीको
आयुर्वेदके जाननेवाले कष्टसाध्य अथवा असाध्य कहते हैं ॥४९॥
कंदमध्ये स्थिता नाड़ी सुषुम्नेति प्रकीर्तिता ।
तिष्ठन्ते परितः सर्वाश्चक्रेऽस्मिन्नाडिकास्ततः ॥५०॥
सूंडी (नाभि) के बीचमें सुषुम्नानाड़ी स्थित कही है और
एक नाड़ीके सब भागों विषे सूंडी अर्थात् नाभीचक्रमें सब नाड़ी
स्थित हैं ॥५०॥
सार्द्धत्रिकोट्योनाड्योहिस्थूलाःसूक्ष्माश्चदेहिनाम् ।
नाभिकन्दनिबद्धास्तास्तिर्यगूर्ध्वमधः स्थिताः ॥५१॥
देहधारियोंके शरीरमें साढ़े तीन करोड़ स्थूल और सूक्ष्म नाड़ी
हैं और सब नाड़ी नाभीके मूलमें बंधी हुई और टेढ़ी, ऊपरको नीचे
को ऐसे स्थित हैं ॥५१॥
तिस्रः कोट्यर्द्धकोटी च यानि लोमानि मानुषे ।
नाडीमुखानि सर्वाणि घर्मबिंदुं क्षरंति च ॥५२॥
मनुष्योंके शरीरमें साढे तीन करोड़ रोम हैं वे सब नाड़ियोंके
मुख हैं तिन्होंके द्वारा पसीना निकलता है ॥५२॥
नानानाडीप्रसवजं सर्वभूतान्तरात्मनि ।
ऊर्ध्वमूलमधःशाखं वायुमार्गेण सर्वगम् ॥५३॥
सब मनुष्योंके अंतरात्मामें ऊपरको मूलवाला ब्रह्म है, नीचेका
शाखावाला हिरण्यगर्भादि हैं, सो प्राण आदि वायुके मार्गके द्वारा
सर्वव्यापी हैं ॥५३॥
द्विसप्ततिसहस्राणि नाड्यः स्युर्वायुगोचराः ।
तर्पयन्ति रसं देहं नद्यस्तोयैरिवार्णवम् ॥
द्विसप्ततिसहस्रन्तुतासांस्थूलाःप्रकीर्तिताः ॥५४॥
१००२ नाडी वायुके अनुकूल हैं सब नाड़ीरसोंकरके देहको
तृप्त करती है, जैसे नदी जलसे समुद्रको । तिन्हें में १०७२ स्थूल नाड़ी
कही हैं ॥५४॥

हिंदीटीकासहिता १३
देहे धमन्यो धन्यास्ताः पंचेन्द्रियगुणावहाः ।
नाभिकंदस्थितास्तास्तुनाभीचक्रेप्रवेष्टिताः ॥५५॥
शरीरमें सब धमनी नाड़ी धन्य हैं, पांचों इन्द्रियोंके गुणको
वहती हैं, नाभिमूलमें स्थित हैं और नाभिचक्रमें प्रवेष्टित हो
रही हैं ॥५५॥
इडा च पिङ्गला चैव सुषम्ना च सरस्वती ।
वारुणी चैवपूषा च हस्तिजिह्वा यशस्विनी ॥५६॥
इडा, पिंगला, सुषुम्ना, सरस्वती, वारुणी, पूषा, हस्तिजिह्वा
यशस्विनी ॥५६॥
विश्वोदरी कुहुश्चैव शंखिनी च पयस्विनी ।
अलंबुषा च गांधारी मुख्याश्चैताश्चतुर्दश ॥५७॥
विश्वोदरी, कुहु, शंखिनी, पयस्विनी, अलंबुषा, गांधारी ये
चौदह नाड़ी प्रधान हैं ॥५७॥
इडा च पिंगला चैव सुषम्ना च सरस्वती ।
गांधारी हस्तिजिह्वा च कुहुःपूषायशस्विनी ॥५८॥
इडा, पिंगला, सुषुम्ना, सरस्वती, गांधारी, हस्तिजिह्वा, कुहु,
पूषा, यशस्विनी ॥५८॥
चारनालम्बुषा विश्वा शंखिनी च पयस्विनी ।
एताः प्राणवहानाड्योजीवकोशे प्रतिष्ठिताः ॥५९॥
चारना, अलंबुषा, विश्वा, शंखिनी, पयस्विनी ये नाड़ी प्राणोंको
वहनेवाली जीवकोशमें स्थित हैं ॥५९॥
तत्र प्रधाना नाड्यस्तु दश वायुप्रवाहिकाः ।
इडा च पिंगला चैव सुषम्ना चोर्ध्वगामिनी ॥६०॥
उनमें प्रधान दश नाड़ी वायुको वहती हैं, इडा पिंगला सुषुम्ना
ये नाड़ी ऊपरको गमन करती हैं ॥६०॥
गांधारी हस्तिजिह्वा च प्रसारगमना स्थिता ।
अलम्बुषा यशा चैव दक्षिणाङ्गे समन्विता ॥६१॥

१४ नाड़ीपरीक्षा
गांधारी और हस्तिजिह्वा ये नाड़ी फैलकर गमन करती हैं,
अलंबुषा और यशस्विनी नाड़ी दाहिने अंगमें लगी हुई हैं ॥६१॥
कुहुश्च शंखिनी चैव वामाङ्गे चावलम्बिता ।
एतासु दशनाडीषु नानाकार्य प्रसूतिका ॥६२॥
कुहू और शंखिनी नाड़ी वाम अंगमें लगी हुई हैं, इन दश नाड़ियों-
में प्रसूतिक नाड़ी अनेक कार्यमें कुशल है ॥६२॥
इडा च वामनासायां दक्षिणे पिंगला मता ।
सुषुम्ना ब्रह्मरन्ध्रे च गान्धारी वामचक्षुषि ॥६३॥
नासिकाके वाम भागमें नाड़ी इडा स्थित है, और दक्षिण भागमें
पिंगला नाड़ी स्थित है. शिरविषे सुषुम्ना नाड़ी स्थित है, बामनेत्रमें
गांधारी नाड़ी स्थित है ॥६३॥
दक्षिणे हस्तिजिह्वा च पूषा कर्णेऽथ दक्षिणे ।
वामे यशस्विनी ज्ञेया मुखे चालंबुषा मता ॥६४॥
दाहिने नेत्रमें हस्तिजिह्वा नाड़ी स्थित है. दाहिने कानमें पूषा
नाड़ी स्थित है. वाम कानमें यशस्विनी नाड़ी स्थित है. मुखमें अलंबुषा
नाड़ी स्थित है ॥६४॥
कुहुश्च लिङ्गमूले स्याच्छङ्खिनी शिरसोपरि ।
एवं द्वारं समाश्रित्य तिष्ठंति दशनाडिकाः ॥६५॥
लिंगकी जड़में कुहु नाड़ी स्थित है, शिरके ऊपर शंखिनी नाड़ी
स्थित है, इस प्रकार द्वारोंके आश्रित होके दश नाड़ी स्थित हो रही हैं॥६५
प्राणोऽपानः समानश्च उदानो व्यान एव च ।
नागः कूर्मोऽथ कृकरो देवदत्तो धनञ्जयः ॥६६॥
प्राण, अपान, समान, उदान, व्यान, नाग, कूर्म, कृकर, देवदत्त,
धनंजय ॥६६॥
एते नाडीषु सर्वासु चरन्ति दश वायवः ।
एतेषु वायवः पंचमुख्याः प्राणादयः स्मृताः ॥६७॥