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मीमांसा दर्शन / पूर्वमीमांसा (शाबर भाष्य सहित)

मीमांसा दर्शन / पूर्वमीमांसा (शाबर भाष्य सहित)

Purva Mimamsa Darshan with Shabara Bhashya

महर्षि जैमिनि / शाबर स्वामी द्वारा

स्रोत: तारा प्रिंटिंग वाराणसी · तारा प्रिंटिंग वाराणसी · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished804 पृष्ठ

पृष्ठ 551, कुल 804 में से

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पृष्ठ 551

३० ] प्रथमाध्याये तृतीयपादः ४९७
भा० प्र०-यदि यह कहा जाय कि दाक्षिणात्य संज्ञा से अभिहित होने वाला
व्यक्ति आह्लैनैबुक आदि का आचरण करे । प्राच्य संज्ञा से परिचित होने वाला व्यक्ति
होलाक आदि का अनुष्ठान करे । उदीच्य संज्ञा से अभिहित होने वाला व्यक्ति उद्‌वृषम
आदि यज्ञों का अनुष्ठान करे- यह निर्णय भी ठीक नहीं है, क्योंकि संज्ञा देश-संयोग-
निमित्तक होने से जो व्यक्ति दाक्षिणात्य देश का परित्याग कर उत्तरखण्ड या पूर्व देश में
रहता है, वह भी आह्लैनैबुक आदि सम्पादन करता ही है । किन्तु सम्प्रति वह दाक्षिणात्य
शब्द से अभिहित नहीं किया जाता है वरन् वह उदीच्य या प्राच्य कहा जाता है ।
इसी प्रकार उदीच्य देश और प्राच्य देश से जाकर जो व्यक्ति दक्षिण में निवास करता
है, वह भी वहाँ जाकर भी होलाक और उद्‌वृषम का अनुष्ठान करता है, किन्तु उस
समय उनको प्राच्य या उदीच्य नहीं कहा जाता है, अतः होलाक आदि को समाख्या=
संज्ञा के द्वारा देश विशेष से आबद्ध करना उचित नहीं है ।
आख्या=समाख्या अर्थात् दाक्षिणात्य, प्राच्य, उदीच्य आदि प्रकृति प्रत्यय से निष्पन्न
शब्दमूलक संज्ञा । हि=यतः क्योंकि, देशसंयोगात्=देश के सम्बन्ध के अनुसार होती है ।
दाक्षिणात्य आदि संज्ञायें देश के साथ सम्बन्ध के अनुसार ही होती है, अतः ये संज्ञायें
कर्तव्य का विशेषण नहीं हो सकती है ॥ १९ ॥
न स्याद्देशान्तरेष्विति चेत् ॥२०॥
शा० भा०--इति चेत् पश्यसि ? यदि देशसंयोगादाख्या भवेद् देशा-
न्तरस्थस्य न भवेत् । भवति च देशान्तरस्थस्य माथुर इत्यसंबद्धस्यापि मथुरया ।
तस्मान्न देशसंयोगादाख्या ॥ २० ॥ इति आशङ्का ।
भा० वि० - प्राग्देशादिसंयोगस्य व्यभिचारित्वेन प्राच्यादिसमाख्यादिनि-
मित्तत्वासंभवान्निर्निमित्तत्वासंभवाच्च जात्यादिनिमित्तत्वे सति समाख्यायाः कर्तृ-
विशेषः सिद्ध्येदित्याशङ्कते - न स्यादिति । यदि देशसंयोगनिमित्ता समाख्या
देशान्तरेषु गतस्य न स्यादिति सूत्रं व्याचष्टे - इति चेदिति । असम्बद्धस्यापि
मथुरया माथुर इत्याख्यादर्शनान्नेदमिष्टापादनमित्याह - भवति चेति । यस्मा-
द्व्यभिचारान्न देशसंयोगनिमित्तेयं समाख्या, तस्माद्व्यवस्थितप्राच्यादिव्यवहा-
रानुपपत्तिकल्पितप्राच्यत्वादिजातिनिमित्तैवेत्युपसंहरति-तस्मादिति ॥ २० ॥
त० वा० - अपरस्त्वनयैवोपपत्त्या लब्धात्मीयपक्षोपपत्तिः प्रत्यवतिष्ठमान
आह—'न स्याद्देशान्तरेष्विति चेत्' इति ।
यदि देशनिमित्तत्वात्समाख्या दूषिता त्वया ।
शक्यमन्यनिमित्तत्वं वक्तुमस्या मया पुनः ॥ ६७४
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