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सर्वकोश
मीमांसा दर्शन / पूर्वमीमांसा (शाबर भाष्य सहित)

मीमांसा दर्शन / पूर्वमीमांसा (शाबर भाष्य सहित)

Purva Mimamsa Darshan with Shabara Bhashya

महर्षि जैमिनि / शाबर स्वामी द्वारा

स्रोत: तारा प्रिंटिंग वाराणसी · तारा प्रिंटिंग वाराणसी · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished804 पृष्ठ

पृष्ठ 455, कुल 804 में से

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पृष्ठ 455

८ ] प्रथमाध्याये तृतीयपादः ४०३
से अकर्म किये हैं, अतः, शिष्टाचार प्रमाण नहीं है। इस प्रसङ्ग में कहा है—
"कारणाग्रहणे" शिष्टाचार के मूल में यदि काम, क्रोध आदि कारण न रहें तो
"प्रयुक्तानि" अर्थात् स्मृति रूप में निबद्ध न रहने पर भी वे कर्म शिष्टों के द्वारा आचार
के रूप में सम्पादित हो रहे हैं, वे "प्रतीयेरन्" धर्म के रूप में प्रतीत होंगे। "तेषु
अदर्शनात् विरोधस्य" अर्थात् उन कर्मों के विरुद्ध वचन शास्त्र में नहीं देखे गये हैं।
अतः शिष्ट धर्म की बुद्धि से जो अनुष्ठान कर रहे हैं, वे भी धर्म में प्रमाण है और
और वे ग्राह्य हैं। ये शिष्टाचार देश के भेद से, कुल के भेद से अनेक होने से, ग्रन्थ
के विस्तार के भय से स्मृतिकार ने उन्हें उपनिबद्ध नहीं किया है। इसीलिए उन्होंने
शिष्टाचार को प्रमाण कहा है। यथा—
वेदोऽखिलो धर्ममूलं स्मृतिशीले च तद्विदाम् ।
आचारश्चैव साधूनामात्मनस्तुष्टिरेव च ॥ मनु० २/६
समग्र वेद धर्म में प्रमाण है एवं वेदवेत्ताओं की स्मृतियां और शास्त्र शिष्टों का
आचार एवं आत्मतुष्टि धर्म में प्रमाण है। याज्ञवल्क्यस्मृति में कहा गया है—
श्रुतिः स्मृतिः सदाचारः स्वस्य च प्रियमात्मनः ।
सम्यक् सङ्कल्पजः कामो धर्ममूलमिदं स्मृतम् ॥ (याज्ञव० स्मृ०)
श्रुति, स्मृति, सदाचार, अपना प्रिय अर्थात् आत्मतुष्टि एवं सम्यक् सङ्कल्पमूलक
कामना ये धर्म में प्रमाण है। अतः स्मृति के समान ही शिष्टाचार भी प्रमाण है। शिष्टा-
चार प्रमाण भी अनुमान के द्वारा ही प्रतिपादित है—
होलाक प्रभृति आचार प्रमाण हैं (प्रतिज्ञा)
यतः वे धर्मबुद्धि से शिष्टों से (वैदिकों) अनुष्ठित हैं (हेतु)
जैसे अष्टका आदि का अनुष्ठान (उदाहरण)
शिष्टाचार को प्रमाण मानने पर स्थल विशेष में शिष्टों का अकर्म भी प्रमाण होगा,
यह आपत्ति ठीक नहीं है, क्योंकि वे आचरण धर्म बुद्धि से उनके द्वारा सम्पादित नहीं
है। अतः अविगीत (अनिन्दित) शिष्टाचार को ही प्रमाण माना गया है ॥ ७ ॥
अथ चतुर्थयववराधिकरणम्
[४] तेष्वदर्शनाद्विरोधस्य समा विप्रतिपत्तिः स्यात् ॥८॥ पू०
शा० भा०—'यवमयश्चरुः, वाराही उपानहौ, वैतसे कटे प्राजापत्यान्
संचिनोति' इति यववराहवेतसशब्दान् समामनन्ति। तत्र केचिद्दीर्घशूकेषु
यवशब्धं प्रयुञ्जते, केचित् प्रियङ्गुषु। वराहशब्दं केचित्सूकरे, केचित्कृष्ण-
शकुनौ। वेतसशब्दं केचिद्वञ्जुलके, केचिज्जम्बवाम्। तत्रोभयथा पदार्थाव-
गमाद्विकल्पः ॥ ८ ॥