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सर्वकोश
मीमांसा दर्शन / पूर्वमीमांसा (शाबर भाष्य सहित)

मीमांसा दर्शन / पूर्वमीमांसा (शाबर भाष्य सहित)

Purva Mimamsa Darshan with Shabara Bhashya

महर्षि जैमिनि / शाबर स्वामी द्वारा

स्रोत: तारा प्रिंटिंग वाराणसी · तारा प्रिंटिंग वाराणसी · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished804 पृष्ठ

पृष्ठ 398, कुल 804 में से

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३४६ मीमांसादर्शनम् [ सू०
कहना उचित नहीं है। यद्यपि इस उद्धृत कारिका में प्रथम को छोड़कर अन्य सभी
भाष्यकार के सिद्धान्त की व्याख्या का पूर्वपक्ष है, तथापि वार्तिककार ने बाद में जो
अपने सिद्धान्त को व्यक्त किया है, वे उस सिद्धान्त पक्ष में प्रयोज्य हैं। भाष्यकार एवं
वार्तिककार के मत के भेद का कारण प्रदर्शन करते हुए भाट्टदीपिका में वार्तिक का सार
सङ्कलन करते हुए कहा है कि—भाष्यकार के मत में जिज्ञासा अर्थात् साध्य सन्देह
भाट्टदीपिका के भाट्ट चिन्तामणि टीकाकार यज्वा के मत में अनुमान का कारण है—
अतः, औदुम्बरी स्पर्श विधि के द्वारा आवेष्टित रूप में ही औदुम्बरी का निश्चयात्मक
ज्ञान होता है और उसी से जिज्ञासा की निवृत्ति हो जाती है। इसलिए स्मृति के मूली-
भूत वाक्य का अनुमान नहीं होता है। वार्तिककार ने कहा है कि अन्वय और व्यतिरेक
व्यभिचार होने से जिज्ञासा अर्थात् साध्य सन्देह अनुमिति का कारण नहीं है। अतः,
प्रत्यक्ष श्रुति विरुद्ध स्मृति का भी मूलीभूत श्रुतिवाक्य अनुमेय है और उस अनुमेय श्रुति
के साथ प्रत्यक्ष श्रुति का विरोध होने पर व्रीहि यव के समान विकल्प ही आश्रयणीय
है। ऐसी स्थिति में विकल्प होने पर भी ऐसे स्थल में प्रत्यक्ष श्रुतिविहित पदार्थ ही
अनुष्ठेय है क्योंकि, प्रत्यक्ष श्रुति से बोधित अर्थ का अनुष्ठान करने पर किसी भी दोष
की सम्भावना नहीं है। दूसरी बात यह है कि अनुमान को अपेक्षा प्रत्यक्ष पर ही अधिक
आस्था होनी चाहिए और ऐसी स्थिति में स्मृति के द्वारा अनुमेय श्रुति के अर्थ का
उस समय अनुष्ठान न करने पर ही स्मृति का अननुष्ठापकत्व रूप अप्रामाण्य होगा, किन्तु
बाधितार्थकत्व रूप अप्रामाण्य नहीं है भाष्यकार का भी यही अभिप्राय है। इस पक्ष में
सूत्रार्थ भी इस रूप में योजनीय है। यथा—'विरोधे' अर्थात् प्रत्यक्ष श्रुति के साथ
विरोध होने पर “अनपेक्षं स्यात्” अर्थात् स्मृति वचन अपेक्षणीय अर्थात् उस समय तक
जब तक उस स्मृति का मूलभूत श्रुतिवचन उपलब्ध नहीं हो जाता है तब तक आदरणीय
या अनुष्ठेय नहीं है। वस्तुतः कात्यायनी ब्राह्मण, गोपथब्राह्मण आदि में इन स्मृतियों का
मूलीभूत वेदवचन मिलता है। इस प्रकार आचमन, उपवीतित्व, बद्धशिखत्व, दक्षिणा-
चारता आदि का मूलीभूत श्रुतिवचन उपलब्ध है।
“हेतुदर्शनात्” लोभरूप हेतु दृष्ट होने से, 'च' = और। लोभरूप हेतु दृष्ट होने से
ही उक्त स्मृति प्रमाण नहीं है ॥ ४ ॥
अथ तृतीयं शिष्टाकोपाधिकरणम्
[ ३ ] शिष्टाकोपेऽविरुद्धमिति चेत् ॥५॥ सि०
शा० भा०—आचान्तेन कर्त्तव्यम्, यज्ञोपवीतिना कर्त्तव्यम्, दक्षिणाचारेण
कर्त्तव्यमित्येवंलक्षणान्युदाहरणानि । किमेतानि श्रुतिविरुद्धानि न कर्त्तव्यानि,
उताविरुद्धानि कार्याणीति चेत्पश्यसि, तैरप्यनुष्ठीयमानैर्वैदिकं किञ्चिन्न कुप्यति ।
तस्मादविरुद्धानीति ॥५॥