सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
संग्रह पर लौटें

मीराँ बृहद् पदावली (भक्त शिरोमणि मीराबाई - सम्पूर्ण पद सटीक)

Meera Brihad Padavali with Hindi Commentary

भक्त शिरोमणि मीराबाई / डॉ. मुरलीधर श्रीवास्तव द्वारा

DevanagariRajasthanipublished365 पृष्ठ

२०६ मीराँ-बृहद्-पद-संग्रह
सो मद भगत करो जी न साधो, मत बिसरो नन्दलाल ।
काहू के चदो काहू के मदो, काहू के उर मे माल ।
प्रेम भरी मीराँ जिन गरजै, हिरदै गिरधर लाल ।
(येक) घडी घडी पल मोये जुग सम, बीतत हो गई हाल बेहाल ।
मीराँ के प्रभु गिरिधर नागर, छुट गई जजाल ॥३३१॥†
पदाभिव्यक्ति मे सगति नही है ।
४
बाना¹ रो बिडद² दुहेलो रे ।
बाना पहर कहा गरबायो, मुक्ति न हामी खेलो (रे) ।
बाना रो प्रण-प्रह्लाद उबार्यो, बैर पिता सो गेल्यो (रे) ।
आगा धर पीछा मत ताको, दकतर नाहि चढैलो (रे) ।
मीराँ जी ने भक्ति कमाई, जहर पियालो गेल्यो (रे) ।
॥३३२॥†
श्री सूर्यनारायण जी चतुर्वेदी के मतानुसार यह पद सम्भवत
मीराँ लीला करने वालो का है । "मीराँ जी ने भक्ति कमाई" जैसी
अभिव्यक्ति के आधार पर इस मत की पुष्टि होती है ।
५
हरि से गरब किया सोई हारा ।
गरब किया रतनागर सागर, जल खारा कर डारा ।
गरब किया लकापति रावण, टूक टूक कर डारा ।
गरब किया चकवे चकवी ने, रैन बिछोहा डारा ।
गरब किया बन की चिरभी ने, मुख कारा कर डारा ।
१ वेश भूषा, २ यश ।

वैष्णव-प्रभाव द्योतक पद २०७
इन्द्र कोप किया ब्रज ऊपर, नख पर गिरिवर धारा ।
मीराँ के प्रभु गिरिधर नागर, जीवन प्राण हमारा । ॥३३३॥†
चतुर्वेदी जी के मतानुसार इस पद की प्रामाणिकता भी संदिग्ध
ही है, क्योकि शैली मे गहरा अन्तर है। मै भी चतुर्वेदी जी का समर्थन
करती हूँ ।
६
राणा जी करमारो सगाती१, कुल मे कन्हेंई नही ।
एक तो मात रे दोय दोय डीकरा, ज्या की न्यारी न्यारी भात२ ।
(वाकी न्यारी३ न्यारी करमा रेख) ।
एक तो राजाजी री गद्दी बैठिया, दूजो हलर बैल भर तो पेट ।
एक तो भाखा रे दोय दोय डीकरी, ज्या की न्यारी न्यारी भात ।
(वाकी न्यारी न्यारी कामा रेख) ।
एक तो मोतियन माग भरावती, दूजी घर घर की पनिहार ।
एक तो गऊ रे दो दो बछड़ा, ज्याकी न्यारी न्यारी राणा भांत ।
(वाकी न्यारी न्यारी करमां रेख) ।
एक तो महादेवजी रे मदिर नादियो, दूजो वणजारारे हाथ ।
एक तो कुम्हार रे दोय दोय मटकिया,ज्याकी न्यारी न्यारी राण भात ।
(ज्याकी न्यारी न्यारी करमा रेख) ।
एक महादेव जी रे मदिर जल, चढ़े दूजी चभारा रे हाथ।
राणा जी करमां रो सगाती, जग मे कोऊ नही ॥३३४॥†
सम्पूर्ण पद मे मीराँ का कही वर्णन नही है। “राणाजी” जैसे
सम्बोधन के कारण सम्भवत मीराँ का कहा जा सकता है, परन्तु यह
पहलू बहुत हल्का जान पड़ता है। शब्द योजना अन्य पदो के अनुकूल नही
पड़ती। पद को प्रक्षिप्त मानना ही अधिक युक्तियुक्त प्रतीत होता है।
१ साथी, २ भाँति, तरह, ३ भिन्न भिन्न।

२०८ मीराँ-बृहद्-पद-संग्रह
७
साधू म्हांरे आइया हेली, वे गिरधर जी रा प्यारा।
चरण धोय चरणामृत लेस्या, (हे) कलमल मेटन हार।
प्राण तो अति प्रिय लागै, (हे) कबहुन करस्या न्यारा।
प्रभु कृपा कीनी अति (मो) पर, सुधार्या जनम हमारा ॥३३५॥†
यह पद मीराँ का है, ऐसा कही से भी स्पष्ट नही होता। चतुर्वेदी
जी “प्रभु कृपा किनी अति”-के बदले “मीराँ के प्रभु गिरधर नागर”
का व्यवहार करना उत्तम समझते है जिसका कोई कारण नही देते।
ऐसा होने से प्रामाणिक पदो को छाँट लेना और भी कठिन हो जाता
है। ऐसे पदो को मीराँ के नाम पर चलाने का प्रयास निरर्थक ही प्रतीत
होता है।
८
बड़े घर ताली लागी, रे, म्हारा मन री डणारथ भागी रे।
छीलटिये म्हारो चित नही रे, डांबरिये कुण जाव।
गगा जमना सूं काम नही रे, मै तो जाय मिलूँ परियाव।
हाल्या मोल्या सूं काम नही रे, मै तो जाय करु दरबार।
काच कथीर सूं काम नही रे, म्हांरे हीरा रो व्योपार।
भाग हमारो जागियो रे, भयो समंद सूं सीर।
अमृत प्याला छाडि कै, कुण पिवै कडवी नीर।
पीपा को प्रभु परचो दीनो, दिया रे खजीना पूर।
मीराँ के प्रभु गिरिधर नागर, घणी मिल्या छै हजूर ॥३३६॥
पदाभिव्यक्ति मे सगति का अभाव है।
९
आंवो सखी रली करां दे, पर घर गवण निवारि।
झूठो माणिक मोतिया री , झूठी जगमग जोति।

वैष्णव-प्रभाव द्योतक पद २०९
झूठा सब आभूषण री, साची प्रिया जी री प्रीति।
झूठा पाट पटम्बरा रे, झूठा दीखनी चीर।
साची पिया जी री गूदडी, जामे निरमल रहे सरीर।
छप्पन भोग बुहाइ दे रे, ˙इन भोगिन मे दाग।
लूण अलूणो ही भलो है, अपने पियाजी के साग¹।
देखि विराणे निवाण कूं हे, क्यूं उपजावे खीज²।
कालर³ आपणो ही भलो है, जामे निपज्वै⁴ चीज।
छैल विराणे लाख को है, अपणे काज न होई।
ताके सग सिधारता है, भला कहेसी न कोई।
जाके सग सिधारता हे, भला कहे सन कोई।
अविनासी सूं बालमा हे, जिन सूं साची प्रीत।
मीराँ को प्रभु मिलिया हे, ऐसी ही भगति की रीत ॥३३७॥
पद से व्यक्त होती भावनाओ का अन्य भावाभिव्यक्ति से कोई
समन्वय नही होता, पदाभिव्यक्ति मे भी सगति नही है। सम्भवत
कीर्तन मडली का ही कोई गीत हो।
१०
राम मोरी बाहडली जी गहो।
या भव सागर मझधार मे, थे ही निभावण हो।
म्हारे ओगण⁵ धणा⁶ छै, हो प्रभु जी थे ही सहो तो सहो।
मीराँ के प्रभु हरि अविनासी, लाज बिदर की बहो। ॥३३८॥
कही कही प्रथम पंक्ति मे प्रयुक्त “राम” सम्बोधन के बदले “श्याम’
सम्बोधन भी मिलता है।
१ मारवाडी का शब्द है ‘सागे’ जिसका अर्थ है ‘साथ’। यहाँ लय मिलाने के
लिये ही ‘सागे’ का ‘साग’ हो गया हो, ऐसा प्रतीत होता है, २ क्रोध, ३ कुरूप,
४ उत्पन्न हो, ५ अवगुण, ६ बहुत।
१४

२१० मीराँ-बृहद्-पद-संग्रह
पाठान्तर १,
बाहडली जो गहो राम जी, म्हारी बाहडली जो गहो।
भवसागर की तीक्षणधारा, थेई हो न नीमो (निमो)१।
म्हे तो छा ओगण का भरिया, थेई हो न सहो।
मीराँ के प्रभु गिरधर नागर विडद की लाज गहो।
पद की द्वितीय पंक्ति का उत्तरार्द्ध अस्पष्ट है।
११
, सूरत दीनानाथ सो लगी, तू तो समझ सुहागण सुरता नार।
लगनी लहगो पहर सुहागण, बीती जाय बहार।
धन जोवण है पावणा री, मिलै न दूजी बार।
राम नाम को चुडलो पहिरो, प्र ेम को सुरमो सार।
नक बेसर२ हरि नाम की री, उतर चलोनी परले३ पार।
ऐसे बर को क्या करू, जो जन्मे और मर जाय।
बर बरिए एक सावरो री, मेरो चुडलो अमर हो जाय।
मै जान्यो हरि मे ठग्यो री, हरी ठग ले गयो मोय।
लख चौरासी मोरचा री, छिन मै गोप्या छै विगोय।
सुरत चली जहा मै चली रे, कृष्ण नाम झकार।
अविनासी की पोल पर जी, मीराँ करै छै पुकार ॥३३९॥†
पद की प्रथम दो और दो पंक्तियों से सतमत का प्रभाव सुस्पष्ट
हो जाता है। बीच की पंक्तियाँ असम्बद्ध हैं। पद का प्रारम्भ होता
है उपदेशात्मक शैली से, परन्तु अन्त होता है व्यक्तिगत भावनाओ की
अभिव्यक्ति मे। ऐसे पदो की प्रामाणिकता विशेष रूपेण संदिग्ध
ही जान पडती है।
१ निर्वाह कर दिया, २ नथ, ३ उस पार।

वैष्णव-प्रभाव द्योतक पद २११
१२
सब जग रूठडा, रूठण द्यो, येक राम रूठो नहि पावै ।
गरभ१ कियौ रतनागर सागर, नीर खारो कर डार्यौ ।
गरभ कियौ उन चकवा चकवी, रेण बिहोहो२ पार्यौ ।
गरभ कियौ उन वन की कोयल, रूप स्याम कर डार्यौ ।
मीराँ के प्रभु हरि अविनासी, हरि के चरण तन वार्यौ॥३४०॥
पद मे पूर्वापर सगति का अभाव है। सम्भवत यह कोई स्वतत्र
पद न होकर पद स० ५ की ही कुछ पक्तियो का रूपान्तर है।
निर्वेद
मिश्रित भाषा में प्राप्त पद
१
अरे मै तो ठाढी जपूँ रे राम माला रे।
मै तो जपत्ती नांव मेरे सायब का, आण मिलो नन्दलाला रे ।
हाथ सुमरणी काख कूबडी, ओढ रही मृग छाला रे ।
मोर मुकुट पीताम्बर सोहै, ओढे लाल दुसाला रे।
मीराँ के प्रभु गिरधर नागर, भगतन के प्रतिपाला रे ॥३४१॥
२
ज्याँरा३ चित चरणा से लागा, वे ही सबेरे जागा।
पहले भूप भरतरी जागा, शहर उजीणी लागी।
सुणा सुणां बचन साहब सतगुरु का गोपीचन्द उठ भाँगा।
१ गर्व, २ वियोग, ३ जिनका ।

२१२ मीराँ-वृहद्-पद-संग्रह
साहब सैन बलखारा राजा, बाण बिरहरा लागा।
आठ पहर कबीरा जागा, मरण जीवन भय भागा।
राणा रूस्या भय मोरे नाही, चित साहब से लागा।
मीराँ बाई तो शरणे आया, लोक लाज भय त्यागा ॥३४२॥
पद से सत मत का प्रभाव सुस्पष्ट हो उठता है।
३
माई म्हारे निरधन रो धन राम।
खाय न खूटै चोरन लूटै, विपति पड्या आवै काम।
दिन दिन प्रीति सवाई दूणी, समरण आगे याम।
मीराँ के प्रभु गिरधर नागर, चरण कमल बिसराम ॥३४३॥†
पाठान्तर १,
माई म्हारे निरधन को धन राम।
खाय न खूटे, चोर न लूटे, विपत पड् चा आवै काम।
दिन दिन प्रीत सवाई दूणी, सुमभरण सूँ म्हारै काम।
मीराँ के प्रभु गिरधर नागर, चरणकमल बिसराम१।
उपर्युक्त दोनो पाठ “पायो जी मै तो राम रतन धन पायो” पद
के ही गेय रुपान्तर प्रतीत होते है।
४
भजु मन चरण कंवल अविनासी।
जेताईँ२ दीसे धरीन गगन बिच, तेताईँ३ सब उठि बासी।
कंहो भयो तीरथ व्रत कीन्हे, कहा लिये करवत कासी।
„इस देही का गरब न करना, माटी मे मिल जासी।
१ विश्राम, २ जितने ही, ३ उतने ही।

वैष्णव-प्रभाव द्योतक पद २१३
यो ससार चहर की बाजी, साझ पड्या उठ जासी ।
कहा भयो है भगवा पहरया, घर तजि भयो सन्यासी ।
जोगी होय जुगुति नही जाणी, उलटि जनम फिर आसी ।
अरज करो अबला कर जोरे, स्याम तुम्हारी दासी ।
मीराँ के प्रभु गिरधर नागर, काटो जम की फांसी ॥३४४॥
उपर्युक्त पद पर सत मत का प्रभाव सुस्पष्ट है ।
५
लगे रहना, लगे रहना, हरी भजन मे लगे रहना ।
साहेब का घर दूर है रे, जैसी लगी खजूर ।
चढै तो चाखे प्रेम रस, पडे तो चकना चूर ।
क्या बक्तर का पहनना रे, क्या ढालो की ओट ।
सूरे पूरे का पारखा रे, लडी घणी से जोर ।
कान्ह कटारी बडी रे गुरु गोविन्द तलवार ।
धनुष्य रूपी माला बाध वो, कबू न लागे द्वार ।
हाड चाम की देह बनी रे, नव नाड़ी दश कोर ।
मीराँ के प्रभु गिरिधर नागर, लगी भर्म की चोट ॥३४५॥†
पद की पहली तीन और अतिम दो पक्तियो से सतमत का प्रभाव स्पष्ट
स्पष्ट हो उठता है। पद का मध्याश अर्थहीन है। ऐसे पदो की
प्रामाणिकता मे सदेह का होना सहज है ।
६
भजन भरोसे अविनासी, मै तो भजन भरोसे ।
जप तप तीरथ कछूए न जाणूँ, करत मे उदासी रे ।
मत्र न जत्र कछुए न जाणूँ, वेद पढ़चो न गई कांसी ।
मीराँ के प्रभु गिरिधर नागर, चरणकवल की हूँ दासी ॥३४६॥

२१४ मीराँ-बृहद्-पद-संग्रह
७
भजन बिना जिवडा दु खी, मन तू राम भजन करी ले।
जीव तूँ जायगा जरूरू मन तू राम भजन करीले।
लाख रे चौर्यासी फेरा फिरोगे, जीव जन्मी जन्मी भरे।
माता पिता तेरा दास ने¹ बन्धु वाल्हे, कारज कछु ना सरे।
हस्ती ने घोडा माल खजाना, धन भडार भर्यो घर मे।
बाइ मीराँ के प्रभु गिरिधर नागर, अरे मेरो चित भजन मे धरे।
।।३४७।।
उपर्युक्त पद की भाषा पर गुजराती प्रभाव 'वाल्हे' आदि
स्पष्ट है।
८
तुम सुनो दयाल म्हांरी अरजी।
भौ² सागर मे बही जात हूँ, काढो तो थारी मरजी।
यो ससार सगो नही कोई, साचां रघुवर जी।
मात पिता और कुटुम्ब कबीला, सब मतलब के गरजी।
मीराँ की प्रभु अरजी सुन लो,चरन लगाओ थांरी मरजी।।३४८।।
९
जग मे जीवणा थोड़ा रे, राम कुण करे जजार।
मात पिता तो जन्म दियो है, करम दियो करतार।
कई रे खायो कइ रे खरचियो, कइ रे कियो उपकार।
दिया लिया तेरे सग चलेगा, और नही तेरी लार³।
मीराँ के प्रभु गिरिधर नागर, भज उतरो भव पार ।।३४९।।
१ गुजराती शब्द जिसका अर्थ है 'और', २ भव, ३ पीछे।

वैष्णव-प्रभाव द्योतक पद २१५
१०
काय कूं न लियो तब नू काय कूँ न लियो।
राम जी को नाम तब तू काय कूँ न लियो।
नव मास तू ने उदर मै राख्यो।
झूलणे झुलाओ, तू ने पारणे¹ पोढायो।
बडो रे भयो तब तू कुल लजायो।
गुनका² को बेटा गली माही डोले।
पिता बिन पुत्र ए गुनका को कहायो।
बाई मीराँ के प्रभु तिहारा भजन बिना।
आवो ⁻ रुडो मन खोवे ऐले³ गुभायो ॥३५०॥
पदाभिव्यक्ति मे असंगति है। भाषा परं गुजराती प्रभाव है।
पद की प्रामाणिकता विशेष संदिग्ध है।
११
भजले रे मन गोपाल गुणा।
अधम तरे अधिकार भजन सूं, जोइ आये हरि की सरणा।
अविस्वास तो सखि बताऊ, अजामेल, गणिका, सदना।
जो कृपालु तन मन धन दीन्हो, नैन नासिका मुख रसना।
जाको रचत मास दस लागे, ताहि न सुमिरौ एक दिना।
बालापन सब खेल गमायो, तरुण भयो जब रुप घना।
वृद्ध भयो जब आलस उपज्यो, माया मोह भयो मगना।
गज अरु गीध हूँ तरे भजन सूं, कोऊ तर्यो नही भजन बिना।
धना भगत पीपा मुनि सबरी, मीराँ की हु करो गणना ॥३५१॥†
अन्तिम पक्ति के आधार पर यह सुस्पष्ट हो जाता है कि पद
मीराँ द्वारा रचित नही।
१ पालने, २ गनिका, ३ मारवाडी मे शब्द है 'अहला' जिसका
अर्थ है 'व्यर्थ'।

२१६ मीराँ-बृहद्-पद-संग्रह
१२
राम कहिये रे गोविन्द कहि मेरे।
ककर हीरा एक सरसा, हीरा किस कूँ कहिए रे।
हीरा पण तो जब ही जांणूँ, महगा मोल बिकइए रे।
कोयल कागा एक सरसा, कोयल किस को कहिए रे।
कोयलपण तो जब ही जाणूँ, मीठा बचन सुनाइये रे।
हसा बगुला एक सूरीखा, हसा किस कूँ कहिए रे।
हसा पण तो जद ही जाणूँ, चुग चुग मोती खइये रे।
जगत भगत के आवरे है, भगत किसकूँ कहिए रे।
भगत पणो तो जबही जाणूँ, बोल सभी का सहिए रे।
मीराँ के प्रभु गिरिधर नागर, हरि चरणा चित दइए रे।
द्वारका के ठाकुर के सरण मे, जाकर रहिए रे ॥३५२॥
१३
रमइया बिन या जिवड़ो दु ख पावै, कहो कुण धीर बँधावै।
या ससार कुबुध१ को माडो२, साध सगति नही भावै।
राम की निन्दा ठाणै, करम ही करम कुमावै३।
राम नाम बिनु मुकुति न पावै, फिर चौरासी जावै।
साध सगति कबहू न जावै, मूरख जनम गवावै।
मीराँ प्रभु गिरधर के सरणे, जीव परम पद पावै ॥३५३॥†
पद की पाँचवी पक्ति मे पुनरुक्ति है। प्रथम पक्ति को वियोग
द्योतंक पदो मे प्राप्त पक्ति का ही रुपान्तर कहा जा सकता है। इस
पक्ति से व्यक्त होने वाली वियोग वेदना का कोई आभास शेष पद
पर नही!
१ कुबुद्धि, पाप, २ पात्र, ३ कमाता हैं।

वैष्णव-प्रभाव द्योतक पद २१७
ब्रजभाषा में प्राप्त पद
१
बसो मोरे नैनन मे नन्दलाल।
मोहनी मूरत सावरि सूरति, बनै नैन विसाल।
अधर सुधारस मुरलि राजति, उर बैजन्ती माल।
छुद्र घटिका कटि तट सोभित, नूपुर शब्द रसाल।
मीराँ प्रभु सत सुखदाई, भक्त वछल गोपाल ॥३५४॥
पद की भाषा शुद्ध साहित्यिक ब्रजभाषा है। यह देखते हुए अन्तिम
पंक्ति मे व्यवहृत "बछल" शब्द अनुपयुक्त ठहरता है "बछल" शब्द
के कारण लय भग भी होता है। अत "बछल" के बदले "वत्सल" का
प्रयोग ही अधिक युक्तियुक्त होगा।
२
मेरो मन राम ही राम रटै रे।
राम नाम जप लीजै प्राणी, कोटिक पाप कटै रे।
जनम जनम के खत जू पुराने, नामही लेत फटे रे।
कनक कटोरे इम्रिता भरियो रे, पीवत कौन नटै रे।
मीराँ कहै प्रभु हरि अविनासी, तन मन ताहि पटै रे ॥३५५॥†
पद की तीसरी पंक्ति का शेष पद से पूर्वापर संबंध नही
बैठ रहा है।
३
नैया मेरी हरी तुम ही खवैया, तुमरी कृपा ते पार लगैया।
गहरी नदिया नाव पुरानी, पार करो बलभद्र जू के भैया।
अजमिल गज गनिका तारी, शबरी अहिल्या (द्रोपदी) लाज रखैया।
मीराँ के प्रभु गिरधर नागर, बार बार तुमरें बाल गैया।
॥३५६॥†
चतुर्थ पंक्ति का उत्तरार्द्ध अशुद्ध है।
c

२१८ मीराँ-बृहद्-पद-संग्रह
४
राम नाम रस पीजै मनुआ, राम नाम रस पीजै।
तज कुसग सतसग बैठ नित, हरि चरचा सुन लीजै।
काम क्रोध मद लोभ मोहं कूँ, चित से बहाय दीजै।
मीराँ के प्रभु गिरधर नागर, ताही के रग भीजै ॥३५७॥†
उपर्युक्त पद मे "राम" गिरधर नागर" दोनो ही सम्बोधन का
प्रयोग हुआ है यह विचारणीय् है।
५
मेरा बेडा लगाय दीजो पार, प्रभु अरज करु छूूँ।
या भव मे मै बहुत दुख पायो, ससा सोग निवार।
अष्ट करम की तलब लगी है, दूर करो दुख पार।
यो ससार सब बह्यो जात है, लख चौरासी धार।
मीराँ के प्रभु गिरिधर नागर, आवागमन निवार ॥३५८॥†
प्रथम पक्ति मे "करु छूूँ" क्रिया का प्रयोग शेष पद की शुद्ध ब्रज
भाषा से सर्वथा भिन्न पडता है।
६
कृष्ण करो जजमान, प्रभु तुम कृष्ण करो जजमान।
जाकी कीरति बेद बखानत, साखी देते पुरान।
मोर मुकुट पीताम्बर शोभत, कुडल झलकत कान।
मीराँ के प्रभु गिरिधर नागर, दे दर्शन को दान ॥३५९॥†
पद की प्रथम पक्ति सर्वथा निरर्थक है। शेष पद वर्णनात्मक
है। तृतीय पक्ति अन्य पदो मे भी हूबहू इसी रूप मे मिल जाती है।
७
धन आज की घरी, सतसंग मे परी।
श्री मदभागोत श्रवण सुनी, रसना रटत हरी।

वैष्णव-प्रभाव द्योतक पद २१९
मन डूबत लीला सागर मे, देही प्रीति धरी।
गुरु सतन की मोहनि सूरति, उर बिच आई अरी।
मीराँ के प्रभु हरी अविनासी, सरणौ राखि हरी ॥३६०॥
वैष्णव और सतमत दोनो का ही प्रभाव स्पष्ट है।
८
डब्बा मे सालगरम बोलत क्यो नहियाँ।
हम बोलत तुम बोलत नाहि, काहे को मौन धरैयाँ।
यह भव सागर अगम भरी है, काढ़ लेहूँ गहि बैयाँ।
मीराँ के प्रभु गिरधर नागर, तुम्ही मोरे सैयाँ ॥३६१॥†
पदाभिव्यक्ति असगत है।
९
तुम बिन स्याम कौन सुने (गो) मेरी।
ठाढी खेवटणी अरज करत है।
मलवा ने नाव पच्छिम फेरी।
नदिया गहरी नाव पुराणी।
अध पर बीच भंवर ने घेरी।
बोदी है प्रभु पार लगावो।
डूब जाय तो कहा रहै तेरी।
मीराँ के प्रभु गिरिधर नागर।
कुल को त्याग शरण लिईं तेरी। ॥३६२॥†
पदाभिव्यक्ति स्पष्ट नही है।
१०
काहे को देह धरी, भजन बिन काह को देह धरी।
गर्भवास की मास ृदिखाई, बाकी पीव लुरी।

२२० मीराँ-बृहद्-पद-संग्रह
कोल¹ बचन कर बाहर आयी, अब तुम भूल परी।
नीब तन गारा बजे बधाई, कुटुंब सब देख डरी।
मीराँ के प्रभु गिरिधर नागर, जननी भार मरी ॥३६३॥†
पदाभिव्यक्ति मे सगति नही है।
११
अब कोऊ कछु कहो दिल लागा रे।
जाकी प्रीत लगी लालन से, कचन मिला सुहागा रे।
हसा की प्रकृत हसा (ही) जाने, का जाने मर कागा रे।
तन भी लागा, मन भी लागा ज्यो बाभण गल धागा रे।
मीराँ के प्रभु गिरिधर नागर, भाग हमार जागा रे ॥३६४॥†
पदाभिव्यक्ति मे सगति का अभाव है। पद मे पूर्वापर सबन्ध
का भी निर्वाह नही हुआ है। सघर्ष द्योतक पदो मे भी एक पद ऐसा ही
मिलता है। बहुत सम्भव है कि यह पद उसका गेय रुपान्तर मात्र हो।
१२
करम की गति न्यारी सन्तो, करम की गति न्यारी।
बडे बडे नयन दिये मरधन कु, बन बन फरत उघारी रे।
उज्वल वरन दीनी बगलन कु, कोयल कर दीनीकारी रे।
औरन दीपन जल निरमल कीनो, समुदर कर दीनी खारी रे।
मुरख कु तुम राज दियत हो, पण्डित फरत भिखारी रे।
मीराँ के प्रभु गिरिधर नागुन राना जी तो कान बिचारी रे।
॥३६५॥
१३
भजन भरोसे अविनाशी, मै तो भजन भरोसे अविनाशी।
जप तप तीर्थ कछुए न जाणुँ फरत मे उदासी रे।
१ कौल, बचन।

वैष्णव-प्रभाव द्योतक पद २२१
मत्र ने जन्त्र कछुए न जाणुं बेद पढ्यो न गै काशी।
मीराँ के प्रभु गिरधर नागर, चरण कमल की हूँ दासी ॥३६६॥
१४
कोई ना जाने हरिया तारी गति कोई ना जाने।
मिट्टी खात मुख देखा जसोदा चोदह भुवन भरिया।
पडी पाताल काली नागनाथ्यूँ सूरन शशी डरिया।
डूबत ब्रज राख लियो है कर गोबरधन धरिया।
मीराँ के प्रभु गिरधर नागर सरने आयो सो तरिया ॥३६७॥
१५
चरण रज महिमा मे जानी।
ये ही चरण से गगा प्रगटी भगीरथ कुल तारी।
ये ही चरण से विप्र सुदामा हरि कचन धाम दीनी।
ये ही चरण से अहिल्या उधारी गौतम की पटरानी।
मीराँ के प्रभु गिरधर नागर ये ही चरण कमल मे लपटानी ॥३६८॥
१६
मेरो मन हर लिनो राजा रण छोड़, राजा रण छोड़, प्यारा रंगीला रणछोड़
केशव माधव श्री पुरुषोत्तम कुबेर कल्याण कीजो।
शंख चक्र गदा पद्म विराजे, मुख मुरली घन घोर।
मोर मुकुट सिर छत्र विराजे, कुण्डल की छब ओर।
आस पास रतनांगर सागर, गोमती जी करे कलोल।
धजाँ पताका बहुत्याँ फरके, झालर फरत झकझोर।
सब भगत के भाग्य ही प्रकटे, नाम धर्यो रणछोर।
जे कोई तेरो नाम सुनावे, पावे युगल किशोर।
मीराँ बाई के प्रभु गिरधर नागुण कर ग्रहो नन्द किशोर ॥३६९॥

२२२ मीराँ-बृहद्-पद-संग्रह
गुजराती में प्राप्त पद
१
बोल माँ बोल माँ बोल माँ रे।
राधा कृष्ण बिना बीजूँ बोल माँ¹।
साकर शेलडीनो स्वाद तजी ने।
कडवो लीवडो घोल माँ रे।
चाँदा सूरजनु तेझ तजी ने।
अगिया सगा ने प्रीत जोड माँ रे।
हीरा माणेक झवेर तजी ने,
कथीर सगाते मणि तोल माँ रे।
मीराँ कहे प्रभु गिरधर नागर,
शरीर आप्यु सम तोल माँ रे ॥३७०॥
२
ध्यान धणी केरू धरवूूँ² रे, बीजुँ³ पारे शुँ कहूँ।
शुँ कहूँ रे सुन्दर श्याम, बीजाने⁵ मारे शुँ कहूँ।
नित्य उठी शुभे नाहि अने धोई अने रे, ध्यान धणीतर्णु धरीए रे।
साधु जन ने जमाडीओ⁴ वाला, जूठूं वधे⁶ ते अमे जभीए रे।
वृन्द ते वन माँ राच्यो रे वाला, राम मडल माँ तो अमे रमीए रे।
हरि ने चीर काम न आवे वाला, भगवाँ पहरीने अमे भभीए रे।
बाई मीराँ के प्रभु-गिरिधर नागर, चरण कमल माँ चित धरीए रे।
॥३७१॥
पदाभिव्यक्तिमे वह गाम्भीर्य पूर्ण मधुरता नही जो मीराँ के
पदो की विशेषता है।
१ मत कर, २ धरना, ३ दूसरा, ४ भोजन करा कर, ५ दूसरे का,
६ बढे।

वैष्णव-प्रभाव द्योतक पद २२३
३
राम नाम साकर कटका हॉ रे, मुख आवे अभी रस गटका।
हॉरे जेने१ राम भजन प्रीत थोडी, तेनी२ जी मड़ली लियो ने तोड़ी।
हॉरे जेने राम तना गुण गाया, तेने जमुना मार न खाया।
हॉ रे गुण गाये छे मीराँ बाई, तुम हरि चरने जाओ धाई।
बोल माँ बोल माँ बोल माँ रे, राधिका सुन बिन बोल माँ रे।
साकर सेरड़ी स्वाद तजी ने, कड़वो लिवड़ो३ घोल माँ रे।
चान्दा सूरजने तेज तजी रे, आगिया सधाथे प्रीत जोड माँ रे।
हीरा माणक जेवर तजी ने, कथीर सधा थे मनी तोल माँ रे।
मीराँ के प्रभु गिरधर नागर, सरीर आप्यूँ समतोल माँ रे ॥३७२॥†
उपर्युक्त पद का प्रथमांश "राम नाम जाओ धाई।
अभिव्यक्ति के आधार पर प्रक्षिप्त ही प्रतीत होता है। द्वितीयांश
"बोल माँ रे प्रीत जोड माँ रे।" प्रथम पद (स० १) की ही
पुनरुक्ति है। ऐसे पद निश्चित रूप से प्रक्षिप्त कहे जा सकते है।
४
मुझ अबला ने मोटी नीरात थई सामलो घरे, तु म्हारे साँचुरे।
खाली धडाऊँ बीटलबर केरी, हार हरिनो म्हारे हिय रे।
तीन माल चतुर भुज चुडलो, सिद्ध सोयी धरे जाइये रे।
झाझरिया जगजीवन केरा, किसन गला री कठी रे।
बिछुवा घुँघरा रामनारायण, अनवट अन्तरजामी रे।
पेटी घड़ाऊ पुरुषोतम केरी, ने टीकम नाम नूं तालो रे।
कुञ्जी कराऊँ .करुणा नन्द केरी, ते मा गैषा नू माँरू रे।
सासर बासो सजी ने बैठी, अब नथी४ काँचू रे।
मीराँ के प्रभु गिरिधर नागर, हरि नु चरणे जाचू रे।
३७३।।†
१ जिसको, २ उसकी, ३ नीम, ४ नही।

२२४ मीराँ-बृहद्-पद-संग्रह
५
मुखडानी माया लागी रे, मोहन प्यारा, मुखडानी माया लागी रे।
मुखडूँ मै जोयूँ१ त़ासूँ सर्व जग थे यूँ२ खारूँ, मन मारूँ, रहियूँ न्यारूँ रे।
संसारी नो सुख एवो३ झाझवाना नीरं जे बूँ४, तेने तुच्छ करी फेरिये रे।
ससारी नो सुख काचूँ, परणी ने रड़ावु पाछूँ, तेने घर सीद५ जइये रे।
परणूँ तो प्रीतम प्यारो, अखण६ सौभाग्य मारो, राण्डवानो भय टाल्यो रे।
मीराँ बाई बलिहारी आशा मूने एक तारी, हवे७ हूँ तो बड भागी रे।
॥३७४॥†
६
काम नही आवे तो काम नही आवे प्रभु बिना तुम्हारे काम नही आव।
खचि खचि अन्न वो भोजन बनायो, तापरे तन तापकर लगायो रे।
रत्न जतन करि एहि पुतर जायो, छनो छनो बाबु लाड लडायो रे।
तिरया कहे तोरे साथ चलूँगी, लुटि लुटि वाको धन खायो रे।
काढ काढ करे घर की बाहरी छनुरे रहेवा न पाया रे।
बाई मीराँ थे प्रभु गिरधर नागुण, चरणे रही चरण न धरायो रे।
॥३७५॥†
७
हाँ रे चालो डाकोर माँ जई बसिये।
हाँ रे मने रग लगाडी रग रसिये रे।
हाँ रे प्रभात ने पहोर माँ नोबत बाजे।
हाँ रे अमे दरसन करवा जइये रे।
हाँ रे अटपटी पाग केसरियो बाधो रे।
हाँ रे काने कुण्डल सोइये रे।
हाँ रे पीला पीताम्बर जरकस जामा।
१ देखा, २ हुआ, ३ ऐसा, ४ जैसा, ५ उसको, ६ अखड ७ अब।

वैष्णव-प्रभाव द्योतक पद २२५
हाँ रे मोतियन माल थी मोहिये रे।
हाँ रे चन्द्र बदन अनियाली आँखो।
हाँ रे मुखड़ो सुन्दर सोहिये रे।
हाँ रे रूमझूम रूमझूम नूपूर बाजे।
हाँ रे मन मोहियो मारू मोर लिये रे।
हाँ रे मीराँ बाई कहे रे गिरधर नागर।
हाँ रे अगो अंग जाई मलिये रे ॥३७६॥†
उपर्युक्त पद गुजराती गरबा गीतों की तर्ज पर है।
८
सोकल डानूं साल भरि भोटूँ हो जीरे घरमाँ सो कलडानूं साल मोरे।
हेमो ने हमारे मइयर बनावो वोला, हवे रहेवानूं म्हाने खोटु।
कुबेरे पडीसुँ अभो वखडोर पीसूं, हावे जीवा ने आल सिर चोटु।
सासु हठीली ननद ढगारी वाला, नाना दिये रर्युं मे यूँ मोटु।
मीराँ के प्रभु गिरधर नागर वाला, चरण कमल चितने ओठु ॥३७७॥†
९
लेताँ लेताँ राम नाम रे, लोकड़याँ तो लाज मरे छे।
हरि मन्दिर जाता पाव लिया रे दूखे, फिरि आवे सारो गाम रे।
झगडो थाय त्यॉ दौड़ी ने जाय रे, मुकी ने घर ना काम रे।
भाड गवैया गाने का नृत्य करताँ, बेसी रहे चारे जाम रे।
मीराँ के प्रभु गिरधर नागर, चरण कमल चित हाम रे ॥३७८॥†
१०
हाँ रे मै तो की धी छै ठाकोर थाली रे, पधारो बनमाली रे वनमाली।
प्रभु कंगाल तोरी दासी, हाँ रे प्रभु प्रेमना छो तमे प्यासी, दासी नी पूरजो
आशी।
प्रभु साकर द्राख खजूरी, माँहे न थी बासुरी के पुरी, मारे सासु नन्दनी
सूली।
१५