मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Mayamatam of Maya Muni with Hindi Commentary by Shailaja Pandey
मय मुनि (टीकाकार: डॉ. शैलजा पाण्डेय) द्वारा
१५६ मयमतम्
अश्वत्थ ( पीपल ), उदुम्बर ( गूलर ), प्लक्ष ( पाकड़ ), वट ( बरगद ), सप्तपर्ण,
बिल्व ( बेल ), पलाश, कुटज, पीलु, श्लेष्मातकी ( लिसोढ़ा ), लोध्र, कदम्ब,
पारिजात, शिरीष, कोविदार ( कचनार ), तिन्त्रिणी, महाद्रुम, शिलीन्ध्र, सर्पमार,
शाल्मली ( सेमल ), सरल ( चीड़ ), किंशुक, अरिमेद, अभया, अक्ष, आमलकद्रुम,
कपित्थ ( कैथा ), कण्टक, पुत्रजीव, डुण्डुक, कारस्कर, करञ्ज, वरण, अश्ममारक,
बदर, वकुल, पिण्डी, पद्मक, तिलक, पाटली, अगरु तथा कपूर के वृक्षों का प्रयोग
गृहनिर्माण में नहीं करना चाहिये। ये सभी वृक्ष देवों के योग्य हैं; लेकिन मनुष्यों के
लिये अनर्थकारक होते हैं। इसलिये मनुष्यों के गृह-निर्माण के लिये इनको प्रयत्नपूर्वक
नहीं ग्रहण करना चाहिये अर्थात् इन वृक्षकाष्ठों का परित्याग कर देना चाहिये।
✱ इष्टकासंग्रहणम् ✱
ऊषरं पाण्डुरं कृष्णचिक्कणं ताम्रपुल्लकम् ॥१९४॥
ईंटों का संग्रह—( मृत्तिका चार प्रकार की होती है— ) ऊषर ( लोनी, नमकीन ),
पाण्डुर ( सफेद ), कृष्ण-चिक्कण ( काली और चिकनी ) एवं ताम्रपुल्लक ( लाल
वर्ण की खिली हुई ) ॥१९४॥
मृदश्चतस्रस्तास्वेव गृह्णीयात्ताम्रपुल्लकम् ।
अशर्कराश्ममूलास्थिलोष्ठं सतनुवालुकम् ॥१९५॥
मृत्तिकायें चार प्रकार की होती हैं। इनमें ताम्रपुल्लक मृत्तिका इष्टकादि के लिये
ग्रहण करने योग्य होती है। इसमें कंकड़, पत्थर, जड़ एवं अस्थि के टुकड़े नहीं होने
चाहिये; साथ ही इसमें महीन बालू होना चाहिये।। १९५ ।।
एकवर्णं सुखस्पर्शमिष्टं लोष्टेष्टकादिषु ।
मृत्खण्डं पूरयेदग्रे जानुदध्ने जले ततः ॥१९६॥
यह मृत्तिका एक रंग की एवं छूने में सुखद होनी चाहिये। लोष्ट ( टाइल्स ) एवं
ईंट के निर्माण के लिये ( गर्त में ) घुटने के बराबर जल में मिट्टी डालनी चाहिये।। १९६ ।।
आलोड्य मर्दयेत्पद्भ्यां चत्वारिंशत्पुनः पुनः ।
क्षीरद्रुमकदम्बाम्राभयाक्षत्वग्जलैरपि ॥१९७॥
त्रिफलाम्बुभिरासिक्त्वा मर्दयेन्मासमात्रकम् ।
मिट्टी एवं पानी को अच्छी तरह से मिलाकर पैरों से चालीस बार उनका मर्दन
करना चाहिये। इसके पश्चात् क्षीरद्रुम, कदम्ब, आम, अभया एवं अक्ष वृक्ष के छाल
के जल से एवं त्रिफला के जल से सिञ्चित कर तीस बार मर्दन करना चाहिये अर्थात्
पैरों से सानना चाहिये।। १९७।।
'गञ्चदशोऽध्यायः 卐 पादप्रमाणद्रव्यपरिग्रहविधानम् १५७
चतुष्पञ्चषडष्टाभिर्मात्रैस्तद्द्विगुणायतः ॥११८॥
व्यासार्धार्धत्रिभागैकतीव्रा मध्ये परेऽपरे।
इष्टका बहुशः शोष्याः समदग्धाः पुनश्च ताः ॥११९॥
( उपर्युक्त विधि से तैयार की गई मिट्टी से ) चार, पाँच, छः या आठ अङ्गुल
चौड़ी, चौड़ाई की दुगुनी लम्बी तथा चौड़ाई की चतुर्थांश, आधा अथवा तीसरे भाग
के बराबर मोटी ईंटों का निर्माण करना चाहिये। इनकी मोटाई एक छोर से दूसरे छोर
तक बराबर होती है। ईंटों को पूर्ण रूप से सुखाकर पुनः इन्हें समान रूप से पकाया
जाता है॥११८-११९॥
एकद्वित्रिचतुर्मासमतीत्यैव विचक्षणः।
जले प्रक्षिप्य यत्नेन जलादुद्धृत्य तत्पुनः।
निरार्द्रास्ताः प्रयोक्तव्या इष्टका इष्टकर्मणि ॥१२०॥
इसके पश्चात् एक, दो, तीन या चार मास बीत जाने पर बुद्धिमान ( स्थपति )
को ईंटों को यत्नपूर्वक जल में डाल कर पुनः जल से निकालना चाहिये। जब ईंटें
सूख जायें तब इच्छित निर्माणकार्य में इनका प्रयोग करना चाहिये॥१२०॥
एवं द्रुमेष्टकशिला विधिना गृहीत्वा
कुर्वन्तु वस्तु विहिता हि वराः समृद्धयै।
यन्निन्दितं त्वपरवस्तववशिष्टमाद्यै-
र्द्रव्यं विनष्टभवनप्रभवं विपत्त्यै ॥१२१॥
इस प्रकार विधिपूर्वक वृक्ष ( काष्ठ ), ईंट एवं शिला आदि लेकर भवननिर्माण
करना चाहिये। श्रेष्ठ जन ऐसे भवन को समृद्धिकारक कहते हैं। जो पदार्थ निन्दित हैं
अथवा दूसरे भवन से लिये गये हैं ( पुराने भवन से निकले ईंट, काष्ठ आदि ), उनसे
निर्मित भवन नष्ट हो जाते हैं तथा ( गृहस्वामी के लिये ) विपत्ति के कारण बनते हैं,
ऐसा प्राचीन जनों का मत है॥१२१॥
स्तम्भायामं तारमाकारभेदं
सालङ्कारं भूषणं च क्रमेण।
युक्त्या युक्तं सम्पदामास्पदं तत्
प्रोक्तं नृणां तैतिलानां मयेह ॥१२२॥
इति मयमते वास्तुशास्त्रे पादप्रमाणद्रव्यपरिग्रहो
नाम पञ्चदशोऽध्यायः
१५८ मयमतम्
स्तम्भों की लम्बाई, मोटाई एवं आकारों का वर्णन उनके अलङ्कार एवं सज्जा-
सहित क्रमानुसार किया गया है। मनुष्यों एवं देवों के गृह में विधिपूर्वक इनका प्रयोग
सम्पत्ति प्रदान करता है, ऐसा मय द्वारा वर्णित है।।१२२।।
व्याख्यात्मक टिप्पणी
१. स्तम्भ के मान एवं भेद ( श्लोक १-२८ )
(क) समराङ्गणसूत्रधार (२८.२७-३३) में पद्मकस्तम्भ, घटपल्लवक स्तम्भ,
कुबेर एवं श्रीधर संज्ञक चार स्तम्भों का उल्लेख किया गया है। विभिन्न प्रकार के
अलङ्करणों से युक्त पद्मकस्तम्भ, अष्टकोण घटिका, पुष्पमाला एवं पल्लव आदि से
अलंकृत घटपल्लवक स्तम्भ, षोडश कोण से युक्त कुबेरस्तम्भ तथा ऊपर पल्लवों
से युक्त चौकोर श्रीधर संज्ञक स्तम्भ होते हैं—
एवं गृहाणां चत्वारः स्तम्भा लक्ष्मभिरीरिताः। (२८.३३)
(ख) विश्वकर्मवास्तुशास्त्र ( ६४ अ. ) में स्तम्भों को सभी निर्माण का आधार
कहा गया है। इसका निर्माण सुकरता, सुख एवं शोभा के लिये किया जाता है। इसका
निर्माण प्रस्तर, धातु, काष्ठ अथवा इष्टकाओं द्वारा किया जाता है—
निर्माणस्य यथा भूमिराधारस्सम्प्रकीर्तितः।
तथा तस्याधारमाहुः पादं शिल्पविशारदाः ।।१।।
सौकर्यञ्च सुखं शोभालाभः पादप्रकल्पनात्।
तस्मात्तत्कल्पयेच्छिल्पी शिलालोहद्रुमेष्टकैः ।।२।।
इस ग्रन्थ में बारह प्रकार के स्तम्भों का वर्णन किया गया है। ये हैं—देवकान्त,
ब्रह्मकान्त, इन्द्रकान्त, विष्णुकान्त, स्कन्दकान्त, सोमकान्त, सुप्रतीकान्त, सूर्यकान्त,
ब्राह्मणकान्त, कैलासकान्त, मेरुकान्त एवं नन्दिकान्त स्तम्भ। आकृति एवं लक्षण-
सहित इनका वर्णन इस प्रकार है—
देवकान्तं ब्रह्मकान्तमिन्द्रकान्तमथापि वा।।३।।
विष्णुकान्तं स्कन्दकान्तं सोमकान्तमिति क्रमात्।
वर्तुलं चतुरस्रञ्च षडस्रन्त्वष्टपट्टिकम् ।।४।।
द्वादशास्रं षोडशास्रं पादकल्पं विदुर्बुधाः।
पुरः पश्चात्सर्वतो वा कल्पस्तम्भप्रकल्पनम्।।५।।
युग्मद्वियुग्मसङ्कीर्णोपस्तम्भादिप्रकल्पनम् ।
सुप्रतीकान्तकं सूर्यकान्तं ब्राह्मणकान्तकम्।।६।।
पञ्चदशोऽध्यायः 卐 पादप्रमाणद्रव्यपरिग्रहविधानम् १५९
कैलासमेरुकं कान्तं तथा नन्दीशकान्तकम्।
इति द्वादशभेदेन स्तम्भानां कल्पनं मतम्।।७।।
इनके प्रमाण एवं अलङ्करण का भी वर्णन प्राप्त होता है (८-३४ श्लोक)। इन
पर गज, वाजन, चक्रवाक, हंस, शुक, सारिका, विभिन्न देवता, लता, पुष्प आदि
का अङ्कन करना चाहिये। इनके लिये उपयुक्त काष्ठ तिलक, शाल, श्रीपर्ण, चन्दन,
शमी आदि सारवान एवं दोषरहित वृक्षों से ग्रहण करने चाहिये।
(ग) राजवल्लभमण्डन (अ. ५) में स्तम्भ के विषय में इस प्रकार वर्णन प्राप्त
होता है—
स्तम्भोऽष्टास्रसुवृत्तभद्रसहितो रूपेण चालङ्कृतो
युक्तः पल्लवकैस्तथाभरणकं स्यात्पल्लवेनावृतम्।
कुम्भी भद्रयुता कुमारसहितं शीर्ष तथा किन्नराः
पत्रं चेति गृहे न शोभनमिदं प्रासादके शस्यते।। (५.३३)
स्तम्भ अष्टकोणीय, वृत्ताकार, भद्रयुक्त, विविध रूपों से सुसज्जित, पल्लव,
आभरण, कुम्भी, भद्र, कुमार एवं शीर्ष पर किन्नर से युक्त होना चाहिये। इस प्रकार
का स्तम्भ देवालय में प्रशस्त होता है।
(घ) मनुष्यालयचन्द्रिका (५ अ. २१-२५) में दृढ़ अधिष्ठान के लिये ओमा,
घट, मण्डि अथवा घटफलक, वीरकाण्ड एवं पोतिका संज्ञक अवयवों का निर्माण
किया जाता है। इन स्तम्भों का मध्य भाग गृहकर्त्ता को रुचि के अनुसार चौकोर, गोल,
अष्ट अथवा षोडश कोण बनाना चाहिये। स्तम्भ की स्थापना के लिये स्तम्भ के मूल
में स्थित ओमा में गर्त बनाना चाहिये। स्तम्भ में मूलाग्र (लकड़ी की चूल) निर्मित
कर उसे ओमा में स्थापित किया जाता है—
स्तम्भाः स्वविस्तारहुताशभागप्रक्लृप्तमूलाग्रशिखासमेताः।
स्थाप्या यथार्हं निजपीठकोर्ध्वं तद्गर्तसंलग्नशिखाः समस्ताः।।२३।।
(ङ) शिल्परत्न (पूर्वभाग २१ अ.) में स्तम्भों के माप, अङ्ग, आकृति एवं अलङ्करण
आदि का.विस्तार से वर्णन किया गया है। इनमें चौकोर स्तम्भ ब्रह्मकान्त, अष्टकोण
विष्णुकान्त (५८ श्लोक), षट्कोण इन्द्रकान्त या स्कन्दकान्त, द्वादश कोण भानुकान्त,
षोडश कोण चन्द्रकान्त (५९), वर्तुलाकार ईशकान्त, मूल में चौकोर एवं मध्य में
अष्टकोण रुद्रकान्त स्तम्भ (६०-६१) होते हैं। अलङ्करणों के अनुसार भद्रकान्त,
वज्रकान्त आदि स्तम्भों के भेद वर्णित हैं। स्तम्भों का सामान्य वर्णन इस प्रकार किया
गया है—
कार्याः स्युश्चरणा युगाष्टनृपकोणाः सर्वतो वर्तुला
विस्तारत्रिगुणोपरित्रिगुणविस्तारोन्मिताष्टास्रकाः ।
१६० मयमतम्
मूलोद्भावितकर्णसूत्रचतुरस्रोर्ध्वांशवृत्तः पुनः
शुण्डूद्भेदविचित्रवृत्तिरुचिरा वारब्धगेहोचिताः ।।५७।।
लगभग यही श्लोक तन्त्रसमुच्चय (२.२४) में भी प्राप्त होता है।
(च) मत्स्यपुराण (२५५.३-६) में पाँच प्रकार के स्तम्भों द्विवज्र, षोडशास्र,
बत्तीस कोण, प्रलीनक एवं वृत्ताकार का वर्णन, उनके पद्म-कुम्भादि अङ्गों का एवं
अलङ्करण का उल्लेख प्राप्त होता है—
द्विवज्रः षोडशास्रस्तु द्वात्रिंशास्रः प्रलीनकः।
मध्यप्रदेशे यः स्तम्भो वृत्तो वृत्त इति स्मृतः।।
एते पञ्च महास्तम्भाः प्रशस्ताः सर्ववास्तुषु।
पद्मवल्लीलताकुम्भपत्रदर्पणरूपिताः ।।
स्तम्भस्य नवांशेन पद्मकुम्भान्तराणि तु।
स्तम्भतुल्या तुला प्रोक्ता हीना चोपतुला ततः।।
त्रिभागेनेह सर्वत्र चतुर्भागेन वा पुनः।
हीनं हीनं चतुर्थांशात्तथा सर्वासु भूमिषु।।
इन ग्रन्थों के अतिरिक्त बृहत्संहिता (५३.२८-२९), प्रासादमण्डन (७.१४),
अपराजितपृच्छा (१८४), क्षीरार्णव, ज्ञानप्रकाशदीपार्णव, ईशानशिवगुरुदेवपद्धति आदि
ग्रन्थों में भी स्तम्भ का वर्णन प्राप्त होता है।
२. कलश ( श्लोक ३१ )
कलश के विषय में ईशानशिवगुरुदेवपद्धति एवं शिल्परत्न में इस प्रकार प्राप्त
होता है—
(क) पोतिकाखण्डमण्डीनि कुम्भं लशुनमूलकम्।
अम्भोजमालास्थानानि स्तम्भाग्रे योजयेत् क्रमात्।।
अग्रहीनं तु लशुनं मूलोच्चं विपुलं भवेत्।
(क्रिया०-३१.६०-६१)
(ख) बोधिकाखण्डमण्डीनि कुम्भं लशुनमूलकम्।
अम्भोजमालां चान्तानि पादपीठं पुनः क्रमात्।।
क्रमेण योजयेद्ग्रात् सर्वस्तम्भेषु बुद्धिमान्।
तत्र बोधिकया हीनं कारयेद् वापि पीठकम्।।
(शिल्परत्न, पूर्व०-२१.११६-११७)
पञ्चदशोऽध्यायः 卐 पादप्रमाणद्रव्यपरिग्रहविधानम् १६१
( श्लोक ३२-३४ ) कलश के विषय में मयमत के साथ अन्य ग्रन्थों में प्राप्त
वर्णन की तुलना इस प्रकार प्रस्तुत की जा सकती है—
| मयमत | अजिता<br>(१४.३४-३६) | दीप्तागम<br>(५.२३-२४) | ईशानशिव-<br>गुरुदेवपद्धति<br>(क्रिया.३१.५१-५३) | शिल्परत्न<br>(२१.७९-८०) |
|---|---|---|---|---|
| दृग् १।९ | दृग् १।९ | धृग् १।९ | धृग् १।९ | धृग् १।९ |
| कमल ४।९ | कुम्भ ४।९ | कलश ४।९ | कुम्भ ४।९ | घट ४।९ |
| कण्ठ १।९ | कण्ठ १।९ | कण्ठ १।९ | कण्ठ १।९ | कर्ण १।९ |
| आस्य १।९ | आस्य १।९ | आस्य १।९ | मुख १।९ | मुख १।९ |
| पद्म १।९ | पद्म १।९ | पद्म १।९ | पद्म १।९ | पद्म १।९ |
| वृत्त १।१८ | वृत्त- | वृत्त- | वृत्त १।१८ | पीठिका १।९ |
| हीरकौ १।१८ | ग्रीव १।९ | भित्रौ १।९ | भिन्नकौ १।१८ | |
| ( मयमत में ब्रूनो डेगेन्स की टिप्पणी २०, पृष्ठ १८९ ) | ||||
| ३. पोतिका ( श्लोक ३९-५० ) | ||||
| स्तम्भ के शीर्षभाग पर वीरकाण्ड के ऊपर स्थापित होता है। इसके विषय में | ||||
| अन्य ग्रन्थों में इस प्रकार प्राप्त होता है— | ||||
| (क) मनुष्यालयचन्द्रिका ( अ. ५ ) में इसे रूपोत्तर को सहारा देने वाला अङ्ग | ||||
| कहा गया है। इसका माप इस प्रकार वर्णित है— | ||||
| स्तम्भाग्रोत्तरतारयोगदलविस्तारं तथा स्तम्भम- | ||||
| ध्योद्यद्व्यासतातं च तद्गलघनां रूपोत्तरे पोतिकाम्।। (२९) | ||||
| पत्रोत्तरे चेद् वितताङ्घ्रिहीनतीव्रा विधेया खलु पोतिकेयम्। | ||||
| खण्डोत्तरे तुल्यवितानतीव्रा सर्वांश्च सर्वेषु यथोपशोभम्।। (३०) | ||||
| (ख) | ||||
| ..................................................वीरकाण्डं त्रिसाधें- | ||||
| षूद्वन्वद्दण्डदीर्घं चरणतततदर्थोच्छ्रायं पोतिकां च।। | ||||
| ( तन्त्रसमुच्चय-२.२५ ) | ||||
| (ग) वास्तुविद्या ( ८ अ. ) में त्रिदण्डा, चतुर्दण्डा एवं पञ्चदण्डा तथा पत्री, चित्री | ||||
| एवं महार्णवी संज्ञक तीन प्रकार की पोतिकाओं का वर्णन प्राप्त होता है— | ||||
| पोतिका तु त्रिधा ज्ञेया नामभेदेन दैर्घ्यतः। | ||||
| त्रिदण्डा च चतुर्दण्डा पञ्चदण्डा यथाक्रमम्।। | ||||
| महार्णवी च चित्री च पत्री च प्रतिलोमतः। (८.४४, ४५) | ||||
| मय०-११ |
१६२ मयमतम्
(घ) शिल्परत्न (पूर्वभाग) में उपर्युक्त तीनों का वर्णन इस प्रकार है—
महार्णवी च पत्री च चित्री चेति त्रिधैव सा।
भूतेभमकरव्यालरत्नबन्धविचित्रिता ।।
बल्लीचित्राग्रपट्टा च सा ख्याता चित्रपोतिका।
केवलं पत्रवल्लीभिर्विचित्रा पत्रपोतिका।
तरङ्गमात्रचित्रा या पोतिका स्यान्महार्णवी ।।
(२१.१११-११३)
५. काष्ठसंग्रह—ग्राह्य वृक्ष (श्लोक ६२-६६)
वर्ज्य काष्ठ (श्लोक ७१-८०)
(क) विश्वकर्मवास्तुशास्त्र (अ. ४) में गृहनिर्माण में विशेषतः स्तम्भ आदि के
लिये (श्लोक १६ में) प्रशस्त वृक्षों का परिगणन इस प्रकार किया गया है—
आम्रातको मधूकश्च नागरङ्गश्च तिन्दुकः।
खदिरो पूतिको वेणुः पाटलश्च विभीतकः ।।
कर्णिकारश्च सरलः कर्कन्धुस्तिनिशस्तथा।
काश्मरी च रसालश्च पारिभद्रश्च केसरः ।।
श्रीपर्णीस्तिलकश्चापि नक्तमालश्च भद्रकः।
अन्ये च क्षीरवृक्षा ये निम्बाद्याश्च सुगन्धिनः ।। (११-१३)
वर्ज्य वृक्ष इस प्रकार हैं—
मधूकं तिनिशं पूतिमन्यं क्षीरतरुं तथा।
तिर्यग्दारौ चित्रकार्ये योजयेन्न कदाचन ।।
नाडीवृक्षाः पितृवृक्षाः गुलिकाभिन्नदारवः।
गजदन्तप्रभिन्नाश्च वक्रा भिन्नास्तथा वने ।।
पक्षिहीना दिवाभीतैरुषिताश्च द्विजाधमैः।
विद्युता भिन्नवृक्षाश्च योधानामिषुभिर्हताः ।।
कण्टकावृतदेहाश्च न प्रशस्ताः प्रकीर्तिताः।
पतिता दक्षिणाशायां तथा प्रेतवनं गताः।
दुष्टभूमिस्थिता वृक्षा वर्ज्या निन्द्याश्शुभेप्सुभिः ।। (१८-२१,२३)
(ख) मत्स्यपुराण (२५७ अ.) में प्रशस्त एवं अप्रशस्त वृक्षों की चर्चा इस
प्रकार है—
पञ्चदशोऽध्यायः 卐 पादप्रमाणद्रव्यपरिग्रहविधानम् १६३
पूर्वोत्तरेण पतितं गृहदारु प्रशस्यते।
अन्यथा न शुभं विन्द्याद्याम्योपरि निपातनम्।।
क्षीरवृक्षोद्भवं दारु न गृहे विनिवेशयेत्।
कृताधिवासं विहगैरनिलानलपीडितम्।।
गजावरुग्णं च तथा विद्युन्निर्घातपीडितम्।
अर्धशुष्कं तथा दारु भग्नशुष्कं तथैव च।।
चैत्यं देवालयोत्पन्नं नदीसङ्गमजं तथा।
श्मशानकूपनिलयं तडागादिसमुद्भवम्।।
वर्जयेत्सर्वथा दारु यदीच्छेद्विपुलां श्रियम्।
तथा कण्टकिनो वृक्षान्नीपनिम्बविभीतकान्।।
श्लेष्मातकानाम्प्रतरून् वर्जयेद् गृहकर्मणि।
आसनाशोकमधुकसर्जशालाः शुभावहाः।।
चन्दनं पनसं धन्यं सुरदारुहरिद्रवः।
द्वाभ्यामेकेन वा कुर्यात्त्रिभिर्वा भवनं शुभम्।।
बहुभिः कारितं यस्मादनेकभयदं भवेत्।
एकैकशिंशपा धन्या श्रीपर्णी तिन्दुको तथा।
एता नान्यसमायुक्ताः कदाचिच्छुभकारकाः।
स्पन्दनः पनस्सत्तद्वत् सरलार्जुनपद्मकाः।। (२५८.३-११)
(ग) राजवल्लभमण्डन (५ अ.) में ग्रहणीय एवं गर्हणीय वृक्षों का वर्णन इस
प्रकार प्राप्त होता है—
त्याज्य वृक्ष—
वृक्षं दग्धविशुष्ककण्टकयुतं नीडैश्च बैल्वद्रुमम्।
क्षौरं मारुतपातितं च भवने चिञ्चां बिभीतं त्यजेत्।। (५.१६)
ग्राह्य वृक्ष—
शाकः शालमधूकसर्जखदिरा रक्तासनाः शोभना
एकोऽसौ सरलोऽर्जुनस्य पनसः श्रीपर्णिनी शिंशिपाः।
हारिद्रस्त्वपि चन्दनः सुरतरु पद्माक्षकस्तिन्दुको
नैतेऽन्येन युता भवन्ति फलदाः शाकादयः शोभनाः।। (५.१७)
इन ग्रन्थों के अतिरिक्त बृहत्संहिता, समराङ्गणसूत्रधार आदि ग्रन्थों में ग्राह्य एवं
त्याज्य वृक्षों की चर्चा प्राप्त होती है।
१६४ मयमतम्
६. शिलालक्षण ( श्लोक ६७-६८ )
शिल्परत्न ( पूर्वभाग-१४ ) में शिलालक्षण अत्यन्त विस्तार से वर्णित है। ग्राह्य
शिला का वर्णन इस प्रकार प्राप्त होता है—
सिद्धाद्याकरसम्भवा वसुमती भग्ना स्ववर्णोचिता
स्निग्धा शस्रसहा गभीरनिनदा दिश्याहिताग्रा शिला।
ग्राह्या बिम्बविधौ स्फुलिङ्गबहुला तस्याच्छिरोधोमुखा
यत्काष्ठाभिमुखी समुत्थितवती स्थाप्या च तद्दिङ्मुखी।। (१४.११)
इसके अतिरिक्त १२-२० श्लोकों में ग्राह्य शिलाओं के लक्षण एवं शेष में दोष-
युक्त शिलाओं के लक्षण वर्णित हैं।
७. इष्टका ( श्लोक ६७-६८ )
इष्टकाओं का वर्णन शिल्परत्न ( पूर्वभाग-१४ ) में प्राप्त होता है—
स्थूलमूलेष्टका स्त्री स्यादग्रस्थूला नपुंसकाः।।
सर्वत्र समविस्तारास्तुल्याः स्युः पुरुषेष्टकाः।
अथवा यमरेखाः स्युर्ऋजवश्चेत् पुमानथ।।
वक्राश्चेद्युग्मरेखाः सा स्त्रीलिङ्गाख्या प्रकीर्तिता।
युग्मरेखास्त्वयुग्मं वा कर्णाभाश्चेन्नपुंसकाः।।
ईषदुन्रतं मूलं नतं वाग्रमुदाहृतम्। (५५-५८)
इष्टका-निर्माण के लिये ग्राह्य मृत्तिका का वर्णन शिल्परत्न ( पूर्व-१४ ) में इस
प्रकार प्राप्त होता है—
चिक्कणा पाण्डराख्या च सलोणा च विगर्हिता।
चतुर्थी ताम्रफुल्ला तु कर्मयोग्यमृदिष्यते।।
तुषाङ्गारास्थिपाषाणशर्कराकाष्ठलोष्टकैः ।
वर्जिता सूक्ष्मसिकता ताम्रफुल्लेष्टकोचिता।। (४५-४६)
( तुलना ईशान, क्रिया ३३.३६ )
मृत्तिका को इष्टका-निर्माण के योग्य बनाने की विधि शिल्परत्न ( १४.४७-५४ )
में विस्तार से वर्णित है।
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अथ षोडशोऽध्यायः
( प्रस्तरकरणम् )
उत्तरादिवृतेरन्तं प्रस्तारावयवं क्रमात् ।
संवक्ष्ये शिष्य सर्वेषां हर्म्याणामथ योग्यकम् ॥१॥
प्रस्तर-निर्माण—मैं ( मय ऋषि ) सभी प्रकार के भवनों के अनुरूप उत्तर से
प्रारम्भ कर वृति ( प्रति ) पर्यन्त प्रस्तार ( प्रस्तर ) के अंगों का सम्यक् रूप से क्रमशः
वर्णन कर रहा हूँ।।१।।
✳ उत्तरवाजनौ ✳
उत्तरं त्रिविधं पादविस्तारं तत्समोद्गमम् ।
त्रिपादोदयमध्योच्चं विस्तारं पादतः समम् ॥२॥
उत्तर एवं वाजन—उत्तर ( स्तम्भ के ऊपर की भित्ति ) तीन प्रकार का होता है।
प्रथम की चौड़ाई स्तम्भ के बराबर होनी चाहिये एवं उसकी ऊँचाई चौड़ाई के बराबर
होनी चाहिये। दूसरे उत्तर की ऊँचाई चौड़ाई से तीन चौथाई अधिक होनी चाहिये एवं
तीसरे उत्तर की ऊँचाई चौड़ाई की आधी होनी चाहिये।।२।।
खण्डोत्तरं पत्रबन्धं रूपोत्तरमिति त्रिधा।
त्रिपादं वा त्रिभागोनमर्धं वा कर्णनिर्गमम् ॥३॥
इन तीनों उत्तरों की संज्ञा खण्डोत्तर, पत्रबन्ध एवं रूपोत्तर है। इनका कर्णनिर्गम
( कोणों पर निकली निर्मिति ) तीन चौथाई, तीन भाग कम अथवा आधा होना चाहिये।
स्वस्तिकं वर्धमानं च नन्द्यावर्तसमाकृतिः ।
सर्वतोभद्रवृत्तिर्वा प्रत्युत्तरनिवेशनम् ॥४॥
उत्तर से वृति ( अथवा प्रति ) के मध्य होने वाले निवेश स्वस्तिक, वर्धमान,
नन्द्यावर्त अथवा सर्वतोभद्र आकृति के होते हैं।।४।।
त्रिभागैकं चतुर्भागं वाजनं निर्गमोद्गमम् ।
चतुरस्रं सपर्णाग्रं तदूर्ध्वं मुष्टिबन्धनम् ॥५॥
वाजन के तीसरे अथवा चौथे भाग से चार कोणों वाले एवं ऊपरी भाग में पर्ण
१६६ मयमतम्
से युक्त निर्गम का प्रारम्भ होना चाहिये। निर्गम के ऊपर मुष्टिबन्ध निर्मित होना चाहिये।
तुलाच्छेदेन वा कुर्यात् पृथग्वा वाजनोपरि ।
स्तम्भार्धविपुलं स्वार्धं तीव्रं पट्टाम्बुजक्रियम् ॥६॥
सनालिकमधस्तात्तु वाजनाद् दण्डनिर्गमम् ।
वाजन के ऊपर मुष्टिबन्ध तुलाच्छेद के द्वारा अथवा स्वतन्त्र रूप से निर्मित होना
चाहिये। स्तम्भ की चौड़ाई का आधा चौड़ा एवं अपनी चौड़ाई का आधा मोटा अम्बुज-
पट्ट निर्मित होना चाहिये। वाजन के नीचे नाली से युक्त दण्डनिर्गम का निर्माण होना
चाहिये॥६॥
✵ प्रमालिका ✵
मूलाग्रयोः शिखोपेता तदूर्ध्वं तु प्रमालिका ॥७॥
स्तम्भव्याससमोच्चा वा त्रिचतुर्भागतीव्रका ।
कुम्भमण्डियुताग्रा च हस्तिमुण्डकसन्निभा ॥८॥
उसके ऊपर मूल एवं ऊर्ध्व भाग में शिखा से ( चूल ) युक्त प्रमालिका निर्मित
होती है। यह स्तम्भ के व्यास के बराबर ऊँची एवं उसके तीसरे या चौथे भाग के बराबर
मोटी होती है। साथ ही हाथी के सूँड़ के समान आकृति वाली कुम्भ एवं मण्डि से
युक्त होती है॥७-८॥
✵ दण्डिका ✵
दण्डिकासमनिष्क्रान्ता तदूर्ध्वं दण्डिका भवेत् ।
स्तम्भार्धविपुला स्वार्धतीव्रा नीव्राधर्धनिष्क्रमा ॥९॥
मुष्टिबन्धसमाकारचतुरस्रा यथा तथा ।
इसके ऊपर दण्डिका होती है। यह स्तम्भ की आधी चौड़ी, चौड़ाई की आधी
मोटी एवं एक दण्ड माप की होती है। इसका निष्क्रम नीव्र का आधा होता है। इसकी
आकृति मुष्टिबन्ध के समान चौकोर होती है॥९॥
✵ वलयं गोपानञ्च ✵
यथेष्टविपुलोत्तुङ्गं तत्तुङ्गसमवेशनम् ॥१०॥
वलयं स्यात्तदूर्ध्वं तु गोपानं वा तदूर्ध्वतः ।
मुष्टिबन्धविशालोच्चा पट्टिकाक्षेपणाम्बुजा ॥११॥
इसके ऊपर ऊँचाई पर इच्छानुसार चौड़ा एवं ऊँचा वलय होना चाहिये। उसके
ऊपर गोपान तथा उसके ऊपर क्षेपणाम्बुज पट्टिका होती है, जो मुष्टिबन्ध के समान
विस्तृत एवं ऊँची होती है॥१०-११॥
षोडशोऽध्यायः 卐 प्रस्तरकरणम् १६७
छित्त्वार्पितावशिष्टा तु दण्डिकोपरि पट्टिका ।
तस्यां छित्त्वा तु तन्मानं गोपानं चार्पयेद्बुधः ॥१२॥
यह पट्टिका दण्डिका के ऊपर छील-काट कर लगाई जाती है। उसके ऊपर
उसके प्रमाण के अनुसार काट कर बुद्धिमान (स्थपति) को गोपान निर्मित करना
चाहिये।।१२।।
उत्तरान्तावलम्बं वा यथायुक्ति यथारुचि।
वाजनोर्ध्वे तुलोर्ध्वे वा गोपानं योजयेद्बुधः ॥१३॥
उत्तर के अन्तिम भाग में इच्छानुसार युक्तिपूर्वक अवलम्ब निर्मित करना चाहिये।
वाजन अथवा तुला के ऊपर बुद्धिमान (स्थपति) को गोपान लगाना चाहिये।।१३।।
तुलान्तरसमं गोपानान्तरं प्रविधीयते ।
गोपानदण्डिकोर्ध्वं चेद्वाजनान्तावलम्बनम् ॥१४॥
जितना (भित्ति से) तुला का अन्तर होता है, उतना ही अन्तर गोपान का भी
होना चाहिये। गोपान यदि दण्डिका के ऊपरी भाग में निर्मित हो तो वाजन के अन्तिम
भाग में अवलम्बन होना चाहिये।।१४।।
दण्डार्धविपुलं स्वार्धं तीव्रं गोपानमूर्ध्वतः ।
कम्पं समान्तरं कुर्याद् वलयच्छिद्रमन्तरे ॥१५॥
गोपान के ऊपर दण्ड का आधा चौड़ा एवं चौड़ाई का आधा मोटा कम्प निर्मित
होना चाहिये। इसे वलयछिद्र अन्तर के बराबर अन्तर पर रखते हुये उसके समानान्तर
निर्मित करना चाहिये।।१५।।
☸ कायपादम् ☸
दण्डिकावाजनान्तःस्थं कायपादं यथांशकम्।
पादविस्तारमर्धार्धनिष्क्रान्तं साग्रपट्टिकम् ॥१६॥
दण्डिका एवं वाजन के बीच में पूर्वोक्त वर्णित भाग के अनुसार कायपाद (स्तम्भ
को सहारा देने वाली कड़ी) लगाना चाहिये। यह स्तम्भ के विस्तार के बराबर होता
है एवं उसका निष्क्रान्त उसके विस्तार के आधे का आधा होता है एवं अग्रपट्टी से
युक्त होता है।।१६।।
पादानान्तरं छाद्यं फलकैः सारदारुजैः ।
अष्टांशबहलं छत्रफलकाच्छाद्यमूर्ध्वतः ॥१७॥
गोपानस्योपरिष्टात्तु च्छादयेल्लोहलोष्टकैः ।
कपोतपालिकोत्सेधनिष्क्रान्तं द्वित्रिदण्डकम् ॥१८॥
१६८ मयमतम्
स्तम्भों के मध्य भाग को सार वृक्ष के काष्ठ के फलकों ( पटरों ) से छा देना
चाहिये। इसे दण्ड के आठवें भाग की मोटाई वाले फलकों से छाना चाहिये। इसके
ऊपर गोपान के ऊपर धातुनिर्मित लोष्टकों ( टाइल्स ) से आच्छादन करना चाहिये।
इसके साथ दो या तीन दण्ड माप की ऊँचाई पर निकली हुई कपोतपालिका निर्मित
होनी चाहिये।।१७-१८।।
एकहस्तं द्विहस्तं वा क्षुद्रे महति मन्दिरे।
यथाशोभं यथाचित्रं कपोते कर्णपालिका ॥१९॥
तथा मध्यस्थिता वाऽपि सौधे शैले समाहिता।
छोटे भवन में एक हाथ की एवं बड़े भवन में दो हाथ की सुन्दरता के लिये
चित्रयुक्त कर्णपालिका कपोत पर निर्मित करनी चाहिये। अथवा इसे भवन के मध्य भाग
में प्रस्तर-निर्मित कर्णपालिका लगानी चाहिये।।१९।।
✺ वाजनम् ✺
विधेया वाजनस्योर्ध्वं भूतहंसादिकावलिः ॥२०॥
दण्डोच्चा वा त्रिपादोच्चा वाजनं पूर्ववद्भवेत्।
कपोतालम्बनं तत्स्याद्दण्डार्धं वाऽथ दण्डकम् ॥२१॥
वाजन के ऊपर भूत ( प्राणी, पशु आदि ) एवं हंस आदि की पंक्ति एक दण्ड
या पौन दण्ड ऊँची होनी चाहिये। वाजन पूर्व के सदृश होना चाहिये। वहाँ आधे दण्ड
या एक दण्ड माप का कपोतालम्बन होना चाहिये।।२०-२१।।
अध्यर्धादित्रिदण्डान्तं कपोतोच्चविनिर्गतम् ।
वसन्तकं वा निद्रा वा विधेया वाजनोपरि ॥२२॥
त्रिपादोच्चा तदूर्ध्वं स्यात्कपोतोच्चं तु पूर्ववत् ।
कपोत की ऊँचाई से निकला निर्गम डेढ़ दण्ड से लेकर तीन दण्डपर्यन्त होता
है। वाजन के ऊपर वसन्तक अथवा निद्रा निर्मित करनी चाहिये। यह उसके ऊपर पौन
दण्ड ऊँची होनी चाहिये एवं कपोत की ऊँचाई पूर्ववर्णित रखनी चाहिये।।२२।।
✺ कपोतम् ✺
एवं स्याद् दृढकल्प्यं तच्छिलयेष्टकमात्रकैः ॥२३॥
यथाप्रयोगं स्थैर्यं तु तथा योज्यं विचक्षणैः ।
कपोतोच्चत्रिभागं वा पादं वा क्षुद्रनिष्कृतिः ॥२४॥
इस प्रकार पूर्वोक्त वर्णित भागों को प्रस्तर अथवा ईंटों से दृढ़ बनाना चाहिये।
षोडशोऽध्यायः 卐 प्रस्तरकरणम् १६९
जिस वस्तु के प्रयोग से स्थिरता प्राप्त हो, उसी का प्रयोग बुद्धिमान ( स्थपति ) को
करना चाहिये। कपोत की ऊँचाई के तीन भाग अथवा चतुर्थांश के बराबर क्षुद्रनिष्कृति
( बाहर निकला भाग ) बनाना चाहिये।।२४।।
कपोते नासिका क्षुद्रे नीव्रोर्ध्वं स्थितकर्णिका।
सपाददण्डा वाध्यर्धं द्विदण्डं विस्तृता स्थिता ॥२५॥
कपोत के नीव के ऊपर नासिका ( खिड़की के सदृश आकृति ) होती है, जो
कर्णिका ( लता ) की भाँति होती है। यह सवा दण्ड, डेढ़ दण्ड या दो दण्ड विस्तृत
होती है।।२५।।
सिंहश्रोत्रशिखालिङ्गं पट्टिकान्तस्य पट्टिका।
विधेया स्वस्तिकाकृत्या नासिकोर्ध्वं तु नासिका ॥२६॥
कुक्षिमानं शिखामानं यथाशोभनमेव वा।
प्रतिवाजनकस्योर्ध्वं नेष्यते नासिकोच्छ्रयम् ॥२७॥
इसके शीर्ष भाग की आकृति सिंह के कान के सदृश होती है। पट्टिका के अन्तिम
भाग में स्वस्तिक की आकृति वाली पट्टिका होती है। नासिका के ऊपर नासिका निर्मित
होनी चाहिये। इसके मूल भाग एवं ऊर्ध्व भाग का प्रमाण शोभा के अनुसार होना
चाहिये। प्रतिवाजनक के ऊपर नासिका की ऊँचाई नहीं होनी चाहिये।।२६-२७।।
✺ प्रस्तरोर्ध्वभागम् ✺
आलिङ्गं पादपादोच्चं पादात् पादविनिर्गतम्।
तस्मादन्तरितं चोर्ध्वं निष्क्रान्तावेशनक्रियम् ॥२८॥
प्रस्तर का ऊपरी भाग—प्रस्तर के ऊर्ध्व भाग की योजना इस प्रकार है—
आलिङ्ग का माप पाद के चतुर्थांश माप का होता है एवं पादविनिर्गत ( बाहर निकला
भाग ) भी चतुर्थांश माप का होना चाहिये। उन दोनों के मध्य में ऊर्ध्व भाग पर
निष्क्रान्त स्थापित करना चाहिये।।२८।।
त्रिपट्टाग्रं हि पादोच्चं पादे पादान्तरे स्थितम्।
दण्डं त्रिपादमर्धं वा प्रत्युत्सेधं तदूर्ध्वतः ॥२९॥
दो स्तम्भों के मध्य, स्तम्भों के ऊपर स्तम्भ की ऊँचाई का त्रिपट्टाग्र ( तीन पट्टियों
की आकृति ) निर्मित होनी चाहिये। उसके ऊपर प्रति का निर्माण करना चाहिये,
जिसका माप एक दण्ड, तीन चौथाई अथवा आधा दण्ड होना चाहिये।।२९।।
स्वोच्चत्रिपादनिष्क्रान्ता प्रतिरर्धेन वा तथा।
दण्डः सपादः सार्धो वा प्रतिवक्त्रं विनिर्गमः ॥३०॥
१७० मयमतम्
प्रतिवक्त्र संज्ञक भाग का माप प्रति के माप का तीन चौथाई, आधा, एक दण्ड,
सवा दण्ड अथवा डेढ़ दण्ड रखना चाहिये ।।३०।।
तावदूर्ध्वोद्गतितस्तस्याः प्रागुक्तविधिना कुरु।
सव्याला वा ससिंहेभा ऋज्वी वा स्यात्प्रतेः कृतिः ॥३१॥
उसके ऊपर उसकी गति का निर्माण पूर्ववर्णित विधि से करना चाहिये। प्रति की
रचना व्याल के सहित, सिंह के सहित, गज के सहित अथवा सीधी करनी चाहिये।
तदुच्चत्रिचतुर्भागं वाजनं निर्गमोद्गमम्।
समकरं चित्रखण्डं नागवक्त्रमिति त्रिधा ॥३२॥
इसके ऊपर इसकी ऊँचाई के तीसरे अथवा चौथे भाग से वाजन एवं निर्गम का
प्रारम्भ करना चाहिये। ये समकर, चित्रखण्ड एवं नागवक्त्र—तीन प्रकार के होते हैं।
नागवक्त्रं नागफणं स्वस्त्याकृतिशिरःक्रियम् ।
तैतिलानां द्विजातीनां भवेत् समकरा प्रतिः ॥३३॥
नागवक्त्र आकृति में नाग के फण एवं स्वस्ति की आकृति में (नाग का) सिर
निर्मित होता है। देवों एवं ब्राह्मणों के भवन में समकर प्रति का निर्माण करना चाहिये।
चतुरस्रं तु खण्डाग्रं मकरं चित्रखण्डकम्।
नृपाणां वणिजां शूद्रजन्मनामर्धचन्द्रकम् ॥३४॥
हस्तिरूपं भवेन्मुण्डं प्रत्यग्रं चित्रसन्निभम्।
ककरं कर्कटं बन्धमन्यदप्येवमूह्यताम् ॥३५॥
(समकर प्रति) आकृति में चौकोर एवं शीर्षभाग में मकर निर्मित होता है।
चित्रखण्ड प्रति राजाओं, व्यापारियों (वैश्यों) एवं शूद्रों के (भवन के) अनुकूल होता
है। इसकी आकृति अर्धचन्द्र के सदृश होती है। इसका शीर्षभाग गज की आकृति से
युक्त होता है। इस प्रति का अग्र भाग चित्र की भाँति होता है; इसलिये इसे ककर,
कर्कट, बन्ध अथवा अन्य संज्ञा से भी सम्बोधित करते हैं।।३४-३५।।
✹ तुलादिबन्धम् ✹
वाजनोध्र्वे वलीकोर्ध्वं तुलां सम्यङ् निवेशयेत् ।
दण्डोच्चं वा त्रिपादोच्चमर्धतारसमन्वितम् ॥३६॥
वाजन के ऊपर (अथवा) वलीक के ऊपर भली-भाँति तुला (बीम) को स्थापित
करना चाहिये। इसकी ऊँचाई एक दण्ड अथवा तीन चौथाई दण्ड होनी चाहिये तथा
इसकी मोटाई ऊँचाई की आधी होनी चाहिये।।३६।।
षोडशोऽध्यायः 卐 प्रस्तरकरणम् १७१
त्रिचतुष्पञ्चदण्डेन दीर्घं तत्साग्रनालिकम् ।
सव्यालाग्रं सम्भृताग्रं पार्श्वाङ्गैस्तत्तरङ्गवत् ॥३७॥
वलीक की लम्बाई तीन, चार या पाँच दण्ड होनी चाहिये। इसके अग्र भाग में
नालियाँ, व्याल या बिन्दु होना चाहिये एवं इसका पार्श्व भाग तरङ्ग की भाँति होना
चाहिये।।३७।।
वलीकं स्याद्वलीकोर्ध्वं कर्तव्या वर्णपट्टिका ।
दण्डार्धार्धविशालोच्चा निश्छिद्रं स्यात्तदन्तरे ॥३८॥
फलकैश्च तदूर्ध्वे तु दण्डोत्सेधा तुला स्थिरा ।
त्रिपादविस्तृता न्यस्ता प्रवेशानुगता शुभा ॥३९॥
( उपर्युक्त वर्णन के अनुसार ) वलीक होना चाहिये। वलीक के ऊपर वर्णपट्टिका
का निर्माण करना चाहिये। इसका विस्तार आधा दण्ड एवं ऊँचाई विस्तार का आधा
होना चाहिये। उसके मध्य भाग को फलकों द्वारा छेदरहित करना चाहिये। इसके ऊपर
एक दण्ड ऊँची स्थिर तुला स्थापित करनी चाहिये। तुला का विस्तार तीन चौथाई
दण्ड होना चाहिये। इसे द्वार की ओर उन्मुख होना चाहिये।।३८-३९।।
तुलाविस्तारतारोच्चा जयन्ती स्यात्तुलोपरि ।
अर्धदण्डेन तत्रोच्चा जयन्त्यूर्ध्वेऽनुमार्गकम् ॥४०॥
तुला के ऊपर तुला की चौड़ाई के बराबर ऊँचाई वाली जयन्ती रक्खी जानी
चाहिये। जयन्ती के ऊपर आधा दण्ड ऊँचा अनुमार्गक रखना चाहिये।।४०।।
तदूर्ध्वे फलका पादपादषड्भागतीव्रकाः ।
इष्टकाचूर्णसङ्घातप्रस्तरस्तम्भविस्तरम् ॥४१॥
उसके ऊपर फलकों को स्थापित करना चाहिये। इसकी मोटाई दण्ड के चौथे या
छठवें भाग के बराबर होनी चाहिये। प्रस्तर एवं स्तम्भ के विस्तार को ईंटों एवं चूर्ण
से जोड़ना चाहिये।।४१।।
करालमुद्गिगुल्मासकल्कचिक्कणकर्मवान् ।
उत्तरं वाजनं चैव तत्पार्श्वानुगतं भवेत् ॥४२॥
कराल, मुद्गि, गुल्मास, कल्क एवं चिक्कण ( ये सभी ईंटों को जोड़ने एवं लेप
में प्रयुक्त होते हैं ) का प्रयोग करना चाहिये। उत्तर एवं वाजन पार्श्व में लगने चाहिये।
तुला द्वारानुयाता हि जयन्ती तिर्यगागता ।
अनुमार्गं तदूर्ध्वे तु द्वारस्यानुगतं शुभम् ॥४३॥
१७२ मयमतम्
तुला (की स्थापना) द्वार के अनुसार होनी चाहिये। जयन्ती (उसके ऊपर)
तिरछी रक्खी जानी चाहिये। उसके ऊपर द्वार के अनुसार अनुमार्ग रक्खा जाना चाहिये।
द्वारतिर्यग्गता वाऽथ तुला देवनृपवेशयोः ।
त्रिदण्डं वा द्विदण्डं वा स्याद्वलीकतुलान्तरम् ॥४४॥
देवालय एवं राजभवन में तुला द्वार से तिरछी होनी चाहिये। वलीक एवं तुला
के मध्य का अवकाश दो या तीन दण्ड होना चाहिये॥४४॥
द्विदण्डं सार्धमध्यर्धं जयन्त्यन्तरमिष्यते ।
दण्डान्तरमनु मार्गं निश्छिद्रं स्यात्तदूर्ध्वतः ॥४५॥
जयन्तियों के मध्य का अन्तर डेढ़ या ढाई दण्ड होता है। उनके ऊपर एक-एक
दण्ड के अन्तर पर रक्खे अनुमार्ग उनके मध्य के छिद्र को भर देते हैं॥४५॥
अथ चित्रविचित्राङ्गा विधेया प्रस्तरक्रिया ।
क्षुद्राणां तु तुलादीनि यथा स्थैर्यं तथाचरेत् ॥४६॥
इस प्रकार प्रस्तर-क्रिया चित्र-विचित्र अङ्गों से निर्मित होती है। क्षुद्र एवं तुला को
इस प्रकार रखना चाहिये, जिससे कि वे दृढ़तापूर्वक स्थापित हो जायँ॥४६॥
विरूपं वा सरूपं वा सर्वमङ्गं प्रयोजयेत् ।
तुलाद्वयोपरिष्टात्तु फलकाच्छादनं तु वा ॥४७॥
इष्टका वा विधातव्या शेषं पूर्ववदाचरेत् ।
रूप (आकृति) के साथ अथवा बिना रूप के (प्रस्तर-प्रकल्पन में) सभी अङ्गों
का प्रयोग करना चाहिये। तुला के ऊपर फलकों द्वारा आच्छादन करना चाहिये। अथवा
ईंटों से आच्छादन करना चाहिये। शेष कार्य पूर्ववर्णित विधि से करना चाहिये॥४७॥
✺ प्रस्तरमानम् ✺
पङ्क्त्यष्टभागविकलं हि मसूरकोच्छा-
न्म्रोन्नतं मतमथो तलिषार्धकं वा ।
यावद् बलं विपुलसुन्दरतां समेति
तावद् विधेयमधुना विधिना विधिज्ञैः ॥४८॥
प्रस्तर की ऊँचाई मसूर की ऊँचाई के बराबर होनी चाहिये एवं स्तम्भ की ऊँचाई
से दश या आठ भाग कम होनी चाहिये। प्रस्तर की ऊँचाई एवं माप इस प्रकार रखना
चाहिये, जिससे कि भवन को दृढ़ता एवं सौन्दर्य प्रदान किया जा सके, ऐसा विद्वानों
का मत है॥४८॥
षोडशोऽध्यायः 卐 प्रस्तरकरणम् १७३
✵ लेपः ✵
मधुघृतदधिदुग्धं माषयूषं च चर्म
कदलिफलगुलञ्च त्रैफलं नालिकेरम्।
क्रमवशमनुभागैर्वर्धितं लब्धचूर्णं
शतमथ कृतमस्य द्वैगुणं शर्करास्तु ॥४९॥
लेप-सामग्री—लेप के लिये यह मिश्रण तैयार किया जाता है—शहद, घृत,
दही, दूध, उड़द का पानी, चमड़ा, केला, गुड़, त्रिफला एवं नारियल। इन्हें क्रमशः
एक-एक भाग बढ़ाते हुये लेना चाहिये। इनमें एक सौ भाग चूना मिलाना चाहिये तथा
इस मिश्रण में दुगुनी मात्रा में बालू मिलाना चाहिये॥४९॥
✵ युग्मायुग्ममानम् ✵
हस्तस्तम्भतुलादिकान् नरगृहे युञ्ज्यादयुग्मं यथा
युग्मायुग्मकसंख्यया सुरगृहे युञ्जीत हस्तादिकान्।
सम एवं विषम मान—मनुष्यों के गृह में हस्त, स्तम्भ तथा तुला आदि का
प्रयोग विषम संख्याओं में करना चाहिये; किन्तु देवालय में हस्त आदि का प्रयोग सम
अथवा विषम संख्याओं में होता है।
✵ द्वारम् ✵
मध्ये द्वारमनिन्दितं सुरमहिदेवक्षितीशालये
शेषाणामुपमध्यमेव विहितं तत्सम्पदामास्पदम् ॥५०॥
देवता, ब्राह्मण एवं राजाओं के गृह में मध्य में द्वारस्थापन निन्दनीय नहीं है; किन्तु
अन्य वर्ण वालों के लिये द्वार मध्य के पार्श्व में शुभ होता है॥५०॥
✵ वेदिः ✵
प्रतेरुपरि वेदिः स्यात् सार्धद्वित्र्यङ्घ्रिणोदयम् ॥५१॥
प्रति के ऊपर वेदि का निर्माण होना चाहिये, जिसकी ऊँचाई प्रति की डेढ़, पौने
दो या दुगुनी होनी चाहिये॥५१॥
द्वौ षट् चत्वारि कम्पानि पादपादघनानि च।
पद्मशैवलपत्रादिचित्राङ्गा वेदिका मताः ॥५२॥
कम्प की संख्या दो, चार या छः होनी चाहिये। इनकी मोटाई चौथाई दण्ड होनी
चाहिये। इनकी वेदिका पद्मपुष्प, शैवाल एवं पत्र आदि चित्रों से सज्जित होनी
चाहिये॥५२॥
१७४ मयमतम्
कम्पाधस्तात् प्रयोज्या हि स्तम्भास्तत्रैव युक्तितः ।
ऊर्ध्वाधः कम्पवत् पद्मपट्टिकं चाग्रबन्धनम् ॥५३॥
कम्प के नीचे स्तम्भों को उचित रीति से जोड़ना चाहिये। इन स्तम्भों का मूल
एवं अग्र भाग कम्प के अनुसार होना चाहिये तथा इसे पद्मपट्टी एवं अग्रबन्धन से युक्त
होना चाहिये॥५३॥
✹ जालकानि ✹
वेदिकोपरि योज्यानि जालकानि विचक्षणैः ।
त्यक्त्वा भित्त्यङ्घ्रिमध्यं तु चतुर्दण्डान्तविस्तृतम् ॥५४॥
झरोखा, जाल—विद्वानों के अनुसार वेदियों के ऊपर जालकों (खिड़की,
रोशनदान) का प्रयोग करना चाहिये। इन्हें भित्ति के साथ स्तम्भ के मध्य भाग में नहीं
होना चाहिये। इनकी चौड़ाई चार दण्ड होनी चाहिये॥५४॥
द्विदण्डादिनिजव्यासद्विगुणं तुङ्गमीरितम् ।
सार्धमङ्घ्र्यूनकं वोच्चं त्यक्त्वा मध्याङ्घ्रिरन्ध्रकम् ॥५५॥
इनकी चौड़ाई दो दण्ड से प्रारम्भ कर (चार दण्डपर्यन्त) तथा ऊँचाई चौड़ाई
की दुगुनी होनी चाहिये। अथवा ऊँचाई डेढ़ या पौने दो भाग (चौड़ाई की) होनी
चाहिये। यह स्तम्भ के मध्य रन्ध्र को छोड़ कर होनी चाहिये॥५५॥
युग्मायुग्माङ्घ्रिभिः कम्पैर्युक्तं तुङ्गे च वैपुले ।
गवाक्षं कुञ्जराक्षं च नन्द्यावर्तमृजुक्रियम् ॥५६॥
पुष्पखण्डं सकर्णं च योजितव्यं यथोचितम् ।
दीर्घास्रं कर्णकच्छिद्रं तद् गवाक्षमिति स्मृतम् ॥५७॥
सम एवं विषम संख्याओं वाले पादों एवं कम्पों से युक्त सजावटी खिड़कियों का
यथोचित ऊँचाई एवं विस्तार के साथ प्रयोग करना चाहिये। इनकी संज्ञा गवाक्ष,
कुञ्जराक्ष, नन्द्यावर्त, ऋजुक्रिय, पुष्पखण्ड एवं सकर्ण है। गवाक्ष संज्ञक जालक
(खिड़की, झरोखा) लम्बा, अनेक कोणों वाला एवं छिद्रयुक्त होता है॥५६-५७॥
युग्मास्रं कर्णकच्छिद्रं कुञ्जराक्षमिति स्मृतम् ।
पञ्चसूत्रमयच्छिद्रं प्रदक्षिणवशात् कृतम् ॥५८॥
नन्द्यावर्तकृतिवशान्नन्द्यावर्तमिति स्मृतम् ।
स्तम्भतिर्यग्गतं कम्पमृजुत्वात्तदृजुक्रियम् ॥५९॥
चौकोर एवं कर्णकछिद्र (विभिन्न प्रकार के छिद्रों वाले) से युक्त जालक कुञ्जराक्ष
षोडशोऽध्यायः 卐 प्रस्तरकरणम् १७५
संज्ञक होता है। पाँच सूत्रों से प्रदक्षिणक्रम (बायें से दाहिने) से निर्मित छिद्रयुक्त
जालक नन्द्यावर्त आकृति का होने के कारण नन्द्यावर्त संज्ञक होता है। तिरछे एवं सीधे
स्तम्भों से निर्मित एवं कम्पयुक्त जालक की संज्ञा ऋजुक्रिय होती है।।५८-५९।।
पुष्पखण्डं सकर्णं च नन्द्यावर्तं तथोच्यते।
भित्तिमध्याद्वहिस्तस्य स्तम्भयोगं कवाटयुक् ॥६०॥
पुष्पखण्ड एवं सकर्ण जालक नन्द्यावर्त के समान होते हैं। भित्ति के मध्य से हट
कर जालकों के स्तम्भों का योग होता है एवं जालक कवाट (पल्लों) से युक्त होते
हैं।।६०।।
कवाटयुगलं वैकं घाटनोद्घाटनक्षमम्।
पादवर्गे भवेद् ग्रीवावर्गे वातायनस्थितिः ॥६१॥
ये कवाट एक अथवा दो होते हैं एवं खुलने तथा बन्द होने में समर्थ होते हैं।
जालकों की स्थिति स्तम्भ के बराबर अथवा भवन की ग्रीवा के बराबर होती है।।६१।।
गुलिकाजालकं धामविन्यासाकृतिरन्ध्रकम् ।
स्वस्तिकं वर्धमानं च सर्वतोभद्रसन्निभम् ॥६२॥
गोल आकृति वाले जालक सूर्य की आकृति वाले एवं छिद्रयुक्त होते हैं। ये
स्वस्तिक, वर्धमान तथा सर्वतोभद्र प्रकार के होते हैं।।६२।।
✺ भित्तिः ✺
द्रुमोपलेष्टकाद्रव्यैर्युक्त्या युञ्जीत बुद्धिमान् ।
जालकं फालकं कुड्यमैष्टकञ्च त्रिधा मतम् ॥६३॥
दीवार—बुद्धिमान (स्थपति) को गृहस्वामी की इच्छानुसार अथवा आवश्यकता-
नुसार) काष्ठ, प्रस्तर अथवा ईंटों से भित्ति-निर्माण करना चाहिये। इस प्रकार जालक
(काष्ठ-निर्मित), फलक (प्रस्तरफलकों से निर्मित) तथा ऐष्टक (ईंटों से निर्मित) तीन
प्रकार की भित्तियाँ होती हैं।।६३।।
जालकं जालकैर्युक्तमिष्टकामयमैष्टकम्।
फालकं फलकोपेतं भित्तिमध्येऽङ्घ्रिसंयुतम् ॥६४॥
जालक भित्ति जालकों (काष्ठनिर्मित) से युक्त, ऐष्टक भित्ति ईंटों से युक्त तथा
फालक भित्ति फलकों (प्रस्तरखण्डों) से युक्त होती है। भित्ति के मध्य में पाद होते
हैं।।६४।।
भित्तिबन्धनमूर्ध्वाधःपद्मसङ्घट्टपट्टिकम् ।
पादपादषडष्टांशबहला फलका भवेत् ॥६५॥