सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Mayamatam of Maya Muni with Hindi Commentary by Shailaja Pandey

मय मुनि (टीकाकार: डॉ. शैलजा पाण्डेय) द्वारा

DevanagariHindipublished395 पृष्ठ

पृष्ठ 188, कुल 395 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 188

१६४ मयमतम्
६. शिलालक्षण ( श्लोक ६७-६८ )
शिल्परत्न ( पूर्वभाग-१४ ) में शिलालक्षण अत्यन्त विस्तार से वर्णित है। ग्राह्य
शिला का वर्णन इस प्रकार प्राप्त होता है—
सिद्धाद्याकरसम्भवा वसुमती भग्ना स्ववर्णोचिता
स्निग्धा शस्रसहा गभीरनिनदा दिश्याहिताग्रा शिला।
ग्राह्या बिम्बविधौ स्फुलिङ्गबहुला तस्याच्छिरोधोमुखा
यत्काष्ठाभिमुखी समुत्थितवती स्थाप्या च तद्दिङ्मुखी।। (१४.११)
इसके अतिरिक्त १२-२० श्लोकों में ग्राह्य शिलाओं के लक्षण एवं शेष में दोष-
युक्त शिलाओं के लक्षण वर्णित हैं।
७. इष्टका ( श्लोक ६७-६८ )
इष्टकाओं का वर्णन शिल्परत्न ( पूर्वभाग-१४ ) में प्राप्त होता है—
स्थूलमूलेष्टका स्त्री स्यादग्रस्थूला नपुंसकाः।।
सर्वत्र समविस्तारास्तुल्याः स्युः पुरुषेष्टकाः।
अथवा यमरेखाः स्युर्ऋजवश्चेत् पुमानथ।।
वक्राश्चेद्युग्मरेखाः सा स्त्रीलिङ्गाख्या प्रकीर्तिता।
युग्मरेखास्त्वयुग्मं वा कर्णाभाश्चेन्नपुंसकाः।।
ईषदुन्रतं मूलं नतं वाग्रमुदाहृतम्। (५५-५८)
इष्टका-निर्माण के लिये ग्राह्य मृत्तिका का वर्णन शिल्परत्न ( पूर्व-१४ ) में इस
प्रकार प्राप्त होता है—
चिक्कणा पाण्डराख्या च सलोणा च विगर्हिता।
चतुर्थी ताम्रफुल्ला तु कर्मयोग्यमृदिष्यते।।
तुषाङ्गारास्थिपाषाणशर्कराकाष्ठलोष्टकैः ।
वर्जिता सूक्ष्मसिकता ताम्रफुल्लेष्टकोचिता।। (४५-४६)
( तुलना ईशान, क्रिया ३३.३६ )
मृत्तिका को इष्टका-निर्माण के योग्य बनाने की विधि शिल्परत्न ( १४.४७-५४ )
में विस्तार से वर्णित है।
❖——❖——❖