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मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Mayamatam of Maya Muni with Hindi Commentary by Shailaja Pandey

मय मुनि (टीकाकार: डॉ. शैलजा पाण्डेय) द्वारा

DevanagariHindipublished395 पृष्ठ

पृष्ठ 198, कुल 395 में से

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पृष्ठ 198

१७४ मयमतम्
कम्पाधस्तात् प्रयोज्या हि स्तम्भास्तत्रैव युक्तितः ।
ऊर्ध्वाधः कम्पवत् पद्मपट्टिकं चाग्रबन्धनम् ॥५३॥
कम्प के नीचे स्तम्भों को उचित रीति से जोड़ना चाहिये। इन स्तम्भों का मूल
एवं अग्र भाग कम्प के अनुसार होना चाहिये तथा इसे पद्मपट्टी एवं अग्रबन्धन से युक्त
होना चाहिये॥५३॥
✹ जालकानि ✹
वेदिकोपरि योज्यानि जालकानि विचक्षणैः ।
त्यक्त्वा भित्त्यङ्घ्रिमध्यं तु चतुर्दण्डान्तविस्तृतम् ॥५४॥
झरोखा, जाल—विद्वानों के अनुसार वेदियों के ऊपर जालकों (खिड़की,
रोशनदान) का प्रयोग करना चाहिये। इन्हें भित्ति के साथ स्तम्भ के मध्य भाग में नहीं
होना चाहिये। इनकी चौड़ाई चार दण्ड होनी चाहिये॥५४॥
द्विदण्डादिनिजव्यासद्विगुणं तुङ्गमीरितम् ।
सार्धमङ्घ्र्यूनकं वोच्चं त्यक्त्वा मध्याङ्घ्रिरन्ध्रकम् ॥५५॥
इनकी चौड़ाई दो दण्ड से प्रारम्भ कर (चार दण्डपर्यन्त) तथा ऊँचाई चौड़ाई
की दुगुनी होनी चाहिये। अथवा ऊँचाई डेढ़ या पौने दो भाग (चौड़ाई की) होनी
चाहिये। यह स्तम्भ के मध्य रन्ध्र को छोड़ कर होनी चाहिये॥५५॥
युग्मायुग्माङ्घ्रिभिः कम्पैर्युक्तं तुङ्गे च वैपुले ।
गवाक्षं कुञ्जराक्षं च नन्द्यावर्तमृजुक्रियम् ॥५६॥
पुष्पखण्डं सकर्णं च योजितव्यं यथोचितम् ।
दीर्घास्रं कर्णकच्छिद्रं तद् गवाक्षमिति स्मृतम् ॥५७॥
सम एवं विषम संख्याओं वाले पादों एवं कम्पों से युक्त सजावटी खिड़कियों का
यथोचित ऊँचाई एवं विस्तार के साथ प्रयोग करना चाहिये। इनकी संज्ञा गवाक्ष,
कुञ्जराक्ष, नन्द्यावर्त, ऋजुक्रिय, पुष्पखण्ड एवं सकर्ण है। गवाक्ष संज्ञक जालक
(खिड़की, झरोखा) लम्बा, अनेक कोणों वाला एवं छिद्रयुक्त होता है॥५६-५७॥
युग्मास्रं कर्णकच्छिद्रं कुञ्जराक्षमिति स्मृतम् ।
पञ्चसूत्रमयच्छिद्रं प्रदक्षिणवशात् कृतम् ॥५८॥
नन्द्यावर्तकृतिवशान्नन्द्यावर्तमिति स्मृतम् ।
स्तम्भतिर्यग्गतं कम्पमृजुत्वात्तदृजुक्रियम् ॥५९॥
चौकोर एवं कर्णकछिद्र (विभिन्न प्रकार के छिद्रों वाले) से युक्त जालक कुञ्जराक्ष