मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Mayamatam of Maya Muni with Hindi Commentary by Shailaja Pandey
मय मुनि (टीकाकार: डॉ. शैलजा पाण्डेय) द्वारा
१३० मयमतम्
बाँटना चाहिये। इसमें एक भाग से जन्म, पाँच से वप्र, एक से कञ्ज, आधे से गल,
आधे से अब्ज, चार से कुमुद, आधे से पङ्कज, आधे से कम्प, दो से कण्ठ, आधे
से कम्प, आधे से पद्म, दो से महावाजन, आधे से दल तथा आधे से पङ्कजयुक्त कम्प
निर्मित होते हैं। इस प्रकार अनेक पद्म-पुष्पों से युक्त अधिष्ठान पुष्पपुष्कल कहलाता
है। शिल्पियों के अनुसार यह अधिष्ठान मध्यम एवं बड़े विमानों (मन्दिरों) कें अधिक
अनुकूल होता है।।२७-२८।।
⁕ श्रीबन्धम् ⁕
द्वाभ्यामेकेन सप्तांशकशशिशिववेदैकचन्द्राग्निभागै-
रेकेनैकेन वेदैः शिवशशिनयनैकेन मोहामराब्जम्।
हृत्पद्मं कैरवाब्जं गलधरगलकम्पं दलं तत्कपोतं
चालिङ्गान्तादिकं तत्प्रतिमुखमथ तद्वाजनं पङ्कजाढ्यम् ॥२९॥
श्रीबन्धं स्यादेतदुच्चे चतुर्व्वस्वंशे कुर्याच्छान्तधीर्वर्द्धकिस्तत् ।
देवेशानां मन्दिरेष्वेवमुक्तं श्रीसौभाग्यारोग्यभोग्यं ददाति ॥३०॥
श्रीबन्ध अधिष्ठान—श्रीबन्ध अधिष्ठान की ऊँचाई के बत्तीस भाग किये जाते
हैं। इसमें दो भाग से अधिष्ठान का निचला भाग, एक से अब्ज, सात से हृत्, एक
से पद्म, एक से कैरव, चार से अब्ज, एक से गल, एक से अधर, तीन से गल,
एक से कम्प, एक से दल, चार से कपोत, एक से आलिङ्गादि, एक से आलिङ्गान्त,
दो से प्रतिमुख एवं एक से पङ्कजयुक्त वाजन निर्मित होते हैं। इसकी स्थापना कुशल
वर्धकि द्वारा करानी चाहिये। यह अधिष्ठान देवालयों एवं राजभवनों के लिये अनुकूल
होता है तथा श्री, सौभाग्य, आरोग्य एवं भोग प्रदान करता है।।२९-३०।।
⁕ मञ्चबन्धम् ⁕
तुङ्गे षड्विंशदंशे खुरमथ जगतीकैरवं कम्पकण्ठं
कम्पं पद्मं कपोतं तदुपरि च तथा निम्नमन्तादिवक्त्रम्।
कम्पं भागेन षड्भिः शरशशिगुणचन्द्रैकबन्थांशकांशै-
र्द्वाभ्यामेकेन कुर्यादमरनरपतेर्मन्दिरे मञ्चबन्धम् ॥३१॥
मञ्चबन्ध अधिष्ठान—मञ्चबन्ध अधिष्ठान की ऊँचाई के छब्बीस भाग करने
चाहिये। एक भाग से खुर, छः से जगती, पाँच से कैरव, एक से कम्प, तीन से
कण्ठ, एक से कम्प, एक से पद्म, तीन से कपोत, एक-एक भाग से ऊपर-नीचे के
सदृश निर्माण, एक-एक भाग से अन्तवक्त्र एवं आदिवक्त्र तथा एक भाग से कम्प
निर्मित होना चाहिये। यह अधिष्ठान राजगृह के अनुकूल होता है।।३१।।
चतुर्दशोऽध्यायः 卐 अधिष्ठानविधानम् १३१
✵ श्रीकान्तम् ✵
आलिङ्गयुक्तमथ चान्तरितप्रतीभ्यां
तद्वाजनेन च वियुक्तकमेतदेव।
श्रीकान्तनामकमसूरकमष्टकोणं
वृत्तं तु वा कुमुदम्बरमार्गिणां तत्॥३२॥
श्रीकान्त अधिष्ठान—जब अधिष्ठान आलिङ्ग एवं अन्तरित प्रति से युक्त हो
एवं वाजन से रहित हो तो उसे श्रीकान्त कहते हैं। इसका कुमुद अष्टकोण अथवा
वृत्ताकार हो सकता है एवं यह अम्बरमार्गियों के अनुकूल होता है॥३२॥
✵ श्रेणीबन्धम् ✵
एकद्व्येकर्तुवेदैः शशिनयनशिवद्व्येकदृक्चन्द्रसार्धा-
र्धशैलैर्जन्माब्जकम्पं जगतिकुमुदकं कम्पकण्ठं च कम्पम्।
पद्मं पट्टं च कण्ठं तदुपरि च तथा वाजनाब्जं च पट्टं
श्रेणीबन्धं सुराणामुदितमिदमलं तुङ्गषड्विंशदंशे ॥३३
१३२ मयमतम्
पद्मं पट्टं च कण्ठं तदुपरि च तथा कम्पपद्मं च पट्टी-
पट्टं तद्वप्रबन्धं तदपि च सहितं सद्द्विकैर्विंशदंशैः ॥३५॥
वप्रबन्ध अधिष्ठान—वप्रबन्ध अधिष्ठान की ऊँचाई को बाईस भागों में बाँटा
जाता है। इसमें दो भाग से उपान, एक से कञ्ज, एक से कम्प, पाँच से वप्र, चार
से कुम्भ, एक से पद्म, एक से पट्ट, दो से कण्ठ, एक से कम्प, एक से पद्म, दो
से पट्टी तथा एक से पट्ट निर्मित होता है। इसे वप्रबन्ध अधिष्ठान कहते हैं।।३५।।
✺ कपोतबन्धम् ✺
तदेव वृत्तं कुमुदं तु वाजने कपोतयुक्तं हि कपोतबन्धकम्।
कपोतबन्ध अधिष्ठान—वाजन पर जब कुमुद वृत्ताकार हो एवं कपोत निर्मित
तो उसे कपोतबन्ध अधिष्ठान कहते हैं।
✺ प्रतिबन्धम् ✺
तदेव वेदैः प्रतिवाजनं प्रतित्रिकास्रयुक्तं प्रतिबन्धमुच्यते ॥३६॥
प्रतिबन्ध अधिष्ठान—जब प्रति एवं वाजन चार भाग में निर्मित हों एवं प्रति
त्रिकास्रयुक्त ( तीन कोणों वाला ) हो तो उसे प्रतिबन्ध अधिष्ठान कहते हैं।।३६।।
✺ कलशाधिष्ठानम् ✺
एकद्व्येकाग्निभागैः शशियुगलशिवद्व्येकचन्द्रेशदृग्भि-
श्चन्द्रैकैकाक्षिश्चन्द्रैः खुरकमलमथो कम्पकण्ठं च कम्पम्।
पद्मं पट्टाब्जनिम्नं कमलमुपरि कुम्भं दलं निम्नमन्ताद्
या स्याच्चोर्ध्वे प्रतिर्वाजनमथ कलशाख्येन भागास्त्रिरष्टौ ॥३७॥
कलश अधिष्ठान—इस अधिष्ठान को ऊँचाई में चौबीस भागों में बाँटा जाता
है। इसमें एक भाग से खुर, दो से कमल, एक से कम्प, तीन से कण्ठ, एक से
कम्प, दो से पद्म, एक से पट्ट, दो से अब्ज, एक से निम्न, दो से प्रति एवं एक से
वाजन निर्मित होता है। इसे कलश अधिष्ठान कहते हैं।।३७।।
✺ अधिष्ठानसामान्यलक्षणम् ✺
एतानि भेदैस्तु चतुर्दशैव प्रोक्तानि तज्ज्ञैस्तु मसूरकाणि।
सर्वाणि नास्यङ्घ्रियुतानि युक्त्यादृढीकृताङ्गानि मयोदितानि ॥३८॥
अधिष्ठान के सामान्य लक्षण—इस प्रकार चौदह प्रकार के अधिष्ठानों का
लक्षणसहित वर्णन विद्वानों द्वारा किया गया है। सभी को छोटे पादों एवं सजावटी
खिड़कियों से युक्त करना चाहिये। इनके सभी अङ्गों को, जिनका वर्णन ऋषि मय ने
किया है, दृढ़ता-पूर्वक स्थापित करना चाहिये।।३८।।
चतुर्दशोऽध्यायः 卐 अधिष्ठानविधानम् १३३
भागेनार्धत्रिपादाङ्घ्रिभिरथ युगलाध्यर्धचन्द्रार्धपादै-
र्मात्रैर्वृद्धिश्च हानिर्दृढतरमतिना योजितव्या बलार्थम्।
शोभार्थं भागमङ्घ्र प्रतिवरमथनीचाल्पहर्म्ये तलाना-
मेवं प्रोक्तं यमीन्द्रैरविकलमतिभिस्तन्त्रविद्भिः पुराणैः ॥३९॥
अधिष्ठान को अधिक दृढ़ बनाने के लिये बुद्धिमान (स्थपति) को एक भाग या
आधा, त्रिपाद (पौन भाग) या चतुर्थांश, डेढ़ भाग अथवा एक भाग का चतुर्थांश
जोड़ना या घटाना चाहिये। इस माप का निर्णय भवन के अनुसार उसके उत्तम
(बड़ा), मध्यम अथवा छोटे आकार के अनुसार करना चाहिये। यह भवन की शोभा
के लिये होता है। यह मत संयमी, निर्मल बुद्धि, तन्त्र एवं पुराण के ज्ञाता विद्वानों का
है।।३९।।
✵ अधिष्ठानपर्यायनामानि ✵
मसूरकमधिष्ठानं वास्वाधारं धरातलम्।
तलं कुट्टिममाद्यङ्गं पर्यायवचनानि हि ॥४०॥
अधिष्ठान के पर्यायवाची शब्द—मसूरक, अधिष्ठान, वास्वाधार, धरातल,
तल, कुट्टिम तथा आद्यङ्ग अधिष्ठान के पर्यायवाची हैं।।४०।।
✵ निर्गममानम् ✵
यावज्जगतिनिष्क्रान्तं तावत् कुमुदनिर्गमम्।
अम्बुजानां तु सर्वेषामुत्सेधसमनिर्गमम् ॥४१॥
निर्गम का प्रमाण—जितना जगती का निष्क्रान्त निर्मित हो, उतना ही कुमुद
का निर्गम निर्मित करना चाहिये। सभी अम्बुजों की ऊँचाई निर्गम के बराबर रखनी
चाहिये।।४१।।
दलाग्रतीव्रमुत्सेधात् पादं पादार्धमेव वा।
वेत्राणामपि सर्देषां चतुर्भागैकनिर्गमम् ॥४२॥
दल (पत्तियों की पंक्ति) के अग्र भाग पंक्ति की ऊँचाई का चतुर्थांश या चतुर्थांश
का आधा होना चाहिये। सभी वेत्रों का निर्गम चौथाई होना चाहिये।।४२।।
तत्समं वा त्रिपादं वा महावाजननिर्गमम्।
१३४ मयमतम्
बल के अनुसार अधिष्ठान के सभी भागों का प्रवेश एवं निर्गम रखना चाहिये ।। ४३ ।।
✺ अधिष्ठानप्रतिच्छेदविधिः ✺
प्रतिच्छेदं न कर्तव्यं सर्वत्रैवं विचक्षणैः ।। ४४ ।।
द्वारार्थं यत् प्रतिच्छेदं सम्पद्द्वारं च नेत्यलम्।
पादबन्धमधिष्ठानं छेदनीयं यथोचितम् ।।४५।।
अधिष्ठान में खण्ड करने की विधि—बुद्धिमान (स्थपति) को अधिष्ठान में
कहीं भी प्रतिच्छेद (खण्ड) नहीं करना चाहिये। द्वार के लिये किया गया प्रतिच्छेद
सम्पत्तिकारक नहीं होता है। पादबन्ध एवं अधिष्ठान में आवश्यकतानुसार प्रतिच्छेद
करना चाहिये ।।४४-४५।।
जन्मादिपञ्चवर्गे तु तत्तत्तुङ्गावसानके ।
सपटिकाङ्गेऽधिष्ठानेऽप्यन्यस्मिन्नेवमूह्यताम् ।
यद् यत्रैवोचितं प्राज्ञास्तत् तत्रैव प्रयोजयेत् ।।४६।।
जन्म आदि पाँच वर्गों में उनकी ऊँचाई के अन्त में, सपट्टिकाङ्ग में, अधिष्ठान
में एवं अन्य अङ्गों में प्रतिच्छेद हो सकता है। जहाँ-जहाँ उचित हो, बुद्धिमान (स्थपति)
को वहाँ प्रयोग करना चाहिये ।।४६।।
स्तम्भोच्चार्धं वा मसूरोच्चमानं तत् षट्सप्ताष्टांशकं भागहीनम् ।
वस्वाधारोच्चं भवेत् सर्ववस्तुष्वेवं पूर्वं शम्भुना सम्यगुक्तम् ।।४७।।
इति मयमते वास्तुशास्त्रे अधिष्ठानविधानो
नाम चतुर्दशोऽध्यायः
अधिष्ठान की ऊँचाई स्तम्भ के ऊँचाई की आधी, छः, सात या आठ भाग कम
होनी चाहिये। अधिष्ठान की ऊँचाई सभी भवनों में उनके अनुसार रखनी चाहिये। इस
मत का प्रतिपादन शम्भु ने अच्छी प्रकार से किया है ।।४७।।
व्याख्यात्मक टिप्पणी
भूमि के प्रकार (श्लोक १)
भूमि के जाङ्गल एवं अनूप भेद की चर्चा अर्थशास्त्र (२.२४.५) मे भी प्राप्त होती
है। शिल्परत्न (१०.१-३) में दो प्रकार की स्निग्धा एवं अस्निग्धा भूमि की चर्चा की
गई है—
: त्कम्पं!
Wait, let's look between क्रमाद् and विरचयेत्:
There is no space, it's क्रमाद्विरचयेत्कम्पं or क्रमाद्विरचयेत् कम्पं?
Wait, look:
त्रिद्व्यग्न्यश्विमितैः [space] क्रमाद्विरचयेत्कम्पं [space] गलं [space] पट्टिकाम्
Wait, look at त्रिद्व्यग्न्यश्विमितैः:
Is there a visarga after तै?
Yes, two small dots: :
Then क्रमाद्विरचयेत्कम्पं
Then गलं
Then पट्टिकाम्.
Wait, let's check line 26:
प्रत्युद्यन्मकरास्यकादिरुचिरां सिंहादिभिश्चोज्ज्वलाम्।। (२.१३)
Let's scan line 26:
1, 2, 3: प्रत-युद्-यन् (---) = Magaṇa
4, 5, 6: म-क-रा (UU-) = Sagaṇa
7, 8, 9: स्य-का-दि (U-U) = Jagaṇa
10, 11, 12: रु-चि-रां (UU-) = Sagaṇa
13, 14, 15: सिं
१३६ मयमतम्
भागाभ्यां गलपादुकान् विरचयेदधर्शातः पट्टिकाम्
क्षुद्रां सार्धधरांशकेन महतीं स्वांशोल्लसद्वाजनाम् ।। (वही-२.१४)
मञ्जरी का मत भी यही है।
(ङ) अधिष्ठान-निर्माण में तीसरा माप इस प्रकार रक्खा जाता है। इसकी ऊँचाई
के बारह भाग होते हैं, जिसमें जगती, कुमुद, पट्टिका, अन्तरि, वाजन एवं प्रति निर्मित
होते हैं—
मासूरेंडशौर्दिनेशांशिनि सति जगतीकैरवे श्रत्युपायै-
स्तच्छिष्टैः पट्टिकामन्तरमपि रचयेद् वाजनं च प्रतिं च ।
प्रत्युत्पन्नक्रमाख्ये क्रम इति कथितः पट्टिकान्तं तथातः
खण्डान् सार्धैकतो वाजनमपि सदलैकांशतः पादबन्धे ।।
(वही-२.१५)
(घ) मनुष्यालयचन्द्रिका में चौदह प्रमाण-भेद एवं इनके भी चौरासी भेद प्राप्त
होते हैं, जो मयमत (१४.२८) के अनुकूल है। प्रमाण इस प्रकार है—
मासूरमानानि चतुर्दशैव भवन्ति तेभ्यः पृथगूनिताश्च ।
रसाद्रिनागाङ्कदशेशभागाश्चतुर्युताशीतिमितिानि सन्ति ।। (५.१५)
(ङ) विश्वकर्मवास्तुशास्त्र (२७ अ.) में अधिष्ठान प्रकल्पन का उद्देश्य भवन की
ऊँचाई, रक्षा, शोभा एवं दृढता कही गई है। इसकी ऊँचाई आवश्यकतानुसार एक
हाथ, दो हाथ, तीन हाथ या एक दण्ड रखनी चाहिये—
औन्नत्यार्थं च रक्षार्थं शोभार्थं च बलार्थकम्।
एकहस्तं द्विहस्तं वा त्रिहस्तं वा विशेषतः ।।
एकदण्डप्रमाणं वा कारयेत् स्थलयोग्यकम्। (२७.३-४)
इसके आठ भेद कहे गये हैं—मञ्चभद्र, बोधिभद्र, वाजिभद्र, कुमुदभद्र, मञ्चबन्ध,
बोधिबन्ध, वाजिबन्ध एवं कुमुदबन्ध—
मञ्चभद्रं बोधिभद्रं वाजिभद्रं च कौमुदम्।
बन्धस्वरूपमन्यच्च स्थापयेत्स्थपतिः क्रमात्।। (२७.७)
(च) वास्तुविद्या (९ अ.) में पाद-मान के प्रकरण में मानभेद की दृष्टि से बारह
प्रकार के अधिष्ठानों की चर्चा की गई है।
(छ) शिल्परत्न (पूर्वभाग, १९ अ.) में अधिष्ठान की चर्चा विस्तार से प्राप्त होती
है। श्रीकुमार (शिल्परत्नाकर) के अनुसार मय ने चौदह प्रकार के अधिष्ठान का एवं
पराशर ने दो प्रकार के अधिष्ठान का वर्णन किया है। अन्य शिल्पविज्ञों ने तीन प्रकार
के अधिष्ठान—मञ्चक, पादबन्ध एवं प्रतिबन्ध का वर्णन किया है, जो इस प्रकार है—
चतुर्दशोऽध्यायः 卐 अधिष्ठानविधानम् १३७
मञ्चकान्यधमान्याहुः पादबन्धाभिधानि वै।
मध्यमान्युत्तमानि स्युः प्रतिबन्धान्यसंशयः।। (१९.२)
इसके पाँच वर्ग हैं—उपान, जगती, कुम्भ, कन्धर एवं प्रस्तर—
उपानं जगती कुम्भं कन्धरं प्रस्तरं तथा।
पञ्चवर्गमिति ख्यातमाद्यङ्गानां विशेषतः।। (१९.३)
मञ्चक, पादबन्ध एवं प्रतिबन्ध का सामान्य लक्षण इस प्रकार है—
कुमुदेन विना कार्यं यत्तन्मञ्चकमुच्यते।
पादबन्धतलानां तु वस्वस्रं कुमुदं भवेत्।।
सर्वेषां प्रतिबन्धानां कुमुदं वृत्तमुच्यते। (१९.५)
अधिष्ठान की एवं उपपीठ की रचना मृत्तिका, ईंट, शिला अथवा काष्ठ से
भवनादि की आवश्यकता देखते हुये करनी चाहिये—
अधिष्ठानं चोपपीठं मृदा चेष्टकयापि वा।
शिलाभिर्वा विधातव्यं दारुणा वा यथाबलम्।। (वही-१८.२०)
(ज) मानसार (अ. १४) में अधिष्ठानों के भेद एवं अनके अङ्गों का विस्तार
से वर्णन प्राप्त होता है। इनमें उरगबन्ध, प्रतिक्रम, कुमुदबन्ध, श्रीबन्ध, मञ्चबन्ध,
श्रेणीबन्ध, पद्मबन्ध, कुम्भबन्ध, वप्रबन्ध, वज्रबन्ध, श्रीभोग, रत्नबन्ध, पट्टबन्ध, कुक्षिबन्ध,
कम्पबन्ध, एवं श्रीकान्त आदि अधिष्ठानों का वर्णन किया गया है।
अधिष्ठानप्रतिच्छेद (श्लोक ४४-४५)
अधिष्ठान के छेदन के विषय में अन्य ग्रन्थों में इस प्रकार उल्लेख प्राप्त होता
है—
(क) शिल्परत्न (पूर्वभाग-१९.१२९-१३१)
द्वारार्थं वा स्थलार्थं वा जलमार्गार्थमेव वा।
जन्मादिपञ्चवर्गेषु तत्तदङ्गावसानके।।
छेदनं नैव दोषाय पादबन्धतलेऽखिले।
प्रतेशच्छेदं न कर्तव्यं प्रतिबन्धकुले कदाचन।।
जन्मच्छेदं न कर्तव्यं यत्र-कुत्रापि सर्वतः।
विपदामास्पदं ह्येतत्तस्मान्नैव कारयेत्।।
(ख) ईशानशिवगुरुदेवपद्धति (क्रिया.-३१.१०१-२)
सर्वत्र प्रत्युपरि द्वारं कुर्याद् विचक्षणः।
प्रतिच्छेदेन तु द्वारं न कुर्वीत कदाचन।।
अथ पञ्चदशोऽध्यायः
( पादप्रमाणद्रव्यपरिग्रहविधानम् )
☀ स्तम्बलक्षणम् ☀
पादायामं सविस्तारमाकारं भूषणादिकम् ।
लक्षणान्तरतः सम्यग् वक्ष्ये संक्षेपतः क्रमात् ॥१॥
स्तम्भ के लक्षण—मैं ( मय ऋषि ) अन्य लक्षणों के साथ स्तम्भों की लम्बाई,
चौड़ाई, आकृति एवं उनके अलङ्करण आदि का संक्षेप में सम्यक् रूप से क्रमशः वर्णन
कर रहा हूँ॥१॥
स्थाणुः स्थूणश्च पादश्च जङ्घा च चरणोऽङ्घ्रिकः ।
स्तम्भश्च तलिपः कम्पः पर्यायवचनानि हि ॥२॥
स्थाणु, स्थूण, पाद, जङ्घा, चरण, अङ्घ्रिक, स्तम्भ, तलिप एवं कम्प ( स्तम्भ
के ) पर्यायवाची शब्द हैं॥२॥
☀ स्तम्भमानम् ☀
सवितस्त्यष्टहस्तोच्चं द्वादशक्ष्माद्यपादकम् ।
तत्तद्वितस्तिहीनेन त्रिकरं चान्त्यभूमिके ॥३॥
स्तम्भ का प्रमाण—बारह तल के भवन में भूतल पर बनने वाले स्तम्भ की
ऊँचाई आठ हाथ एक बित्ता ( साढ़े आठ हाथ ) होनी चाहिये। प्रत्येक तल पर एक-
एक बित्ता कम करते हुये सबसे ऊपर के तल पर तीन हाथ ऊँचाई होनी चाहिये॥३॥
आत्तोत्सेधांशमानेन पादोच्चं वा विधीयते ।
आत्ताधिष्ठानतुङ्गस्य द्विगुणं पादतुङ्गकम् ॥४॥
अथवा स्तम्भ की ऊँचाई का मापन दिये गये माप से ( दूसरे ढंग से ) करना
चाहिये। अधिष्ठान की ऊँचाई का दुगुना माप स्तम्भ का रखना चाहिये॥४॥
द्विगुणादधिकोत्सेधः स्तम्भः प्रोक्तः स्वयम्भुवा ।
अष्टविंशतिमात्रैस्तु मूलभूस्तम्भवस्तृतम् ॥५॥
( बारह तल के भवन में ) स्वयम्भू के अनुसार स्तम्भ की ऊँचाई अधिष्ठान
पञ्चदशोऽध्यायः 卐 पादप्रमाणद्रव्यपरिग्रहविधानम् १३९
के दुगुने से अधिक होनी चाहिये। भूतल के स्तम्भ का विस्तार अट्ठाईस मात्रा
( अङ्गुल-माप ) होना चाहिये॥५॥
तत्तद्व्यङ्गुलभिन्नेन षण्मात्रं चान्त्यभूमिके।
पादोच्चे पङ्क्तिनन्दाष्टभागैऽशं पादविस्तृतम् ॥६॥
प्रत्येक तल में उपर्युक्त माप से दो-दो अङ्गुल कम करते हुये ऊपर के तल में
स्तम्भ की चौडाई का माप प्राप्त होता है। अथवा स्तम्भ की ऊँचाई का दसवाँ, नवाँ
या आठवाँ भाग उसकी चौड़ाई का माप होना चाहिये।।६।।
तदर्धं वा त्रिभागोनं चतुर्भागोनमेव वा।
कुड्यस्तम्भस्य विस्तारस्तेन द्वित्रिचतुर्गुणः ॥७॥
पञ्चषड्गुण एवं स्याद् भित्तिविष्कम्भ इष्यते।
जन्मोर्ध्वे स्तम्भविक्षेपहोमाः स्तम्भविधौ विदुः ॥८॥
अथवा स्तम्भ का विस्तार आधा, तीन भाग कम अथवा चतुर्थांश कम रखना
चाहिये। भित्ति-स्तम्भ के विस्तार से भित्ति-विष्कम्भ का विस्तार दुगुना, तीन गुना, चार
गुना, पाँच गुना या छः गुना रखना चाहिये। स्तम्भ-स्थापन-विधि के ज्ञाता अधिष्ठान
के ऊपर स्तम्भ के स्थापन के समय होम करने का विधान बतलाते हैं।।७-८।।
✹ स्तम्भभेदाः ✹
प्रतिस्तम्भः प्रतेरूर्ध्वे चोत्तराधो हितायतिः ।
जन्मोर्ध्वे स्तम्भनिक्षेपः स्तम्भायामत्रिभागभाक् ॥९॥
स्तम्भ के भेद—प्रतिस्तम्भ को प्रति के ऊपर एवं उत्तर ( भित्ति ) के नीचे निर्मित
किया जाता है। जन्म ( अधिष्ठान का एक भाग ) के ऊपर स्तम्भ को स्थापित किया
जाता है एवं उसकी चौड़ाई उसकी ऊँचाई के तीसरे भाग के बराबर होती है।।९।।
गाम्भीर्यमवटं कृत्वा तदुपज्ञतलं कुरु।
पादुकाद्युत्तरान्तःस्थो निखातस्तम्भ इष्यते ॥१०॥
( निखातस्तम्भ के लिये ) गहरा गर्त बनाकर उसके ऊपर तल का निर्माण किया
जाता है ( पुनः स्तम्भ-स्थापन होता है )। पादुक से लेकर उत्तर-भित्ति के मध्य में
स्थित इस स्तम्भ को निखातस्तम्भ कहते हैं।।१०।।
अधिष्ठानोत्तरान्तःस्थो झषालस्तम्भ उच्यते।
तद्द्व्यासादर्कभागाद्यं षड्भागोनाग्रविस्तरः ॥११॥
अधिष्ठान से प्रारम्भ होकर उत्तरभित्ति के मध्य में स्थित स्तम्भ को झषाल स्तम्भ
१४० मयमतम्
कहते हैं। यह स्तम्भ मूल की अपेक्षा ऊर्ध्व भाग में छः-बारह भाग कम चौड़ा होता
है।।११।।
मूलभूतस्तम्भतुङ्गस्य द्वादशाद्याः षडंशयुक्।
ऊर्ध्वोर्ध्वस्तम्भतुङ्गं स्यादेवं तद्विस्तरक्रमः ।।१२।।
( बारह मञ्जिल के भवन में ) भूतल में स्तम्भ की चौड़ाई उसकी ऊँचाई का छठवाँ
भाग होना चाहिये। ऊपर के तलों में भी स्तम्भों की ऊँचाई एवं चौड़ाई में यही अनुपात
होना चाहिये।।१२।।
अग्राकारं युगास्रं तु कुम्भमण्डिसमन्वितम्।
ब्रह्मकान्तं तदष्टास्रं विष्णुकान्तमिहोच्यते ।।१३।।
मूल से लेकर ऊपर तक चौकोर तथा कुम्भ एवं मण्डि से युक्त स्तम्भ को
ब्रह्मकान्त कहा जाता है तथा आठ कोण वाले स्तम्भ को विष्णुकान्त कहते हैं।।१३।।
षडस्रमिन्द्रकान्तं स्यात् सौम्यं तत् षोडशास्रकम्।
कर्णमात्रेण तन्मूले चतुरस्रमितोर्ध्वतः ।।१४।।
अष्टास्रं वा द्विरष्टास्रवृत्तं पूर्वास्रमीरितम्।
कुम्भमण्डियुतं वाऽपि रुद्रकान्तं सुवृत्तकम् ।।१५।।
षट्कोण वाला स्तम्भ इन्द्रकान्त संज्ञक होता है। सोलह कोण वाला स्तम्भ सौम्य
कहलाता है। ( कोण वाले स्तम्भों में ) मूल में चौकोर होता है। इसके पश्चात्
अष्टकोण, षोडशकोण अथवा वृत्ताकार होता है। इसकी संज्ञा पूर्वास्र होती है। वृत्ताकार
स्तम्भ यदि कुम्भ एवं मण्डि से युक्त हो तो उसकी संज्ञा रुद्रकान्त होती है।
विस्तारद्विगुणं मध्येऽष्टास्रयुक्तं युगास्रकम्।
वियुक्तं कुम्भमण्डिभ्यां मध्येऽष्टास्रं तदुच्यते ।।१६।।
यदि स्तम्भ की लम्बाई विस्तार से दुगुनी हो, मध्य में अष्टकोण एवं ऊपर तथा
नीचे चौकोर हो तथा कुम्भ एवं मण्डि से रहित हो तो उसे 'मध्ये अष्टास्र' कहा जाता
है।।१६।।
चतुरस्रास्रवृत्ताभं रुद्रच्छन्दं समांशतः।
दण्डाध्यर्धं द्विदण्डेनोत्तुङ्गद्विगुणविस्तृतम् ।।१७।।
पद्मासनं तु कर्तव्यं मूले पद्मासनं भवेत्।
यथेष्टाकृतिसंयुक्तमूर्ध्वतो वा समण्डितम् ।।१८।।
रुद्रच्छन्द संज्ञक स्तम्भ ( मूल से क्रमशः ऊपर की ओर ) चतुष्कोण, अष्टकोण
पञ्चदशोऽध्यायः 卐 पादप्रमाणद्रव्यपरिग्रहविधानम् १४१
एवं वृत्ताकार होता है। पद्मासन संज्ञक स्तम्भ के मूल में पद्मासन की रचना की जाती
है, जिसका प्रमाण डेढ़ दण्ड अथवा दो दण्ड ऊँचा एवं उसका दुगुना चौड़ा होता है।
इसके ऊर्ध्व भाग में इच्छानुसार आकृति अथवा मण्डि का निर्माण करना चाहिये।
चक्रवाकाकृतिव्याप्तं मूले पद्मासनान्वितम् ।
सभद्रं मध्यभागे तु भद्रकं तद् द्विमण्डितम् ॥१९॥
भद्रक संज्ञक स्तम्भ के मूल में पद्मासन, चक्रवाक की आकृति से युक्त दो मण्डि
एवं मध्य में भद्र निर्मित होता है॥१९॥
व्यालेभसिंहभूतादिमण्डितं यत्तु मूलतः ।
यथेष्टाकृतिसंयुक्तं तत्तन्नाम्ना समीरितम् ॥२०॥
जिसके मूल में व्याल, गज, सिंह एवं भूत आदि (अन्य प्राणी) अलंकृत हों
एवं ऊपर इच्छानुसार आकृति का निर्माण किया गया हो, उस स्तम्भ को उसके
अलङ्कार के अनुसार संज्ञा दी जाती है॥२०॥
आत्तमेव तदायामे शुण्डभेदसमन्वितम् ।
युतं तत्कुम्भमण्डिभ्यां शुण्डपादमिति स्मृतम् ॥२१॥
जिस स्तम्भ पर लम्बाई में हाथी का सूँड़ निर्मित हो एवं कुम्भ तथा मण्डि से
युक्त हो, उसे शुण्डपाद स्तम्भ कहते हैं॥२१॥
मुक्तोत्करणकर्माङ्गं पिण्डिपादं तदेव हि ।
कर्मायामेन चाग्रे तु चतुरस्रसमन्वितम् ॥२२॥
तदधस्त्वर्धदण्डेन पद्मं वस्वस्रसंयुतम् ।
तदधस्तु विकारास्रं दण्डेनाब्जं तु पूर्ववत् ॥२३॥
तदधो दण्डमानेन मध्यपट्टं युगास्रकम् ।
पद्मं च षोडशास्रं च पूर्ववत्परिकल्पयेत् ॥२४॥
मूले शेषं युगास्रं स्याच्चित्रखण्डं तदुच्यते ।
तदेवाष्टास्रकं मध्यपट्टं श्रीखण्डमुच्यते ॥२५॥
शुण्डपाद में जब पूरे स्तम्भ में मोतियां उत्कीर्ण होती हैं तो उसे पिण्डिपाद कहते
हैं। (चित्रखण्ड संज्ञक स्तम्भ के) अग्र भाग (ऊपरी भाग) में दो दण्ड से चौकोर
निर्मित होता है। उसके नीचे आधे दण्ड से अष्टकोण पद्म होता है। उसके नीचे एक
दण्ड माप का सोलह कोण पद्म तथा उसके नीचे एक दण्डप्रमाण का चौकोर मध्य
पट्ट होता है। इसके पश्चात् (नीचे) पहले के सदृश षोडश कोण पद्म निर्मित होता
१४२ मयमतम्
है। मूल में शेष भाग चौकोर होता है। इस स्तम्भ को चित्रखण्ड कहते हैं। इसी में
यदि मध्य पट्ट अष्टकोण हो तो उसे श्रीखण्ड स्तम्भ कहते हैं।।२२-२५।।
मध्यपट्टं कलास्रं चेच्छ्रीवज्रस्तम्भमुच्यते ।
अग्राकारं युगास्रं स्यात्त्रिपट्टक्षेपणांवितम् ।।२६।।
क्षेपणस्तम्भमित्युक्तं पट्टं पत्रादिशोभितम् ।
ऊर्ध्वाधस्ताच्छिखामानं त्रिचतुर्भागमेव वा ।।२७।।
सर्वे पोतिकया युक्ता नानारूपैर्विचित्रिताः ।
उपर्युक्त स्तम्भ में यदि मध्य पट्ट सोलह कोण हो तो उसकी संज्ञा श्रीवज्र होती
है। ( क्षेपण स्तम्भ के ) अग्र भाग की आकृति चौकोर होती है। जिसमें तीन पट्ट से
युक्त क्षेपण निर्मित होता है, उसे क्षेपण स्तम्भ कहते हैं। इसके पट्ट पत्र आदि से
अलंकृत होते हैं। उसके नीचे तीन अथवा चार भाग में शिखा का मान रखा जाता
है। सभी स्तम्भ पोतिका से युक्त एवं विभिन्न प्रकार की
पञ्चदशोऽध्यायः 卐 पादप्रमाणद्रव्यपरिग्रहविधानम् १४३
कुम्भोच्छ्रये नवांशे धृग्भागेन चतुरंशकैः ।
कमलं कण्ठमंशेन भागेनास्यं प्रकीर्तितम् ॥३२॥
भागेन पद्ममर्धेन वृत्तमर्धेन हीरकौ ।
हीरौ पादसमव्यासौ तत्कर्णेनास्यविस्तृतम् ॥३३॥
कुम्भ की ऊँचाई के नौ भाग करने चाहिये। इसमें एक भाग से धृग्, चार भाग
से कमल, एक भाग से कण्ठ, एक भाग से मुख, एक भाग से पद्म, आधा भाग से
वृत्त एवं आधा भाग से दो हीरकों का निर्माण करना चाहिये। हीरकों का व्यास स्तम्भ
की चौड़ाई के बराबर एवं मुख उसके कर्ण तक विस्तृत होना चाहिये ।। ३२-३३ ।।
तत्कर्णं कुम्भविस्तारं तत्कर्णं फलकायतम् ।
अथवा फलकायामं चतुर्दण्डं त्रिदण्डकम् ॥३४॥
कर्ण फलक के बराबर चौड़ा होना चाहिये एवं कर्ण के बराबर कुम्भ का विस्तार
रखना चाहिये अथवा फलक का विस्तार चार दण्ड या तीन दण्ड होना चाहिये ।। ३४ ।।
सार्धत्रिदण्डमायाममुत्सेधाख्यं त्रिदण्डकम् ।
तदुत्सेधे त्रिभागे तु भागेनोत्सन्धिरिष्यते ॥३५॥
अथवा साढ़े तीन दण्ड विस्तार होना चाहिये एवं उसकी ऊँचाई तीन दण्ड रखनी
चाहिये। ऊँचाई को तीन बराबर भागों में बाँटना चाहिये। ऊर्ध्व भाग की निर्मिति
( उत्सन्धि ) एक भाग से करनी चाहिये ।। ३५ ।।
भागेन वेत्रमंशेन पद्मं पाल्याभमिष्यते ।
नागवक्त्रसमाकारमावेत्रात् पादरूपवत् ॥३६॥
एक भाग से वेत्र एवं एक भाग से अन्दर की ओर मुड़ा पद्म होना चाहिये। यह
कुम्भ स्तम्भ की आकृति के समान वेत्र से नागवक्त्र के आकार का होना चाहिये ।। ३६ ।।
पादविस्तारविस्तारं धृक्कण्ठं वीरकाण्डकम् ।
सर्वेषामपि पादानां वीरकाण्डं युगास्त्रकम् ॥३७॥
स्तम्भ के विस्तार के समान धृक्, कण्ठ एवं वीरकाण्ड का विस्तार रखना
चाहिये। सभी स्तम्भों का वीरकाण्ड चौकोर होना चाहिये ।। ३७ ।।
तदुत्सेधत्रिपा दोनं दण्डोत्थं स्कन्धमिष्यते ।
तदधस्तु तदर्धेन पद्मं पत्रविचित्रितम् ॥३८॥
मालास्थानमधस्तस्माद् दण्डमानसमुन्नतिः ।
उसकी ( वीरकाण्ड की ) ऊँचाई से पौन भाग कम ( एक चौथाई अथवा ) एक
१४४ मयमतम्
दण्ड ऊँचा स्कन्ध होना चाहिये। उसके नीचे उसके आधे माप का पद्म होना चाहिये,
जो पत्रों से अलंकृत हो। उसके नीचे माला-स्थान होना चाहिये, जो दण्डप्रमाण ऊँचा
हो।।३८।।
❋ पोतिका ❋
पादविस्तारविस्तारा पोतिका तत्समोदया ॥३९॥
पोतिका ( स्तम्भ का ऊपरी भाग, जो स्तम्भ से बाहर निकला हो ) का विस्तार
स्तम्भ के विस्तार के बराबर होना चाहिये एवं उसकी ऊँचाई भी विस्तार के बराबर
होनी चाहिये।।३९।।
पञ्चदण्डसमायामा श्रेष्ठाऽर्धोच्चा कनिष्ठिका।
आयता सा त्रिदण्डेन चतुर्दण्डेन दीर्घका ॥४०॥
त्रिभागोना त्रिपादोच्चा मध्यमा पोतिका भवेत्।
पूर्वोक्तं तत् समण्डीनां सकुम्भानां चतुर्गुणम् ॥४१॥
उत्तम पोतिका की चौड़ाई पाँच दण्ड एवं उसकी ऊँचाई चौड़ाई की आधी होनी
चाहिये। कनिष्ठ पोतिका की चौड़ाई तीन दण्ड एवं मध्यम पोतिका की चौड़ाई तीन
भाग कम चार दण्ड होनी चाहिये। ( स्तम्भ का ) पूर्वोक्त प्रमाण मण्डी एवं कुम्भ के
साथ चार गुना हो जाता है।।४०-४१।।
त्रिगुणं केवलानां तु पादानां प्रविधीयते।
सर्वेषामपि पादानां यथेष्टायतमीरितम् ॥४२॥
( मण्डी, कुम्भ आदि से रहित ) केवल स्तम्भ का माप तीन गुना होता है। सभी
पादों का यथोचित माप वर्णित किया गया है।।४२।।
तदुच्चत्रिचतुर्भागोच्चा वा स्वाग्रे तु पट्टिका।
अर्धं त्र्यंशमङ्घ्यूनं छायामानं विधीयते ॥४३॥
पोतिका की ऊँचाई के तीसरे या चौथे भाग के बराबर पोतिका के ऊपर अग्र-
पट्टिका निर्मित होती है। इसका छायामान आधा, दो-तिहाई अथवा तीन-चौथाई होना
चाहिये।।४३।।
त्रिभागं वा चतुर्भागं तरङ्गस्थानमिष्यते।
सक्षुद्रक्षेपणं मध्यपट्टं पत्रविचित्रितम् ॥४४॥
तीन भाग अथवा चौथे भाग में तरङ्ग-स्थान ( लहरों की रचना ) होना चाहिये।
यह क्षुद्र-क्षेपण, मध्य पट्ट एवं पट्टों से अलंकृत होना चाहिये।।४४।।
पञ्चदशोऽध्यायः 卐 पादप्रमाणद्रव्यपरिग्रहविधानम् १४५
समास्तरङ्गाश्चान्योन्यहीनाः सर्वत्र सम्मताः।
अग्रनिष्क्राममर्धं वा त्रिभागं वा स्वतारतः ॥४५॥
सभी लहरें सम एवं एक-दूसरे से हीन नहीं होती हैं। इनका अग्र भाग एवं
निष्क्राम ( प्रथम छोर से अन्तिम छोर ) अपने विस्तार का आधा अथवा तीसरे भाग
के बराबर होना चाहिये।।४५।।
मुष्टिबन्धोपरिक्षिप्तव्यालसंहितिरूपवत् ।
सनालीकं समतलं सनाटकमथापि वा ॥४६॥
इसके ऊर्ध्व भाग में सर्प की कुण्डली के सदृश मुष्टिबन्ध होना चाहिये, जो
नालियों के सहित समतल एवं नाटकों ( नाट्य चित्रों ) से युक्त हो।।४६।।
भूतेभमकरैर्व्यालैसंयुक्तं चाग्रमण्डनम्।
पार्श्वयोः पोतिकामध्ये पट्टं पादविशालवत् ॥४७॥
पोतिका के ऊर्ध्व भाग में भूत ( जीव-जन्तु ), गज, मकर एवं व्याल आदि का
अलङ्करण होना चाहिये। पोतिका का मध्य पट्ट दोनों पार्श्वों में स्तम्भ के समान विस्तृत
होना चाहिये।।४७।।
रत्नबन्धक्रियावल्ली चित्रा वाग्रस्थपट्टिका।
नानाचित्रैर्विचित्रा वा सा प्रोक्ता चित्रपोतिका ॥४८॥
जिस पोतिका की अग्रस्थ पट्टिका ( ऊपरी पट्टी पर ) रत्नजटित लता अङ्कित हो
अथवा अनेक प्रकार के चित्रों से जिसकी सज्जा की गई हो, उसे चित्रपोतिका कहते
हैं।।४८।।
पत्रैर्विचित्रिता पत्रपोतिकेति प्रकीर्तिता।
महार्णवतरङ्गाभतरङ्गाभा तरङ्गिणी ॥४९॥
चतुःषडष्टपङ्क्त्यर्कसंख्या वा स्युस्तरङ्गकाः।
बहवोऽपि समाश्चैते चान्योन्याः स्युर्वराः क्रमात् ॥५०॥
विभिन्न प्रकार के पत्रों से अलंकृत पोतिका को पत्रपोतिका कहते हैं। जिस पोतिका
में सागर के लहरों के सदृश लहरें निर्मित हों, वह तरङ्गिणी पोतिका होती है। इन
लहरों की संख्या चार, छः, आठ, दश या बारह होनी चाहिये। अथवा बहुत-सी सम
संख्याओं में लहरें होनी चाहिये, जो एक-दूसरे से आगे बढ़ती हुई हों।।४९-५०।।
❋ स्तम्भविषये विशेषः ❋
पादमर्धं त्रिपादं वा भित्तेः स्तम्भस्य निर्गतम्।
चतुरस्रास्रवृत्तानां यथाक्रममिति स्मृतम् ॥५१॥
मय०-१०
१४६ मयमतम्
स्तम्भ के विषय में विशेष—भित्ति के स्तम्भ का निर्गम इस प्रकार होना चाहिये—
यदि चतुष्कोण हो तो चौथाई, अष्टकोण हो तो आधा तथा वृत्ताकर हो तो तीन
चौथाई॥५१॥
द्विहस्ताद्यं चतुर्हस्तं स्तम्भान्तरमिति स्मृतम्।
षडङ्गुलविवृद्ध्या तु नवभेदं प्रकीर्तितम्॥५२॥
स्तम्भान्तर दो हाथ से लेकर चार हाथ तक कहा गया है। छः-छः अङ्गुल की
वृद्धि करते हुये इसके नौ भेद कहे गये हैं॥५२॥
गृहीतांशवशेनपि यथायुक्त्या प्रयोजयेत्।
स्तम्भस्तम्भान्तरं सर्वं प्रासादे सार्वदेशिके ॥५३॥
सभी स्थानों पर सभी भवनों में यथोचित अंश ( उपर्युक्त मापों में से ) ग्रहण कर
स्तम्भ एवं स्तम्भान्तर में प्रयोग करना चाहिये॥५३॥
विषमस्तम्भभागं तु वास्तुवस्तुविनाशनम्।
सायतं चापि तत्सर्वं तन्नाम्नैव प्रपद्यते ॥५४॥
यदि स्तम्भ-स्थापन नियमानुकूल न हो तो वह भूमि एवं भवन ( तथा उसके
स्वामी ) का विनाश करने वाला होता है। अनुकूल स्तम्भ-स्थापन कल्याण प्रदान
करता है॥५४॥
दारुस्तम्भविशालं वा सार्धं द्वित्रिगुणं तु वा।
शिलास्तम्भविशालं स्याद् देवानां नैव मानवे ॥५५॥
जितना विस्तृत काष्ठस्तम्भ होता है, उतना विस्तृत, उसका आधा, दुगुना या
तीन गुना विस्तृत प्रस्तरस्तम्भ हो सकता है; किन्तु इसका प्रयोग केवल देवालय में
होना चाहिये, मनुष्यालय में नहीं होना चाहिये॥५५॥
इष्टकाश्मद्रुमैः सर्वैः स्तम्भाः प्रोक्ताश्चिरन्तनैः ।
युग्मायुग्मं तु देवाना मयुग्मं तु नृणां मतम् ॥५६॥
प्राचीन मनीषियों ने सभी स्तम्भों को ईंट, प्रस्तर अथवा काष्ठ से निर्मित कहा
है। देवगृहों में स्तम्भ की संख्या सम अथवा विषम हो सकती है; किन्तु मनुष्यों के
गृह में स्तम्भों की संख्या विषम होनी चाहिये॥५६॥
अन्तःस्तम्भं बहिःस्तम्भमाजुसूत्रं यथा भवेत्।
गृहाणां भित्तिमध्ये तु शालानां तु तथा भवेत् ॥५७॥
जिस प्रकार आजुसूत्र ( मापसूत्र ) हो, उसी के अनुसार अन्तःस्तम्भ एवं बहिःस्तम्भ
पञ्चदशोऽध्यायः 卐 पादप्रमाणद्रव्यपरिग्रहविधानम् १४७
का निर्माण करना चाहिये। उसी के अनुसार गृह की भित्ति के मध्य शालाओं की भी
स्थिति होनी चाहिये।।५७।।
प्रासादानां तु पाद्बाह्ये पान्मध्ये शयनासने।
उपानादिशिरः केचित्केचित्स्तूप्यन्तमुन्नतम् ॥५८॥
यह माप देवालयों में स्तम्भ के बाहर से लिया जाता है। (किन्तु) शयन एवं
आसन के निर्माण में पाद (पाये = स्तम्भ) के अन्दर से लिया जाता है। (प्रासादों
के निर्माण में ऊँचाई का माप) कुछ विद्वानों के अनुसार उपान से शिरःप्रदेश तक माप
लेना चाहिये तथा कुछ के मतानुसार मापन कार्य प्रासाद की स्तूपी तक होना चाहिये।
मुनयः प्रवदन्त्युच्चं प्रासादे सार्वदेशिके।
पाद्बाह्ये पादमध्ये वा सभामण्डपयोर्मतम् ॥५९॥
सभी स्थानों पर प्रासादों की ऊँचाई का माप इसी प्रकार लेना चाहिये, ऐसा मुनियों
का मत है। सभागार एवं मण्डप में स्तम्भों के बाहर से अथवा स्तम्भ के मध्य से
माप-सूत्र ले जाना चाहिये।।५९।।
अन्तर्बहिश्च मध्ये तु सालानां मानसूत्रकम्।
युञ्जीयादेवमेवं तु सर्वेषां सम्पदां पदम् ॥६०॥
विपरीते विपत्त्यै स्यादिति शास्त्रविनिश्चयः।
भवनों में मानसूत्र बाहर (भित्ति अथवा स्तम्भ के बाहर) से, भीतर से एवं मध्य
से प्रयुक्त होना चाहिये। इस प्रकार का (विविध प्रकार से मानसूत्र का) प्रयोग सभी
सम्पदाओं को प्रदान करने वाला होता है। इसके विपरीत (मानसूत्र द्वारा भली-भाँति
मापन न करने पर) होने पर गृहस्वामी के लिये विपत्तिकारक होता है, ऐसा शास्त्रों
का मत है।।६०।।
✵ द्रव्यपरिग्रहः ✵
स्तम्भोत्तरादिकाङ्गानां द्रव्यं द्रुमोपलेष्टकाः ॥६१॥
पदार्थों का संग्रह—स्तम्भ एवं उत्तर (स्तम्भ के ऊपर निर्मित भित्ति) आदि
अङ्गों में प्रयुक्त होने वाले द्रव्य काष्ठ, प्रस्तर एवं ईंटें हैं।।६१।।
✵ वृक्षलक्षणम् ✵
स्निग्धसारमहासारा ह्यवृद्धास्तरुणेतराः।
अवक्रा निर्व्रणाः सर्वे ग्रहीतव्या महीरुहाः ॥६२॥
वृक्ष के लक्षण—(भवनों में प्रयुक्त होने वाले काष्ठ के गुण-धर्म इस प्रकार
१४८ मयमतम्
हैं— ) स्निग्धसार ( ठोस एवं चिकना ), महासार ( अत्यन्त दृढ़ ), न ही बहुत पुराना
तथा न ही अपरिपक्व हो, टेढ़ा न हो तथा वृक्ष में किसी प्रकार का चोट एवं दोष
न हो; ऐसा वृक्ष गृहनिर्माण में ग्रहण करने योग्य होता है।।६२।।
पुण्याद्रिवनतीर्थस्था दर्शनीया मनोरमाः ।
सर्वसम्पत्समृद्ध्यर्था भवेयुस्ते न संशयः ॥६३॥
पवित्र स्थल, पर्वत, वन एवं तीर्थों में स्थित, देखने में सुन्दर तथा मन को आकृष्ट
करने वाले वृक्ष सभी प्रकार की सम्पत्ति एवं समृद्धि प्रदान करने वाले होते हैं, इसमें
सन्देह नहीं है।।६३।।
पुरुषः खदिरः सालो मधुकः चम्पकस्तथा ।
शिंशपार्जुनाजकर्णी क्षीरिणी पद्मचन्दनौ ॥६४॥
पिशितो धन्वनः पिण्डी सिंहो राजादनः शमी ।
तिलकश्च द्रुमाश्चैते स्तम्भवृक्षाः समीरिताः ॥६५॥
निम्बासनशिरीषाश्च एकः कालश्च कट्फलः ।
तिमिसो लिकुचश्चैव पनसः सप्तपर्णकः ॥६६॥
भौमा चैव गवाक्षी चैत्यादयश्चोर्ध्वभूरुहाः ।
स्तम्भ में प्रयोग के योग्य वृक्ष इस प्रकार हैं—पुरुष, कत्था, साल, महुआ,
चम्पक, शीशम, अर्जुन, अजकर्णी, क्षीरिणी, पद्म, चन्दन, पिशित, धन्वन, पिण्डी,
सिंह, राजादन, शमी एवं तिलक। इसी प्रकार निम्ब, आसन, शिरीष, एक, काल,
कट्फल, तिमिस, लिकुच, कटहल, सप्तपर्णक, भौमा एवं गवाक्षी के वृक्ष भी ग्रहण
करने योग्य होते हैं।।६४-६६।।
✵ शिलालक्षणम् ✵
एकवर्णाः स्थिराः स्निग्धाः सुखसंस्पर्शनान्विताः ॥६७॥
प्राचीनाश्चाप्युदीचीना भूमग्नाः शुभदाः शिलाः ।
शिला के लक्षण— शुभ शिला एक रंग की, दृढ़, ( किन्तु छूने पर ) चिकनी,
छूने पर अच्छी लगने वाली, भूमि में गड़ी होने पर पूर्वमुख अथवा उत्तर की ओर मुख
वाली होती है।।६७।।
✵ इष्टकालक्षणम् ✵
स्त्रीलिङ्गाश्चापि पुंल्लिङ्गा निर्दोषाश्च नपुंसकाः ॥६८॥
"( इस वर्ग के वृक्ष भी भवन के लिये अग्राह्य होते हैं )।।७३।।" - wait, look at the line breaks:
Line 26: "वायु द्वारा तोड़ा गया, गजों द्वारा तोड़ा गया, समाप्त जीवन वाला, चण्डालवर्ग"
Line 27: "के लोगों को शरण देने वाला तथा जिस वृक्ष के नीचे ( चण्डालवर्ग को छोड़ कर )"
Line 28: "अन्य सभी वर्ग के लोग शरण लेते हों ( इस वर्ग के वृक्ष भी भवन के लिये अग्राह्य"
Line 29: "होते हैं )।।७३।।"
Let's check line 28-29 carefully in the image:
Line 28 ends with: "अन्य सभी वर्ग के लोग शरण लेते हों ( इस वर्ग के वृक्ष भी भवन के लिये अग्राह्य"
Line 29: "होते हैं )।।७३।।"
Yes! Exactly.
Now verse 74:
"नान्योन्यवलिता भग्ना न वल्मीकसमाश्रिताः ।"
"न लतालिङ्गिता गाढा न सिराकोटरावृताः ॥७४॥"
Wait, look at the text of verse 74 in the image:
First line: "नान्योन्यवलिता भग्ना न वल्मीकसमाश्रिताः ।"
- नान्योन्यवलिता (ना, न्यो, न्य