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मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Mayamatam of Maya Muni with Hindi Commentary by Shailaja Pandey

मय मुनि (टीकाकार: डॉ. शैलजा पाण्डेय) द्वारा

DevanagariHindipublished395 पृष्ठ

पृष्ठ 168, कुल 395 में से

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पृष्ठ 168

१४४ मयमतम्
दण्ड ऊँचा स्कन्ध होना चाहिये। उसके नीचे उसके आधे माप का पद्म होना चाहिये,
जो पत्रों से अलंकृत हो। उसके नीचे माला-स्थान होना चाहिये, जो दण्डप्रमाण ऊँचा
हो।।३८।।
❋ पोतिका ❋
पादविस्तारविस्तारा पोतिका तत्समोदया ॥३९॥
पोतिका ( स्तम्भ का ऊपरी भाग, जो स्तम्भ से बाहर निकला हो ) का विस्तार
स्तम्भ के विस्तार के बराबर होना चाहिये एवं उसकी ऊँचाई भी विस्तार के बराबर
होनी चाहिये।।३९।।
पञ्चदण्डसमायामा श्रेष्ठाऽर्धोच्चा कनिष्ठिका।
आयता सा त्रिदण्डेन चतुर्दण्डेन दीर्घका ॥४०॥
त्रिभागोना त्रिपादोच्चा मध्यमा पोतिका भवेत्।
पूर्वोक्तं तत् समण्डीनां सकुम्भानां चतुर्गुणम् ॥४१॥
उत्तम पोतिका की चौड़ाई पाँच दण्ड एवं उसकी ऊँचाई चौड़ाई की आधी होनी
चाहिये। कनिष्ठ पोतिका की चौड़ाई तीन दण्ड एवं मध्यम पोतिका की चौड़ाई तीन
भाग कम चार दण्ड होनी चाहिये। ( स्तम्भ का ) पूर्वोक्त प्रमाण मण्डी एवं कुम्भ के
साथ चार गुना हो जाता है।।४०-४१।।
त्रिगुणं केवलानां तु पादानां प्रविधीयते।
सर्वेषामपि पादानां यथेष्टायतमीरितम् ॥४२॥
( मण्डी, कुम्भ आदि से रहित ) केवल स्तम्भ का माप तीन गुना होता है। सभी
पादों का यथोचित माप वर्णित किया गया है।।४२।।
तदुच्चत्रिचतुर्भागोच्चा वा स्वाग्रे तु पट्टिका।
अर्धं त्र्यंशमङ्‌घ्यूनं छायामानं विधीयते ॥४३॥
पोतिका की ऊँचाई के तीसरे या चौथे भाग के बराबर पोतिका के ऊपर अग्र-
पट्टिका निर्मित होती है। इसका छायामान आधा, दो-तिहाई अथवा तीन-चौथाई होना
चाहिये।।४३।।
त्रिभागं वा चतुर्भागं तरङ्गस्थानमिष्यते।
सक्षुद्रक्षेपणं मध्यपट्टं पत्रविचित्रितम् ॥४४॥
तीन भाग अथवा चौथे भाग में तरङ्ग-स्थान ( लहरों की रचना ) होना चाहिये।
यह क्षुद्र-क्षेपण, मध्य पट्ट एवं पट्टों से अलंकृत होना चाहिये।।४४।।