मत्तविलास प्रहसनम् (पल्लव नरेश महेन्द्रविक्रमवर्मा - कांचीपुरम सामाजिक व्यंग्य संस्कृत-हिन्दी सटीक)
Mattavilasa Prahasana of Mahendravarman I
पल्लव सम्राट् महेन्द्रविक्रमवर्मा (व्याख्या: रानी मजूमदार) द्वारा
टिप्पणियाँ ८१
महायान ग्रन्थों के अनुसार जो बुद्धत्व की प्राप्ति के लिए यत्नवान्
है अर्थात् जो बोधिसत्व है, उसे षट्पारमिता का ग्रहण करना चाहिए। इन
षट्पारमिताओं का अर्जन बुद्धत्व प्राप्ति का नैसर्गिक उपाय है। षट्-
पारमिता में प्रज्ञा का प्राधान्य है। प्रज्ञापारमिता यथार्थज्ञान को कहते हैं।
प्रज्ञा की प्राप्ति के लिए ही अन्य पारमिताओं की शिक्षा कही गई है। ये
पञ्चपारमिताएँ प्रज्ञा रहित होने पर लौकिक कहलाती हैं। जब पञ्च-
पारमिताएँ प्रज्ञापारमिता से समन्वगत होती हैं तभी वह सचक्षुक कहलाती
हैं और उसको लोकोत्तर संज्ञा प्राप्त होती है। प्रज्ञा की प्रधानता होते हुए भी
अन्य पारमिताओं का ग्रहण नितान्त आवश्यक है। सम्बोधि की प्राप्ति में
दान प्रथम कारण है, शील दूसरा। आत्मभाव का त्याग तथा निस्वार्थ बुद्धि
की प्रकृष्टता दानपारमिता है। दान, शील की अनुपालना क्षान्ति द्वारा
होती है। दानादि त्रितय पुण्यसंभार, वीर्य अर्थात् कुशलोत्साह के बिना नहीं
हो सकता; और बिना ध्यान अर्थात् चित्तैकाग्रता के प्रज्ञा का प्रादुर्भाव नहीं
होता क्योंकि समाहित चित्त होने से ही यथाभूत परिज्ञान होता है जिससे
सब आवरणों की अत्यन्त हानि होती है।³
भरतवाक्यम् (पृ० ६२)—
इससे नाट्याभिनय की समाप्ति पर सामाजिकों के लिए नट के द्वारा
आशीर्वाद दिया जाता है।
१. प्रस्तावना के अनन्तर वे नट ही नाट्य के विभिन्न पात्रों के
रूप में रङ्गशाला में प्रकट होते हैं। अभिनय की समाप्ति पर उसी
पहले रूप में प्रकट होना सम्भव नहीं होता है; अतः नटवाक्य न कहकर भरत-
वाक्य कहा जाता है।
२. नाट्यशास्त्र के रचयिता भरत मुनि की स्मृति में पुनः यह नट-
वाक्य भरतवाक्य कहा जाता है।
राजन्वान् (श्लोक; पृ० ६२)—
राजन् शब्द से राजवत् और राजन्वत् दोनों शब्द बनते हैं। राजवत्
शब्द का अर्थ है 'केवल राजा से युक्त' अर्थात् उस देश का राजा उत्तम नहीं
है; और जो देश न्यायपरायण तथा उत्तम राजा द्वारा शासित है वह
राजन्वत् है—
सुराज्ञि देशे राजन्वान् स्यात् ततोऽन्यत्र राजवान् । —अमरकोषः ।
३. आचार्य नरेन्द्रदेव, बौद्ध-धर्म-दर्शन', पृ० १८४ ।
श्लोक-सूची
श्लोक संख्या पृष्ठ
अजिह्मैः सारगुरुभिः १८ ५२
अनतिशयमनन्तं ९ ३०
आकरे सूक्तिरत्नानाम् ४ २६
आवृतं बहि- १६ ५०
आस्थाय प्रयतो १७ ५०
उद्भिन्नरोमाञ्चकपोलरेखम् ५ २४
उद्भिन्नश्रमवारिबिन्दु- ६ २६
कार्यस्य निःसंशयम् ८ ३०
गृहीतशूला १९ ५६
चिरं मया २१ ६०
तां क्षौरिकस्य १४ ४६
दृष्टानि वस्तूनि १३ ४४
निर्विष्टोज्झित- २० ५६
पेया सुरा ७ २८
प्रज्ञादानदया- ३ २४
भाषावेषवपुः १ २२.
मिथ्यात्रिलोचन- १० ३२
यदेतदासीत् १५ ५०
येन मम पानभोजन- ११ ३४
विरोधः पूर्वं- २२ ६२
वेदान्तेभ्यो १२ ४०
शश्वद् भूत्यै २३ ६२
सम्प्रति सङ्गीतघनः ५ २६
सन्दर्भ-ग्रन्थ-सूची
मत्तविलासप्रहसन (आवृत्तियाँ)
- Giri, Sri Kapildev : Mattavilāsa Prahasana; Varanasi, 1966.
- Unni, N.P., (ed. and tr.) : Mattavilāsa Prahasana of Mahen-
dravikrama Varman, Trivandrum, 1974.
संस्कृत-ग्रन्थ
अभिनवगुप्त : 'अभिनवभारती' सं० डा० नगेन्द्र, दिल्ली
विश्वविद्यालय, दिल्ली, १६६० ।
दण्डी : 'काव्यादर्श', दिल्ली, १६७३ ।
भरत : 'नाट्यशास्त्रम्' (काव्यमाला ४२), भारतीय
विद्या प्रकाशन, दिल्ली, १६८३ ।
मम्मट : 'काव्यप्रकाश', दिल्ली, १६६६ ।
विश्वनाथ : 'साहित्यदर्पण', वरेली, १६७६ ।
शुभङ्कर : 'सङ्गीतदामोदर', कलकत्ता, १६६६ ।
हिन्दी-ग्रन्थ
गैरोला, वाचस्पति : 'भारतीय नाट्य-परम्परा और अभिनयदर्पण',
संवर्तिका प्रकाशन, इलाहाबाद, १६७१ ।
गैरोला, वाचस्पति : 'संस्कृत साहित्य का इतिहास', इलाहाबाद, १६६० ।
नरेन्द्रदेव, आचार्य : 'बौद्ध-धर्म-दर्शन', पटना, १६५६ ।
त्रिपाठी, रमाकान्त : 'संस्कृत-नाट्य-सिद्धान्त', वाराणसी, १६६६।
अंग्रेजी-ग्रन्थ
Diskalkar, D.B. : Selections from Sanskrit Inscriptions (2nd
century to 8th century A.D.), Delhi, 1977.
Gopalan, R. : History of the Pallavas of Kāñchī, Madras,
Mani, Veṭṭam : Puranic Encyclopaedia, Delhi, 1975.
Śāstrī, N. K. : A History of the South India, Madras, 1955.
कोष
अमरसिंह : 'अमरकोष', १६७२ ।
आप्टे, वी०एस० : 'संस्कृत हिन्दी कोष', दिल्ली, १६६६ ।
शुद्धि-पत्र
पृष्ठ पंक्ति अशुद्ध शुद्ध
३ ७ प्रसार प्रकार
३ २० उपदेशपेरक उपदेशपरक
७ ६ वेषभाषाषिः वेषभाषाभिः
८ ७ परस्य परस्थ
८ १७ अड्डों अङ्गों
११ १३ बल्लम वल्लम्
१३ १ सम्बन्ध सन्दर्भ
१३ २२ काल्पनिक कापालिक
१४ ११ सांपृतिक सांवृतिक
१५ ३ काम काय
१५ २०, २३ जैनों जैनियों
१६ १५ शाक्तभिक्षू शाक्यभिक्षु
१७ ३, ७ वभ्रु कल्प बभ्रु कल्प
१७ २१ है हैं
२१ १० भममिति भयमिति
२७ १ बाली वाले
२७ १६ करता ) करता है )
५० २५ पुरायताम् पुण्यताम्
५२ ३ निमितम् निर्मितम्
५४ २६ खादितुकाओ खादितुकामो
५६ १६ चीवघररो चीवरधरो
६३ २१ विधिपूवॅक विधिपूर्वक
८० ८ अयने अपने
८० २६ अनुयामी अनुयायी
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