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मत्तविलास प्रहसनम् (पल्लव नरेश महेन्द्रविक्रमवर्मा - कांचीपुरम सामाजिक व्यंग्य संस्कृत-हिन्दी सटीक)

मत्तविलास प्रहसनम् (पल्लव नरेश महेन्द्रविक्रमवर्मा - कांचीपुरम सामाजिक व्यंग्य संस्कृत-हिन्दी सटीक)

Mattavilasa Prahasana of Mahendravarman I

पल्लव सम्राट् महेन्द्रविक्रमवर्मा (व्याख्या: रानी मजूमदार) द्वारा

DevanagariHindipublished100 पृष्ठ

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भूमिका ३
और सात्त्विक) के द्वारा अनुकार्य (राम आदि) के साथ नायक की अवस्थाओं
का अनुकरण नाट्य कहलाता है—
'अवस्थानुकृतिर्नाट्यम्।' १.७
रूप—दृश्य होने के कारण वह नाट्य रूप भी कहलाता है।
'रूपं दृश्यतयोच्यते।' १.८
जिस प्रकार दृश्य अर्थात् चाक्षुष ज्ञान का विषय होने के कारण नील,
पीत, कृष्णादि रूप कहलाते हैं उसी प्रकार दृश्य होने के कारण नाट्य भी
रूप कहलाता है।
रूपक—आरोप किया जाने के कारण वह नाट्य रूपक कहलाता है।
'रूपकं तत्समारोपात्।' १.८
जिस प्रकार मुख में चन्द्रमा का आरोप किया जाने के कारण 'मुखचन्द्र'
में रूपक अलंकार होता है उसी प्रकार नट में राम आदि की अवस्था
(रूप) का आरोप होने के कारण नाट्य को भी रूपक कहते हैं।
भरत मुनि के मतानुसार 'सुख-दुःख' समन्वित संसार का स्वभाव जब
चार प्रकार के अभिनयों से अभिनीत होता है तो वही नाट्य कहलाता है।
अभिनवगुप्त के मत में नाट्य लौकिक पदार्थों से भिन्न है; अनु-