मत्तविलास प्रहसनम् (पल्लव नरेश महेन्द्रविक्रमवर्मा - कांचीपुरम सामाजिक व्यंग्य संस्कृत-हिन्दी सटीक)
Mattavilasa Prahasana of Mahendravarman I
पल्लव सम्राट् महेन्द्रविक्रमवर्मा (व्याख्या: रानी मजूमदार) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२ मत्तविलास-प्रहसन
परन्तु आज जो मत सर्वमान्य है वह है आचार्य मम्मट का काव्य
लक्षण सम्बन्धी मत। उन्होंने अपनी काव्य परिभाषा में अन्य सभी मतों को
यथोचित सम्मान दिया है। मम्मट के विचार में काव्य वे शब्द एवं अर्थ हैं जो
दोषरहित परन्तु सगुण और कभी-कभी अलंकारों से भी रहित हो सकते हैं—
‘तददोषौ शब्दार्थौ सगुणावनलंकृती पुनः क्वापि।’
मम्मट ने यद्यपि काव्य में ध्वनि को प्राधान्य दिया है तथापि रस, अलंकार
और रीति को भी काव्य में महत्त्वपूर्ण तत्त्व माना है।
अन्त में मम्मट के ही विचार से ‘यह कृति जो नियति के रचित
नियमों से आबद्ध नहीं है, जो आह्लाद से युक्त है, जो अन्य किसी कारण
आदि के वशीभूत नहीं है, नव रसों से युक्त होने के कारण जिसकी रचना
मनोहारिणी है, ऐसी कवियों की वाणी सदैव विजयी होती है’—
नियतिकृतनियमरहितां ह्लादैकमयीमनन्यपरतन्त्राम् ।
नवरसरुचिरां निर्मितिमादधती भारती कवेर्जयति ॥
काव्य के भेद
काव्य के मुख्य रूप से दो भेद हैं—
(१) श्रव्य काव्य (२) दृश्य काव्य
श्रव्य काव्य का आनन्द पढ़कर या सुनकर लिया जाता है। इसके
पुनः तीन भेद होते हैं—गद्य-काव्य, पद्य-काव्य और चम्पू-काव्य। गद्य-काव्य के
अन्तर्गत कथा और आख्यायिका, पद्य-काव्य के तन्तर्गत महा-काव्य, खण्ड-काव्य
मुक्तक-काव्य और गीति-काव्य आदि तथा गद्य-पद्य-मयी रचनायें चम्पू-काव्य
के अन्तर्गत आती हैं।
दृश्य-काव्य वे काव्य हैं जो नेत्रों के माध्यम से हृदय में प्रवेश करते
हैं, अर्थात् जो रङ्गमंच पर अभिनीत किए जाते हैं। इसी कारण श्रव्य काव्य
की अपेक्षा दृश्य काव्य अधिक रमणीय होता है। कहा भी जाता है—
‘काव्येषु नाटकं रम्यम्।’
दशरूपकार धनञ्जय नाट्य, रूप और रूपक—इन तीनों को दृश्य
काव्य का पर्याय मानते हैं।
नाट्य—उनके अनुसार चार प्रकार के अभिनय (आङ्गिक, वाचिक, आहार्य