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मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished866 पृष्ठ

४७८ मार्क्सवाद और रामराज्य
प्रबोध भी कैसे हो सकता था ? बीजके उपमर्दन होनेसे अङ्कुरकी उत्पत्ति होती
है, यह देखकर बौद्धलोग अभावसे ही अङ्कुरादि कार्योंकी उत्पत्ति कहते हैं।
परंतु यदि ऐसी बात होती, तब तो बीजके दाहसे भी अङ्कुरकी उत्पत्ति
होनी चाहिये, क्योकि बीज दाहमें भी तो बीजका उपमर्दन या अभाव
हुआ ही। अतः बीजके अवयव ही अङ्कुरके कारण हैं । बीज अङ्कुरोत्पत्तिके
पूर्वकी अवस्था है। जैसे घटोत्पत्तिके पहले मृत्तिकाकी पिण्डावस्था होती है।
पिण्डमें, घटमें, कपालमें जो व्यापक है, वह मृत्तिका ही सबका कारण है ।
पिण्डादि सब मृत्तिकाके कार्य ही है । उसी तरह बीजावयव ही बीज
एवं अङ्कुरादिमें व्यापक होनेसे वही कारण है । पिण्ड या बीज, घट-अङ्कुरादिमें
व्यापक नहीं हैं, अतः वे कारण नही हैं। एक कारणमें युगपत् विरुद्ध अनेक कार्य नहीं
हो सकते, अतः एक कारणसे होनेवाले कार्योंमें क्रमभाविता है। पिण्ड, घट, कपाल,
बीज, अङ्कुर, नाल, स्कन्ध, शाखोपशाखादि कार्य क्रमसे ही होते हैं।
जो कहते हैं कि पिण्ड, कपालादि कार्योंसे भिन्न होकर कारण मृत्तिका कुछ
भी नहीं है, उन्हे अन्वय व्यतिरेकादि प्रमाणोंपर अवश्य ध्यान देना चाहिये।
जैसे पुष्पोंके परस्पर व्यावृत्त होनेपर भी उनमें अनुवृत्त सूत्र उनसे भिन्न होता है,
वैसे ही पिण्ड, घट, कपालादिके परस्पर व्यावृत्त होनेपर भी सबमें अनुवृत्त मृत्तिका
स्पष्ट ही उन कार्योंसे पृथक् है। अतः इस कारणको असत् नहीं कहा जा सकता ।
इसी तरह उत्पत्तिके पहले कार्य भी सत् ही रहता है। जैसे अविज्ञात
ही घट विज्ञात होता है, वही ज्ञायमान होता है और वही विस्मृत होता है
और फिर उसीका स्मरण भी होता है। इसी तरह सामग्रीके अभावसे या कुड्यादि
दीवाल आदि आवरणसे वर्तमान रहता हुआ भी घट प्रतीत नहीं होता है। पिण्डमें
घट रहता हुआ भी आवृत्त होनेसे उपलब्ध नहीं होता। जैसे एक ही आकाशमें चन्द्र
प्रकाश सौर्य प्रकाशसे आवृत्त होता है, एक ही घटमें नीर क्षीरसे आवृत्त होता है,वैसे
ही एक देशस्थ ही घट पिण्डसे आवृत्त रहता है। एक ही मिट्टीमें पिण्ड आदि
सहस्रों कार्य हैं, जिसकी अभिव्यक्तिकी सामग्री उपस्थित होती है, वही
अभिव्यक्त होता है, अन्य आवृत्त रहते हैं। इस तरह पिण्डसे घट, घटसे कपाल,
कपालसे घट आदि आवृत्त होते हैं।
लोकमें अनेक ढंगसे अभिव्यक्ति होती है, दीपसे रूपकी अभिव्यक्ति
होती है । दण्ड, चक्र, कुलालादिसे घट अभिव्यक्त होता है। जैसे दीपसे
आवरणनाशके अतिरिक्त घट सप्रकाश बनाया जाता है, वैसे ही कुलालादि-
द्वारा आवरणभङ्गके साथ घटाभिव्यक्ति हो जाती है । इसीलिये शिलाघातसे
पिण्ड-भङ्ग होनेपर भी कुलालादि बिना घटकी अभिव्यक्ति नहीं होती।

जैसे अज्ञानताकी निवृत्तिके लिये प्रमातालोग प्रमाणका उपादान करते हैं,
प्रमाणके सम्बन्धसे प्रमेयकी अज्ञातता नष्ट होती है, प्रमातामे प्रमाणकी अभिव्यक्ति
होती है। निष्पन्न प्रमाण प्रमेयमे सङ्गत होकर उसी तरह प्रमेयाकार हो जाता है,
जैसे कुल्या ( नहर ) का जल नालियोद्वारा क्षेत्रमे जाकर क्षेत्राकार हो जाता है,
प्रमाणके प्रमेयाकार होनेसे अज्ञानताके नष्ट होनेसे प्रमेयकी अभिव्यक्ति होती है।
इसी तरह दीपप्रकाशसे घट सप्रकाश होता है। वही घटनिष्ठ प्रकाश घटनिष्ठ तम-
का अपनোদন करता है। इसी तरह मृत्तिकामें स्थित घटाकार दण्ड-चक्रादिसे
स्फुट होता है। शिलादिसे पिण्डभङ्ग होनेपर दूसरे चूर्णादि कार्य सम्पन्न हो जाते
हैं, वे भी घटके आवरण ही हैं, अतः घटकी अभिव्यक्ति नहीं होती ।
इसीलिये भिन्न-भिन्न घटादि कार्योंकी अभिव्यक्तिके साधन नियत हैं ।
प्रागभाव, प्रध्वंसाभाव आदि भी अन्योन्याभावके तुल्य ही भावरूप हैं ।
जैसे घटान्योन्याभाव घटरूप ही है वैसे ही प्रागभाव पिण्डरूप है। प्रध्वंसाभाव
कपालादिरूप है। भावान्तर ही किसी दृष्टिसे अभाव कहा जाता है—'भावान्तर-
मभावो हि कयाचित्तु व्यपेक्षया ।'
जो प्रागभाव, प्रध्वंसाभावको शून्य ही कहता है, उससे यह भी प्रश्न
होगा कि उन दोनोंमें भेद है या नहीं ? यदि कहा जाय कि भेद नहीं है, तो भेद-
व्यवहार क्यों है ? अगर भेद है तो उन दोनोंका भेदक क्या है ? अगर विलक्षण
स्वरूपको ही भेदक कहे तो भी ठीक नहीं, क्योंकि शून्यमात्रमें विलक्षणस्वरूपता
क्या हो सकती है ? विलक्षणस्वरूपता हो तो शून्यता भी कैसी होगी ? शून्यके
साथ उपाधि सम्बन्ध भी नहीं बन सकता, अतः औपाधिक भेद भी नहीं कहा जा
सकता । 'घट-प्रागभावकी पिण्ड ही उपाधि है' ऐसा कहें, तो उसमें प्रमाण बतलाना
पडेगा। यदि प्रत्यक्ष-प्रमाण कहें, तो भी ठीक नहीं, कारणरूप तथा स्पर्शहीन प्राग-
भावके साथ चक्षु आदिका सम्बन्ध सम्भव नहीं है। अतः प्रत्यक्ष नहीं कहा जा
सकता। यदि पिण्डके दर्शनसे ही प्रागभावका दर्शन मानें, तब तो प्रागभावके भाव
रूप माननेसे ही सब काम चल ही सकता है। 'स्वरूपपररूपाभ्यां नित्य सद्सदात्मकम्'
इस दृष्टिसे अभाव या असत्‌से जगत् या कार्यकी उत्पत्ति असङ्गत है, किंतु स्व-
प्रकाश चेतन ब्रह्मसे ही पूर्वोक्त युक्तियोमे जगत्‌की उत्पत्ति सङ्गत है ।
इसी तरह अचेतन अदृष्ट आदि भी चेतनके बिना कर्मके कारण नहीं हो
सकते । परमाणु यदि सावयव हैं, तब तो वे भी कार्य एवं अनित्य ही होंगे । उनकी
उत्पत्तिमें कारणान्तर ढूँढना पड़ेगा । यदि निरवयव हैं, तब तो उनका दूसरे
परमाणुओंसे संयोग होनेपर परिमाणवृद्धि न होगी, क्योंकि एक देशसे संयोग होनेपर
तो संयोगसे अव्याप्त देशोद्वारा प्रथिमा ( विस्तार ) हो सकता है । परन्तु इस
दशामें सावयवत्व, अनित्यत्वादि-दोष होते हैं । निरवयवका तो सम्पूर्णरूपसे ही

अव्यवधानेन संयोग मानना होगा तथा च एक दूसरेहीमें समा जायेंगे, वृद्धिकी
कोई आशा नहीं होती। इसके अतिरिक्त ससारमें प्रदेशवाले पदार्थोंका ही संयोग
होता है, फिर निष्प्रदेश, निरवयव परमाणुओंका संयोग भी कैसे होगा ? इसी तरह
परमाणुओंको प्रवृत्तिस्वभाव, निवृत्तिस्वभाव, उभयस्वभाव या अनुभयस्वभाव
मानना पड़ेगा, परंतु इनमें कोई पक्ष ठीक नहीं है। प्रवृत्तिस्वभाव है, तब तो नित्य
ही प्रवृत्ति होनेसे वस्तुनाशरूप प्रलय नहीं होगा। निवृत्तिस्वभाव होनेसे कभी
सृष्टि न होगी। विरोधात् उभयस्वभाव भी नहीं कहा जा सकता । अनुभयस्वभाव
कहेंगे तब तो दूसरे किसी निमित्तसे उनकी प्रवृत्ति माननी पड़ेगी, फिर वहीं सर्वज्ञ
चेतन अपेक्षित होगा।
इसके अतिरिक्त लोकमें रूपादिमान् वस्तु अपने कारणकी अपेक्षा स्थूल
एवं अनित्य होती है। जैसे पट तन्तुओंकी अपेक्षा स्थूल एवं अनित्य होते हैं।
अंशुओंकी अपेक्षा तन्तु स्थूल तथा अनित्य होते हैं। परमाणु भी यदि रूपादिमान्
हैं, तो उनका भी कारण होना चाहिये और उसकी अपेक्षा उनमे स्थूलता एवं
अनित्यता भी होनी चाहिये।
इसके अतिरिक्त यह भी देखा जाता है कि गन्ध, रस, रूप, स्पर्श गुण-
संयुक्त पृथ्वी स्थूल है। तदपेक्षया रूप, रस, स्पर्श गुणसंयुक्त जल सूक्ष्म है। इसीप्रकार
रूप, स्पर्श गुणवाला तेज एवं स्पर्श गुणवाला वायु और भी सूक्ष्म है। तद्वत्
पृथिव्यादि परमाणुओंमें सूक्ष्मता, स्थूलताका तारतम्य होना चाहिये। यदि गुणोंकी
अधिकतासे पृथ्वी, जल परमाणुमें मूर्तिवृद्धि होगी, तब फिर वे परमाणु ही क्या
रहेंगे ? जब कार्योंमें गुणोंके उपचयसे मूर्तिवृद्धि होती है तो परमाणुमें भी गुणो-
पचयसे मूर्तिवृद्धि क्यों न होगी ? यदि परमाणुओंमें गन्धादिगुण न मानें तो उनके
कार्योंमे ही गन्धादि कहाँसे आयेंगे ? क्योकि कारण गुण ही कार्यगुणोंके आरम्भक
माने जाते हैं। यदि सबमे एक ही गुण माने जायँ, तब तो पृथ्वीमें रस, जलमें रूप,
तेजमे स्पर्श नही उपलब्ध होने चाहिये। यदि समताके लिये सभीको गन्धादि
चारों गुणोंसे युक्त मानेंगे, तब तो जलसे भी गन्ध एवं तेजमें भी गन्ध, रस उपलब्ध
होने चाहिये। वायुमें भी रस-गन्धका उपलम्भ होना चाहिये, परंतु ऐसा होता
नहीं। द्रव्य एवं गुण यदि अत्यन्त भिन्न हों, तो जैसे पुष्प-पलाशादि भिन्न हैं,
स्वतन्त्र हैं, वैसे ही गुण भी द्रव्यसे पृथक् स्वतन्त्र होने चाहिये। परंतु यहाँ तो
गुण द्रव्य-परतन्त्र ही होता है। द्रव्यके साथ-साथ सहभाव होनेसे द्रव्यमात्र ही गुण
है, यही मानना ठीक है। धूम, अग्निके समान-द्रव्य-गुणमें भेद नहीं प्रतीत होता-
इसी प्रकार कर्म, सामान्य, विशेष, समवाय भी द्रव्य ही है।
जैसे एक ही देवदत्त विभिन्न सम्बन्धिरूपोंकी अपेक्षासे मनुष्य, ब्राह्मण,
क्षत्रिय, बाल, युवा, वृद्ध, पिता, पुत्र, पौत्र, भ्राता या जामाता आदि रूपसे कहा

जाता है, जैसे एक ही अङ्क स्थानविशेषके योगसे दस शत, सहस्र आदि शब्दोंसे
व्यवहृत होता है ।
विचार करनेपर कारणसे भिन्न होकर कुछ नहीं होता । मिट्टीसे भिन्न होकर
घटादि पदार्थ उपलब्ध नहीं होते । जन्मके पहले प्रध्वंसके पश्चात् कार्यकी उपलब्धि
नहीं होती, अन्तःकरणसे भिन्न उनकी सत्ता नहीं होती । सद्बुद्धि तथा असद्बुद्धि-
दोनों ही सर्वत्र उपलब्ध होती हैं । जिस विषयकी बुद्धि कभी भी व्यभिचरित नहीं
होती, वही सद्बुद्धि और जिस विषयकी बुद्धि व्यभिचरित होती है, वह असद्बुद्धि
होती है। 'नीलम् उत्पलम्' के तुल्य 'सन् घटः, सन् पटः, सन् हस्ती', इसी तरह सन्-
सन् सर्वत्र घटादिमें सद्बुद्धि बनी रहती है। घटादि बुद्धि व्यभिचरित होती है, अतएव
घटादि बुद्धिके विषय घटादि असत् हैं, क्योंकि उसका व्यभिचार होता है ।
सद्बुद्धिका विषय सत् है, क्योंकि उसका व्यभिचार नहीं होता ।
कहा जा सकता है कि घट नष्ट होनेपर तो घटबुद्धि व्यभिचरित (बाधित)
हो ही जाती है, परन्तु यह कहना ठीक नहीं, कारण पटादिमें सद्बुद्धि रहती ही
है । 'सन् घटः' 'सन् पटः' इस रूपसे घट, पट विशेष्यरूपसे, सन् विशेषण रूपसे प्रतीत
होता है । घटके नष्ट हो जानेपर विशेष्य न रहनेपर विशेषणबुद्धि नहीं होती । जैसे
गो व्यक्ति न रहनेपर अभिव्यञ्जक न रहनेसे गोत्वकी प्रतीति नहीं होती, यह
नहीं कि गोत्व नहीं रह गया । वैसे ही गोत्वके समान सत्‌के विद्यमान होते हुए
भी अभिव्यञ्जकविशेष्य घटादि न रहनेपर सत् प्रतीत नहीं होता । इसीलिये यह
भी नहीं कहा जा सकता कि जैसे घट नष्ट होनेपर पट आदिमें सद्बुद्धि बनी
रहती है, वैसे ही घटबुद्धि भी घटान्तरमें बनी रहती है, क्योंकि भले घटान्तरमें
घटबुद्धि बनी रहे, परन्तु फिर भी पटादिमें तो घटबुद्धिका व्यभिचार है ही,
परन्तु सद्बुद्धिका तो कहीं भी व्यभिचार नहीं होता ।
कहा जा सकता है कि घट नष्ट हो जानेपर उसमें सद्बुद्धि भी नहीं
रहती, परन्तु यह कहना ठीक नहीं, क्योंकि विशेष्य न रहनेसे सद्बुद्धि नहीं होती ।
सद्बुद्धि विशेषणविषया होती है, विशेष्य नहीं होनेसे विशेषणता नहीं बनती । फिर
सद्बुद्धि कैसे हो सकती है ? यह नहीं कहा जा सकता कि सद्बुद्धिका विषय सत्
रहा ही नहीं, इसलिये सद्बुद्धि नहीं रहती ।
यहाँ यह शङ्का होती है कि घटादि विशेष्य असत् हैं, तो उसके साथ सत्-
का सामानाधिकरण्य नहीं होना चाहिये ? परन्तु इसका समाधान यह है कि जैसे
रज्जु-सर्पके सम्बन्धमें सर्पके बाधित होनेपर भी इदमंशके साथ 'अयं सर्पः' सामाना-
धिकरण्य-व्यवहार होता है । इसी तरह घटादिके असत् होनेपर भी 'घटः सन्, पटः
सन्' इस रूपसे अबाधित सत्‌के साथ असद् घटादिका सामानाधिकरण्य व्यवहार
बन जाता है ।
मा० रा० ३१—

४८२ मार्क्सवाद और रामराज्य

पूँजीका स्वरूप

कहा जाता है कि 'अर्थशास्त्रके क्षेत्रमे पूँजी स्वयं उदाहरण है। वह धनका
एक निम्नतम परिमाण है, जिसके रहनेपर ही उसका स्वामी पूँजीपति कहला
सकता है। मार्क्सने उद्योगकी किसी शाखाके एक श्रमिकका उदाहरण लिया है,
जो आठ घंटेतक अपने लिये अर्थात् अपनी मजदूरीका अर्थ उत्पन्न करनेके लिये
श्रम करता है और चार घंटे अतिरिक्त अर्थ पैदा करनेके लिये जो उसके मालिक-
की जेबमे जाता है। इस विशेष दृष्टान्तमें यदि पूँजीपति अपने अतिरिक्त अर्थके
द्वारा मजदूर-श्रेणीका जीवन भी बिताना चाहता है तो उसके पास इतना धन
होना चाहिये कि वह दो मजदूरोंके लिये मजदूरी, कच्चा माल तथा उत्पादनके
साधनोका बदोबस्त कर सके। लेकिन पूँजीपतिका उद्देश्य केवल जीना नहीं है,
बल्कि अपनी सम्पत्तिकी वृद्धि करना है। इसलिये इस धनका मालिक अभी
पूँजीपति नहीं है। अब यदि पूँजीपतिको मजदूरसे दुगुना अच्छा जीवन व्यतीत
करना है और अतिरिक्त अर्थका आधा कारोबारमें फिर डालना है तो उसे आठ
मजदूरोको काममे लगाना चाहिये और पहले अर्थ-संग्रहका चौगुना कारोबारमें
लगाना चाहिये। अब यह अर्थसंग्रह पूँजीका आकार ले लेता है। इस प्रकार अर्थ-
संग्रहका परिमाण बढते-बढते एक सीमापर वह पूँजीके रूपमें परिणत हो जाता है।'
परन्तु यह कहना ठीक नहीं, कारण, मार्क्सका अतिरिक्त श्रम और अतिरिक्त
मूल्यकी कल्पना ही निराधार है, इसका विवेचन पीछे हो चुका है। यह भी
कहा जा चुका है कि व्यापार या उद्योगद्वारा धनार्जनका तरीका ही इस प्रकार-
का होता है जिसमे बुद्धिमानीसे एक मृतमूषिकोद्धारा भी कोटिपति बन जा सकता
है। मार्क्सके मतानुसार उत्पादन-साधन ही पूँजी है, उसकी मात्रा अल्प हो या बड़ी।
इसीलिये किसानोके खेत भी उत्पादन-साधन हैं। इस दृष्टिसे किसान भी पूँजीपति
रहते हैं।
समाज-विज्ञानके क्षेत्रमें इस गुणात्मक परिवर्तनकी गवाहीके लिये एंजिल्सने
नेपोलियनको साक्षी माना है। वह कहता है कि 'फ्रांसीसी घुड़सवार, जो नियन्त्रित
सिपाही थे, लेकिन कोई अच्छे घुड़सवार नही थे और मामेलुक जो बहुत अच्छे
घुडसवार थे लेकिन जिनमें नियन्त्रण नही था। उनकी लडाईके सिलसिलेमें
दो मामेलुक आसानीसे तीन फ्रांसीसियोका मुकाबला कर सकते थे। सौ
मामेलुक सौ फ्रांसीसियोके बराबर थे। लेकिन ३०० फ्रांसीसी साधारणतया ३००
मामेलुकोको हरा देते थे। और १ हजार फ्रांसीसी १५ सौ मामेलुकोको हरा
देते थे। पहलेके उदाहरणकी तरह इससे यह स्पष्ट है कि नियन्त्रित सिपाहियोंके
जत्थेके परिमाणके बढ़नेपर उसका किस प्रकार गुणात्मक परिवर्तन होता है और
वह अपनेसे अधिक संख्याकी फौज हरा देता है।'

परन्तु इससे भी यही सिद्ध होता है कि अनियन्त्रण, अनुशासनहीनता अल्प-
संख्यकोंमें इतनी हानिकर नहीं होती जितनी कि बहुसंख्यकोंमें । उसी
प्रकार नियन्त्रणका गुण अल्पसंख्यकोंमें भले कुछ प्रकट हो, किंतु बहुसंख्यकोंमें
अधिकरूपसे फलदायी होता है । नियन्त्रित संघटित समुदाय शक्तिशाली
होता है। तृणादिनिर्मित रज्जु ही इसका दृष्टान्त है । परिणामवादानुसारी सत्-
कार्यवादमें कोई भी विद्यमान ही गुण किसी अवस्थाविशेषमें प्रकट होता है ।
सिकतामें तेल नहीं होता, अतः कभी नहीं व्यक्त होता । तिलमें तेल होता है, अत. वह
कभी प्रकट होता है । वेदान्त-मतानुसार कारणकी अपेक्षा कार्यमें भिन्नता न
होनेपर भी कुछ अनिर्वचनीय गुण भी सिद्ध होते हैं । जैसे मृत्तिकाद्वारा जला-
नयन नहीं होता, फिर भी मृत्तिकानिर्मित घटादिद्वारा जलानयन आदि कार्य
होते हैं । तन्तुद्वारा अङ्गप्रावरण, शीतापनयन नहीं होता, फिर भी तन्तुनिर्मित पट-
द्वारा वह कार्य होता है। आकाशमे स्पर्श नहीं होता, फिर भी तन्निर्मित वायुमें
स्पर्शगुण है, वायुमें रूप नहीं तथापि वायुपरिणामभूत तेजमें रूप गुण उपलब्ध होता
है। इसी तरह एक-एक व्यक्ति या अल्प व्यक्तिमें जो गुण नहीं व्यक्त होते, अधिक-
संख्यक उन्हीं व्यक्तियोंमें वे गुण प्रकट होते हैं । इसी तरह एक या अन्य व्यक्तियो-
में अनियन्त्रणका जो दुष्परिणाम नहीं व्यक्त होता, बहुसंख्यकोंमें वह
दुष्परिणाम स्पष्ट हो जाता है ।

प्रतिषेधका प्रतिषेध

इसी तरह प्रतिषेधके प्रतिषेधका उदाहरण मार्क्सवादी उपस्थित करते हैं
कि 'यदि यवका एक दाना जमीनमें डाला जाय तो गर्मी और नमीके प्रभावसे
इसमे एक विशेष परिवर्तन होता है। इसमेंसे पौधा उगने लगता है। उस दानेके
अस्तित्वका अन्त हो जाता है। उसका प्रतिषेध हो जाता है । उसके स्थानपर
जो पौधा उगता है, वह उस दानेका प्रतिषेध है । वह पौध बढता है, उसमे
फल आते हैं और फिर उसमे यवके दाने उत्पन्न होते हैं, लेकिन इन दानोंके
पकनेके साथ ही उस पौधेका भी अन्त हो जाता है । अब प्रतिषेधका प्रतिषेध
होकर नये यवके दाने हो गये । एक ही दाना नहीं, बल्कि मूल दानेका दस,
बीस या तीस गुना ।'
इसी तरह पतंगोंके सम्बन्धमें उनका कहना है कि 'ये अंडेने निकलते
हैं। उसके प्रतिषेधके बाद ये पतंगे बढकर पूर्ण यौन विकासको प्राप्त होते हैं और
यौन सम्बन्धमे अंडे पैदा होकर मर जाते हैं। प्रतिषेधका प्रतिषेध करके फिर अंडे
पैदा हो गये, एक नहीं अनेक ।'
इस सम्बन्धमें पीछे कहा जा चुका है कि बीज विनाश या बीज प्रतिषेध
अङ्कुरादि कार्यका कारण नहीं है, किंतु बीजके अवयव ही अङ्कुरके कारण हैं,

४८४ मार्क्सवाद और रामराज्य
क्योकि उनका ही अनुवेध कार्यमें होता है। बीजके विनाशका कारण यह है कि
एक उपादान कारणमें एक कार्यकी अभिव्यक्ति होनेपर कार्यान्तरोकी निवृत्ति होती
है। बीज भी एक अवयवोकी ही कार्यावस्था है। अङ्कुररूप कार्यकी अभिव्यक्तिसे
उसकी निवृत्ति आवश्यक है। जहाँ पूर्व कार्यकी निवृत्ति आवश्यक नही है, वहाँ
प्रतिषेधके प्रतिषेधका कोई अर्थ नहीं है। आकाशसे वायुकी उत्पत्ति होती है, फिर
भी आकाश नही निवृत्त होता। वायुसे तेजकी उत्पत्ति होती है, परंतु वायुकी
निवृत्ति नहीं होती। मृत्तिकासे घट उत्पन्न होता है, किंतु मृत्तिकाकी निवृत्ति नहीं
होती। आम्रादि वृक्षोसे फलोकी उत्पत्ति होती है, परंतु वृक्षोका नाश या प्रतिषेध
नहीं होता। मनुष्य-पशु आदिसे ही दूसरे मनुष्य-पशु आदि उत्पन्न होते हैं, परंतु
उत्पादकोका विनाश नही होता। भूतोकी उत्पत्तिका सिद्धान्त यह है कि कारण
व्यापक, सूक्ष्म तथा स्वच्छ एव निर्गुण, निर्विशेष है। कार्य व्याप्य, स्थूल,
अस्वच्छ, सगुण एव सविशेष है। परंतु साख्यमतानुसार कार्यकी विशेषताओंकी
भी अभिव्यक्ति ही होती है, उत्पत्ति नही। अत्यन्त असत्की उत्पत्ति नही होती—
यह बात सत्कार्यवादके प्रसङ्गमे कही जा चुकी है। वेदान्तमतानुसार जो आदिमे
तथा अन्तमें नही होती, मध्यमें प्रतीत होती है, वह वस्तु रज्जु-सर्प आदिके तुल्य
सदसद्विलक्षण अतएव अनिर्वचनीय ही होती है। वह शुक्ति रजतादि मिथ्या
पदार्थोंके समान होनेपर भी सत्य-सी प्रतीत होती है। आदावन्ते च यन्नास्ति वर्तमानेऽपि
तत्तथा। वितथैः सदृशाः सन्तोऽवितथा इव लक्षिताः॥ (माण्डू०का०२।६) परिणाम-
वादमे कारणको कार्याकारतया परिणत होनेके लिये कारणमे आवश्यक विचार होना ही
चाहिये। एतावता अन्तर्विरोध या प्रतिषेध कार्यका कारण नहीं हो जाता। यदि
प्रतिषेध कारण होता तो सर्वत्र वह सुलभ ही, है, फिर कार्योत्पत्तिके लिये कारणोपादान
ही व्यर्थ होगा। यदि प्रतिषेध ही कार्योत्पत्तिका कारण होता तो दग्ध बीजसे भी
कार्योत्पत्ति होनी चाहिये थी, क्योंकि दाहसे भी बीजका प्रतिषेध हुआ ही। हम
स्पष्ट देखते हैं कि कार्यके लिये कार्यार्थी तत्कारणोंका अन्वेषण करते हैं।
वेदान्तानुसार कारण ब्रह्म ही अनिर्वचनीय माया एवं तदंश विभिन्न उपाधियों-
द्वारा कार्याकारेण विवर्तित होता है। अंडे भी पतंगोके फल हैं, प्रतिषेधरूप नहीं।
कहा जाता है कि मूल वस्तुके अन्तर्विरोध ( विध्वंस ) से समन्वयद्वारा
वस्त्वन्तरकी उत्पत्ति होती है—'नानुपमृद्य प्रादुर्भावात्' विनष्ट बीजसे ही अङ्कुर
उत्पन्न होता है। मृतपिण्डके उपमर्दनसे ही घट निर्माण होता है। विनष्ट क्षीरसे
ही दधिका निर्माण होता है। यदि कूटस्थ कारणसे ही कार्य उत्पन्न हो तब तो
अविशेषेण सभीसे सब कार्यकी उत्पत्ति होने लगे। अर्थात् कूटस्थ कारणका यदि
कार्य-जनन स्वभाव है तब तो तत्काल ही उससे कार्य उत्पन्न होना चाहिये,
कालक्षेप न होना चाहिये। यदि कूटस्थ कारणमे कार्यजनक स्वभाव नहीं है, तब
उससे कभी भी कार्य न उत्पन्न होना चाहिये। यदि कहा जाय कि समर्थ होते हुए भी

मार्क्स-दर्शन ४८५
क्रमेण सहकारियोंकी अपेक्षासे ही कार्य उत्पन्न होता है, परन्तु सहकारी कुछ उपकार
करते हैं या नहीं ? यदि नहीं तो वे सहकारी ही क्यों होंगे ? यदि उपकारका आधान
करते हैं तो भी भिन्न या अभिन्न उपकारका आधान करेंगे । यदि उपकार
अभिन्न हैं तब तो वह कूटस्थ कारणका ही स्वरूप ठहरा । फिर कार्यमें विलम्ब
क्यों होना चाहिये ? यदि उपकार भिन्न है, तब तो उस उपकारके होनेपर ही
कार्य होता है, उसके अभावमें कार्य नहीं होता । फिर तो अन्वय-व्यतिरेकसे
उपकार ही कार्यका कारण हुआ । कूटस्थ कारणके रहनेपर भी कार्य नहीं होता,
अतः कूटस्थ उत्पादक नहीं हुआ—
वर्षातपाभ्यां किं व्योम्नश्चर्मण्यस्ति तयोः फलम् ।
चर्मोपमश्चेत् सोऽनित्यः खतुल्यश्चेदसत्फलः ॥
( नैष्कर्म्यसिद्धि एव सर्वदर्शनसंग्रह )
अतः अभावग्रस्तबीज आदिसे ही कार्यकी उत्पत्ति होती है । ब्रह्मात्मवादी
इसका भी खण्डन करते हैं । उनका कहना है कि अभावसे भावकी
उत्पत्ति नहीं हो सकती, यदि अभावसे भाव उत्पन्न हो तब तो अभाव
सर्वत्र सुलभ ही है, फिर कारण-विशेषकी कल्पना व्यर्थ ही होगी । उपमर्दित
बीजोंका अभाव एव शशविषाण दोनो ही समानरूपसे निःस्वभाव हैं । अतः उनके
अभावत्वमें भी कोई भेद नहीं है । फिर बीजमे अङ्कुर, क्षीरसे दधिके उत्पन्न
होनेका नियम व्यर्थ ही है। यदि निर्विशेष अभाव कारण है तब तो शशविषाण,
खपुष्पादिसे भी अङ्कुरादिकी उत्पत्ति होनी चाहिये, परन्तु ऐसा होता नहीं ।
यदि उत्पलमें नीलत्वके तुल्य अभावमे कुछ विशेषता स्वीकृत है तब तो विशेषवान्
होनेसे अभाव भाव ही हो जायगा । विशेष्यवान् होनेसे उत्पल जैसे भाव है, वैसे
ही विशेष्यवान् होनेसे अभाव भी भाव ही हो जायगा । और फिर तो अभाव कार्य
उत्पत्तिका हेतु भी नहीं हुआ, जैसे शशविषाणादि किसीका हेतु नहीं होता ।
इसके अतिरिक्त यदि अभावसे भावकी उत्पत्ति हो तब तो हर एक कार्यमें
अभावका ही अन्वय दिखायी देना चाहिये, परन्तु देखा जाता है कि इसके विपरीत
सभी कार्य भावरूपसे ही उपलब्ध होते हैं । जैसे मृत्तिकासे अन्वित घटादिको
तन्तु आदिका विकार नहीं कहा जाता, किंतु मृत्तिकाका ही विकार कहा जाता है;
वैसे ही भावान्वित कार्य भावके ही विकार हैं, अभावके नहीं ।
जो कहा जाता है 'स्वरूप-उपमर्दके बिना किसी भी कूटस्थ कारणमे कार्य-
की उत्पत्ति नहीं होती, अतः अभावसे भावकी उत्पत्तिका सिद्धान्त ही ठीक है'—
यह कहना भी ठीक नहीं । स्थिर स्वभाववाले सुवर्ण, मृत्तिका आदि स्पष्टरूपमे कार्यमें
प्रत्यभिज्ञात होते हैं, अतः स्थिरभावमें ही कार्य-कारणभाव मानना युक्त है।
बीज आदिका उपमर्द देखा जाता है, इससे उपमृद्यमाना पूर्वावस्था उत्तरावस्थाका
कारण नही है, किंतु अनुपमृद्यमान बीजावयव ही अङ्कुरादिमें अनुगत होकर कारण

४८६ मार्क्सवाद और रामराज्य

होते हैं। असत् खपुष्पादिसे कार्योत्पत्ति नही होती, सत् सुवर्णादिसे कार्योत्पत्ति
देखी जाती है, अतः भावसे भावकी उत्पत्तिका पक्ष ही ठीक है।
कूटस्थ स्थिर कारण ही क्रमवत् सहकारी कारणोंकी अपेक्षासे कार्यकारी
होते हैं। ये सहकारी अनुपकारक नहीं कहे जा सकते, किन्तु इनके द्वारा आहित
उपकार कारणसे न भिन्न है न अभिन्न, किंतु अनिर्वचनीय है। इसलिये कार्य
भी अनिर्वाच्य ही होता है। फिर स्थिरकी अकारणता नहीं कही जा सकती;
क्योंकि कार्यका वही उपादान है—जैसे कल्पित अनिर्वाच्य सर्पका उपादान रज्जु
होती है।
यदि अभावसे ही भावकी उत्पत्ति होती है तब तो उदासीन, अनीहमान
लोगोंकी भी समीहित सिद्धि होनी चाहिये, क्योकि अभाव तो सभीको सुलभ है।
खेतीके कार्यमे बिना संलग्न हुए भी किसीको सस्यादि प्राप्त होने चाहिये। कुदाल
मृत्तिकादिमें बिना प्रवृत्त हुए भी घटोत्पादन कर सकेगा। तन्तुवाय तन्तुओमे बिना
प्रवृत्त हुए भी वस्त्रलाभ कर लेगा, परंतु यह सब होता नही; अतः भावसे ही
भावकी उत्पत्ति होती है, अभावसे नही।
बीज एवं मृत्तिका-पिण्ड उपमर्द हुए बिना अङ्कुर, बीज आदि उत्पन्न
नहीं होते, अतः अभाव या विनाश ही कार्योंके कारण होते हैं। इस कल्पनाकी
इस पक्षमें अपेक्षा लाघव है। बीज एवं मृत्तिकाको ही कार्योंका कारण माननेमें
नीज या मृत्पिण्डका आकारविशेष कार्यका कारण नहीं है, अतएव अन्वयी
द्रव्य ही कारण होता है। पिण्ड या बीजके आकारविशेषका कार्यमें अन्वय भी
नहीं है। अन्वय बीजावयव एवं मृत्तिकामात्र ही अनुभूत होता है। मृत्तिका
कारण है; क्योकि उसके अभावमें घटका अभाव होता है, परंतु पिण्डादि
आकारके न रहनेपर भी घटकी उपलब्धि होती है। सभी कारण कार्यका उत्पादन
करते हुए अपने पूर्व कार्यका तिरोधान करते हैं, क्योकि एक कारणमें एक कालमे
ही दो कार्य नहीं हो सकते। पूर्वकार्यके उपमर्दसे कारणका स्वरूप नहीं उपमर्दित
होता।
मृत्तिकादिका पूर्व कार्य पिण्डादि हैं, घटादिकी उत्पत्तिके लिये उनका
तिरोधान आवश्यक ही है। कार्यान्तरकी उत्पत्तिके लिये पूर्वकार्यका तिरोधान
आवश्यक होता है, इसलिये पिण्डादिका तिरोधान होता है, इसलिये नही कि कारण
नाश कार्यका हेतु है। असत्कारणवादी कहता है कि पिण्डादिसे भिन्न मृत्तिकादि कुछ
भी नहीं है। यद्यपि कहा जा सकता है कि पिण्डादि पूर्वकार्यके उपमर्दित होनेपर भी
मृदादि कारण नहीं नष्ट हुआ, क्योकि वह घटादि कार्यान्तरमें अन्वित है, परंतु
यह ठीक नहीं; क्योंकि पिण्ड घटादिसे भिन्न मृदादि कारणका उपलम्भ ही नही होता।

मार्क्स-दर्शन ५८७
इसपर वेदान्तीका कहना है कि मृदादि कारणोंसे घटादिकी उत्पत्ति होनेपर
पिण्डादिकी निवृत्ति हो जानेपर भी मिट्टी आदि कारणकी घटादिमें अनुवृत्ति रहती
है। अतः पिण्डादिके विनष्ट होनेपर भी मृदादि कारणका विनाश नहीं हुआ।
असद्वादी कहते हैं कि 'यद्यपि मृत्तिकादि कारण पिण्डादिके नष्ट होनेपर नष्ट हो गया,
घटादिमें मृत्तिकादि कारणका अन्वयदर्शन कारणकी अनुवृत्तिसे नहीं, अपितु
सादृश्यके कारण है। पिण्डगत मृत्तिकासे घटगत मृत्तिका भिन्न है, फिर भी सादृश्य-
के कारण अभेद प्रतीतिसे अन्वयदर्शन-सा होता है।' परंतु यह कहना ठीक नहीं;
क्योकि पिण्डादिगत मिट्टी आदिकोंके अवयवोंका ही घटादिमें प्रत्यक्ष अनुभव
होता है । अतः पिण्डगत मृत्तिकासे घटगत मृत्तिका भिन्न है—यह प्रत्यक्ष नहीं
है, किंतु 'यत् सत् तत् क्षणिक यथा दीपं सन्तञ्चेमे भावाः' जो सत् है वह क्षणिक
होता है जैसे दीप, और सभी पदार्थ सत् हैं; अतः वे क्षणिक होने चाहिये । इस
अनुमानसे मृदादिकारणोंकी भी क्षणिकताका अनुमान करके ही भेद सिद्ध किया
जा सकता है। परंतु 'सैवेयं मृत्तिका' वही यह मिट्टी है—इस प्रकारकी प्रत्यभिज्ञा
प्रत्यक्ष पहचानसे विरुद्ध होनेके कारण यह अनुमान अग्निके अनुष्णत्वानुमान-
के समान अनुमानाभास है।
कहा जा सकता है कि 'प्रत्यक्ष-प्रमाणसे कारणकी एकता प्रतीत होती है
और अनुमानसे भेद प्रतीत होता है, अतः जैसे प्रत्यक्षसे विरुद्ध होनेके कारण अनुमानको
अनुमानाभास कहकर अप्रमाण घोषित किया जाता है, वैसे ही अनुमानविरुद्ध
प्रत्यक्षको ही प्रत्यक्षाभास कहकर अप्रमाण क्यों न घोषित किया जाय ?' परंतु यह
नहीं कहा जा सकता, क्योंकि अनुमान प्रत्यक्षपूर्वक ही हुआ करता है, अतः अनु-
मानद्वारा प्रत्यक्ष न होनेसे प्रत्यभिज्ञासिद्ध प्रत्यक्षका विरोध उपजीव्यविरोध
ठहरता है। इसलिये अनुमान दुर्बल है। अन्यथा यदि अनुमानसे प्रत्यक्ष बाधित
होगा तब तो सर्वत्र ही अनाश्वास होगा।
कहा जा सकता है कि प्रत्यभिज्ञा स्वार्थमें स्वतःप्रमाण नहीं हो सकती, किंतु
दूसरी बुद्धियोंके संवादसे ही उसका प्रामाण्य हो सकता है, परंतु स्थायित्व-साधक
दूसरी कोई बुद्धि नहीं है, अतः 'प्रत्यभिज्ञासिद्धः प्रत्यभिज्ञायमानः' अर्थ भी क्षणिक
ही है। परंतु यह भी कहना ठीक नही, क्योकि इस तरह तो अनुमान-सिद्ध
क्षणिकत्वबुद्धि भी स्वार्थमे स्वतः प्रमाण न होनेसे उसे भी तादृग् दूसरी बुद्धिकी
अपेक्षा होगी। उस दूसरी बुद्धिको भी अपने प्रामाण्यके लिये तादृक् तीसरी
बुद्धिकी आवश्यकता होगी—इस तरह अनवस्था प्रसङ्ग होगा। अतः प्रत्यभिज्ञाके
प्रमाण-बुद्धिका स्वतः प्रामाण्य ही अङ्गीकार करना ठीक है। इस दृष्टिसे प्रत्यभिज्ञान
भी स्वतः प्रमाण है।
जो कहते हैं कि प्रत्यभिज्ञा भी सादृश्यके कारण भ्रमरूप है। 'त एवेमे केशाः'
—ये वही बाल हैं, इत्यादिस्थलोमे बालोकी भिन्नता रहनेपर भी सादृश्यके कारण

अभिन्नता प्रतीत होती है, उसी तरह 'सैवेयं मृत्तिका' वही यह मिट्टी है, इत्यादि
स्थलोंमें भी सादृश्यके कारण ही अभेदकी प्रत्यभिज्ञा होती है, उनका कथन भी
ठीक नहीं; क्योकि एक स्थायी अनुभविता न होनेसे पूर्वोत्तर कालवर्ती तत्पदार्थएव
इदं पदार्थका ग्रहण ही नहीं होगा । उनके ग्रहण हुए बिना 'तेनेद सदृशम्' यह
सादृश्य-बुद्धि ही नहीं होगी । फिर सादृश्य-बुद्धिमूलक भी प्रत्यभिज्ञाको कैसे
कहा जा सकता है ? कोई भी क्षणिक बुद्धि या क्षणिक द्रष्टा भिन्न कालवर्ती पदार्थोंको
नहीं ग्रहण कर सकता । इस सम्बन्धमें विज्ञानवादी बौद्धोंका कहना है कि बाह्यार्थके
बिना ही बुद्धियाँ उत्पन्न होती हैं, अतः सादृश्य बिना ही अर्थात् असत् सादृश्यमें
ही सादृश्य-बुद्धि होती है । परंतु इस तरह तो तत् पदार्थ और इद पदार्थकी
बुद्धि भी सादृश्य-बुद्धिकी तरह ही असद्विषयक ही समझी जायगी । यदि कहा
जाय कि ऐसा भी अभीष्ट ही है अर्थात् विज्ञानवादी बाह्य अर्थका अस्तित्व ही
नहीं अङ्गीकार करता । अतः सभी बुद्धियाँ बाह्य विषयके बिना ही उत्पन्न होती हैं
तो यह भी ठीक नहीं, क्योकि फिर तो बुद्धि, बुद्धि भी असद्विषयक ही होगी ।
अतः बाह्य अर्थके समान ही आन्तर अर्थ ( बुद्धि ) का भी असत्त्व सिद्ध हो
जायगा । यद्यपि शून्यवादी इसे भी अभीष्ट ही मानता है, तथापि यदि सर्वबुद्धि
मिथ्या ही हो तो असद्बुद्धि भी मिथ्या हो जायगी । फिर तो असत् या शून्यकी
सिद्धि भी असम्भव ही होगी । इसलिये सादृश्य-बुद्धिसे प्रत्यभिज्ञा होती है—यह
कहना गलत है । तथा च कार्योत्पत्तिके पहले कारणका सद्भाव सिद्ध होता है ।
संसारमें तम आदिद्वारा प्रावृत घटादि वस्तु आलोकादिके द्वारा प्रावरण तिरस्कार-
से अभिव्यक्त होती है । अतः अभिव्यक्तिके पहले भी उसका अस्तित्व होता है।
उसी तरह घटादि कार्य भी कारण-व्यापारद्वारा आवरण तिरस्कारसे अभिव्यक्त
होता है । अतः अभिव्यक्तिके पहले भी उसका अस्तित्व मान्य होना चाहिये ।
जैसे अविद्यमान वस्तु सूर्योदय होनेपर भी उपलब्ध नहीं होती, उसी तरह कार्य
यदि उत्पत्तिके पहले अविद्यमान होता तो कारक-व्यापारसे भी उसकी अभिव्यक्ति
सर्वथा असम्भव ही होती ।
कहा जा सकता है कि सत्कार्यवादीके मतानुसार यदि घटादि कार्य कभी
भी अविद्यमान नहीं है, तब तो सूर्योदय होनेपर उसका सदा ही उपलब्ध होना
चाहिये, किंतु यह ठीक नहीं; क्योकि आवरण दो प्रकारके होते हैं—जैसे अभिव्यक्त
घटका तम आदि आवरण है, उसी प्रकारसे अभिव्यक्तिके पहले अनभिव्यक्त घटका
आवरण है मृदादि अवयवोका पिण्डादि कार्यान्तररूपसे संस्थान । इसलिये जबतक
मृदादि अवयवोंकी पिण्डादि कार्यान्तररूपसे स्थिति रहती है, तबतक अर्थात् उत्पत्ति-
के पहले घटादि कार्य उसी आवरणसे आवृत्त होनेके कारण उपलब्ध नहीं होते ।
उसी आवरणके भङ्ग होनेसे घटादि कार्योंकी उत्पत्तिका व्यवहार होता है । जैसे
तम हटनेसे घटादिके व्यवहारका भाव होता है, वैसे ही पिण्डादिसे तिरोभूत

रहनेपर अभावका व्यवहार होता है । कपालादिसे तिरोभूत होनेपर घटादिके
नष्ट होनेका व्यवहार हुआ करता है। कहा जा सकता है कि पिण्ड-कपालादि
घटादिके समान देशवाले होनेके कारण आवरण नहीं हो सकते, क्योंकि तम और
कुड्यादि (दीवार) आवरण घटादिसे भिन्न देशवाले होते हैं अर्थात् आवृतके देशसे
भिन्न देशवाला ही आवरण होता है, परंतु पिण्ड-कपाल आदि तो सर्वथा आवृतके
ही देशवाले होते हैं। यह कहना भी ठीक नहीं, क्योंकि क्षीर जलके समान देशमें
रहकर भी जलका आवरक रहता है । समानदेशत्व आवरणका बाधक है—इसका
क्या अभिप्राय है ? एकाश्रयाश्रितत्व या एककारणत्व ? अर्थात् जो दो वस्तु
एक आश्रयमें आश्रित होते हैं उनमें एक दूसरेका आवरक नहीं होता । अथवा
जिन दो वस्तुओंका एक ही कारण होता है उनमें एक दूसरा आवरक नहीं होता। इनमें
पहला पक्ष ठीक नहीं, क्योंकि एकाश्रयाश्रित होनेपर भी क्षीरके द्वारा क्षीरमिश्रित जलका
आवरण होता ही है, तथा दूसरा पक्ष भी ठीक नहीं, क्योंकि कार्यभेदसे कारणका
भेद होता है । अतः घटादिके

४९० मार्क्सवाद और रामराज्य
वह अभाव क्या है ? घटका स्वरूप ही है या अर्थान्तर ? यदि प्रथम पक्ष कहे तो
ठीक नहीं; क्योकि यदि घटस्वरूप ही हो तो घटके द्वारा उसका व्यपदेश कैसे
हो ? अर्थात् अभेदमे घटका प्रागभाव इस रूपसे भेदमूलक सम्बन्ध व्यवहार
कैसे होगा ? यदि कहा जाय कि कल्पित सम्बन्धको ही लेकर व्यवहार बनता है
तो भी यही कहना पडेगा कि कल्पित अभावका ही 'घटस्य प्रागभावः' इस रूपसे
व्यवहार होता है। घटस्वरूपका घटसे व्यपदेश नहीं बन सकता । यदि कहा जाय
कि घटाभाव घटसे अर्थान्तर है तो वह घटसे अर्थान्तर कारणरूप ही हुआ तथा
च घटप्रागभाव घटकारणरूप ही ठहरा ।
अभिव्यञ्जकके व्यापार होनेसे नियमेन घटकी अभिव्यक्ति होती है,
अभिव्यञ्जक व्यापार न होनेसे नहीं । इस तरह अन्वयव्यतिरेकसे घटादि कार्योंके
लिये कुलालादि-व्यापार सार्थक होते हैं । उस व्यापारसे आवरण-भङ्ग आर्थिक
रूपसे हो जाता है । कारणमे वर्तमान एक कार्य इतर कार्योंका आवरक होता है ।
यदि घटादिके पूर्वाभिव्यक्त पिण्डादि

मार्क्स-दर्शन ४९१
उस तरह विकसित बीजमें अन्तर्विरोध, वर्गभेद, वर्गसंघर्ष एवं वर्ग-
विध्वंसरूपी वाद-प्रतिवादके अङ्कुरका फलपर्यन्त विकास होना और उससे पुनः
उसी प्रकार अङ्कुरानन्तररूपी विकासान्तरकी उत्पत्ति यद्यपि किसी अंशमें इष्ट है
तथापि भूतोंकी उत्पत्तिमें यह नियम व्यभिचरित है। आकाशसे वायुकी उत्पत्ति
होती है, फिर भी आकाश बना रहता है। वायुसे तेजकी उत्पत्ति होनेपर भी वायु
नष्ट नहीं हो जाती, इसी प्रकार तेजसे जल एवं जलसे भूमि उत्पन्न होनेपर भी
कारण बने ही रहते हैं। कार्यके विकासान्तर होनेपर प्रथम विकास समाप्त हो जानेका
नियम सर्वथा अदृष्ट है। वृक्षसे फलोंके विकसित होनेपर भी वृक्षोंके नष्ट होनेका
नियम नहीं है। मनुष्य, पशु आदिसे मनुष्य, पशु आदिकी उत्पत्ति होनेपर भी
कारणका विनाश नहीं होता । भूत भी सावयव होनेसे कार्य है। जो-जो भी सावयव
होता है, घटादिके समान कार्य ही होता है। साथ ही जो भी कार्य है, उसे सकर्तृक
एवं सोपादान भी होना चाहिये। कर्त्ता चेतन होता है, इस दृष्टिसे ईश्वरसिद्धि
होती है एवं कार्यकी अपेक्षा उपादान व्यापक, शुद्ध एवं नित्य होता है, इस दृष्टिसे
कार्यकी अपेक्षा कारणकी अनश्वरता, स्वच्छता एवं व्यापकताका ही निर्णय होता
है। इस तरह पृथ्वी जलसे, जल तेजसे, तेज वायुसे एवं वायु आकाशसे उत्पन्न
होता है, यह श्रुतियों एवं युक्तियोंसे सिद्ध है। यहाँ वाद-प्रतिवाद, समन्वय आदिका
सिद्धान्त व्यभिचरित एवं अत्यल्पदेशीय ही सिद्ध होता है।
पाश्चात्त्य वैज्ञानिक कहते हैं 'कि गणितशास्त्रके किसी अङ्क चिह्नको
लीजिये '+क'। इसका प्रतिषेध है '-क'। यदि '-क' से गुणाकर हम इसका
प्रतिषेध करते तो इसका फल होता है 'क²'। प्रतिषेधके प्रतिषेधसे मूल अङ्क फिर
लौट आया, लेकिन और ऊँचे स्तरपर अपने वर्गफलके रूपमें। इसमें कोई हानि-
की बात नहीं है। यही नतीजा क और क के गुणासे भी प्राप्त होता है; क्योंकि
'क²' के वर्गमूलमें सदा दोनो अङ्क रहते हैं 'क' और '-क'। संख्याणुगणितके द्वारा किसी
गणितकी समस्याका हल तो इसका और भी अच्छा उदाहरण है। दो अङ्क चिह्न
'क' और 'ख' ले लीजिये। जिनके परिवर्तनका आपसी सम्बन्ध निर्धारित है।
यानी किसी एकमें परिवर्तन हो तो दूसरेमें परिवर्तनका स्थिरीकरण उस उक्त
सम्बन्धसे हम कर सकते हैं। यदि हम दोनोका प्रतिषेध करें तो घटते-घटते ये
दोनों अङ्क नहींके बराबर हो जाते हैं। लेकिन उनका पूर्व सम्बन्ध ज्यों-का-त्यों
बना रहता है । इसको अङ्कमें हम यों रख सकते हैं । संख्याणु+'क' / संख्याणु+'ख' लेकिन
यह सम्बन्ध बराबर है, क/ख के अत इस प्रतिषेधके द्वारा जब हम उस
समस्याको हल कर लेते हैं, तो हम फिर मूल अङ्कपर उपनीत होते हैं। पूर्व प्रतिषेध
का प्रतिषेध और समस्याका हल हो गया।'

४९२ मार्क्सवाद और रामराज्य
उपर्युक्त उदाहरण भी वस्तुतः प्रतिषेधके प्रतिपेधका नही। धन-ऋणका
बढाव-घटावके रूपमें विरोध होनेसे यद्यपि धनका प्रतिषेध ऋणको कहा जा सकता है,
ऋणके गुणनसे निकलनेवाले फलभूत वर्गफल सख्याको भी प्रतिषेधका प्रतिषेध कहा
जा सकता है। परंतु केवल वह धनके रूपमें ही मूल सख्याके रूपमें है, वस्तुतः
उसका रूप पृथक्-पृथक् है। जैसे अङ्कुर-कारणभूत यवका दाना और अङ्कुरका
फलभूत यवके दाने पृथक्-पृथक् हैं।
संख्यानुगणितका भी उदाहरण, इस सम्बन्धमें अनुकूल नही है। मूलका
प्रतिषेध शून्यवत् ‘क’ अवश्य प्रतिषेधका प्रतिपेध है। उनके निर्धारित परस्पर
सम्बन्धके आधारपर उसके प्रतिषेधसे मूलपर पहुँचते हैं, परंतु यह अपेक्षा-बुद्धि-
की ही कलाबाजी है। इससे प्रतिषेधके प्रतिषेधसे प्रतियोगी सत्त्व-व्यवस्थापन-जैसी
कोई चीज नही निकलती। एक अपेक्षा-बुद्धिमे वही वस्तु पहली या दूसरी, छोटी
या बडी हो सकती है, परंतु वस्तुतः वह विरोधात्मक नही हो सकती।
ऐतिहासिक द्वन्द्ववाद
कहा जाता है कि 'इतिहासके लिये भी यही बात लागू है। सब सभ्य
जातियोका, जो एक निर्दिष्ट अवस्थाको पार कर चुकी हैं। आरम्भ भूमिके
सामूहिक स्वामित्वसे होता है। कृषिके विकासके लिये एक स्तरपर भूमि-
का सामूहिक स्वामित्व उत्पादन-क्रियाके लिये बाधकस्वरूप बन जाता है।
इसका अन्त किया जाता है, इसका प्रतिषेध होता है और कुछ बीचके स्तरोको
पारकर व्यक्तिगत सम्पत्तिमें रूपान्तरित हो जाता है, व्यक्तिगत सम्पत्तिसे ही
कृषिका ऊँचे स्तरपर विकास होता है, लेकिन व्यक्तिगत सम्पत्ति ही आगे चलकर
कृषि-उत्पादनकी क्रियाके लिये बाधकस्वरूप हो जाती है। अब इसके प्रतिषेध-
की और भूमिपर सामूहिक स्वामित्वकी माँग होने लगती है, लेकिन यह मूल-
रूपसे बहुत भिन्न होगा, जिसमें आधुनिक आविष्कारोका पूरा उपयोग किया
जा सकेगा।'
पर यह कहना भी सङ्गत नहीं है। भूमिपर सामूहिक स्वामित्व ऐतिहासिक
नहीं है। ईश्वर-निर्मित भूमि ईश्वरकी थी। बलिकी पत्नी विन्ध्यावलिने भगवान
वामनसे कहा था कि आपने क्रीड़ाके लिये ही जगत्की रचना की है, परंतु दुर्बुद्धि-
लोग उसे अपना समझने लगते हैं। आप सर्वकर्ता हैं, आपहीद्वारा जीवोंमें भी
कर्तृत्व सफल होता है, फिर बलि आदि आपको क्या दे सकते हैं—
क्रीडार्थमात्मन इदं त्रिजगत् कृतं ते
स्वाम्यं तु तत्र कुधियोऽपर ईश कुर्युः ।
कर्तुः प्रभोस्तव किमस्यत आवहन्ति
त्यक्तह्रियस्त्वदवरोपितकर्तृवादाः ॥
(श्रीमद्भा० ८।२२।२०)

ईश्वरके उत्तराधिकारी ब्रह्मा, इन्द्र, मनु आदि हुए। धर्म-नियन्त्रणकी
स्थिति कमजोर पड़नेपर मात्स्यन्याय-निराकरणके लिये जनताने मनुको शासक
बनाया। तदनन्तर विभिन्न व्यक्ति भी व्यष्टिभूमिके ही स्वामी हुए। प्राणियोंका
कर्मद्वारा सृष्टिमें हाथ होता है, कर्मके अनुसार ही और भोग-साधन प्राप्त होते हैं।
हैरण्यगर्भ, मनु आदिको कर्मानुसार समष्टि-भोग साधन मिलते हैं, सामान्य
जीवोंको भी व्यष्टि-भोगसाधन भी कर्मोंके अनुरूप ही मिलते हैं। कोई वस्तु ईश्वर
या प्रकृतिद्वारा निर्मित है, एतावता वह सबकी है—ऐसा नहीं कहा जा सकता।
एक स्त्री भी प्रकृतिद्वारा निर्मित होती है, तो भी उसपर माता-पिताका ही स्वत्व
होता है। पश्चात् उनके द्वारा दिया हुआ स्वत्व पति आदिको मिलता है, या स्वयं
वह जिसे स्वत्व समर्पण करती है, उसे मिलता है।
जिस रूपमें भूमि, आकाशादिपर कभी सामूहिक स्वामित्व था, उस रूपमें
आज भी है ही। भूमिपर सभी प्राणियोंको जीवित रहने, चलने बैठने, श्वास लेने,
अवकाश ग्रहण करनेका अधिकार सदा मिला, आज भी है। परंतु विशिष्ट-
रूपसे भूमिका स्वामित्व भूमिपतिका ही है। भूमिपतिद्वारा दिया हुआ सीमित भूमि-
पतित्व अन्यलोगोंको भी प्राप्त हुआ। इसीलिये भूमिकर देनेकी प्रथा है।
यह कोई भी व्यवस्था सर्वथा आगन्तुक एव नवीन नहीं है। व्यक्तिगत सम्पत्तिसे
ही कृषिका जैसे ऊँचे स्तरपर विकास हुआ, इसी प्रकार आगे भी व्यक्तिगत
भूमिका अपहरण किये बिना उसका उच्चतम विकास हो सकता है।
अमेरिका आदिमें भी वैसा ही विकास हो रहा है। बड़े कामोंके लिये
सहकारिताके आधारपर सम्भूयोत्थान (सम्मिलित कृषि, व्यापारादि) पहले भी
होता था, यह अन्यत्र दिखाया गया है, वैसे ही अब भी हो रहा है, आगे
भी हो सकेगा। अतः भूमि, सम्पत्ति आदिका अपहरण प्रतिषेधके प्रतिषेधका
तदाहरण नहीं हो सकता है।
उन्नत साधनोंसे फलमें उन्नति होती है। इस दृष्टिसे जब भी पहले या पीछे
उन्नत साधन होते हैं तब कृषि उन्नत होती है। आज भी जहाँ उन्नत साधन
नहीं मिलते, वहाँ खेतीका वही निम्नरूप है। अनेक स्थानोंमें आज भी सामूहिक
खेतियोंसे व्यक्तिगत खेतियाँ उच्चकोटिकी होती हैं। दूसरी दृष्टिसे अन्न, फल
आदिकी उत्पत्ति और अच्छाई तथा मात्रा पहले बहुत अच्छी थी, अब कम
अच्छी है। जिन खेतोंमें पहले बीस मन अन्न पैदा होता था, उनमें आज पाँच मन
भी उत्पन्न नहीं होता। पशुओं, मनुष्योंकी भी जैसी बुद्धि, शक्ति, आकार, बल-
पराक्रम हजारों वर्ष पहले था, उससे आज ह्रास ही है। मनुष्योंके पुराने अस्थिपञ्जर
तथा प्राचीन तलवारों और भालोंके बृहत् आकार इसके साक्षी हैं।
समाजवादी कहते हैं कि 'यह बात इतिहाससे सिद्ध है कि पारिवारिक और
वैयक्तिक सम्पत्ति एकत्रित करनेके नियम चलनेसे पहले मनुष्य हजारों वर्षतक श्रेणी-

भेदके बिना आदिम समष्टिवादकी अवस्था में रहा है', पर यह ऐतिहासिक तत्त्व
आधुनिक लोगोंका स्वगोष्ठिनिष्ठ सिद्धान्तमात्र है। संसारके सबसे प्राचीन इतिहास
महाभारत और रामायण हैं, जिनकी बहुत कुछ सत्यता मोहन-जो-दड़ो तथा हरप्पाके
भूगर्भसे मिली हुई वस्तुओसे सिद्ध होती है। उन आर्ष इतिहासों एवं अपौरुषेय
वेदादि शास्त्रोसे सिद्ध है कि न केवल मनुष्योंमें ही किंतु देवताओ, पशुओ, वृक्षोंमें
भी ब्राह्मण आदि भेद सृष्टिकालसे ही है। अवश्य यह श्रेणी-भेद शोषक तथा
शोषितके आधारपर नहीं हुआ, किंतु धर्मके आधारपर ब्राह्मण, क्षत्रिय आदि
श्रेणी-भेद और उसके अनुसार ही श्रौत-स्मार्त धर्म एव जीविकाओंके विधान हुए,
'न वै राज्यं न राजासीन्न च दण्ड्यो न दाण्डिकः' (महा०शा०५९।१४) आदि पूर्वोक्त
सर्वोत्कृष्ट धर्म-नियन्त्रणके युगमें भी धर्म तथा ब्राह्म आदि श्रेणियोंकी सत्ता थी ही।
'पुराकालमे सब ब्राह्मण ही थे, क्षत्रिय आदि न थे। स्त्रियाँ भी विवाहित
न होती थी, सम्पत्ति सामूहिक होती थी।' आदि बाते भी अत्यन्त असङ्गत है।
अनादि सृष्टि-सहारकी परम्परामें मूलभूत धर्मपरम्परा भी अनादि है। तन्मूलक
वर्णाश्रम-धर्म, पातिव्रत्यादि-धर्म भी अनादि ही है। कभी भी उत्पत्ति-क्रममें
कार्योत्पत्तिके पहले कारण ही रहता है, वायुकी उत्पत्तिके पहले आकाश था ही।
क्रम-वर्णनमे क्षत्रिय आदि उत्पत्तिके पहले ब्राह्मण ही थे, विवाह होनेके पहले स्त्रियाँ
आज भी अविवाहित होती हैं। आज भी घट बननेके पहले मृत्तिका ही रहती है,
परंतु इससे ब्राह्मणादि वर्णों तथा विवाहादि धर्मोंकी अनादितामें कोई बाधा नहीं
आती। अतएव इन सबोका उत्पत्ति-क्रम-वर्णनमे ही तात्पर्य है। आकाशसे वायु,
वायुसे तेज एव तेजसे जल तथा जलसे पृथ्वीकी उत्पत्ति होती है। यह कहा जा
सकता है कि पृथ्वी, जलके उत्पत्तिके पहले तेज ही था, तेजसे भी पहले वायु ही
था, वायुसे भी पहले आकाश था और कुछ नहीं था। उसी तरह भगवान्‌की
मुखशक्तिसे ब्राह्मणकी उत्पत्तिके पश्चात् बाहुकी शक्तिसे क्षत्रियकी उत्पत्ति हुई।
अतः उदर या ऊरुसे वैश्य, पादसे शूद्रकी उत्पत्ति हुई। उत्पत्तिक्रममे पौर्वापर्य
होता ही है, उसीमे अभावका व्यवहार होता है। जब कि अनादि वेदोंद्वारा ही
प्रतिकल्पकी सृष्टि होती है और अनादि वर्णाश्रम-धर्मका प्रतिपादन होता है।
अनादि ही पातिव्रत-धर्मका प्रतिपादन है, तब अमुकवर्ण या अमुक धर्म पहले नहीं
था - इत्यादि कल्पनाएँ निराधार एव अप्रमाणित हैं।
जीव ईश्वरके समान ही धर्माधर्म भी अनादि हैं। तदनुसार ही तद्बोधक
शास्त्र एवं तदनुयायी वर्णाश्रम-धर्म भी अनादि हैं। ब्राह्म आदि विवाहोंसे सवर्णामें
उत्पन्न ही ब्राह्मणादि वर्ण हैं, अतः विवाह आदि सभी अनादि हैं। श्वेतकेतु
आदिकी कथाएँ गुणवादसे लक्ष्यार्थमें पर्यवसित हैं, वाच्यार्थमें नहीं। अर्थात् कुन्तीको
देवताओसे सन्तानोत्पादनमे प्रवृत्त करनेके लिये यह अर्थवाद है और अर्थवाद भी

जहाँ प्रमाणान्तरसे विरुद्ध अर्थका प्रतिपादक होता है, वहाँ भूतार्थवाद न होकर
गुणवाद ही होता है अर्थात् उसका वाच्यार्थमें कुछ भी तात्पर्य न होकर प्रशंसा
या निन्दाद्वारा प्रवृत्ति या निवृत्तिमें ही तात्पर्य होता है। सिद्धान्ततः
ह्रास-विकासका चक्र ही सिद्ध है। तदनुसार कभी ब्राह्मणोंकी बहुलता, कभी
शूद्रोंकी बहुलता होती है, अर्थात् कभी ज्ञान-विज्ञानप्रधान मनुष्योंकी बहुलता
होती है, कभी शिल्पादि कर्म-प्रधान मनुष्योंकी—
यथा कृतयुगे पूर्वमेकवर्णमभूत् किल।
तथा कलियुगस्यान्ते शूद्रीभूताः प्रजास्तथा॥
(मत्स्यपुराण अध्याय १४३।७८)
मार्क्सवादी कहते हैं कि 'दर्शनके क्षेत्रमें स्वयं द्वन्द्वात्मक भौतिकवाद ही
एक ऐसा उदाहरण है। पहलेके भौतिकवादका प्रतिषेध हुआ आदर्शवाद, और
इस आदर्शवादका प्रतिषेध हुआ, फिर भौतिकवाद। लेकिन यह भौतिकवाद
यान्त्रिक भौतिकवाद नहीं, बल्कि द्वन्द्वात्मक भौतिकवाद है। दार्शनिक क्षेत्रमे एक
और उदाहरण है, रूसोके समतावादका तथ्य। रूसोके अनुसार प्राकृतिक बर्बर-
युगमें सब मनुष्य समान थे। रूसो भाषाको भी इस प्राकृतिक
अवस्थाका विकार मानता है, उसके अनुसार एक ही जातिके पशुओंके बीचकी
समताको उन पशु-मनुष्योंके लिये भी लागू करना चाहिये जिनको हेकलने एक
आनुमानिक श्रेणीयुक्त किया है, आलालीमूक। लेकिन इन पशु-मनुष्योंको अन्य
पशुओंकी अपेक्षा एक सुविधा थी उन्नतिकी शक्ति और यही असमताका कारण
थी। इसलिये असमतामें भी रूसो उन्नतिका कारण देखता है। लेकिन यह उन्नति
विरोधपूर्ण थी। यह साथ-ही-साथ अवनति भी थी। उन्नतिका मार्ग यही था कि
मनुष्य व्यक्तिगतरूपसे पूर्णताकी ओर कदम बढ़ाता, लेकिन यही कदम मनुष्य-
जातिके लिये अवनतिका भी कदम था। सभ्यताका हर एक कदम असमताकी
ओर अग्रसर होता था। यह निर्विरोध सत्य है और वैज्ञानिक नियमका मूल सत्य
भी है कि लोग सरदारोंको चुनते हैं अपनी स्वतन्त्रताकी रक्षाके लिये न कि उसका
अन्त करनेके लिये। फिर भी ये सरदार अवश्य ही लोगोंको सतानेवाले बन जाते
हैं और यहाँ तक सताते हैं कि यह असमता चरम सीमापर पहुँचकर अपने विपरीत
बन जाती है और समताका कारण बन जाती है, क्योंकि निरङ्कुश शासकके सामने
सब समान हैं, सब शून्य हैं। लेकिन यह शासक तभीतक प्रभु है जबतक वह
जबरदस्त है और जब वह निकाला जाता है तब जबरदस्तीकी शिकायत नहीं कर
सकता। शक्ति ही उसकी प्रभुता बनाये रखती है। अन्तमें शक्तिसे ही उसका पतन
होता है। सब प्राकृतिक और सही रास्तेपर ही चलते हैं। इस प्रकार असमता
फिर एक बार समतामें रूपान्तरित हो जाती है। लेकिन यह मूक प्राथमिक मनुष्य-
की प्राकृतिक समता नहीं है, यह समाजकी उन्नत समता है। सतानेवाले सताये-
जानेवाले हो जाते हैं, प्रतिषेधका प्रतिषेध हो जाता है।'

उपर्युक्त कथन भी असङ्गत ही है; क्योकि किसी भी शास्त्रार्थमें जब एक
पक्षका खण्डन होता है तब वह दूसरे प्रकारसे अपने खण्डित पक्षका समर्थन करता
है। जैसे द्वैत-अद्वैत पक्षके ही शास्त्रार्थकी बात लीजिये । श्रीमध्वके द्वैतका खण्डन
मधुसूदनने ‘सिद्धान्तबिन्दु’ ग्रन्थके द्वारा किया। उसका खण्डन करके 'न्यायामृत'-
द्वारा पुनः द्वैतका प्रतिष्ठापन हुआ । उसका खण्डन पुनः 'अद्वैतसिद्धि'द्वारा हुआ ।
पुनश्च 'न्यायामृत-तरङ्गिणी'द्वारा उसका प्रतिष्ठापन हुआ, पुनश्च 'गौड़ब्रह्मानन्दी' द्वारा
उसका खण्डन हुआ, 'न्यायभास्कर' द्वारा पुनः प्रतिष्ठापन हुआ । 'न्यायेन्दुशेखर'-
द्वारा पुनः खण्डन होनेपर पुनः प्रतिष्ठापनार्थ प्रयत्न हुआ, परंतु एतावता उनके
पहलेके द्वैत और अद्वैतसे पिछले द्वैत-अद्वैतमे कोई भेद नही हुआ । इसी तरह
जड़वाद एवं भौतिकवादका भले ही सहस्रो बार खण्डन तथा मण्डन हो तथापि
वस्तुत्वमे कोई अन्तर नही पडता । ऐसे प्रतिषेधके प्रतिषेधको प्रतिप्रसव कहा
जाता है । दर्शनशास्त्रोमें सिद्धान्ततः भी इसके उदाहरण मिलते हैं । जैसे
सन्यासका विधान, पुनश्च कलियुगके लिये निषेध, पुनश्च कलिमें भी वर्णविभाग
वैदिकधर्म-प्रवृत्ति-पर्यन्त विधानद्वारा प्रतिषेधके प्रतिषेध होनेसे विधानका
प्रतिप्रसव होता है । यह निर्दोष उदाहरण है । इसी प्रकार व्याकरणकी
दृष्टिसे राम शब्दके प्रथमा या द्वितीयाके द्विवचनमे ‘राम औ’ इस
स्थितिमें ‘वृद्धिरेचि’से वृद्धि प्राप्त होती है । उसका बाधकर ‘प्रथमयोः
पूर्वसवर्णः’ से पूर्वसवर्ण दीर्घ प्राप्त होता है । पुनश्च ‘नादिचि’से उसका बाध होकर
‘वृद्धिरेचि’से वृद्धि हो जाती है । तब ‘रामौ’ शब्द बनता है ।
भौतिकवाद एवं आदर्शवादके तत्त्वोमे कोई भी अन्तर नही है । यह नहीं
कहा जा सकता कि वस्तुतः पहले भौतिकवादका खण्डन हो गया था और अब वह
पुनः सिद्ध ही हो गया है । रूसो हैकेल आदिकोके मनःकल्पित इतिहासकी
अपेक्षा ऋषियोके आर्ष इतिहासका महत्त्व कहीं अधिक है । तदनुसार सृष्टिकालके
वशिष्ठ, अत्रि आदि उच्चकोटिके महामानव थे । उनके धर्म, योग, वेदान्त आदिके
सिद्धान्त आजके सभ्य कहे जानेवाले नरपशुओको दुर्विज्ञेय ही हैं । उनमें जो
आध्यात्मिक समता थी, वह आज भी है ।
विद्याविनयसम्पन्ने ब्राह्मणे गवि हस्तिनि ।
शुनि चैव श्वपाके च पण्डिताः समदर्शिनः ॥
(गीता ५ । १८)
सुहृन्मित्रार्युदासीनमध्यस्थद्वेष्यबन्धुषु ।
साधुष्वपि च पापेषु समबुद्धिर्विशिष्यते ॥
(गीता ६ । ९)
विद्वान् सदा ही सर्वत्र समब्रह्मका दर्शन करता है, यही समता है । शरीर-
बुद्धि या कर्म अथवा उसके फलकी दृष्टिसे न कभी समता थी, न होनेवाली है ।

पशुतुल्य मनुष्य असंस्कृत मूक तभी होता है जब उसका सद्गुरु-सम्बन्ध नहीं
होता । आज भी यह बात स्पष्ट है। जहाँ शिक्षण है, वहाँ ज्ञान-विद्या विकसित
होती है, जहाँ शिक्षण नहीं है, वहाँ विकास नहीं होता । ईश्वरने ब्रह्माको
नियुक्त करके उसे नित्य वेदोंका उपदेश दिया—
यो ब्रह्माणं विदधाति पूर्वं यो वै वेदांश्च प्रहिणोति तस्मै । (श्वेता० उप० ६।१८)
ब्रह्माने सनकादिको एव मरीचि आदिकोको उत्पन्न करके उन्हें वेदादि
शास्त्रोका उपदेश किया है । जिन मनुष्योका प्रमादवश उक्त सम्पर्क टूट गया,
वे ही पशुतुल्य हो गये हैं ।
हान्स, लाक, रूसो आदिकी कल्पनाएँ परस्पर भी टकराती हैं । हान्सके मता-
नुसार 'आदिम प्राणी समताकी स्थितिमे नहीं था, किंतु खूँखार था ।' लाकका
'आदिम मनुष्य बहुत नेक था', रूसोका भी ऐसा ही था । सुकरातके अनुसार
'मनुष्य स्वभावसे ही सामाजिक प्राणी है' इनके अनुबन्धीय राज्यको भी अन्य
दार्शनिक अनैतिहासिक कहते हैं । हैकलका अनुमान केवल उसका दिमागी फितूर
ही है । मनुष्यो एव पशुओके वैषम्यका कारण उनके जन्मान्तरीय कर्म मानने
पड़ेंगे । निर्हेतुक शक्तिवैषम्यकी उपपत्ति हैकलके पास कुछ नहीं है । मनुष्योंमें
भी कर्मतारतम्यसे ही उन्नतिकी शक्तिमें तारतम्य होता है और इसका भी
अन्तिम उद्देश्य है उस आध्यात्मिक स्तरपर समता स्थापित करना, जिससे
अधिक उन्नति हो ही नहीं सकती ।
व्यक्तिगत उन्नतिकी ओर कदम बढाना कभी भी अवनतिका कारण नहीं
होता । व्यक्तिका समुदाय ही समाज है, व्यक्तिगत उन्नतिसे समाजकी उन्नति
सुतरा सम्भव होती है । उन्नति एव सभ्यताका कोई भी कदम अवनतिका
कदम नही है । क्या कोई विद्वान् बलवान् बनता है, एतावता किसीका नुकसान
होता है ? इतनी सहज-सी चीजको आधुनिक सभ्योंने कितने उल्टे रूपमें ग्रहण किया
है ? यदि किसी ऊँचे स्थानपर १०० मनुष्य चढनेके लिये अग्रसर होते हैं और
यदि कुछ आलसियो, दीर्घसूत्रियोंको पीछे छोडकर कुछ लोग आगे बढते हैं तो
स्पर्धासे दूसरे भी आगे बढनेके लिये दीर्घसूत्रता और आलस्य छोड़ेंगे ही । अतः
आगे कदम बढ़ानेसे यदि विषमता होती है, तो यह भी उन्नत स्तरपर समताकी
ओर ले जानेका ही प्रयत्न है ।
मुखिया, सरदार या राजाको सदा ही धर्मनियन्त्रित होना आवश्यक है ।
उच्छृङ्खल होना धर्महीनताका परिणाम है, सरदार या राजा होनेके कारण नहीं ।
धर्महीन राज्योंमें ही उच्छृङ्खल या निरङ्कुश शासन होते हैं, वेन, रावणादि इसके
उदाहरण हैं । मनु, इक्ष्वाकु, नृग, नल, मान्धाता, राम, युधिष्ठिर आदि धर्मनियन्त्रित
राजाओंमें निरङ्कुशताका लेश भी नहीं हो सकता था। समाजवादी ढंगकी समता उच्चकोटि
मा० रा० ३२—