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सर्वकोश
मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished866 पृष्ठ

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पृष्ठ 798

मार्क्स-दर्शन ४८५
क्रमेण सहकारियोंकी अपेक्षासे ही कार्य उत्पन्न होता है, परन्तु सहकारी कुछ उपकार
करते हैं या नहीं ? यदि नहीं तो वे सहकारी ही क्यों होंगे ? यदि उपकारका आधान
करते हैं तो भी भिन्न या अभिन्न उपकारका आधान करेंगे । यदि उपकार
अभिन्न हैं तब तो वह कूटस्थ कारणका ही स्वरूप ठहरा । फिर कार्यमें विलम्ब
क्यों होना चाहिये ? यदि उपकार भिन्न है, तब तो उस उपकारके होनेपर ही
कार्य होता है, उसके अभावमें कार्य नहीं होता । फिर तो अन्वय-व्यतिरेकसे
उपकार ही कार्यका कारण हुआ । कूटस्थ कारणके रहनेपर भी कार्य नहीं होता,
अतः कूटस्थ उत्पादक नहीं हुआ—
वर्षातपाभ्यां किं व्योम्नश्चर्मण्यस्ति तयोः फलम् ।
चर्मोपमश्चेत् सोऽनित्यः खतुल्यश्चेदसत्फलः ॥
( नैष्कर्म्यसिद्धि एव सर्वदर्शनसंग्रह )
अतः अभावग्रस्तबीज आदिसे ही कार्यकी उत्पत्ति होती है । ब्रह्मात्मवादी
इसका भी खण्डन करते हैं । उनका कहना है कि अभावसे भावकी
उत्पत्ति नहीं हो सकती, यदि अभावसे भाव उत्पन्न हो तब तो अभाव
सर्वत्र सुलभ ही है, फिर कारण-विशेषकी कल्पना व्यर्थ ही होगी । उपमर्दित
बीजोंका अभाव एव शशविषाण दोनो ही समानरूपसे निःस्वभाव हैं । अतः उनके
अभावत्वमें भी कोई भेद नहीं है । फिर बीजमे अङ्कुर, क्षीरसे दधिके उत्पन्न
होनेका नियम व्यर्थ ही है। यदि निर्विशेष अभाव कारण है तब तो शशविषाण,
खपुष्पादिसे भी अङ्कुरादिकी उत्पत्ति होनी चाहिये, परन्तु ऐसा होता नहीं ।
यदि उत्पलमें नीलत्वके तुल्य अभावमे कुछ विशेषता स्वीकृत है तब तो विशेषवान्
होनेसे अभाव भाव ही हो जायगा । विशेष्यवान् होनेसे उत्पल जैसे भाव है, वैसे
ही विशेष्यवान् होनेसे अभाव भी भाव ही हो जायगा । और फिर तो अभाव कार्य
उत्पत्तिका हेतु भी नहीं हुआ, जैसे शशविषाणादि किसीका हेतु नहीं होता ।
इसके अतिरिक्त यदि अभावसे भावकी उत्पत्ति हो तब तो हर एक कार्यमें
अभावका ही अन्वय दिखायी देना चाहिये, परन्तु देखा जाता है कि इसके विपरीत
सभी कार्य भावरूपसे ही उपलब्ध होते हैं । जैसे मृत्तिकासे अन्वित घटादिको
तन्तु आदिका विकार नहीं कहा जाता, किंतु मृत्तिकाका ही विकार कहा जाता है;
वैसे ही भावान्वित कार्य भावके ही विकार हैं, अभावके नहीं ।
जो कहा जाता है 'स्वरूप-उपमर्दके बिना किसी भी कूटस्थ कारणमे कार्य-
की उत्पत्ति नहीं होती, अतः अभावसे भावकी उत्पत्तिका सिद्धान्त ही ठीक है'—
यह कहना भी ठीक नहीं । स्थिर स्वभाववाले सुवर्ण, मृत्तिका आदि स्पष्टरूपमे कार्यमें
प्रत्यभिज्ञात होते हैं, अतः स्थिरभावमें ही कार्य-कारणभाव मानना युक्त है।
बीज आदिका उपमर्द देखा जाता है, इससे उपमृद्यमाना पूर्वावस्था उत्तरावस्थाका
कारण नही है, किंतु अनुपमृद्यमान बीजावयव ही अङ्कुरादिमें अनुगत होकर कारण