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मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished866 पृष्ठ

पृष्ठ 792, कुल 866 में से

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पृष्ठ 792

जैसे अज्ञानताकी निवृत्तिके लिये प्रमातालोग प्रमाणका उपादान करते हैं,
प्रमाणके सम्बन्धसे प्रमेयकी अज्ञातता नष्ट होती है, प्रमातामे प्रमाणकी अभिव्यक्ति
होती है। निष्पन्न प्रमाण प्रमेयमे सङ्गत होकर उसी तरह प्रमेयाकार हो जाता है,
जैसे कुल्या ( नहर ) का जल नालियोद्वारा क्षेत्रमे जाकर क्षेत्राकार हो जाता है,
प्रमाणके प्रमेयाकार होनेसे अज्ञानताके नष्ट होनेसे प्रमेयकी अभिव्यक्ति होती है।
इसी तरह दीपप्रकाशसे घट सप्रकाश होता है। वही घटनिष्ठ प्रकाश घटनिष्ठ तम-
का अपनোদন करता है। इसी तरह मृत्तिकामें स्थित घटाकार दण्ड-चक्रादिसे
स्फुट होता है। शिलादिसे पिण्डभङ्ग होनेपर दूसरे चूर्णादि कार्य सम्पन्न हो जाते
हैं, वे भी घटके आवरण ही हैं, अतः घटकी अभिव्यक्ति नहीं होती ।
इसीलिये भिन्न-भिन्न घटादि कार्योंकी अभिव्यक्तिके साधन नियत हैं ।
प्रागभाव, प्रध्वंसाभाव आदि भी अन्योन्याभावके तुल्य ही भावरूप हैं ।
जैसे घटान्योन्याभाव घटरूप ही है वैसे ही प्रागभाव पिण्डरूप है। प्रध्वंसाभाव
कपालादिरूप है। भावान्तर ही किसी दृष्टिसे अभाव कहा जाता है—'भावान्तर-
मभावो हि कयाचित्तु व्यपेक्षया ।'
जो प्रागभाव, प्रध्वंसाभावको शून्य ही कहता है, उससे यह भी प्रश्न
होगा कि उन दोनोंमें भेद है या नहीं ? यदि कहा जाय कि भेद नहीं है, तो भेद-
व्यवहार क्यों है ? अगर भेद है तो उन दोनोंका भेदक क्या है ? अगर विलक्षण
स्वरूपको ही भेदक कहे तो भी ठीक नहीं, क्योंकि शून्यमात्रमें विलक्षणस्वरूपता
क्या हो सकती है ? विलक्षणस्वरूपता हो तो शून्यता भी कैसी होगी ? शून्यके
साथ उपाधि सम्बन्ध भी नहीं बन सकता, अतः औपाधिक भेद भी नहीं कहा जा
सकता । 'घट-प्रागभावकी पिण्ड ही उपाधि है' ऐसा कहें, तो उसमें प्रमाण बतलाना
पडेगा। यदि प्रत्यक्ष-प्रमाण कहें, तो भी ठीक नहीं, कारणरूप तथा स्पर्शहीन प्राग-
भावके साथ चक्षु आदिका सम्बन्ध सम्भव नहीं है। अतः प्रत्यक्ष नहीं कहा जा
सकता। यदि पिण्डके दर्शनसे ही प्रागभावका दर्शन मानें, तब तो प्रागभावके भाव
रूप माननेसे ही सब काम चल ही सकता है। 'स्वरूपपररूपाभ्यां नित्य सद्सदात्मकम्'
इस दृष्टिसे अभाव या असत्‌से जगत् या कार्यकी उत्पत्ति असङ्गत है, किंतु स्व-
प्रकाश चेतन ब्रह्मसे ही पूर्वोक्त युक्तियोमे जगत्‌की उत्पत्ति सङ्गत है ।
इसी तरह अचेतन अदृष्ट आदि भी चेतनके बिना कर्मके कारण नहीं हो
सकते । परमाणु यदि सावयव हैं, तब तो वे भी कार्य एवं अनित्य ही होंगे । उनकी
उत्पत्तिमें कारणान्तर ढूँढना पड़ेगा । यदि निरवयव हैं, तब तो उनका दूसरे
परमाणुओंसे संयोग होनेपर परिमाणवृद्धि न होगी, क्योंकि एक देशसे संयोग होनेपर
तो संयोगसे अव्याप्त देशोद्वारा प्रथिमा ( विस्तार ) हो सकता है । परन्तु इस
दशामें सावयवत्व, अनित्यत्वादि-दोष होते हैं । निरवयवका तो सम्पूर्णरूपसे ही