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मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished866 पृष्ठ

४७२ मार्क्सवाद और रामराज्य
भी क्या होगा ? क्योकि दो सत्‌का ही सम्बन्ध होता है, सत् तथा असत्‌का एवं
दो असत्‌का भी सम्बन्ध नहीं हो सकता । इसके अतिरिक्त अभाव या असत्
निरुपाख्य असत् ही होता है तब उत्पत्तिके प्रथम कार्य असत् था—यह मर्यादा-
करण भी नहीं बन सकता । यह व्यवहार नहीं होता कि अमुक राजाके पहले
वन्ध्यापुत्र राजा था । यदि कारकव्यापारसे वन्ध्यापुत्र, खपुष्प भी उत्पन्न
हो सके तभी यह कहा जा सकता है कि उत्पत्तिके पहले असत् कार्य कारकव्यापारसे
उत्पन्न हुआ है ।
कहा जा सकता है कि जैसे प्रथमसे ही सिद्ध होनेसे कारणकी स्वरूप सिद्धिके
लिये कोई व्यापृत नहीं होता तो उसी तरह यदि कारकव्यापारके पहले भी कार्य
स्वरूप सिद्ध ही हो तो उसके लिये कौन व्यापृत होगा ? कारणसे यदि कार्य
अनन्य ही है, तब कारणके समान ही कार्यके लिये भी कारकव्यापार नहीं होना
चाहिये । परंतु व्यापार देखा जाता है, अतः कारकव्यापारकी सार्थकताके
लिये उत्पत्तिके पहले कार्यका अभाव मानना उचित ही है । किंतु यह
कहना ठीक नहीं है, क्योकि कारणको कार्याकारसे व्यवस्थापन करनेके
लिये ही कारकव्यापार अपेक्षित होता है । वह कार्याकार कारणका आत्म-
भूत ही है; विशेष दर्शनमात्रसे वस्तुभेद नहीं होता । देवदत्त हाथ-पाँव फैलाने या
संकुचित करनेसे भिन्न नहीं हो जाता है; क्योकि ‘स एवायम्’ वही यह है, ऐसी
प्रत्यभिज्ञा (पहचान) होती है । प्रतिदिन ही पिता, माता, भ्राता आदिमें ह्रास-
विकास आदि होते रहते हैं । फिर भी वस्तुभेद नहीं प्रतीत होता; क्योकि पिता-
माता, भ्राताकी एक रूपसे प्रत्यभिज्ञा होती रहती है । यदि कहा जाय कि वहाँ
जन्मका व्यवधान न होनेसे ही अभेद प्रतीत होना ठीक है परंतु कार्य-कारणमें
ऐसा नहीं कहा जा सकता है; क्योंकि यहाँ तो कारण बीज, मृत्पिण्डादिका
नाश एवं अङ्कुर, घटादिकी उत्पत्ति होती है, अतः प्रत्यभिज्ञा नहीं होती ।
किंतु यह भी ठीक नहीं, क्योकि यहाँ भी कारण नाश आदि नहीं अनुभूत
होता । क्षीरादिका दधि आदि रूपसे संस्थान प्रत्यक्ष दिखायी देता है ।
वट-बीजादिसे समान जातीय अवयवोंके उपचयद्वारा अङ्कुर वृक्षादिकी उत्पत्ति एवं
अवयवोंके अपचयसे विनाशका व्यवहार होता है । वस्तुतः कारणका विनाश और
कार्यकी उत्पत्ति यहाँ भी नहीं है । जैसे मृत्पिण्डके अवयव घटमें अन्वित हैं, वैसे ही
वटबीजके अवयव वटबीज भी अन्वित हैं । इस तरहके अवयवोपचय तथा
अवयवापचयसे यदि वस्तुमें भिन्नता हो और इसीसे सत्‌की उत्पत्ति तथा सत्‌का
विनाश हो तो गर्भस्थ तथा पर्यङ्क स्थ शिशुमे भी भेद कहना पड़ेगा, और बाल्य-
यौवनादि शरीरमे भी भेद कहना पड़ेगा; क्योकि अवयवोंका उपचय-अपचय वहाँ
भी देखा ही जाता है। फिर तो पित्रादि व्यवहार भी बाधित होगा । इस तरह सत्कार्य-

-वादमें तो कारणको कार्याकाररूपसे व्यवस्थापन करनेमें कारकव्यापार सार्थक है,
परंतु असत्-कार्यवादमें तो कारकव्यापार सर्वथा निर्विषय हो जायेंगे । जैसे
आकाशके हननके लिये खड्ग् आदिका प्रयोग व्यर्थ है, वैसे ही कार्याभावया असत्में
भी कारकव्यापार व्यर्थ होंगे । कहा जाता है कि समवायी कारणमे अर्थात् तन्तु-
मृत्तिका आदिमें कारकव्यापार होगा, परंतु यह भी ठीक नही, क्योकि अन्यविषयक
व्यापारसे अन्यकी निष्पत्ति असम्भव है । अन्यथा यदि समान ही है तो फिर सिकता-
विषयक व्यापारसे भी पट क्यो नहीं उत्पन्न होता ? जो कहते हैं कि समवायी कारणका
ही आत्मातिशय कार्य है, उन्हे तो सत्कार्यवाद मानना ही पडेगा । अतः क्षीर
आदि द्रव्य ही द्रव्याद्याकारसे अवस्थित होकर कार्य-द्रव्यके रूपमें व्यवहृत होते हैं,
वेदान्तमतानुसार तो मूल कारण परब्रह्म ही घटादि अन्तिमकार्य पर्यन्त उस-उस
कार्यके आकारसे नटवत् सर्वव्यवहारका आस्पद होकर प्रतीत होता है । जैसे
लपेटा हुआ वस्त्र स्पष्ट नहीं दीखता, फैला हुआ स्पष्ट दीखता है, उसी तरह कारणा-
वस्थित कार्य स्पष्ट नहीं उपलब्ध होता, कार्यावस्थित होकर स्पष्ट दीखता है ।
यह भी शङ्का होती है कि लोकमे कुलाल घट आदि कार्योंके लिये मृत्तिका
दण्ड-चक्रादिका सग्रह करते हैं परंतु ब्रह्म विना सामग्री-संग्रहके किस तरह विश्व-
निर्माण कर सकेगा ? परंतु जैसे क्षीर स्वभावसे दधिनिर्माणक्षम होता है, जल हिमरूपसे
परिणत हो जाता है, वैसे ही ब्रह्म भी प्रपञ्चात्मना व्यक्त हो जाता है । यद्यपि औष्ण्य,
शैत्य आदिकी अपेक्षा करके ही क्षीर, नीर आदि दधि, हिम आदि रूपमें परिणत
होते हैं, तथापि इन साधनोसे केवल शीघ्रता-सम्पादन की जाती है । यदि स्वय दधि
आदि बननेकी शक्ति न होती तो बाह्य साधनोसे भी क्षीर आदि दधि आदि नहीं
बन सकते । इसीलिये वायु, आकाश आदिसे दधि नहीं बनता; क्योकि उनमें
दधि बननेका स्वभाव नहीं है ।
जैसे ऋषि, मुनि, देवादि बाह्य साधनोके बिना ही विविध शरीरो एव प्रासाद
आदिका निर्माण कर सकते हैं, तन्तुनाभ (मकडी) बिना बाह्य साधनके तन्तु-निर्माण
करती है, बलाका ( बगुली ) बिना शुक्रके ही घन-गर्जन-श्रवणसे गर्भ धारण करती है,
कमलिनी बिना किसी गमन-साधनके ही दूसरे सरोवरमे पहुँच जाती है, उसी तरह
बाह्य साधन बिना चेतनब्रह्म भी विश्वकी रचना करता है । यद्यपि कहा जा सकता
है कि 'देवाद्दिका अचेतन शरीर ही अन्य शरीरका कारण है। यहाँ अचेतन ही कारण है,
मकडीका मुखलालादि ही कठोर होकर तन्तु बन जाता है, बलाका भी गर्जन-श्रवणसे
गर्भ धारण करती है, यहाँ भी बाह्य निमित्त है ही । इसी तरह पद्मिनी चेतनप्रयुक्त
अचेतन शरीरसे ही दूसरे सरोवरमे जाती है, जैसे लता वृक्षपर आरूढ होती है,
तथापि कुलालादिसे विलक्षणता तो इन कारणोंमें स्पष्ट ही है।
वस्तुतः लक्षण एव प्रमाणसे ही वस्तुकी सिद्धि होती है। जो-जो पदार्थ
प्रमाण-सिद्ध होते हैं, उन्हींका अस्तित्व माना जाता है। विज्ञान आदिके प्रयोग-

द्वारा भी ज्ञान ही सम्पादन किया जाता है । विश्व, राष्ट्र या देहादि प्रपञ्च तथा भूत-
प्रकृति आदि भी प्रतीत होते हैं, प्रमाण-सिद्ध हैं, तभी उनका अस्तित्व माना जाता
है। तथा च जैसे नील, पीत, हरितरूपका प्रकाशक प्रकाशरूपसे प्राक् सिद्ध है, वैसे ही
भूतादिप्रपञ्च, प्रमेय, प्रमाण तथा प्रमाता—इन सबका भी भासक अखण्ड बोधरूप
साक्षी उन सबसे प्रथम सिद्ध है । जडभूतकी सिद्धि तो चेतन साक्षीके परतन्त्र है,
परंतु प्रमाण, प्रमाता या साक्षीको उनकी सिद्धिके लिये किसी जड़की अपेक्षा नहीं
होती । जैसे घटादिके प्रकाशके लिये भले ही सूर्यकी अपेक्षा हो, परंतु सूर्यके प्रकाशके
लिये घटादिकी अपेक्षा नहीं, उसी तरह भूत आदि सिद्धिके लिये प्रमाण, साक्षी
आदिकी अपेक्षा है; परंतु प्रमाण आदिकी सिद्धिके लिये जडभूतादिकी अपेक्षा नही।
संसारमें प्रकाशके सम्पर्कसे या प्रकाशरूप होनेसे 'प्रकाशित होता है,' ऐसा व्यवहार
होता है। प्रकाशः प्रकाशते, घटः प्रकाशते'—ये ही दोनोंके उदाहरण हैं। इसी तरह
स्वप्रकाश चेतनमें सूर्यादिके समान प्रकाश स्वरूप होनेसे 'प्रकाशते'का व्यवहार होता
है। 'प्रपञ्चः प्रकाशते'में 'घटः प्रकाशते'के समान चेतन सम्पर्कसे 'प्रकाशते'का व्यवहार होता
है । इस तरह परतन्त्र एवं अस्वतःसिद्ध जडभूतसे चेतनकी उत्पत्ति माननेकी
अपेक्षा स्वतन्त्र स्वतः सिद्धचेतनसे जडभूतकी सिद्धि कहीं श्रेष्ठ तथा बुद्धिगम्य है ।
भौतिकवादी तथा प्रकृतिवादियोका कहना है कि 'अचेतन प्रपञ्चका अचे-
तन प्रकृति या भूतादि ही कारण हैं, चेतन ब्रह्म या ईश्वर कारण नहीं हो
सकता । जैसे घट आदि कार्योंमें मृत्तिका अन्वित होती है, वैसे ही प्रपञ्चमे जड़ता
या सुख, दुःख, मोहकी अन्विति प्रतीति होती है।' परंतु यह कथन ठीक नहीं,
क्योकि यदि दृष्टान्तबलसे ही यह सिद्ध करना है, तब तो यह भी कहा जा सकता है कि
संसारमे कहीं भी चेतनसे अधिष्ठित हुए बिना स्वतन्तरूपसे अचेतन कोई पुरुषार्थ
सम्पादन नहीं कर सकता। प्रज्ञावान् शिल्पीलोग ही गृह, प्रासाद, वायुयान आदिका
निर्माण करते हुए देखे जाते हैं । उसी तरह कहा जा सकता है कि नानाकर्म-
फलोपभोग योग्य बाह्य आध्यात्मिक विविध वैचित्र्ययुक्त संसार बड़े-बड़े शिल्पी
जिसे मनसे भी कल्पना नहीं कर सकते, उसे अचेतन प्रकृति या भूत किस तरह
रच सकते हैं ? जड लोष्ट-पाषाण-जैसे स्वतन्तरूपसे कुछ नहीं कर सकते, वैसे ही
प्रकृति भूतादि भी स्वतन्तरूपसे विश्व-निर्माणमे असमर्थ हैं । कुम्भकारादिसे
अधिष्ठित ही मृत्तिकादिसे घटादि बनते हैं, उसी तरह भूत या प्रकृति भी चेतनसे
अधिष्ठित होकर ही कोई कार्य कर सकते हैं । फिर यह भी तो नहीं कहा जा
सकता कि जड घटका कारण जड मृत्तिका है । अतः जड विश्वका भी जड ही
कारण होना चाहिये । क्योकि उसके विपरीत यह भी कहा जा सकता है कि
'चेतन कुलाल जैसे मृत्तिकासे घट बनाता है, वैसे ही चेतन ब्रह्म ही जड प्रकृति,
परमाणु आदिसे जगत् बनाता है।'

सुख, दुःख आदि आन्तर हैं, बाह्य शब्दादि उनके निमित्त हो सकते
हैं, परंतु सुखादिरूप नहीं हो सकते । विशिष्टकार्य किसी प्रेक्षावान् द्वारा ही निर्मित
देखा जाता है, अतः अवश्य ही प्रपञ्च भी वैसे ही होना चाहिये ।
प्रकृतिकी साम्यावस्थासे प्रच्युति भी बिना चेतनके होना असम्भव है ।
'यह भी कहा जा सकता है कि केवल चेतनकी भी प्रवृत्ति नहीं दृष्ट है, परंतु
चेतनयुक्त रथादि अचेतनकी प्रवृत्ति तो देखी ही गयी है । अचेतनयुक्त चेतन-
की प्रवृत्ति नहीं देखी जाती । अतः विचारणीय विषय यह है कि जिसमें प्रवृत्ति
दृष्ट है, उसकी प्रवृत्ति मानी जाय या जिसके सम्बन्धसे प्रवृत्ति हो रही है, उसकी
प्रवृत्ति मानी जाय ? यदि कहा जाय कि जिसमें प्रवृत्ति दृष्ट है, उसीकी मानी जाय,
क्योंकि दोनों ही प्रत्यक्ष हैं, जैसे रथादि प्रवृत्तिके आश्रयरूपसे प्रत्यक्ष हैं, वैसे ही
केवल चेतन प्रवृत्तिके आश्रयरूपमें प्रत्यक्ष नहीं है । किंतु प्रवृत्तिके आश्रयभूत
देहादि संयुक्त ही चेतनके सद्भावकी सिद्धि होती है; क्योंकि केवल अचेतन रथादि-
की अपेक्षा जीवित देहमें विलक्षणता दृष्ट है, परंतु सद्भावमात्रसे प्रवृत्तिके प्रति
चेतनकी हेतुता नहीं सिद्ध होती, जैसे सद्भावमात्रसे घटादिके प्रति आकाशकी
निमित्तता नहीं सिद्ध होती । अतः प्रवृत्तिमें चेतन हेतु नहीं है । इसीलिये प्रत्यक्ष
देहके रहनेपर ही प्रवृत्ति एवं चैतन्यका उपलम्भ होता है । देह न रहनेपर चैतन्य-
का भी उपलम्भ नहीं होता । अतः देहका ही धर्म प्रवृत्ति एवं चैतन्य है, यह
चार्वाक कहते हैं । इस दृष्टिसे अचेतनकी ही प्रवृत्ति सिद्ध होती है ।'
इसपर अध्यात्मवादीका कहना है कि भले ही जिस देहमें प्रवृत्ति दिखायी
देती है, उसीकी प्रवृत्ति मानी जाय, परंतु वह चेतनसे ही होती है; क्योंकि चेतनके
रहनेपर ही प्रवृत्ति होती है, चेतन न रहनेसे प्रवृत्ति नहीं होती । यद्यपि काष्ठादिके
आश्रय ही दहन, प्रकाशन आदिरूप क्रियाएँ देखी जाती हैं, केवल अग्निमें दहन,
प्रकाशनादि नहीं उपलब्ध होते । चन्द्र, सूर्य, विद्युत्—सभी प्रकाश जलीय एवं
पार्थिव-काष्ठ, लोहादिके ही आश्रित हैं, तथापि अग्निसे ही दाह-प्रकाश आदि होते हैं ।
क्योंकि अग्निसंयोग होनेसे ही काष्ठादिमें दाहकत्वादि होते हैं, अग्निवियोग
होनेपर काष्ठादिमें दाह-प्रकाशादि उपलब्ध नहीं होते । चार्वाक भी चेतन देहके
सम्पर्कसे ही अचेतन रथ आदिकी प्रवृत्ति मानते हैं । अतः चेतनकी प्रवर्त्तकतामें
विवाद नहीं है । कहा जा सकता है कि कर-चरणादियुक्त प्राणी अपने व्यापारसे ही
अचेतनका प्रवर्त्तक होता है । इधर ब्रह्मरूप चेतन तो प्रवृत्तिशून्य, कूटस्थ, नित्य
है, वह कैसे प्रवर्त्तक होगा ? परंतु इसका समाधान यह है कि जैसे अयस्कान्त मणि
एवं सुन्दररूप आदि स्वतः प्रवृत्तिरहित होनेपर ही लोह तथा चक्षु आदि इन्द्रियोंके
प्रवर्त्तक होते हैं, वैसे ही प्रवृत्तिरहित ब्रह्म भी अचेतनका प्रवर्त्तक होगा ।
कुछ लोग कहते हैं कि जैसे अचेतन क्षीरकी वत्सवृद्धिके लिये स्वतः
प्रवृत्ति होती है, उसी प्रकार अचेतन जलवायु आदिमें भी स्वतः लोकोपकारके

४७६ मार्क्सवाद और रामराज्य
लिये प्रवृत्ति होती है।' परंतु यह भी ठीक नहीं। यदि उभयवादिसम्मत रथ
आदिमें चेतनाधिष्ठित प्रवृत्ति दृष्ट है, तब तो उसी दृष्टान्तसे क्षीर-जल आदिकी प्रवृत्तिमें
भी चेतनाधिष्ठान होनेका अनुमान किया जा सकता है—जलादीनां प्रवृत्ति-
श्चेतनाधीना अचेतनप्रवृत्तित्वाद् रथादिप्रवृत्तिवत् । रथादिके समान अचेतनकी
प्रवृत्ति होनेसे जलादिकी प्रवृत्ति चेतनाधीन है। क्षीरका प्रवर्तक तो चेतन धेनु ही है।
'योऽप्सु तिष्ठन्नद्भ्योऽन्तरः'योऽपोऽन्तरःयमयति'(बृहदा० उप० ३।७।४)एतस्य ०००
वा अक्षरस्य प्रशासने गार्गि प्राच्योऽन्या नद्यः स्यन्दन्ते' (बृ० उ० ३।८।९) यह श्रुति
कहती है कि अन्तर्यामी चेतन जलके भीतर रहकर उसका नियमन करता है, उसीके
शासनसे नदियाँ बहती हैं। वत्सके चोषणसे भी दुग्धकी प्रवृत्ति होती है, जलके
प्रवाहणके लिये निम्नभूमि प्रदेश आवश्यक होता है, चेतनापेक्षा तो सर्वत्र है ही।
आधुनिक महायन्त्रोंमें भी मूल-प्रवर्तक चेतन रहता ही है।
कुछ लोग कहते हैं, तृण पल्लवादि दूसरे निमित्तोंकी अपेक्षा बिना ही
स्वभावसे ही क्षीरादिके रूपमे परिणत होते हैं, उसी तरह प्रकृति या भूत भी
स्वभावसे ही विविध प्रपञ्चाकारसे परिणत होता है। क्योकि क्षीर आदि बननेमें
दूसरा कोई निमित्त उपलब्ध नहीं होता। यदि कोई निमित्त होता तब तो उन-उन
निमित्तोंकोलेकर यथेष्ट क्षीर बनाया जा सकता था। परंतु यह भी कथन ठीक नहीं
है, तृणादिका क्षीर आदि परिणाम निष्कारण नहीं है।' धेनुसे खाये हुए तृणादिसे
ही क्षीर बनता है। यदि धेनु दुग्ध बननेका असाधारण निमित्त न होती तो धेनुसे
अनुपभुक्त या वृषभ आदिसे उपभुक्त तृणसे भी क्षीर बनना चाहिये था। अतएव
धेनु आदि निमित्तोंको लेकर दुग्ध यथेष्ट बनाया ही जा सकता है। धेनु एवं
उसकी उदर-वह्नि आदि ही तृणादिको क्षीर बनाती हैं। अधिक दुग्ध चाहनेवाले
धेनुको पर्याप्त दाना-घास देकर उसे प्राप्त करते हैं। संसारमें कई वस्तु मानुष-सम्पाद्य
वस्तुएँ होती हैं और कई देवसम्पाद्य होती हैं। जो लोग प्रकृति-भूतों या परमा-
णुओंमें भी चेतन-शक्तिकी कल्पना करते हैं, वे तो फिर जड़वादी नहीं रह जाते।
साथ ही अनेक चेतन परमाणुभूत या परमाणु विद्युत्को कारण माननेकी अपेक्षा
लाघवार्थ एक व्यापक सर्वशक्ति चेतन ईश्वरको ही कारण मानना कहीं श्रेष्ठ है।
जड परमाणुओसे संयुक्त होकर कार्यारम्भके लिये कर्म अपेक्षित होगा। देखा
जाता है कि तन्तुओंमें कर्म (हलचल) होता है। तभी संयोग आदिद्वारा
पटादिकी उत्पत्ति होती है। कर्म भी कार्य है, अतः उसका भी कोई निमित्त
चाहिये। यदि कोई निमित्त न होगा, तो परमाणुमें आद्यकर्म ही नहीं होगा। यदि
लोकानुसार प्रयत्न या अभिघातादि परमाणु कर्मका निमित्तमान्य है, तब तो तदर्थ
चेतन ईश्वर मानना ही युक्त है।
कहा जाता है कि 'ज्ञानस्वरूप ब्रह्मसे प्रपञ्चकी उत्पत्ति इसीलिये नहीं हो
सकती कि प्रपञ्च ब्रह्मसे विलक्षण है। सुवर्णसे उत्पन्न मुकुट-कुण्डलादिमें, मृत्तिका-

से उत्पन्न घटादिमे समानता होती है । मृत्तिकासे मुकुट-कुण्डलादि नहीं बनते ।
जगत् अचेतन है, अतः इसका कारण भी अचेतन होना ठीक है । इस तरह
ज्ञानसे विलक्षण होनेसे प्रपञ्च ज्ञानका कार्य नहीं । प्रीति, परिताप, विषादका
हेतुभूत प्रपञ्च चेतनका कार्य नहीं हो सकता, किंतु प्रकृतिका ही कार्य होना
चाहिये । विपरीत दृष्टान्त भी मिलते ही हैं । लोकमें चेतनत्वेन प्रसिद्ध पुरुष, पशु
आदिसे विलक्षण केश, नख आदिकी उत्पत्ति होती है । तथा अचेतनत्वेन प्रसिद्ध
गोमय, केश, काष्ठ आदिसे वृश्चिक, यूका, दीमकादिकी उत्पत्ति होती है । इसपर भी
कहा जा सकता है कि वस्तुतः अचेतन शरीरोंसे ही अचेतन केश आदिकी उत्पत्ति
होती है । इसी तरह गोमयादिसे वृश्चिकादिके अचेतन शरीरकी उत्पत्ति होती है ।
तो भी उक्त दृष्टान्तोंसे कारण-कार्योंकी विलक्षणता तो सिद्ध ही हो जाती है ।
गोमयकी अपेक्षा वृश्चिक शरीरमें शरीरकी अपेक्षा केश आदिकी विलक्षणता भोगा-
यतन और भोगानायतनरूपसे स्पष्ट ही है । कारण-कार्यमें अति समानता होनेसे तो
कार्य-कारणभाव ही नहीं होता । कुछ समानता तो इधर भी है ही । ब्रह्मगत सत्ता
स्फूर्ति जगत्में भी अनुगत है ही ।
मार्क्सवादी तो स्वयं ही अचेतनभूतसे चेतनाकी उत्पत्ति मानते हैं ।
वे भी गोमयादिसे वृश्चिकादिकी उत्पत्तिका दृष्टान्त उपस्थापित करते हैं । इस
दृष्टिसे भी चेतन ब्रह्मसे तद्विलक्षण अचेतन प्रपञ्चकी उत्पत्तिमें कोई आपत्ति
नहीं हो सकती । किंच जैसे पृथिवीत्व जातियुक्त पाषाणोंमें ही हीरक, पद्मराग आदि
बहुमूल्य रत्न होते हैं, कोई मध्य वीर्यके सूर्यकान्त आदि मणिहोते हैं, कोई कुत्ता,
बगुला, कौवाके हटानेके लायक सामान्य पाषाण होते हैं, बीजोसे ही बहुविधपत्ते, पुष्प,
फल, गन्ध, रसादि विचित्र वस्तुएँ उत्पन्न होती हैं, वैसे सभी बीज पार्थिव ही हैं ।
फिर पृथक् बीजोसे पृथक् ढंगके पत्र, पुष्प, फल, रसादि उत्पन्न होते हैं । एक ही
अन्नरसके लोहितादि, रस, केश, नख आदि विचित्र कार्य होते हैं । उसी तरह एक
ही ब्रह्मसे विविधवैचित्र्योपेत प्रपञ्चका निर्माण होता है ।
बौद्धलोग सम्पूर्ण प्रपञ्चको उत्पत्तिके पहले असत् कहते हैं, अर्थात् सत्‌के
अभावको ही विश्वका मूल कारण कहते हैं । इस कथनमें यह असंगति है कि असत् है,
या असत् था । इस प्रकार असत् या अभावके साथ अस्तित्वका सम्बन्ध कैसे होगा ?
क्योंकि सत्‌के साथ ही सत्‌का सम्बन्ध हो सकता है । खपुष्पके तुल्य असत् या
अभावके साथ सत्ताका सम्बन्ध सम्भव नहीं । इसी तरह प्रमाण या प्रमाता होनेपर
ही भाव या अभावका बोध हो सकता है । यदि प्रमाता एव प्रमाणका अस्तित्व
था, तब तो असत् या अभाव कैसे कहा जा सकेगा ? क्योंकि प्रमाता और प्रमाण-
का ही अस्तित्व था । यदि प्रमाता-प्रमाण नहीं थे, तब तो फिर अभाव या असत्‌का

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प्रबोध भी कैसे हो सकता था ? बीजके उपमर्दन होनेसे अङ्कुरकी उत्पत्ति होती
है, यह देखकर बौद्धलोग अभावसे ही अङ्कुरादि कार्योंकी उत्पत्ति कहते हैं।
परंतु यदि ऐसी बात होती, तब तो बीजके दाहसे भी अङ्कुरकी उत्पत्ति
होनी चाहिये, क्योकि बीज दाहमें भी तो बीजका उपमर्दन या अभाव
हुआ ही। अतः बीजके अवयव ही अङ्कुरके कारण हैं । बीज अङ्कुरोत्पत्तिके
पूर्वकी अवस्था है। जैसे घटोत्पत्तिके पहले मृत्तिकाकी पिण्डावस्था होती है।
पिण्डमें, घटमें, कपालमें जो व्यापक है, वह मृत्तिका ही सबका कारण है ।
पिण्डादि सब मृत्तिकाके कार्य ही है । उसी तरह बीजावयव ही बीज
एवं अङ्कुरादिमें व्यापक होनेसे वही कारण है । पिण्ड या बीज, घट-अङ्कुरादिमें
व्यापक नहीं हैं, अतः वे कारण नही हैं। एक कारणमें युगपत् विरुद्ध अनेक कार्य नहीं
हो सकते, अतः एक कारणसे होनेवाले कार्योंमें क्रमभाविता है। पिण्ड, घट, कपाल,
बीज, अङ्कुर, नाल, स्कन्ध, शाखोपशाखादि कार्य क्रमसे ही होते हैं।
जो कहते हैं कि पिण्ड, कपालादि कार्योंसे भिन्न होकर कारण मृत्तिका कुछ
भी नहीं है, उन्हे अन्वय व्यतिरेकादि प्रमाणोंपर अवश्य ध्यान देना चाहिये।
जैसे पुष्पोंके परस्पर व्यावृत्त होनेपर भी उनमें अनुवृत्त सूत्र उनसे भिन्न होता है,
वैसे ही पिण्ड, घट, कपालादिके परस्पर व्यावृत्त होनेपर भी सबमें अनुवृत्त मृत्तिका
स्पष्ट ही उन कार्योंसे पृथक् है। अतः इस कारणको असत् नहीं कहा जा सकता ।
इसी तरह उत्पत्तिके पहले कार्य भी सत् ही रहता है। जैसे अविज्ञात
ही घट विज्ञात होता है, वही ज्ञायमान होता है और वही विस्मृत होता है
और फिर उसीका स्मरण भी होता है। इसी तरह सामग्रीके अभावसे या कुड्यादि
दीवाल आदि आवरणसे वर्तमान रहता हुआ भी घट प्रतीत नहीं होता है। पिण्डमें
घट रहता हुआ भी आवृत्त होनेसे उपलब्ध नहीं होता। जैसे एक ही आकाशमें चन्द्र
प्रकाश सौर्य प्रकाशसे आवृत्त होता है, एक ही घटमें नीर क्षीरसे आवृत्त होता है,वैसे
ही एक देशस्थ ही घट पिण्डसे आवृत्त रहता है। एक ही मिट्टीमें पिण्ड आदि
सहस्रों कार्य हैं, जिसकी अभिव्यक्तिकी सामग्री उपस्थित होती है, वही
अभिव्यक्त होता है, अन्य आवृत्त रहते हैं। इस तरह पिण्डसे घट, घटसे कपाल,
कपालसे घट आदि आवृत्त होते हैं।
लोकमें अनेक ढंगसे अभिव्यक्ति होती है, दीपसे रूपकी अभिव्यक्ति
होती है । दण्ड, चक्र, कुलालादिसे घट अभिव्यक्त होता है। जैसे दीपसे
आवरणनाशके अतिरिक्त घट सप्रकाश बनाया जाता है, वैसे ही कुलालादि-
द्वारा आवरणभङ्गके साथ घटाभिव्यक्ति हो जाती है । इसीलिये शिलाघातसे
पिण्ड-भङ्ग होनेपर भी कुलालादि बिना घटकी अभिव्यक्ति नहीं होती।

जैसे अज्ञानताकी निवृत्तिके लिये प्रमातालोग प्रमाणका उपादान करते हैं,
प्रमाणके सम्बन्धसे प्रमेयकी अज्ञातता नष्ट होती है, प्रमातामे प्रमाणकी अभिव्यक्ति
होती है। निष्पन्न प्रमाण प्रमेयमे सङ्गत होकर उसी तरह प्रमेयाकार हो जाता है,
जैसे कुल्या ( नहर ) का जल नालियोद्वारा क्षेत्रमे जाकर क्षेत्राकार हो जाता है,
प्रमाणके प्रमेयाकार होनेसे अज्ञानताके नष्ट होनेसे प्रमेयकी अभिव्यक्ति होती है।
इसी तरह दीपप्रकाशसे घट सप्रकाश होता है। वही घटनिष्ठ प्रकाश घटनिष्ठ तम-
का अपनোদন करता है। इसी तरह मृत्तिकामें स्थित घटाकार दण्ड-चक्रादिसे
स्फुट होता है। शिलादिसे पिण्डभङ्ग होनेपर दूसरे चूर्णादि कार्य सम्पन्न हो जाते
हैं, वे भी घटके आवरण ही हैं, अतः घटकी अभिव्यक्ति नहीं होती ।
इसीलिये भिन्न-भिन्न घटादि कार्योंकी अभिव्यक्तिके साधन नियत हैं ।
प्रागभाव, प्रध्वंसाभाव आदि भी अन्योन्याभावके तुल्य ही भावरूप हैं ।
जैसे घटान्योन्याभाव घटरूप ही है वैसे ही प्रागभाव पिण्डरूप है। प्रध्वंसाभाव
कपालादिरूप है। भावान्तर ही किसी दृष्टिसे अभाव कहा जाता है—'भावान्तर-
मभावो हि कयाचित्तु व्यपेक्षया ।'
जो प्रागभाव, प्रध्वंसाभावको शून्य ही कहता है, उससे यह भी प्रश्न
होगा कि उन दोनोंमें भेद है या नहीं ? यदि कहा जाय कि भेद नहीं है, तो भेद-
व्यवहार क्यों है ? अगर भेद है तो उन दोनोंका भेदक क्या है ? अगर विलक्षण
स्वरूपको ही भेदक कहे तो भी ठीक नहीं, क्योंकि शून्यमात्रमें विलक्षणस्वरूपता
क्या हो सकती है ? विलक्षणस्वरूपता हो तो शून्यता भी कैसी होगी ? शून्यके
साथ उपाधि सम्बन्ध भी नहीं बन सकता, अतः औपाधिक भेद भी नहीं कहा जा
सकता । 'घट-प्रागभावकी पिण्ड ही उपाधि है' ऐसा कहें, तो उसमें प्रमाण बतलाना
पडेगा। यदि प्रत्यक्ष-प्रमाण कहें, तो भी ठीक नहीं, कारणरूप तथा स्पर्शहीन प्राग-
भावके साथ चक्षु आदिका सम्बन्ध सम्भव नहीं है। अतः प्रत्यक्ष नहीं कहा जा
सकता। यदि पिण्डके दर्शनसे ही प्रागभावका दर्शन मानें, तब तो प्रागभावके भाव
रूप माननेसे ही सब काम चल ही सकता है। 'स्वरूपपररूपाभ्यां नित्य सद्सदात्मकम्'
इस दृष्टिसे अभाव या असत्‌से जगत् या कार्यकी उत्पत्ति असङ्गत है, किंतु स्व-
प्रकाश चेतन ब्रह्मसे ही पूर्वोक्त युक्तियोमे जगत्‌की उत्पत्ति सङ्गत है ।
इसी तरह अचेतन अदृष्ट आदि भी चेतनके बिना कर्मके कारण नहीं हो
सकते । परमाणु यदि सावयव हैं, तब तो वे भी कार्य एवं अनित्य ही होंगे । उनकी
उत्पत्तिमें कारणान्तर ढूँढना पड़ेगा । यदि निरवयव हैं, तब तो उनका दूसरे
परमाणुओंसे संयोग होनेपर परिमाणवृद्धि न होगी, क्योंकि एक देशसे संयोग होनेपर
तो संयोगसे अव्याप्त देशोद्वारा प्रथिमा ( विस्तार ) हो सकता है । परन्तु इस
दशामें सावयवत्व, अनित्यत्वादि-दोष होते हैं । निरवयवका तो सम्पूर्णरूपसे ही

अव्यवधानेन संयोग मानना होगा तथा च एक दूसरेहीमें समा जायेंगे, वृद्धिकी
कोई आशा नहीं होती। इसके अतिरिक्त ससारमें प्रदेशवाले पदार्थोंका ही संयोग
होता है, फिर निष्प्रदेश, निरवयव परमाणुओंका संयोग भी कैसे होगा ? इसी तरह
परमाणुओंको प्रवृत्तिस्वभाव, निवृत्तिस्वभाव, उभयस्वभाव या अनुभयस्वभाव
मानना पड़ेगा, परंतु इनमें कोई पक्ष ठीक नहीं है। प्रवृत्तिस्वभाव है, तब तो नित्य
ही प्रवृत्ति होनेसे वस्तुनाशरूप प्रलय नहीं होगा। निवृत्तिस्वभाव होनेसे कभी
सृष्टि न होगी। विरोधात् उभयस्वभाव भी नहीं कहा जा सकता । अनुभयस्वभाव
कहेंगे तब तो दूसरे किसी निमित्तसे उनकी प्रवृत्ति माननी पड़ेगी, फिर वहीं सर्वज्ञ
चेतन अपेक्षित होगा।
इसके अतिरिक्त लोकमें रूपादिमान् वस्तु अपने कारणकी अपेक्षा स्थूल
एवं अनित्य होती है। जैसे पट तन्तुओंकी अपेक्षा स्थूल एवं अनित्य होते हैं।
अंशुओंकी अपेक्षा तन्तु स्थूल तथा अनित्य होते हैं। परमाणु भी यदि रूपादिमान्
हैं, तो उनका भी कारण होना चाहिये और उसकी अपेक्षा उनमे स्थूलता एवं
अनित्यता भी होनी चाहिये।
इसके अतिरिक्त यह भी देखा जाता है कि गन्ध, रस, रूप, स्पर्श गुण-
संयुक्त पृथ्वी स्थूल है। तदपेक्षया रूप, रस, स्पर्श गुणसंयुक्त जल सूक्ष्म है। इसीप्रकार
रूप, स्पर्श गुणवाला तेज एवं स्पर्श गुणवाला वायु और भी सूक्ष्म है। तद्वत्
पृथिव्यादि परमाणुओंमें सूक्ष्मता, स्थूलताका तारतम्य होना चाहिये। यदि गुणोंकी
अधिकतासे पृथ्वी, जल परमाणुमें मूर्तिवृद्धि होगी, तब फिर वे परमाणु ही क्या
रहेंगे ? जब कार्योंमें गुणोंके उपचयसे मूर्तिवृद्धि होती है तो परमाणुमें भी गुणो-
पचयसे मूर्तिवृद्धि क्यों न होगी ? यदि परमाणुओंमें गन्धादिगुण न मानें तो उनके
कार्योंमे ही गन्धादि कहाँसे आयेंगे ? क्योकि कारण गुण ही कार्यगुणोंके आरम्भक
माने जाते हैं। यदि सबमे एक ही गुण माने जायँ, तब तो पृथ्वीमें रस, जलमें रूप,
तेजमे स्पर्श नही उपलब्ध होने चाहिये। यदि समताके लिये सभीको गन्धादि
चारों गुणोंसे युक्त मानेंगे, तब तो जलसे भी गन्ध एवं तेजमें भी गन्ध, रस उपलब्ध
होने चाहिये। वायुमें भी रस-गन्धका उपलम्भ होना चाहिये, परंतु ऐसा होता
नहीं। द्रव्य एवं गुण यदि अत्यन्त भिन्न हों, तो जैसे पुष्प-पलाशादि भिन्न हैं,
स्वतन्त्र हैं, वैसे ही गुण भी द्रव्यसे पृथक् स्वतन्त्र होने चाहिये। परंतु यहाँ तो
गुण द्रव्य-परतन्त्र ही होता है। द्रव्यके साथ-साथ सहभाव होनेसे द्रव्यमात्र ही गुण
है, यही मानना ठीक है। धूम, अग्निके समान-द्रव्य-गुणमें भेद नहीं प्रतीत होता-
इसी प्रकार कर्म, सामान्य, विशेष, समवाय भी द्रव्य ही है।
जैसे एक ही देवदत्त विभिन्न सम्बन्धिरूपोंकी अपेक्षासे मनुष्य, ब्राह्मण,
क्षत्रिय, बाल, युवा, वृद्ध, पिता, पुत्र, पौत्र, भ्राता या जामाता आदि रूपसे कहा

जाता है, जैसे एक ही अङ्क स्थानविशेषके योगसे दस शत, सहस्र आदि शब्दोंसे
व्यवहृत होता है ।
विचार करनेपर कारणसे भिन्न होकर कुछ नहीं होता । मिट्टीसे भिन्न होकर
घटादि पदार्थ उपलब्ध नहीं होते । जन्मके पहले प्रध्वंसके पश्चात् कार्यकी उपलब्धि
नहीं होती, अन्तःकरणसे भिन्न उनकी सत्ता नहीं होती । सद्बुद्धि तथा असद्बुद्धि-
दोनों ही सर्वत्र उपलब्ध होती हैं । जिस विषयकी बुद्धि कभी भी व्यभिचरित नहीं
होती, वही सद्बुद्धि और जिस विषयकी बुद्धि व्यभिचरित होती है, वह असद्बुद्धि
होती है। 'नीलम् उत्पलम्' के तुल्य 'सन् घटः, सन् पटः, सन् हस्ती', इसी तरह सन्-
सन् सर्वत्र घटादिमें सद्बुद्धि बनी रहती है। घटादि बुद्धि व्यभिचरित होती है, अतएव
घटादि बुद्धिके विषय घटादि असत् हैं, क्योंकि उसका व्यभिचार होता है ।
सद्बुद्धिका विषय सत् है, क्योंकि उसका व्यभिचार नहीं होता ।
कहा जा सकता है कि घट नष्ट होनेपर तो घटबुद्धि व्यभिचरित (बाधित)
हो ही जाती है, परन्तु यह कहना ठीक नहीं, कारण पटादिमें सद्बुद्धि रहती ही
है । 'सन् घटः' 'सन् पटः' इस रूपसे घट, पट विशेष्यरूपसे, सन् विशेषण रूपसे प्रतीत
होता है । घटके नष्ट हो जानेपर विशेष्य न रहनेपर विशेषणबुद्धि नहीं होती । जैसे
गो व्यक्ति न रहनेपर अभिव्यञ्जक न रहनेसे गोत्वकी प्रतीति नहीं होती, यह
नहीं कि गोत्व नहीं रह गया । वैसे ही गोत्वके समान सत्‌के विद्यमान होते हुए
भी अभिव्यञ्जकविशेष्य घटादि न रहनेपर सत् प्रतीत नहीं होता । इसीलिये यह
भी नहीं कहा जा सकता कि जैसे घट नष्ट होनेपर पट आदिमें सद्बुद्धि बनी
रहती है, वैसे ही घटबुद्धि भी घटान्तरमें बनी रहती है, क्योंकि भले घटान्तरमें
घटबुद्धि बनी रहे, परन्तु फिर भी पटादिमें तो घटबुद्धिका व्यभिचार है ही,
परन्तु सद्बुद्धिका तो कहीं भी व्यभिचार नहीं होता ।
कहा जा सकता है कि घट नष्ट हो जानेपर उसमें सद्बुद्धि भी नहीं
रहती, परन्तु यह कहना ठीक नहीं, क्योंकि विशेष्य न रहनेसे सद्बुद्धि नहीं होती ।
सद्बुद्धि विशेषणविषया होती है, विशेष्य नहीं होनेसे विशेषणता नहीं बनती । फिर
सद्बुद्धि कैसे हो सकती है ? यह नहीं कहा जा सकता कि सद्बुद्धिका विषय सत्
रहा ही नहीं, इसलिये सद्बुद्धि नहीं रहती ।
यहाँ यह शङ्का होती है कि घटादि विशेष्य असत् हैं, तो उसके साथ सत्-
का सामानाधिकरण्य नहीं होना चाहिये ? परन्तु इसका समाधान यह है कि जैसे
रज्जु-सर्पके सम्बन्धमें सर्पके बाधित होनेपर भी इदमंशके साथ 'अयं सर्पः' सामाना-
धिकरण्य-व्यवहार होता है । इसी तरह घटादिके असत् होनेपर भी 'घटः सन्, पटः
सन्' इस रूपसे अबाधित सत्‌के साथ असद् घटादिका सामानाधिकरण्य व्यवहार
बन जाता है ।
मा० रा० ३१—

४८२ मार्क्सवाद और रामराज्य

पूँजीका स्वरूप

कहा जाता है कि 'अर्थशास्त्रके क्षेत्रमे पूँजी स्वयं उदाहरण है। वह धनका
एक निम्नतम परिमाण है, जिसके रहनेपर ही उसका स्वामी पूँजीपति कहला
सकता है। मार्क्सने उद्योगकी किसी शाखाके एक श्रमिकका उदाहरण लिया है,
जो आठ घंटेतक अपने लिये अर्थात् अपनी मजदूरीका अर्थ उत्पन्न करनेके लिये
श्रम करता है और चार घंटे अतिरिक्त अर्थ पैदा करनेके लिये जो उसके मालिक-
की जेबमे जाता है। इस विशेष दृष्टान्तमें यदि पूँजीपति अपने अतिरिक्त अर्थके
द्वारा मजदूर-श्रेणीका जीवन भी बिताना चाहता है तो उसके पास इतना धन
होना चाहिये कि वह दो मजदूरोंके लिये मजदूरी, कच्चा माल तथा उत्पादनके
साधनोका बदोबस्त कर सके। लेकिन पूँजीपतिका उद्देश्य केवल जीना नहीं है,
बल्कि अपनी सम्पत्तिकी वृद्धि करना है। इसलिये इस धनका मालिक अभी
पूँजीपति नहीं है। अब यदि पूँजीपतिको मजदूरसे दुगुना अच्छा जीवन व्यतीत
करना है और अतिरिक्त अर्थका आधा कारोबारमें फिर डालना है तो उसे आठ
मजदूरोको काममे लगाना चाहिये और पहले अर्थ-संग्रहका चौगुना कारोबारमें
लगाना चाहिये। अब यह अर्थसंग्रह पूँजीका आकार ले लेता है। इस प्रकार अर्थ-
संग्रहका परिमाण बढते-बढते एक सीमापर वह पूँजीके रूपमें परिणत हो जाता है।'
परन्तु यह कहना ठीक नहीं, कारण, मार्क्सका अतिरिक्त श्रम और अतिरिक्त
मूल्यकी कल्पना ही निराधार है, इसका विवेचन पीछे हो चुका है। यह भी
कहा जा चुका है कि व्यापार या उद्योगद्वारा धनार्जनका तरीका ही इस प्रकार-
का होता है जिसमे बुद्धिमानीसे एक मृतमूषिकोद्धारा भी कोटिपति बन जा सकता
है। मार्क्सके मतानुसार उत्पादन-साधन ही पूँजी है, उसकी मात्रा अल्प हो या बड़ी।
इसीलिये किसानोके खेत भी उत्पादन-साधन हैं। इस दृष्टिसे किसान भी पूँजीपति
रहते हैं।
समाज-विज्ञानके क्षेत्रमें इस गुणात्मक परिवर्तनकी गवाहीके लिये एंजिल्सने
नेपोलियनको साक्षी माना है। वह कहता है कि 'फ्रांसीसी घुड़सवार, जो नियन्त्रित
सिपाही थे, लेकिन कोई अच्छे घुड़सवार नही थे और मामेलुक जो बहुत अच्छे
घुडसवार थे लेकिन जिनमें नियन्त्रण नही था। उनकी लडाईके सिलसिलेमें
दो मामेलुक आसानीसे तीन फ्रांसीसियोका मुकाबला कर सकते थे। सौ
मामेलुक सौ फ्रांसीसियोके बराबर थे। लेकिन ३०० फ्रांसीसी साधारणतया ३००
मामेलुकोको हरा देते थे। और १ हजार फ्रांसीसी १५ सौ मामेलुकोको हरा
देते थे। पहलेके उदाहरणकी तरह इससे यह स्पष्ट है कि नियन्त्रित सिपाहियोंके
जत्थेके परिमाणके बढ़नेपर उसका किस प्रकार गुणात्मक परिवर्तन होता है और
वह अपनेसे अधिक संख्याकी फौज हरा देता है।'

परन्तु इससे भी यही सिद्ध होता है कि अनियन्त्रण, अनुशासनहीनता अल्प-
संख्यकोंमें इतनी हानिकर नहीं होती जितनी कि बहुसंख्यकोंमें । उसी
प्रकार नियन्त्रणका गुण अल्पसंख्यकोंमें भले कुछ प्रकट हो, किंतु बहुसंख्यकोंमें
अधिकरूपसे फलदायी होता है । नियन्त्रित संघटित समुदाय शक्तिशाली
होता है। तृणादिनिर्मित रज्जु ही इसका दृष्टान्त है । परिणामवादानुसारी सत्-
कार्यवादमें कोई भी विद्यमान ही गुण किसी अवस्थाविशेषमें प्रकट होता है ।
सिकतामें तेल नहीं होता, अतः कभी नहीं व्यक्त होता । तिलमें तेल होता है, अत. वह
कभी प्रकट होता है । वेदान्त-मतानुसार कारणकी अपेक्षा कार्यमें भिन्नता न
होनेपर भी कुछ अनिर्वचनीय गुण भी सिद्ध होते हैं । जैसे मृत्तिकाद्वारा जला-
नयन नहीं होता, फिर भी मृत्तिकानिर्मित घटादिद्वारा जलानयन आदि कार्य
होते हैं । तन्तुद्वारा अङ्गप्रावरण, शीतापनयन नहीं होता, फिर भी तन्तुनिर्मित पट-
द्वारा वह कार्य होता है। आकाशमे स्पर्श नहीं होता, फिर भी तन्निर्मित वायुमें
स्पर्शगुण है, वायुमें रूप नहीं तथापि वायुपरिणामभूत तेजमें रूप गुण उपलब्ध होता
है। इसी तरह एक-एक व्यक्ति या अल्प व्यक्तिमें जो गुण नहीं व्यक्त होते, अधिक-
संख्यक उन्हीं व्यक्तियोंमें वे गुण प्रकट होते हैं । इसी तरह एक या अन्य व्यक्तियो-
में अनियन्त्रणका जो दुष्परिणाम नहीं व्यक्त होता, बहुसंख्यकोंमें वह
दुष्परिणाम स्पष्ट हो जाता है ।

प्रतिषेधका प्रतिषेध

इसी तरह प्रतिषेधके प्रतिषेधका उदाहरण मार्क्सवादी उपस्थित करते हैं
कि 'यदि यवका एक दाना जमीनमें डाला जाय तो गर्मी और नमीके प्रभावसे
इसमे एक विशेष परिवर्तन होता है। इसमेंसे पौधा उगने लगता है। उस दानेके
अस्तित्वका अन्त हो जाता है। उसका प्रतिषेध हो जाता है । उसके स्थानपर
जो पौधा उगता है, वह उस दानेका प्रतिषेध है । वह पौध बढता है, उसमे
फल आते हैं और फिर उसमे यवके दाने उत्पन्न होते हैं, लेकिन इन दानोंके
पकनेके साथ ही उस पौधेका भी अन्त हो जाता है । अब प्रतिषेधका प्रतिषेध
होकर नये यवके दाने हो गये । एक ही दाना नहीं, बल्कि मूल दानेका दस,
बीस या तीस गुना ।'
इसी तरह पतंगोंके सम्बन्धमें उनका कहना है कि 'ये अंडेने निकलते
हैं। उसके प्रतिषेधके बाद ये पतंगे बढकर पूर्ण यौन विकासको प्राप्त होते हैं और
यौन सम्बन्धमे अंडे पैदा होकर मर जाते हैं। प्रतिषेधका प्रतिषेध करके फिर अंडे
पैदा हो गये, एक नहीं अनेक ।'
इस सम्बन्धमें पीछे कहा जा चुका है कि बीज विनाश या बीज प्रतिषेध
अङ्कुरादि कार्यका कारण नहीं है, किंतु बीजके अवयव ही अङ्कुरके कारण हैं,

४८४ मार्क्सवाद और रामराज्य
क्योकि उनका ही अनुवेध कार्यमें होता है। बीजके विनाशका कारण यह है कि
एक उपादान कारणमें एक कार्यकी अभिव्यक्ति होनेपर कार्यान्तरोकी निवृत्ति होती
है। बीज भी एक अवयवोकी ही कार्यावस्था है। अङ्कुररूप कार्यकी अभिव्यक्तिसे
उसकी निवृत्ति आवश्यक है। जहाँ पूर्व कार्यकी निवृत्ति आवश्यक नही है, वहाँ
प्रतिषेधके प्रतिषेधका कोई अर्थ नहीं है। आकाशसे वायुकी उत्पत्ति होती है, फिर
भी आकाश नही निवृत्त होता। वायुसे तेजकी उत्पत्ति होती है, परंतु वायुकी
निवृत्ति नहीं होती। मृत्तिकासे घट उत्पन्न होता है, किंतु मृत्तिकाकी निवृत्ति नहीं
होती। आम्रादि वृक्षोसे फलोकी उत्पत्ति होती है, परंतु वृक्षोका नाश या प्रतिषेध
नहीं होता। मनुष्य-पशु आदिसे ही दूसरे मनुष्य-पशु आदि उत्पन्न होते हैं, परंतु
उत्पादकोका विनाश नही होता। भूतोकी उत्पत्तिका सिद्धान्त यह है कि कारण
व्यापक, सूक्ष्म तथा स्वच्छ एव निर्गुण, निर्विशेष है। कार्य व्याप्य, स्थूल,
अस्वच्छ, सगुण एव सविशेष है। परंतु साख्यमतानुसार कार्यकी विशेषताओंकी
भी अभिव्यक्ति ही होती है, उत्पत्ति नही। अत्यन्त असत्की उत्पत्ति नही होती—
यह बात सत्कार्यवादके प्रसङ्गमे कही जा चुकी है। वेदान्तमतानुसार जो आदिमे
तथा अन्तमें नही होती, मध्यमें प्रतीत होती है, वह वस्तु रज्जु-सर्प आदिके तुल्य
सदसद्विलक्षण अतएव अनिर्वचनीय ही होती है। वह शुक्ति रजतादि मिथ्या
पदार्थोंके समान होनेपर भी सत्य-सी प्रतीत होती है। आदावन्ते च यन्नास्ति वर्तमानेऽपि
तत्तथा। वितथैः सदृशाः सन्तोऽवितथा इव लक्षिताः॥ (माण्डू०का०२।६) परिणाम-
वादमे कारणको कार्याकारतया परिणत होनेके लिये कारणमे आवश्यक विचार होना ही
चाहिये। एतावता अन्तर्विरोध या प्रतिषेध कार्यका कारण नहीं हो जाता। यदि
प्रतिषेध कारण होता तो सर्वत्र वह सुलभ ही, है, फिर कार्योत्पत्तिके लिये कारणोपादान
ही व्यर्थ होगा। यदि प्रतिषेध ही कार्योत्पत्तिका कारण होता तो दग्ध बीजसे भी
कार्योत्पत्ति होनी चाहिये थी, क्योंकि दाहसे भी बीजका प्रतिषेध हुआ ही। हम
स्पष्ट देखते हैं कि कार्यके लिये कार्यार्थी तत्कारणोंका अन्वेषण करते हैं।
वेदान्तानुसार कारण ब्रह्म ही अनिर्वचनीय माया एवं तदंश विभिन्न उपाधियों-
द्वारा कार्याकारेण विवर्तित होता है। अंडे भी पतंगोके फल हैं, प्रतिषेधरूप नहीं।
कहा जाता है कि मूल वस्तुके अन्तर्विरोध ( विध्वंस ) से समन्वयद्वारा
वस्त्वन्तरकी उत्पत्ति होती है—'नानुपमृद्य प्रादुर्भावात्' विनष्ट बीजसे ही अङ्कुर
उत्पन्न होता है। मृतपिण्डके उपमर्दनसे ही घट निर्माण होता है। विनष्ट क्षीरसे
ही दधिका निर्माण होता है। यदि कूटस्थ कारणसे ही कार्य उत्पन्न हो तब तो
अविशेषेण सभीसे सब कार्यकी उत्पत्ति होने लगे। अर्थात् कूटस्थ कारणका यदि
कार्य-जनन स्वभाव है तब तो तत्काल ही उससे कार्य उत्पन्न होना चाहिये,
कालक्षेप न होना चाहिये। यदि कूटस्थ कारणमे कार्यजनक स्वभाव नहीं है, तब
उससे कभी भी कार्य न उत्पन्न होना चाहिये। यदि कहा जाय कि समर्थ होते हुए भी

मार्क्स-दर्शन ४८५
क्रमेण सहकारियोंकी अपेक्षासे ही कार्य उत्पन्न होता है, परन्तु सहकारी कुछ उपकार
करते हैं या नहीं ? यदि नहीं तो वे सहकारी ही क्यों होंगे ? यदि उपकारका आधान
करते हैं तो भी भिन्न या अभिन्न उपकारका आधान करेंगे । यदि उपकार
अभिन्न हैं तब तो वह कूटस्थ कारणका ही स्वरूप ठहरा । फिर कार्यमें विलम्ब
क्यों होना चाहिये ? यदि उपकार भिन्न है, तब तो उस उपकारके होनेपर ही
कार्य होता है, उसके अभावमें कार्य नहीं होता । फिर तो अन्वय-व्यतिरेकसे
उपकार ही कार्यका कारण हुआ । कूटस्थ कारणके रहनेपर भी कार्य नहीं होता,
अतः कूटस्थ उत्पादक नहीं हुआ—
वर्षातपाभ्यां किं व्योम्नश्चर्मण्यस्ति तयोः फलम् ।
चर्मोपमश्चेत् सोऽनित्यः खतुल्यश्चेदसत्फलः ॥
( नैष्कर्म्यसिद्धि एव सर्वदर्शनसंग्रह )
अतः अभावग्रस्तबीज आदिसे ही कार्यकी उत्पत्ति होती है । ब्रह्मात्मवादी
इसका भी खण्डन करते हैं । उनका कहना है कि अभावसे भावकी
उत्पत्ति नहीं हो सकती, यदि अभावसे भाव उत्पन्न हो तब तो अभाव
सर्वत्र सुलभ ही है, फिर कारण-विशेषकी कल्पना व्यर्थ ही होगी । उपमर्दित
बीजोंका अभाव एव शशविषाण दोनो ही समानरूपसे निःस्वभाव हैं । अतः उनके
अभावत्वमें भी कोई भेद नहीं है । फिर बीजमे अङ्कुर, क्षीरसे दधिके उत्पन्न
होनेका नियम व्यर्थ ही है। यदि निर्विशेष अभाव कारण है तब तो शशविषाण,
खपुष्पादिसे भी अङ्कुरादिकी उत्पत्ति होनी चाहिये, परन्तु ऐसा होता नहीं ।
यदि उत्पलमें नीलत्वके तुल्य अभावमे कुछ विशेषता स्वीकृत है तब तो विशेषवान्
होनेसे अभाव भाव ही हो जायगा । विशेष्यवान् होनेसे उत्पल जैसे भाव है, वैसे
ही विशेष्यवान् होनेसे अभाव भी भाव ही हो जायगा । और फिर तो अभाव कार्य
उत्पत्तिका हेतु भी नहीं हुआ, जैसे शशविषाणादि किसीका हेतु नहीं होता ।
इसके अतिरिक्त यदि अभावसे भावकी उत्पत्ति हो तब तो हर एक कार्यमें
अभावका ही अन्वय दिखायी देना चाहिये, परन्तु देखा जाता है कि इसके विपरीत
सभी कार्य भावरूपसे ही उपलब्ध होते हैं । जैसे मृत्तिकासे अन्वित घटादिको
तन्तु आदिका विकार नहीं कहा जाता, किंतु मृत्तिकाका ही विकार कहा जाता है;
वैसे ही भावान्वित कार्य भावके ही विकार हैं, अभावके नहीं ।
जो कहा जाता है 'स्वरूप-उपमर्दके बिना किसी भी कूटस्थ कारणमे कार्य-
की उत्पत्ति नहीं होती, अतः अभावसे भावकी उत्पत्तिका सिद्धान्त ही ठीक है'—
यह कहना भी ठीक नहीं । स्थिर स्वभाववाले सुवर्ण, मृत्तिका आदि स्पष्टरूपमे कार्यमें
प्रत्यभिज्ञात होते हैं, अतः स्थिरभावमें ही कार्य-कारणभाव मानना युक्त है।
बीज आदिका उपमर्द देखा जाता है, इससे उपमृद्यमाना पूर्वावस्था उत्तरावस्थाका
कारण नही है, किंतु अनुपमृद्यमान बीजावयव ही अङ्कुरादिमें अनुगत होकर कारण

४८६ मार्क्सवाद और रामराज्य

होते हैं। असत् खपुष्पादिसे कार्योत्पत्ति नही होती, सत् सुवर्णादिसे कार्योत्पत्ति
देखी जाती है, अतः भावसे भावकी उत्पत्तिका पक्ष ही ठीक है।
कूटस्थ स्थिर कारण ही क्रमवत् सहकारी कारणोंकी अपेक्षासे कार्यकारी
होते हैं। ये सहकारी अनुपकारक नहीं कहे जा सकते, किन्तु इनके द्वारा आहित
उपकार कारणसे न भिन्न है न अभिन्न, किंतु अनिर्वचनीय है। इसलिये कार्य
भी अनिर्वाच्य ही होता है। फिर स्थिरकी अकारणता नहीं कही जा सकती;
क्योंकि कार्यका वही उपादान है—जैसे कल्पित अनिर्वाच्य सर्पका उपादान रज्जु
होती है।
यदि अभावसे ही भावकी उत्पत्ति होती है तब तो उदासीन, अनीहमान
लोगोंकी भी समीहित सिद्धि होनी चाहिये, क्योकि अभाव तो सभीको सुलभ है।
खेतीके कार्यमे बिना संलग्न हुए भी किसीको सस्यादि प्राप्त होने चाहिये। कुदाल
मृत्तिकादिमें बिना प्रवृत्त हुए भी घटोत्पादन कर सकेगा। तन्तुवाय तन्तुओमे बिना
प्रवृत्त हुए भी वस्त्रलाभ कर लेगा, परंतु यह सब होता नही; अतः भावसे ही
भावकी उत्पत्ति होती है, अभावसे नही।
बीज एवं मृत्तिका-पिण्ड उपमर्द हुए बिना अङ्कुर, बीज आदि उत्पन्न
नहीं होते, अतः अभाव या विनाश ही कार्योंके कारण होते हैं। इस कल्पनाकी
इस पक्षमें अपेक्षा लाघव है। बीज एवं मृत्तिकाको ही कार्योंका कारण माननेमें
नीज या मृत्पिण्डका आकारविशेष कार्यका कारण नहीं है, अतएव अन्वयी
द्रव्य ही कारण होता है। पिण्ड या बीजके आकारविशेषका कार्यमें अन्वय भी
नहीं है। अन्वय बीजावयव एवं मृत्तिकामात्र ही अनुभूत होता है। मृत्तिका
कारण है; क्योकि उसके अभावमें घटका अभाव होता है, परंतु पिण्डादि
आकारके न रहनेपर भी घटकी उपलब्धि होती है। सभी कारण कार्यका उत्पादन
करते हुए अपने पूर्व कार्यका तिरोधान करते हैं, क्योकि एक कारणमें एक कालमे
ही दो कार्य नहीं हो सकते। पूर्वकार्यके उपमर्दसे कारणका स्वरूप नहीं उपमर्दित
होता।
मृत्तिकादिका पूर्व कार्य पिण्डादि हैं, घटादिकी उत्पत्तिके लिये उनका
तिरोधान आवश्यक ही है। कार्यान्तरकी उत्पत्तिके लिये पूर्वकार्यका तिरोधान
आवश्यक होता है, इसलिये पिण्डादिका तिरोधान होता है, इसलिये नही कि कारण
नाश कार्यका हेतु है। असत्कारणवादी कहता है कि पिण्डादिसे भिन्न मृत्तिकादि कुछ
भी नहीं है। यद्यपि कहा जा सकता है कि पिण्डादि पूर्वकार्यके उपमर्दित होनेपर भी
मृदादि कारण नहीं नष्ट हुआ, क्योकि वह घटादि कार्यान्तरमें अन्वित है, परंतु
यह ठीक नहीं; क्योंकि पिण्ड घटादिसे भिन्न मृदादि कारणका उपलम्भ ही नही होता।

मार्क्स-दर्शन ५८७
इसपर वेदान्तीका कहना है कि मृदादि कारणोंसे घटादिकी उत्पत्ति होनेपर
पिण्डादिकी निवृत्ति हो जानेपर भी मिट्टी आदि कारणकी घटादिमें अनुवृत्ति रहती
है। अतः पिण्डादिके विनष्ट होनेपर भी मृदादि कारणका विनाश नहीं हुआ।
असद्वादी कहते हैं कि 'यद्यपि मृत्तिकादि कारण पिण्डादिके नष्ट होनेपर नष्ट हो गया,
घटादिमें मृत्तिकादि कारणका अन्वयदर्शन कारणकी अनुवृत्तिसे नहीं, अपितु
सादृश्यके कारण है। पिण्डगत मृत्तिकासे घटगत मृत्तिका भिन्न है, फिर भी सादृश्य-
के कारण अभेद प्रतीतिसे अन्वयदर्शन-सा होता है।' परंतु यह कहना ठीक नहीं;
क्योकि पिण्डादिगत मिट्टी आदिकोंके अवयवोंका ही घटादिमें प्रत्यक्ष अनुभव
होता है । अतः पिण्डगत मृत्तिकासे घटगत मृत्तिका भिन्न है—यह प्रत्यक्ष नहीं
है, किंतु 'यत् सत् तत् क्षणिक यथा दीपं सन्तञ्चेमे भावाः' जो सत् है वह क्षणिक
होता है जैसे दीप, और सभी पदार्थ सत् हैं; अतः वे क्षणिक होने चाहिये । इस
अनुमानसे मृदादिकारणोंकी भी क्षणिकताका अनुमान करके ही भेद सिद्ध किया
जा सकता है। परंतु 'सैवेयं मृत्तिका' वही यह मिट्टी है—इस प्रकारकी प्रत्यभिज्ञा
प्रत्यक्ष पहचानसे विरुद्ध होनेके कारण यह अनुमान अग्निके अनुष्णत्वानुमान-
के समान अनुमानाभास है।
कहा जा सकता है कि 'प्रत्यक्ष-प्रमाणसे कारणकी एकता प्रतीत होती है
और अनुमानसे भेद प्रतीत होता है, अतः जैसे प्रत्यक्षसे विरुद्ध होनेके कारण अनुमानको
अनुमानाभास कहकर अप्रमाण घोषित किया जाता है, वैसे ही अनुमानविरुद्ध
प्रत्यक्षको ही प्रत्यक्षाभास कहकर अप्रमाण क्यों न घोषित किया जाय ?' परंतु यह
नहीं कहा जा सकता, क्योंकि अनुमान प्रत्यक्षपूर्वक ही हुआ करता है, अतः अनु-
मानद्वारा प्रत्यक्ष न होनेसे प्रत्यभिज्ञासिद्ध प्रत्यक्षका विरोध उपजीव्यविरोध
ठहरता है। इसलिये अनुमान दुर्बल है। अन्यथा यदि अनुमानसे प्रत्यक्ष बाधित
होगा तब तो सर्वत्र ही अनाश्वास होगा।
कहा जा सकता है कि प्रत्यभिज्ञा स्वार्थमें स्वतःप्रमाण नहीं हो सकती, किंतु
दूसरी बुद्धियोंके संवादसे ही उसका प्रामाण्य हो सकता है, परंतु स्थायित्व-साधक
दूसरी कोई बुद्धि नहीं है, अतः 'प्रत्यभिज्ञासिद्धः प्रत्यभिज्ञायमानः' अर्थ भी क्षणिक
ही है। परंतु यह भी कहना ठीक नही, क्योकि इस तरह तो अनुमान-सिद्ध
क्षणिकत्वबुद्धि भी स्वार्थमे स्वतः प्रमाण न होनेसे उसे भी तादृग् दूसरी बुद्धिकी
अपेक्षा होगी। उस दूसरी बुद्धिको भी अपने प्रामाण्यके लिये तादृक् तीसरी
बुद्धिकी आवश्यकता होगी—इस तरह अनवस्था प्रसङ्ग होगा। अतः प्रत्यभिज्ञाके
प्रमाण-बुद्धिका स्वतः प्रामाण्य ही अङ्गीकार करना ठीक है। इस दृष्टिसे प्रत्यभिज्ञान
भी स्वतः प्रमाण है।
जो कहते हैं कि प्रत्यभिज्ञा भी सादृश्यके कारण भ्रमरूप है। 'त एवेमे केशाः'
—ये वही बाल हैं, इत्यादिस्थलोमे बालोकी भिन्नता रहनेपर भी सादृश्यके कारण

अभिन्नता प्रतीत होती है, उसी तरह 'सैवेयं मृत्तिका' वही यह मिट्टी है, इत्यादि
स्थलोंमें भी सादृश्यके कारण ही अभेदकी प्रत्यभिज्ञा होती है, उनका कथन भी
ठीक नहीं; क्योकि एक स्थायी अनुभविता न होनेसे पूर्वोत्तर कालवर्ती तत्पदार्थएव
इदं पदार्थका ग्रहण ही नहीं होगा । उनके ग्रहण हुए बिना 'तेनेद सदृशम्' यह
सादृश्य-बुद्धि ही नहीं होगी । फिर सादृश्य-बुद्धिमूलक भी प्रत्यभिज्ञाको कैसे
कहा जा सकता है ? कोई भी क्षणिक बुद्धि या क्षणिक द्रष्टा भिन्न कालवर्ती पदार्थोंको
नहीं ग्रहण कर सकता । इस सम्बन्धमें विज्ञानवादी बौद्धोंका कहना है कि बाह्यार्थके
बिना ही बुद्धियाँ उत्पन्न होती हैं, अतः सादृश्य बिना ही अर्थात् असत् सादृश्यमें
ही सादृश्य-बुद्धि होती है । परंतु इस तरह तो तत् पदार्थ और इद पदार्थकी
बुद्धि भी सादृश्य-बुद्धिकी तरह ही असद्विषयक ही समझी जायगी । यदि कहा
जाय कि ऐसा भी अभीष्ट ही है अर्थात् विज्ञानवादी बाह्य अर्थका अस्तित्व ही
नहीं अङ्गीकार करता । अतः सभी बुद्धियाँ बाह्य विषयके बिना ही उत्पन्न होती हैं
तो यह भी ठीक नहीं, क्योकि फिर तो बुद्धि, बुद्धि भी असद्विषयक ही होगी ।
अतः बाह्य अर्थके समान ही आन्तर अर्थ ( बुद्धि ) का भी असत्त्व सिद्ध हो
जायगा । यद्यपि शून्यवादी इसे भी अभीष्ट ही मानता है, तथापि यदि सर्वबुद्धि
मिथ्या ही हो तो असद्बुद्धि भी मिथ्या हो जायगी । फिर तो असत् या शून्यकी
सिद्धि भी असम्भव ही होगी । इसलिये सादृश्य-बुद्धिसे प्रत्यभिज्ञा होती है—यह
कहना गलत है । तथा च कार्योत्पत्तिके पहले कारणका सद्भाव सिद्ध होता है ।
संसारमें तम आदिद्वारा प्रावृत घटादि वस्तु आलोकादिके द्वारा प्रावरण तिरस्कार-
से अभिव्यक्त होती है । अतः अभिव्यक्तिके पहले भी उसका अस्तित्व होता है।
उसी तरह घटादि कार्य भी कारण-व्यापारद्वारा आवरण तिरस्कारसे अभिव्यक्त
होता है । अतः अभिव्यक्तिके पहले भी उसका अस्तित्व मान्य होना चाहिये ।
जैसे अविद्यमान वस्तु सूर्योदय होनेपर भी उपलब्ध नहीं होती, उसी तरह कार्य
यदि उत्पत्तिके पहले अविद्यमान होता तो कारक-व्यापारसे भी उसकी अभिव्यक्ति
सर्वथा असम्भव ही होती ।
कहा जा सकता है कि सत्कार्यवादीके मतानुसार यदि घटादि कार्य कभी
भी अविद्यमान नहीं है, तब तो सूर्योदय होनेपर उसका सदा ही उपलब्ध होना
चाहिये, किंतु यह ठीक नहीं; क्योकि आवरण दो प्रकारके होते हैं—जैसे अभिव्यक्त
घटका तम आदि आवरण है, उसी प्रकारसे अभिव्यक्तिके पहले अनभिव्यक्त घटका
आवरण है मृदादि अवयवोका पिण्डादि कार्यान्तररूपसे संस्थान । इसलिये जबतक
मृदादि अवयवोंकी पिण्डादि कार्यान्तररूपसे स्थिति रहती है, तबतक अर्थात् उत्पत्ति-
के पहले घटादि कार्य उसी आवरणसे आवृत्त होनेके कारण उपलब्ध नहीं होते ।
उसी आवरणके भङ्ग होनेसे घटादि कार्योंकी उत्पत्तिका व्यवहार होता है । जैसे
तम हटनेसे घटादिके व्यवहारका भाव होता है, वैसे ही पिण्डादिसे तिरोभूत

रहनेपर अभावका व्यवहार होता है । कपालादिसे तिरोभूत होनेपर घटादिके
नष्ट होनेका व्यवहार हुआ करता है। कहा जा सकता है कि पिण्ड-कपालादि
घटादिके समान देशवाले होनेके कारण आवरण नहीं हो सकते, क्योंकि तम और
कुड्यादि (दीवार) आवरण घटादिसे भिन्न देशवाले होते हैं अर्थात् आवृतके देशसे
भिन्न देशवाला ही आवरण होता है, परंतु पिण्ड-कपाल आदि तो सर्वथा आवृतके
ही देशवाले होते हैं। यह कहना भी ठीक नहीं, क्योंकि क्षीर जलके समान देशमें
रहकर भी जलका आवरक रहता है । समानदेशत्व आवरणका बाधक है—इसका
क्या अभिप्राय है ? एकाश्रयाश्रितत्व या एककारणत्व ? अर्थात् जो दो वस्तु
एक आश्रयमें आश्रित होते हैं उनमें एक दूसरेका आवरक नहीं होता । अथवा
जिन दो वस्तुओंका एक ही कारण होता है उनमें एक दूसरा आवरक नहीं होता। इनमें
पहला पक्ष ठीक नहीं, क्योंकि एकाश्रयाश्रित होनेपर भी क्षीरके द्वारा क्षीरमिश्रित जलका
आवरण होता ही है, तथा दूसरा पक्ष भी ठीक नहीं, क्योंकि कार्यभेदसे कारणका
भेद होता है । अतः घटादिके

४९० मार्क्सवाद और रामराज्य
वह अभाव क्या है ? घटका स्वरूप ही है या अर्थान्तर ? यदि प्रथम पक्ष कहे तो
ठीक नहीं; क्योकि यदि घटस्वरूप ही हो तो घटके द्वारा उसका व्यपदेश कैसे
हो ? अर्थात् अभेदमे घटका प्रागभाव इस रूपसे भेदमूलक सम्बन्ध व्यवहार
कैसे होगा ? यदि कहा जाय कि कल्पित सम्बन्धको ही लेकर व्यवहार बनता है
तो भी यही कहना पडेगा कि कल्पित अभावका ही 'घटस्य प्रागभावः' इस रूपसे
व्यवहार होता है। घटस्वरूपका घटसे व्यपदेश नहीं बन सकता । यदि कहा जाय
कि घटाभाव घटसे अर्थान्तर है तो वह घटसे अर्थान्तर कारणरूप ही हुआ तथा
च घटप्रागभाव घटकारणरूप ही ठहरा ।
अभिव्यञ्जकके व्यापार होनेसे नियमेन घटकी अभिव्यक्ति होती है,
अभिव्यञ्जक व्यापार न होनेसे नहीं । इस तरह अन्वयव्यतिरेकसे घटादि कार्योंके
लिये कुलालादि-व्यापार सार्थक होते हैं । उस व्यापारसे आवरण-भङ्ग आर्थिक
रूपसे हो जाता है । कारणमे वर्तमान एक कार्य इतर कार्योंका आवरक होता है ।
यदि घटादिके पूर्वाभिव्यक्त पिण्डादि

मार्क्स-दर्शन ४९१
उस तरह विकसित बीजमें अन्तर्विरोध, वर्गभेद, वर्गसंघर्ष एवं वर्ग-
विध्वंसरूपी वाद-प्रतिवादके अङ्कुरका फलपर्यन्त विकास होना और उससे पुनः
उसी प्रकार अङ्कुरानन्तररूपी विकासान्तरकी उत्पत्ति यद्यपि किसी अंशमें इष्ट है
तथापि भूतोंकी उत्पत्तिमें यह नियम व्यभिचरित है। आकाशसे वायुकी उत्पत्ति
होती है, फिर भी आकाश बना रहता है। वायुसे तेजकी उत्पत्ति होनेपर भी वायु
नष्ट नहीं हो जाती, इसी प्रकार तेजसे जल एवं जलसे भूमि उत्पन्न होनेपर भी
कारण बने ही रहते हैं। कार्यके विकासान्तर होनेपर प्रथम विकास समाप्त हो जानेका
नियम सर्वथा अदृष्ट है। वृक्षसे फलोंके विकसित होनेपर भी वृक्षोंके नष्ट होनेका
नियम नहीं है। मनुष्य, पशु आदिसे मनुष्य, पशु आदिकी उत्पत्ति होनेपर भी
कारणका विनाश नहीं होता । भूत भी सावयव होनेसे कार्य है। जो-जो भी सावयव
होता है, घटादिके समान कार्य ही होता है। साथ ही जो भी कार्य है, उसे सकर्तृक
एवं सोपादान भी होना चाहिये। कर्त्ता चेतन होता है, इस दृष्टिसे ईश्वरसिद्धि
होती है एवं कार्यकी अपेक्षा उपादान व्यापक, शुद्ध एवं नित्य होता है, इस दृष्टिसे
कार्यकी अपेक्षा कारणकी अनश्वरता, स्वच्छता एवं व्यापकताका ही निर्णय होता
है। इस तरह पृथ्वी जलसे, जल तेजसे, तेज वायुसे एवं वायु आकाशसे उत्पन्न
होता है, यह श्रुतियों एवं युक्तियोंसे सिद्ध है। यहाँ वाद-प्रतिवाद, समन्वय आदिका
सिद्धान्त व्यभिचरित एवं अत्यल्पदेशीय ही सिद्ध होता है।
पाश्चात्त्य वैज्ञानिक कहते हैं 'कि गणितशास्त्रके किसी अङ्क चिह्नको
लीजिये '+क'। इसका प्रतिषेध है '-क'। यदि '-क' से गुणाकर हम इसका
प्रतिषेध करते तो इसका फल होता है 'क²'। प्रतिषेधके प्रतिषेधसे मूल अङ्क फिर
लौट आया, लेकिन और ऊँचे स्तरपर अपने वर्गफलके रूपमें। इसमें कोई हानि-
की बात नहीं है। यही नतीजा क और क के गुणासे भी प्राप्त होता है; क्योंकि
'क²' के वर्गमूलमें सदा दोनो अङ्क रहते हैं 'क' और '-क'। संख्याणुगणितके द्वारा किसी
गणितकी समस्याका हल तो इसका और भी अच्छा उदाहरण है। दो अङ्क चिह्न
'क' और 'ख' ले लीजिये। जिनके परिवर्तनका आपसी सम्बन्ध निर्धारित है।
यानी किसी एकमें परिवर्तन हो तो दूसरेमें परिवर्तनका स्थिरीकरण उस उक्त
सम्बन्धसे हम कर सकते हैं। यदि हम दोनोका प्रतिषेध करें तो घटते-घटते ये
दोनों अङ्क नहींके बराबर हो जाते हैं। लेकिन उनका पूर्व सम्बन्ध ज्यों-का-त्यों
बना रहता है । इसको अङ्कमें हम यों रख सकते हैं । संख्याणु+'क' / संख्याणु+'ख' लेकिन
यह सम्बन्ध बराबर है, क/ख के अत इस प्रतिषेधके द्वारा जब हम उस
समस्याको हल कर लेते हैं, तो हम फिर मूल अङ्कपर उपनीत होते हैं। पूर्व प्रतिषेध
का प्रतिषेध और समस्याका हल हो गया।'