मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)
Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
मार्क्सीय अर्थ-व्यवस्था ४१७
जायगी किंतु भूँकनेकी स्वतन्त्रता न रह जायगी । बकरीको चना मिल जायगा,
किंतु जुगाली करनेकी स्वाधीनता न रहेगी । ऐसे ही किसी तरह कुछ रोटी-कपड़ा
मिल जायगा, पर धार्मिक आचार-विचारोंकी स्वतन्त्रता नहीं रह जायगी ।
रामराज्य-प्रणालीमें सब प्रकारकी स्वाधीनता एवं सामञ्जस्य होनेसे संघर्ष बचेगा ।
धर्मनियन्त्रण तथा विवेकसे अभ्युदय तथा आर्थिक संतुलन एवं समन्वय
हो सकता है।
व्यक्तिगत-सम्पत्तिका सिद्धान्त रहनेपर ही उत्तराधिकारकी बात चलती
है । यह भी पशुओंकी अपेक्षा मनुष्योंकी ही विशेषता है कि पिता-पितामह आदिकी
सम्पत्ति पुत्र-पौत्रोंकी बपौती सम्पत्ति होती है, एतदर्थ धर्मका सम्बन्ध भी अनिवार्य होता
है । पिता आदिको पिण्ड-श्राद्धादि प्रदान करनेके अधिकारी ही दायाधिकारी
होते हैं । इसके लिये प्रत्यक्ष-अनुमानसे भिन्न एक वचन प्रमाण भी मानना पड़ता
है । पिताकी सम्पत्तिपर विवाद उठनेपर सिद्ध करना पड़ता है कि अमुक हमारे
पिता हैं । इसे सिद्ध करनेके लिये प्रत्यक्षानुमान असमर्थ हैं । इसमें तो माता-
पिताका वचन ही प्रमाण मानना पड़ता है । उसके बिना पिता आदिकी सिद्धि
नहीं हो सकती । वचन प्रमाण माननेपर ही माता-भगिनी, पुत्री-पत्नी आदिमें भी
भेद सिद्ध होता है । तदनुसार ही संसारभरमें सर्वत्र भेद-व्यवहार चलता है ।
पत्नी, पुत्री, भगिनी सभी स्त्री हैं । फिर भी पत्नी, भगिनी आदिके साथ व्यवहार-
भेद करना पड़ता है । पशुओंमें प्रत्यक्षानुमान तो मान्य है, किंतु आगम—वचन
प्रमाण मान्य नहीं है, अतः उनके यहाँ न व्यक्तिगत सम्पत्ति है न उत्तराधिकार
है और न पत्नी, भगिनी, पुत्री, माता आदिका भेद-व्यवहार ही चलता है । वह
इनमेंसे किसीको भी पत्नी बनाकर संतान पैदा कर सकता है, पर यह सब मानवताके
विपरीत है । जिस दिन मनुष्य भगिनी-पुत्रीसे संतान उत्पन्न करने लगेगा, उस
दिन मनुष्यता-पशुतामें कोई भेद न रहेगा । कम्युनिष्ट भी ऐसा करनेका साहस
नहीं कर सकता है ।
इस तरह रामराज्य-प्रणालीमें आगम-प्रमाण तथा धर्मका भी आदर कर
पितृपितामहादिकी सम्पत्तिका उत्तराधिकार तथा धार्मिक विवाहादिकी मान्यता होती
है । स्वार्थ-परार्थका समन्वय करके व्यष्टि-समष्टिके अभ्युदयका प्रयत्न किया जाता है ।
यह सही है कि लोभाभिभूत व्यक्ति या राष्ट्र आत्मनाश नहीं देखते ।
हरित तृणके लोभमें बकरी कूप-पतनकी चिन्ता नहीं करती है, मधुलोभमें पड़कर
प्राणी आत्मप्रपात नहीं देखता, पर कोई भी समझदार सर्वनाश देखकर समझौता
करता ही है । अमेरिका और रूस दोनों ही एक-दूसरेका नाश चाहते हैं । दोनों
ही परमाणु, हाइड्रोजनबमकी धमकी देते हैं । तथापि एक दूसरेके भयसे नियन्त्रित
मा० रा० २७—
है; तभी तो आज सह-अस्तित्वका राग अलापा जा रहा है । यदि रूसी साम्राज्य-
वादियोंके साथ सह-अस्तित्व सम्भव समझते हैं, तब तो साम्राज्यवादी भी परस्पर
तथा आत्महितकी कामनासे अपने लोभकी मात्राको संकुचित कर सकते हैं ।
इस समय संयुक्तराष्ट्रसंघद्वारा भी बहुत कुछ नियन्त्रण और समन्वय हो सकता
है । मार्क्सवादियोंके मतानुसार भी जब अन्ताराष्ट्रिय मजदूर-राज्य स्थापित हो
जायगा, तभी सब संघर्षोंका अन्त हो सकता है । धर्मनियन्त्रित रामराज्यवादीके
सार्वभौम शासनमें तो स्पष्ट ही उसके द्वारा सब अन्यायोंका निराकरण हो जायगा ।
इसे ऐतिहासिक अनुभवोंके विपरीत नहीं कहा जा सकता । भले ही आधुनिक
मनगढंत मिथ्या इतिहासके अनुसार रामराज्य ऐतिहासिक तथ्य न हो, परन्तु
आर्ष प्राचीन इतिहासके अनुसार अखण्ड भूमण्डलव्यापी सार्वभौम रामराज्य
परम ऐतिहासिक तथ्य है । हाँ, मार्क्सका सर्वहारा राज्य अभीतक निराकार
स्वप्न ही है । इतिहास साक्षी है कि धर्महीन, जडवादी राज्य कभी पनप नहीं सका है।
शान्ति और समन्वय तो धर्महीन राज्यमें असम्भव है । काट्स्कीका अन्ताराष्ट्रिय
पूँजीवादी साम्राज्यवाद तथा मार्क्सका विश्वव्यापी सर्वहारा राज्य मुकाबिलेकी ही
चीज है । किंतु रामराज्यवादीका धर्मनियन्त्रित सार्वभौम राज्य सहस्रशः अनुभूत
प्रयोग है । मान्धाता, दिलीप, अज, रामचन्द्र, नहुष, पुरूरवा, अलर्क आदिका
अखण्ड भूमण्डलवर्ती धर्मराज्य पूर्णतया शान्तिके स्थापक रह चुके हैं । लाखो
वर्षोंके अनुभवोंके सामने सौ-दो सौ-वर्षके मार्क्सवादी अनुभव कुछ भी मूल्य
नहीं रखते । मार्क्सवादी सर्वहारा राज्य या पूँजीवादियोका अन्ताराष्ट्रिय साम्राज्य-
वाद किसी पथको अपनाये, उसमें धर्म-नियन्त्रणके बिना लूट-खसोटका अन्त
नहीं हो सकता ।
मार्क्सवादमें यह भी कहा जा सकता है कि वहाँ किसीके पास कुछ चीज़
नहीं रह जायगी, फिर कौन किसकी क्या चीज लूटेगा ? इसमें तो सभी फाँकेमस्त
ही होगे, परंतु रामराज्य-प्रणालीमें तो सार्वभौमका नाममात्रका ही नियन्त्रण होगा,
वस्तुतः सर्वोपरि धर्मका ही नियन्त्रण मुख्यरूपसे रहेगा । मार्गमे पड़े हुए दो लाख-
कें नोट पाकर जिसका है उसे लौटा देनेकी सलाह मार्क्सवादी नही दे सकता । यह
तो रामराज्यवादी ही कह सकता है । परान्न या परद्रव्य मार्गमें हो चाहे गृहमें
ही पड़ा हो, विधिपूर्वक बिना पाये नही लेना चाहिये । यहाँ तो बाजारोंमें माल भेजनेका
उद्देश्य केवल मुनाफा नहीं, किंतु वितरण ही है । लाभ भी अवश्य हो सकता है,
किंतु वह आनुषङ्गिक है, मुख्य नहीं । अतएव किसीके द्वारा किसी राष्ट्रके शोषण-
की भी बात नहीं आयेगी, क्योकि समानता, स्वतन्त्रता, भ्रातृत्ताके दृष्टिकोणसे
जैसे एक व्यक्ति दूसरेका पोषक होगा, वैसे ही एक राष्ट्र, एक वर्ग भी दूसरे राष्ट्र,
दूसरे वर्गोंका शोषक न होकर पोषक ही होगा ।
मार्क्सवादियोंका यह आरोप पाश्चात्त्य पूँजीवादियोंके लिये सही हो सकता
है कि पैदावार समाजके हितार्थ नहीं होता, मुनाफा कमानेके लिये ही होता
है, किंतु रामराज्यवादियोंके लिये यह आरोप सर्वथा निराधार ही है, क्योंकि
रामराज्यवादीके मतमें तो बलवान्का बल शोषणके लिये नहीं रक्षणके लिये
है। धनवान्का धन शोषणके लिये नहीं दानके लिये होता है। उत्पादनसे
समाजको वस्तु मिलेगी। उत्पादकको लाभ भी मिल सकता है। आम्रका सिञ्चन भी
हो जाय, पितरोंका तर्पण भी हो जाय—‘एकक्रिया द्व्यर्थकरी’का उदाहरण स्पष्ट है।
मार्क्सवादियोंका यह कथन भी सही नहीं कि ‘आर्थिक शोषणके कारण ही
संग्राम होते हैं।’ सदा अनेकों कारणोंसे संग्राम होते ही रहे हैं। जैसे
समान लक्ष्य रहनेपर भी कम्युनिष्टोंमें पदाधिकार-लिप्सासे मारकाट होती रहती
है, उसी तरह सार्वभौम बननेकी इच्छासे भी अनेको युद्ध हुए हैं। मनुष्योंमें ही
क्या, पशु-पक्षियोंमें भी तो विभिन्न कारणोंको लेकर सघर्ष तथा युद्ध होते रहते हैं,
कहीं सम्पत्तिके लिये, कहीं भूमिके लिये, कहीं कन्याके लिये, कभी धर्मके लिये, कभी
मान-प्रतिष्ठा, इज्जत-आबरूके नामपर भी संग्राम हुए हैं। देवताओं-असुरोंका संग्राम
कौरव-पाण्डवोंका संग्राम, राम-रावणका संग्राम केवल आर्थिक विषमताके लिये नहीं हुए।
संसारमें प्रतिस्पर्धासे उन्नति होती है। आजकल भी अन्नोत्पादनमें, पशुपालनमें,
तैरनेमें, उड़नेमें, चलनेमें—हरबातोंमें प्रतियोगिता चलती है। प्रतियोगिता उन्नति-
का मूल है, एतदर्थ पुरस्कार भी वितरण किया जाता है। प्राणीका यह स्वभाव
भी है कि लाभके लोभ और हानिके भयसे उत्प्रेरित होकर वह तन्मयतासे काम
करता है, अतः उत्पादनमें होड़ होना अनुचित नहीं है। फिर भी रामराज्यकी
नीतिका अनुवर्तन करनेसे आर्थिक असंतुलन नहीं हो सकता। धनका धर्मार्थ,
यशोऽर्थ, अर्थार्थ, कामार्थ और स्वजनार्थ इस तरह पञ्चधा विभाग होनेमे आर्थिक
असंतुलन अवश्य ही दूर हो सकता है। यज्ञादि प्रसङ्गसे भी अर्थका वितरण होनेसे
आर्थिक असंतुलन दूर होता है। रामराज्यकी दृष्टिमें एक वर्ग दूसरे वर्गका पोषक
होता है, शोषक नहीं। रामराज्यमे कोई भी दरिद्र, दुखी, अबुध और लक्षणहीन
नहीं था—
नहिं दरिद्र कोउ दुखी न दीना। नहिं कोउ अबुध न लच्छन हीना॥
सब प्राणी परस्पर प्रेम करते थे, सब स्वधर्म निरत थे, और सब श्रुतिके
अनुसार चलते थे—
सब नर करहिं परस्पर प्रीती। चलहिं स्वधर्म निरत श्रुति नीती॥
हाथी और शेर प्रेमसे साथ-साथ विहार करते थे—
चरहिं एक सँग गज पंचानन।
धन, विद्वान् और शक्तिमानोंका बाहुल्य होना राष्ट्रका भूषण है, दूषण नहीं।
जब सभी समानरूपसे बलवान्, बुद्धिमान् एव समान क्रियावान् नहीं होते, तब सभीके
४२० मार्क्सवाद और रामराज्य
समान धनवान् होनेकी कल्पना भी व्यर्थ है। निर्बल बलवान्का सहारा चाहता है,
अल्पबुद्धि विपुल बुद्धिकी अपेक्षा करता है। इसी तरह सब लोग समानरूपसे
धनार्जन नहीं कर सकते, अतः अल्पधन भी विपुलधन-सम्पन्नकी अपेक्षा कर
सकता है। इसीलिये योग्यता एवं आवश्यकताको ध्यानमें रखते हुए ही 'चींटीको
कणभर और हाथीको मनभर' के अनुसार सभीके लिये समुचित काम, दाम और
आरामकी व्यवस्था होनी चाहिये—यह रामराज्यका सिद्धान्त है। इससे लूले, लँगड़े,
वृद्ध-अपाहिज आदिका भी निर्वाह होगा। इसी दृष्टिसे सबको सस्ता कपड़ा,
सस्ती रोटी, सस्ता आवास-स्थान, सस्ती शिक्षा, सस्ती चिकित्सा और सस्ता न्याय
सुलभ हो सकेगा। उद्यमोंमें होड़, बाजारों, पेट्रोल, कोयलों आदिके लिये संग्राम
आदि तबतक अवश्य बने रहेंगे, जबतक एक राष्ट्रसे दूसरे राष्ट्रका भेद बना रहेगा।
सिद्धान्त और शासनकी दृष्टिसे एक दूसरेको अपनेमें मिलानेके लिये सभी प्रयत्न-
शील बने ही रहेंगे। सब कम्युनिष्ट हो जायें, सब सोवियत-संघमें मिल जायें, तभी
संघर्ष रुक सकता है। परंतु फिर भी लेनिन, ट्राटस्की, स्टालिन आदिमें जैसे
संघर्ष चला, वैसे ही सत्ता हथियानेके लिये संघर्ष चल ही सकता है। इस दृष्टिसे
सर्वोत्तम पक्ष धर्म-नियन्त्रित शासनका है, जिसमें पृथक्-पृथक् शासन रहनेपर
भी युद्ध, संघर्षसे सब दूर रह सकते हैं। यदि अखण्ड भूमण्डलका एक ही धर्म-
नियन्त्रित शासक हो, तभी सब सुख-स्वप्न पूरे हो सकते हैं। जिन कम्युनिष्टोंका
वर्ग-भेद, वर्ग-संघर्ष एवं वर्ग-विध्वंस ही अभ्युदयका मार्ग है, उनकी सद्भावना और
भ्रातृता कैसी है—यह समझनेमें किसीको कठिनाई न होगी। सब चीजें समाजकी हों
यही कहकर सब चीजें मुट्ठीभर मजदूर अधिनायकोंके हाथकी ही बना दी जायेंगी।
बैलगाड़ीवालो, ऊँटवालो, गधेवालों—सबका पूर्ण सत्यानाश तो कम्युनिज्ममें ही होगा।
किसान, व्यापारी तथा बुद्धिजीवी-वर्गको भी कम्युनिष्ट अधिनायकोंके दास बनकर ही
गुलामीका जीवन बिताना पड़ता है। नमूनेके तौरपर कुछ शहरो, ग्रामोंमें अवश्य
मजदूरोंको स्वर्ग दिखायी दे, परंतु व्यापक तौरपर रूसकी कहानी तो कुछ और है।
जो इसे अपनी आँखों देख चुके हैं, उनके वर्णनोंको 'पत्थरके देवता' नामक
पुस्तकमें कोई भी देख सकता है।
जो कहा जाता है कि 'कम्युनिज्ममें हर काम हर व्यक्तिको सिखलाया
जायगा' यह भी अत्यन्त अव्यावहारिक बात है। सब काम सब नहीं कर सकते, सब काममें
सबको दक्षता भी नहीं प्राप्त हो सकती है। प्रत्येक व्यक्तिको उच्चकोटिकी मोटरें,
नये-नये वायुयान सुलभ कर देना कम्युनिस्टोंका दिमागी पुलावमात्र है। जब
सैनिक और सेनापति, शासक और शासितका भेद न रहेगा, तब कोई भी व्यवस्था
न चल सकेगी। यदि उपर्युक्त भेद रहेगा तो रूपान्तरसे वही स्वामी और सेवकका
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माक्र्सीय अर्थ-व्यवस्था ४२१
भाव आ ही जाता है । अफसर और मातहत लोगोंमें भी वही भावनाएँ
चलती हैं ।
धर्म और ईश्वरपर विश्वास होनेसे ही प्राणी अत्याचार, पापाचार आदिसे-
बचता है । अन्यथा शासकोंकी आँखमें धूल डालकर लोग मनमाना अनाचार, दुराचार
कर सकते हैं । धर्म और ईश्वरकी कल्पना न होनेसे ही व्यक्ति, समाज और राष्ट्र
परस्पर एक दूसरेसे जाल-फरेब करते हैं । धर्म और ईश्वरपर विश्वास होनेसे
प्राणिमात्रमें परमेश्वरका अस्तित्व दिखायी देता है । सब प्राणी परमेश्वरकी
संतान हैं (‘अमृतस्य पुत्राः’), फिर किससे विग्रह और किससे वैर ? यह भावना
सिवा अध्यात्मवादके जडवादमें कभी पनप ही नहीं सकती । अध्यात्मवादमें ही
‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ का पाठ पढाया जाता है । जडवादमें तो थोड़ा-सा ही मतभेद
होनेपर एक दूसरेको मौतके घाट उतार देनेकी बात सोची जाती है ।
रामराज्य ही महायन्त्रोंका निर्माण रोकना और उद्योग-धंधोंका विकेन्द्रीकरण करना
चाहता है, परंतु कम्युनिज्ममें तो यन्त्रीकरणका विस्तार ही अभीष्ट है, फिर
छोटे-छोटे कारीगरों या बैलों, ऊँटों, गधों आदिकी समस्या कम्युनिज्ममें कैसे हल
होगी ? रामराज्य-परिषद्की दृष्टिमें आर्थिक असंतुलन दूर करनेकी पूर्ण योजना है
ही । पूँजी और श्रम दोनोंही उत्पादनके मूल हैं । दोनोंकी उचित कदर की
जायगी । विविध प्रकारके करों तथा आयात-निर्यातोंके सम्बन्धमें सदा ही समष्टि
तथा व्यष्टिके हितोंका ध्यान रखा जाता है । व्यक्ति, समाज, राष्ट्र और
विश्व—सभी आत्मोन्नतिके उपाय कर सकते हैं, परंतु समष्टिके परस्पर हितका
सामञ्जस्य रखना उनका अनिवार्य कर्त्तव्य है । यह केवल कम्युनिस्टोंकी ही
बात नहीं है, किसी भी शासनमें समूचा राष्ट्र ही एक कुटुम्ब माना जाता है । सर्वत्र
राष्ट्रके उन्नायकों, नेताओं तथा प्रबन्धकोंकी योग्यता और ईमानदारीके अनुसार-
ही उत्पादन एवं वितरणकी ठीक-ठीक व्यवस्था होती है । खपतके अनुरूप ही
माल पैदा करनेका नियम रामराज्य-पद्धतिमें रहता है, क्योकि समष्टि-हितके
अविरुद्ध ही व्यष्टिको प्रत्येक कार्य करनेकी स्वाधीनता मान्य है । शास्त्रों एवं
तर्कोंसे किसीकी बपौती, मिल्कियत एवं गाढे पसीनेकी कमाई और दान या
पुरस्कारमें पायी हुई सम्पत्तिका अपहरण करना अन्याय एव पाप है ।
अवश्य ही उत्पत्तिके पुराने साधनों एव पद्धतियोंमें रद्दोबदल होनेसे
उत्पादनमें विस्तार हो जाता है । उत्पन्न वस्तुओंमें सस्तापन भी आता है, आमदनी-
में भी वृद्धि हो जाती है । खपतके लिये बाजारोंकी आवश्यकता, माल भेजने,
मँगानेके लिये एवं कारखानोंके लिये कोयले, पेट्रोल आदिके खानोंकी आवश्यकता,
बाजारों एवं कोयले, पेट्रोल आदिके लिये संघर्ष और बेकारीकी समस्या आदि
भी खडी हो जाती हैं । इसीलिये रामराज्यमें उद्योगोंका विकेन्द्रीकरण ही अभीष्ट
है । छोटे-छोटे व्यवसायोंद्वारा स्वावलम्बी ढंगसे बेकारी दूर करके व्यापक-
रूपसे रोजगारोंकी व्यवस्था की जाती है। कम्युनिष्ट यद्यपि बड़ी-बड़ी पुस्तकोंमें कल-
कारखानोंके द्वारा गरीबोंके रोजगार छिन जानेकी चीख-पुकार मचाते हैं, परंतु
उन्हीं कल-कारखानोंका वे समर्थन भी करते हैं। इतना ही क्यो, वे कल-कारखानों-
के विस्तारसे ही लाखोंकी संख्यामें मजदूरोका एकत्रित एवं संगठित हो सकना और
मजदूर-आन्दोलनोके द्वारा कम्युनिष्टराज्य-स्थापनाका भी स्वप्न देखते हैं।
ईश्वर एव धर्मकी भावना दृढ़ होनेसे वैभव एवं सम्पत्तिवाले अपनी सम्पत्तिका
सदुपयोग राष्ट्रके पोषण तथा जीवन-स्तर उन्नत करनेमें करेंगे। बेकारी दूर करनेके
काममें उनकी सम्पत्ति उपयुक्त होगी । इसीलिये प्राचीनकालमे आजकी अपेक्षा
कहीं अधिक सम्पत्ति, शक्ति, बल, विद्या और दक्षताके रहनेपर भी असंतुलित
विषमता, बेकारी, कलह आदि नहीं थे। ईश्वर एवं धर्मकी भावना घटनेसे ही
मात्स्य न्याय, परस्पर भक्ष्य-भक्षकभाव, शोषक-शोषितभाव बढ़ता है और उसे
ही मार्क्सवादी गुण मानते हैं। वर्ग-कलह, वर्ग-विद्वेष तथा वर्ग-विध्वंस ही जिस
संस्थाके सिद्धान्त एव आधार हों, वे ही जिसके जीवन एव उन्नतिके एक-
मात्र साधन हों, उससे विश्वशान्ति एवं विश्वमें समानता, स्वतन्त्रता, भ्रातृत्ताकी
स्थापनाकी आशा करना व्यर्थ ही है ।
उत्पादन-विस्तारसे इस तरह कुछ भौतिक परिवर्तन होनेपर भी धर्म,
दर्शन एव राजनीतिक-नियमों, स्वत्वोंमें रद्दोबदलका कोई प्रसङ्ग नहीं होता ।
अमेरिका आदिकोंमें बिना मौलिक रद्दोबदलके भी काम चलता ही है। आर्थिक
दशा सामाजिक, धार्मिक नियमोंका नींव ही नही है, जिससे कि आर्थिक दशामें
परिवर्तन होनेसे सामाजिक, धार्मिक नियमरूपी भवन ढह पड़े और उनमें
रद्दोबदल करना आवश्यक हो । जो यह कहा जाता है कि 'जिन लोगोंने
उत्पादन-साधनोंमें रद्दोबदल कर लिया, उन्हे उत्पन्न हुई वस्तुओंके वितरण-
सम्बन्धी नियमोंमें भी परिवर्तन कर लेनेका अधिकार मानना न्यायसङ्गत है।
अतः पुत्र-पौत्र आदिका पिता-पितामहकी सम्पत्तिपर दायभूतसे बपौती-सम्पत्तिके
रूपमें अधिकार माननेके नियममे भी हेरफेर करके तथा सभी स्वत्व-सम्बन्धी
पुराने नियमोंमें परिवर्तन करके समाजीकरण या राष्ट्रीयकरणका सिद्धान्त माना जाना
ठीक ही है।' परंतु यह बात विचारणीय है कि उत्पादन-साधनोंमें परिवर्तन
करनेका मुख्य श्रेय किसको है ? क्या साधारण मजदूर-समुदायको ? नही, मानना
पड़ेगा कि इसका पहला श्रेय बडे वैज्ञानिको एव अन्वेषकोको है । फिर ऐसे भी
बहुतसे शाश्वत नियम हैं, जिनमें परिवर्तन असम्भव है। ऐसी दशामें यह सब कथन
भी निस्सार है। इसपर विस्तृत विचार आगेके ४२८ से ४३२ पृष्ठोंपर देखना चाहिये।
सप्तम परिच्छेद
ऐतिहासिक भौतिकवाद
इतिहास क्या है ?
मार्क्सके ऐतिहासिक भौतिकवादपर विचार करनेके पूर्व यह समझना
आवश्यक है कि 'इतिहास' है क्या ? यूनानी भाषामें इतिहास (हिस्ट्री) का अर्थ जिज्ञासा
होता है । मुसलमानोंमें शिक्षापूर्ण उच्च आदर्शका वर्णन ही इतिहास समझा जाता
था । फ्रांसके प्रसिद्ध लेखक वाल्टेयरके अनुसार मनुष्यकी मानसिक शक्तिका वर्णन
ही इतिहास है, छोटी-छोटी घटनाओंका वर्णन इतिहास नहीं । उसके अनुसार
शासकोंका वर्णन भी इतिहास नहीं, किंतु 'मनुष्य जंगलीसे सभ्य कैसे हुआ', इस
विकासका वर्णन ही इतिहास है । विज्ञान-वृद्धिसे विज्ञानका अनुसरण इतिहासमें भी
होने लगा । प्राचीन शिलालेखों, दानपत्रों, मुद्राओं, खण्डहरोंद्वारा सत्यका
अनुसंधान होने लगा । व्यूरी-जैसी प्रसिद्ध लेखिकाने कहा कि 'इतिहास एक
विज्ञान है।' एक फ्रांसीसी लेखकका कहना है कि 'इतिहास शुद्ध विज्ञान है।' परंतु
दूसरे लोग कहते हैं कि इतिहास कभी विज्ञान नहीं हो सकता । लेख-मुद्राओंके
द्वारा भी सत्य घटनाओंका ज्ञान नहीं हो सकता । लेखोंमें परस्पर विरोध भी होता है ।
कुछ लोग 'इतिहास' को एक 'कला कहते हैं किंतु कलामें विशेषरूप देनेके लिये
वस्तुकी कुछ काट-छाँट करनी पड़ती है, और ऐसा करनेमें सत्य अंश छिप जाता
है । कुछ लोगोंका कहना है कि कला लेखन-शैलीमें होनी चाहिये । विज्ञान
घटनाओंके अनुसंधानमें होना चाहिये ।
विश्वमें पशु-पक्षी, कीट-पतङ्ग भी हैं, उनका प्रभाव भी इतिहासपर पड़ता
है । १४ वीं शतीमें युरोपमें प्लेगका भीषण प्रकोप हुआ था । उससे डेढ करोड़
मनुष्य मरे थे । इसके कारण वहाँ बड़ा भारी धार्मिक एवं राजनीतिक उथल-
पुथल हुआ था । इन सबका कारण चूहे ही थे । हैजा आदि भी कीटाणुओंके
ही परिणाम हैं । नेपोलियनकी अजेय सेना संग्रहणीके कीटाणुओंका शिकार बनकर
रूसमें नष्ट-भ्रष्ट हो गयी थी । जंगल नष्ट होनेसे जमीनका कटाव बढ गया । प्रकृतिकी
उथल-पुथलसे कितने ही साम्राज्य भूगर्भमें विलीन हो गये । कभी-कभी साधारण-
साधारण घटनाओंसे ही इतिहासका कायापलट हो जाता है । फ्रांसकी
क्रान्तिके दिनो वहाँका राजा लुई भाग निकला । रास्तेमें एक गाड़ी पड़ी होनेके
कारण उसका मार्ग रुक गया । गाड़ी हटानेमें देर होते ही भीड़ एकत्रित हो गयी। राजा
पहचाना गया और पकड़ लिया गया । यदि वह भागकर राज-भक्त सेनामें
पहुँच गया होता तो क्या फ्रांसकी क्रान्ति सफल हो सकती थी ?
४२४ मार्क्सवाद और रामराज्य
हीगेलके अनुसार 'इतिहास ईश्वरकी आत्मकथा है। वह मनुष्योंको अपनी रुचि-
के अनुसार कार्य करने देता है। उनका फल वही होता है, जो ईश्वर चाहता है।' इंग्लैण्ड-
के डिल्टन मेरका मत है कि 'संसार अज्ञातरूपसे, पर बड़े कष्टपूर्वक ईश्वरकी ओर
बढ़ रहा है—मेरे लिये इतिहासका यही अर्थ है।' यह भी एक पक्ष है कि इतिहास-
में निष्पक्षता हो ही नहीं सकती । लेखक जिस देशकालमें रहता है, उसका प्रभाव उसपर
अवश्य होता है । अतः वह अतीतको भी वर्तमानके चश्मेसे देखता है। जर्मन इतिहासज्ञों-
का कहना है कि 'जर्मनीके जंगलो, पहाड़ों, नदियो तथा जर्मन वीर-गाथाओंका गौरव-
पूर्ण वर्णन ही इतिहास है।' एक इटालियनका कहना है—'यदि प्राचीन इतिहासके
अध्ययनसे हममें उत्साह नहीं बढ़ता तो फिर गड़े मुर्दे खोदनेकी क्या आवश्यकता ?'
कुछ लोगोंका मत है कि इतिहास अपनेको दोहराता रहता है । दूसरे कहते हैं—
'प्राचीन घटनाओंकी पुनरावृत्ति असम्भव है।' कुछ लोग 'विशिष्ट ऐतिहासिक
व्यक्तियोंका विस्तृत वर्णन ही इतिहास' समझते हैं । कुछ लोग छोटी-से-छोटी
घटनाओंका भी इतिहासपर प्रभाव मानते हैं । मेरके अनुसार सार्वजनिक घटनाओं-
का क्रम-बद्ध वर्णन ही इतिहास है । प्रो० हॉर्नशॉकी रायमें विश्व-घटनाओंकी
गति या उसके कुछ अंशका वर्णन इतिहास है। लार्ड ऐक्टनका कहना है कि विश्व-
का इतिहास राष्ट्रोंके इतिहासका संग्रह नहीं, किंतु वह लगातार विकास है। वह
स्मरण-शक्तिके लिये भार न होकर आत्माके लिये प्रकाश है। 'स्टडी आफ हिस्ट्री'
के अनुसार 'इतिहासका आधार राष्ट्र नहीं हो सकता । अपने राष्ट्रको ही विश्व
मान लेना भूल है। वह तो विश्वका अङ्गमात्र है, इसी दृष्टिसे उसका इतिहास
लिखा जाना चाहिये।' मिस्टर वेल्सके अनुसार मानव जाति ही राष्ट्र है।
इस तरह इतिहासके सम्बन्धमें अनेक प्रकारकी धारणा होनेपर भी इतिहासका
उद्देश्य सत्यकी खोज अवश्य होना चाहिये। इससे भिन्न उद्देश्य होनेपर घटनाओं-
की खींचा-तानी तोड़-मरोड़ अवश्य करनी पड़ेगी । 'आई फाउण्ड नो पीस' के
लेखक मिस्टर वेन मिलरका कहना है कि आँखों देखी घटना भी ठीक नहीं बतायी
जा सकती । दो आदमी उसे भिन्नरूपसे देखते हैं । प्रत्येक व्यक्तिकी कल्पना
अलग ही चलती है। पत्रों, सरकारी लेखोंमे भी भाव बदले जाते हैं। फिर हजारों
वर्ष पुराने इतिहासका वर्णन सत्य कैसे हो सकता है ?' वस्तुतः इसीलिये रामायण,
महाभारत आदि आर्ष इतिहासके लेखक वाल्मीकि, व्यास आदि ऋषि प्रत्यक्षा-
नुमान या संवाददाताओंके तारों, पत्रोंके आधारपर नहीं, किंतु समाधिजन्य
ऋतम्भरा प्रज्ञाके अनुसार घटनाओंको पूर्णतया जानकर ही इतिहास लिखनेमें
संलग्न हुए थे। वैदिकोंके यहाँ वेदार्थ जाननेमें इतिहास-पुराणका अत्यन्त
उपयोग है—'इतिहासपुराणाभ्यां वेदं समुपबृंहयेत्', पुराणमितिवृत्तमाख्यायिको-
दाहरणं धर्मशास्त्रमर्थशास्त्रञ्चेतीतिहासः । (कौ० अर्थ० १ । ५ । १४) ब्रह्मादिपुराण,
रामायण महाभारतादि इतिहास, वृहतकथादिआख्यायिका, मीमांसादि उदाहरण, मनु
ऐतिहासिक भौतिकवाद ४२५
याज्ञवल्क्यादि धर्मशास्त्र, औशनस बार्हस्पत्यादि अर्थशास्त्र-ये सभी कौटल्यके अनुसार
इतिहास हैं । शुक्रके मतानुसार किसी राजचरित्र वर्णनके व्याजसे प्राचीन घटनाओं-
का वर्णन ही इतिहास है—
'प्राग्वृत्तकथनं चैकराजकृत्यमिषादितः ।
यस्मिन् स इतिहासः स्यात् पुरावृत्त. स एव हि ॥' (शुक्र नी० ४।२९३)
इतिहासके साथ पुराणोंका भी सम्बन्ध अनिवार्य है; क्योंकि पुराणमें सर्ग
(सृष्टि), प्रतिसर्ग (प्रजापतियोंके बादकी सृष्टि), वंश (कुल), मन्वन्तर (प्रत्येक मनुके
अधिकारका समय), वंश्यानुचरित (कुलवृत्त) का वर्णन विशेषरूपसे होता है। इतिहास
केवल घटनाओंका वर्णन मात्र हो तब तो केवल गड़े मुर्दोंके उखाड़नेके अतिरिक्त
कुछ भी नहीं रह जाता, अतः उसके द्वारा धर्म, अर्थ, काम एवं मोक्षोपदेश
आवश्यक है । इस तरहका कथायुक्त वृत्त ही इतिहास है—
धर्मार्थकाममोक्षाणामुपदेशसमन्वितम् ।
पूर्ववृत्तं कथायुक्तमितिहासं प्रचक्षते ॥ (का० मीमां० म० टी० १।२)
धर्म, अर्थ, काम एवं मोक्षके उपदेशोंसे समन्वित कथायुक्त पूर्ववृत्तका वर्णन
ही इतिहास है । मानवजातिकी प्रगति ऐतिहासिक क्रमसे इसी ओर होती रही है ।
इतिहासकी मार्क्सीय व्याख्या
मार्क्सके अनुसार 'इतिहास छः युगोंमें विभक्त है । प्रथम युगमें अति
प्राचीन मनुष्य साम्यवादी संघोंमें रहता था । उस समय उत्पादन, वितरण आदि
समाजवादी ढंगसे होता था । दूसरा युग दासताका है । कृषि-प्रथा गोपालनके
फलस्वरूप व्यक्तिगत सम्पत्तिका जन्म हुआ । सम्पत्तिके स्वामियोंने अन्य सम्पत्ति-
रहित लोगोंको अपना दास बनाया । राज्य एवं तत्सम्बन्धी अन्य संस्थाओंका जन्म
हुआ । तीसरा सामन्तशाही युग हुआ, इसमें सामन्त भूमिके स्वामी होते थे ।
गरीब किसान इन सामन्तोंके अधीन रहते थे, पर दास नहीं । चौथा युग आधुनिक
पूँजीवादी युग है । इस युगका प्रादुर्भाव व्यवसायों एवं कारखानोंके फलस्वरूप
हुआ है । इसमें अर्थ, समाज एवं राज्यके स्वामी पूँजीपति होते हैं । श्रमिक अपना
जीवन-निर्वाह श्रमके द्वारा करते हैं। पाँचवाँ युग सर्वहाराके अधिनायकत्वका होगा ।
इसमें अर्थ, समाज एवं राज्यकी बागडोर श्रमिकोंके हाथमें होगी । यह समाजवादी
एवं शोषणरहित युग होगा । इसके बाद मानव-जाति छठे युगमें प्रवेश करेगी । उसमें
राज्यविहीन समाज होगा । वास्तविक स्वतन्त्रता तभी होगी, यह सुवर्णयुग होगा ।'
मार्क्सका अति प्राचीन युग रूसोकी प्राकृतिक स्थितिके समान है । रूसो-
की भाँति ही मार्क्सके मतमें भी व्यक्तिगत सम्पत्ति सभ्यताकी धात्री है । मार्क्सका
आधुनिक पूँजीवादी युगका चित्रण रूसो-जैसा ही है । रूसोका 'आदर्श प्रत्यक्ष जन-
तन्त्र' और 'सामान्येच्छाके सिद्धान्त'की तुलना मार्क्सके 'साम्यवाद' से की जा सकती है।
जैसे रूसोकी सामान्येच्छाद्वारा एक नयी स्वतन्त्रता सम्भव होती है, वैसे ही मार्क्सके
४२६ मार्क्सवाद और रामराज्य
क्रान्ति और सर्वहाराके अधिनायकत्वमें एक नयी साम्यवादी व्यवस्थाका जन्म
होगा। रूसोकी यह स्वतन्त्रता प्राचीन प्राकृतिक स्थितिके स्वतन्त्रतासे भिन्न
थी। वैसे ही मार्क्सका साम्यवाद भी अति प्राचीन साम्यवादसे भिन्न है। भेद इतना
ही है कि रूसो आदर्शवादी था और मार्क्स भौतिकवादी।
मार्क्सके अनुसार 'मानव-इतिहास वर्ग संघर्षका इतिहास है। यह संघर्ष
युगानुरूप होता है। कभी प्रत्यक्ष, कभी अप्रत्यक्ष भी रहा है। कभी विजेताद्वारा
नये समाजका निर्माण हुआ, तो कभी दोनों वर्गोंका विध्वंस हुआ है। सर्वहाराकी
क्रान्तिद्वारा ही इस वर्ग-संघर्षका अन्त होगा; क्योंकि इसके द्वारा वर्गका अन्त
होकर एक वर्गविहीन समाज बनेगा।' आधुनिक लोगोंकी दुनिया ही छः हजार
वर्षकी है। इसके ही भीतर इन्हें अनेकों युगोंकी कल्पना करनी पड़ती है। परंतु
भारतीय महर्षियोंकी दृष्टिसे वर्तमान सृष्टि ही दो अरब वर्षकी मानी जाती है।
आधुनिक वैज्ञानिक भी अब सृष्टिकी प्राचीनताकी ओर बढ रहे हैं। इस दृष्टिसे
धर्म-राज्य राम-राज्य और सोपद्रव, क्षुद्रराज्य—तीन ही प्रकारका युग प्रतीत होता
है। मार्क्सके छः युग सोपद्रव क्षुद्रराज्यके भीतर ही हैं।
अनेक दार्शनिक हाब्सके प्राकृतिक खूँखार मानव एवं उसके द्वारा अनु-
बन्धपूर्वक 'दीर्घकाय'को सर्वाधिकार समर्पण आदि-जैसे ही मार्क्सके ऐतिहासिक
वर्णनको भी अप्रामाणिक समझते हैं। अतीत घटनाओंके सम्बन्धमें प्रत्यक्षकी
प्रवृत्ति हो ही नहीं सकती, अतः अनुमान या आगमद्वारा ही उस सम्बन्धमें कुछ
जानकारी हो सकती है। आगमोंपर मार्क्सका विश्वास नहीं था। अपुष्ट कारणोंके
आधारपर इतिहासके सम्बन्धमें अटकल लगाकर किसीने तीन, किसीने पाँच तो
किसीने छः युगकी कल्पना कर डाली। ये कल्पनाएँ निराधार हैं। रूसोकी प्राकृतिक
स्थितिमें स्वर्णयुग ही था, उसी प्रकार मार्क्सकी भी अति प्राचीन मनुष्योंकी
साम्यवादी संघकी स्थिति थी। फिर उसका अन्त क्यों हुआ ? जिस तरह उसका
अन्त हुआ उसी तरह मार्क्ससम्मत सर्वहाराके डिक्टेटरशिपमें होनेवाली क्रान्ति-
द्वारा वर्गहीन राज्यका भी अन्त क्यो न होगा ? हीगेलके अनुसार कोई भी संवाद
अन्तमें वाद बन जाता है; क्योंकि कुछ-न-कुछ लोग उस संवादके भी विरोधी
रहते ही हैं। उन्हींका समुदाय उस संवादका प्रतिवादी बन जाता है। जब अति
प्राचीन साम्यवादी संघवादी बन सका तो अन्तिम वर्गविहीन समाज क्या स्थायी-
रूपसे हो सकेगा ? और उसका विरोधी कोई न होगा ? फिर हिगेलका आदर्श
राज्य भी द्वन्द्वमानके अनुसार अन्तिम ही है। इसमे भी सिवा अन्धविश्वासके
और क्या प्रमाण है ? फिर यह भी तो कहा जा सकता है कि जैसे रूसोकी सामान्ये-
च्छाद्वारा प्राप्त स्वतन्त्रताका स्वप्न पूरा नहीं हुआ, उसी तरह मार्क्सके भी वर्गविहीन
राज्यका स्वप्न पूरा होनेवाला नहीं। धर्मनियन्त्रित शासन-तन्त्रवादीके यहाँ ह्रास-
विकासका चक्र चलता रहता है । अतः कृतयुगमें धर्म-राज्य एवं दण्ड आदिसे
विहीन धर्मनियन्त्रित राज्य था और वह स्वर्णयुग था—यह आर्ष इतिहासोंसे
विदित है । पुनश्च रजोगुण-तमोगुणके विस्तारसे उसमें गड़बड़ी हुई । फिर धर्म-
नियन्त्रित राज-तन्त्र हुआ, तमोगुण बढनेसे फिर और विविध विवादमय राज्य
हुए । पुनश्च 'चक्रनेमिक्रमेण' धर्मनियन्त्रित लोकतन्त्र, धर्मनियन्त्रित राजतन्त्र
एवं पुनः शुद्ध राजादि विहीन धर्मनियन्त्रित राज्य हो सकता है । जैसे प्रतिवर्ष
वसन्त, ग्रीष्म आदि ऋतुओंका प्रादुर्भाव होता है, वैसे ही यह भी सम्भव है।
मार्क्सका 'वर्ग-संघर्ष' कोई वास्तविक तथ्य नहीं है । यह तो एक विकार है । मात्स्य-
न्यायका फैलना धर्म-नियन्त्रण घटनेपर ही बढ़ता है । धर्म-नियन्त्रण बढ़नेपर घट
जाता है । यो तो प्रत्येकव्यक्तिके भीतर देवासुर-संग्राम चलता ही रहता है। रजोगुण,
तमोगुणके अनुकूल वृत्तियाँ, चेष्टाएँ, भावनाएँ तथा उनसे युक्त व्यक्ति, समुदाय,
आसुर समुदाय है । सत्त्वगुणके अनुकूल वृत्तियाँ, भावनाएँ, चेष्टाएँ तथा उनसे
युक्त व्यक्ति, समुदाय दैवी समुदाय है । इनका संघर्ष सदा ही चलता है, परंतु
कभी व्यक्त कभी अव्यक्त । भीतरका ही संघर्ष कभी-कभी बाह्यरूप धारण कर लेता
है । कभी कोई पक्ष जीत जाता है तो कभी कोई पक्ष । तमोगुणपर सत्त्वगुणकी विजय
ही अनृतपर सत्यकी, दानवतापर मानवताकी, आसुर-शक्तिपर दैवीशक्तिकी विजय
है । यही जडवादीपर अध्यात्मवादीकी विजय है । यही व्यष्टिवादपर समष्टि-
वादकी, संकीर्णतापर उदारताकी जीत है । आदर्शवादी दार्शनिक हाब्स आदिके
प्राकृतिक मनुष्य और अनुबन्धद्वारा राज्य-कल्पनाको अप्रामाणिकएव अनैतिहासिक
कहते हैं । ठीक इसी तरह अति प्राचीन साम्यवादी समाज और वर्ग-भेद आदिकी
मार्क्सय कल्पना भी अप्रामाणिक एवं अनैतिहासिक ही है ।
भौतिकवादी व्याख्या
कहा जाता है कि हीगेलके ऐतिहासिक आदर्शवादके मुकाबलेमें ही मार्क्सने
अपनी प्रणालीका नाम 'ऐतिहासिक भौतिकवाद' रखा था । इस प्रणालीद्वारा मार्क्स
विभिन्न परिवर्तनों, क्रान्तियो एव मानसिक, सामाजिक घटनाओंको उत्पन्न करनेवाले
मूलस्रोतोंका पता लगाना चाहता था, इसलिये इतिहास सञ्चालन करनेवाले नियमोंका
उसने पता लगाया । उसका कहना था—'मनुष्योंके विवेक एव विचारोंमें परिवर्तन करने-
वाली तथा विभिन्न सामाजिक प्रणालियों और पारस्परिक विरोधकी सृष्टि करनेवाली
प्रधानशक्ति, विचारो, भावनाओं या विश्वव्यापी ज्ञानसे अथवा सर्वव्यापी आत्माके
ज्ञानसे नहीं हुआ, किंतु वह जीवनकी भौतिक अवस्था एवं नियमोंद्वारा ही हुआ है ।
इसलिये मनुष्यजातिके इतिहासका आधार भौतिक है, अर्थात् जिस मार्गमे मनुष्य
एक सामाजिक प्राणीकी हैसियतसे, प्राकृतिक परिस्थितियो, आन्तरिक, शारीरिक
और मानसिक शक्तियोंकी सहायतासे अपने सासारिक या भौतिक जीवनका निर्माण
करता है और अपनी आवश्यकताओकी पूर्तिके लिये वस्तुओंको उत्पन्न करता, बाँटता
और बदलता है, वही नियम, मार्ग या तरीका जीवनका भौतिक विषय या अवस्था है।
पर यहाँ यह विचारणीय है कि यदि विभिन्न परिवर्तनों, क्रान्तियों, मानसिक-
सामाजिक रचनाओको उत्पन्न करनेवाला कोई मूल स्रोत ढूँढना आवश्यक है
और उसका कारण मार्क्सके मतानुसार भौतिक अवस्था और भौतिक नियम ही
है, तो भौतिक अवस्था एवं भौतिक नियमोंका भी कारण क्या है—यह भी
'जिज्ञासा स्वाभाविक तथा अनिवार्य है। व्यावहारिक बात तो यह है कि विचारशील,
विवेकी पुरुष ही जड भौतिक वस्तुओंमें रद्दोबदल करता रहता है; जड वस्तु स्वयं
न अपनेको जान सकती है, न अन्यको ही। हिताहित सोचना, किसी उद्देश्यसे प्रवृत्त
होना यह शुद्ध चेतनका ही धर्म है, अचेतनका नहीं। इसीलिये जैसे रेल, तार,
रेडियो, वायुयान, विभिन्न शस्त्रास्त्र, कल-कारखाने, बड़े-बड़े बाँध, पुल,
महान् दुर्ग—सब चेतनके विचार एवं इच्छाके ही परिणाम हैं, इसी
प्रकार अन्यान्य आकाश, पृथिवी आदिकी उत्पत्ति एवं उसके नियम एवं
अवस्थाओंमें भी अवश्य ही किसी सर्वज्ञ सर्वशक्तिमान् समष्टि चेतनकी इच्छा एवं
विचारोंको कारण मानना अनिवार्य है । किसी भी विचारमे विचार्य कुछ
भौतिक वस्तुएँ एवं उनकी अवस्थाएँ भी कारण हो सकती हैं । परंतु इसका
अभिप्राय इतना ही है कि जैसे घटज्ञानमें विषयरूपसे घट भी हेतु है, परंतु
इतने मात्रसे चक्षुमे घटका संनिकर्ष तथा मन या अन्तःकरणका चक्षुद्वारा
घटाकार परिणत होना और चेतन आत्माद्वारा उन सबका प्रकाश होना गौण
या मुख्य है—यह नहीं कहा जा सकता है। किंतु ज्ञानमें तो ज्ञाता ही मुख्य है, ज्ञेय
एवं प्रमाण आदि ज्ञाताके अङ्ग होकर ही ज्ञानके साधन हैं।
विवेकी ज्ञाता जीवनकी भौतिक अवस्थाओंमें रद्दोबदल करता ही रहता है ।
यद्यपि भौतिकवादी किसी भी सिद्धान्त, सत्य, न्याय, धार्मिक या सामाजिक नियमको
शाश्वत या नित्य नहीं मानते, फिर भी अचेतन भूतोंमें अनेक शाश्वत नियम मानना
अनिवार्य है, पृथ्वीका गन्धवत्त्व एवं विभिन्न बीजोंद्वारा विभिन्न प्रकारकी वस्तुओ-
का उत्पन्न होना, विविध प्रकारके बीजोंसे विभिन्न पुष्प, स्तवक, कुड्मल, वृक्ष
एवं विभिन्न रूप, रस, गन्धसे युक्त फलोंका उत्पन्न होना, जलका निम्न प्रदेशकी
ओर बहना, अग्निका ऊर्ध्वमुख प्रज्वलन, वायु एवं आकाशके निश्चित धर्म
शाश्वत ही हैं । समुद्रमें विभिन्न तिथियोंमें नियन्त्रित समयपर ज्वारभाटाका
आना, चन्द्रमाका नियमित ह्रास-विकास कितना शाश्वत है—यह सुस्पष्ट है। जिस
प्रकार भौतिक नियम शाश्वत हैं, वैसे ही ज्ञाता, चेतन एवं ईश्वरादिके नियम
शाश्वत हैं, अतएव धार्मिक, सामाजिक एवं न्यायसम्बन्धी अपरिगणित धर्म भी
शाश्वत है। ईश्वरीय नियम, धार्मिक सिद्धान्त, न्याय एवं सत्यके अनुसार विवेकी
ऐतिहासिक भौतिकवाद ४२९
प्राणी शारीरिक, मानसिक एवं भौतिक परिस्थितियोंकी सहायतासे अपनी
आवश्यकताओंकी पूर्तिके लिये वस्तुओंको उत्पन्न करता, बाँटता तथा रद्दोबदल भी
करता है। परंतु जहाँ आध्यात्मिक धार्मिक दृष्टिसे तथा विवेकके विरुद्ध शारीरिक
मानसिक तथा बाह्य भौतिक परिस्थितियाँ, परस्त्री, परधन-हरणके अनुकूल भली
ही हों, तथापि एक विवेकी पुरुष उनका विरोध ही करता है। नदीके तीव्र प्रवाहमें
पड़ा हुआ मुर्दा ही निर्विरोध धाराका अनुसरण करता है, परंतु जीवित प्राणी
अवश्य ही विरोध करता है, प्रवाह चीरकर लक्ष्यकी ओर बढ़ता है। प्रवाहका
किंचित् अनुसरण भी प्रवाह अतिक्रमणके ही अभिप्रायसे करता है। समुद्रमे नाव
डालकर वायुके अनुसार भटकनेवाला प्राणी निरुद्देश्य ही होता है। जिसका कोई
लक्ष्य होता है, वह विरुद्ध भीषण झंझावातका भी मुकाबला करके लक्ष्यकी ओर
चढता है, यदि उसमें सर्वथा असमर्थ रहा तो उसी जगह लंगर डालकर नावको
रोक देता है—'जैसी बहे बयार पीठ तब तैसी दीजै' का दुरुपयोग करनेवाले अवसरवादी
सर्वथा अविश्वसनीय ही हुआ करते हैं।
उत्पादन-शक्तियाँ और नियम
कहा जाता है कि उत्पादन-शक्तियाँ दो प्रकारकी हैं-एक चेतन, दूसरी
अचेतन। अचेतन शक्तियोंके अन्तर्गत भूमि, जल, वायु, कच्चा माल, औजार,
मशीनें आदि आ जाती हैं। चेतन शक्तियोंमें मजदूर, आविष्कारक, अन्वेषक,
इंजीनियर आदि आ जाते हैं। जातिगत गुणों अर्थात् किसी मनुष्य-समूहकी जन्मसिद्ध
योग्यताका भी चेतन शक्तियोंमें अन्तर्भाव है। सबसे अधिक महत्त्व शारीरिक और
मानसिक श्रम करनेवाले श्रम-जीवियोंका है। उनके द्वारा ही पूँजीवादी समाजमे
विनिमय मूल्यकी सृष्टि होती है। दूसरा महत्त्व आधुनिक यन्त्रविद्याका है, जिसके
कारण आज समाजमें उथल-पुथल हो रहा है। मार्क्सके मतानुसार 'मनुष्य उत्पादक
कार्य और उसकी आवश्यकताके प्रभावानुसार अपने समाज, राज्य, धर्म-दर्शन
और विधानसम्बन्धी सिद्धान्तोंकी रचना करता है। भौतिक, आर्थिक अवस्था इसकी
आधार-भित्ति स्वरूप है। उससे उत्पन्न होनेवाली धार्मिक राजनीतिक, दार्शनिक
आदि प्रणालियाँ उसके ऊपर बने हुए भवनोंके समान होती हैं। ये भवन जितने
अंशोंमें अपनी आधारभित्तिके अनुरूप होते हैं, उतने ही दृढ होते हैं, उतनी ही
उन्नति और समृद्धि होती है। सामाजिक दशाओंके द्वारा सम्पत्ति सम्बन्धी नियम
बनाये जाते हैं और मनुष्योंके उन पारस्परिक सम्बन्धोंका निर्णय किया जाता है,
जिनसे उत्पत्तिका कार्य चलता है। उत्पादनके नियमोंका निर्णय समाजके मनुष्य ही
करते हैं, जैसे और नियमोंका निर्णय समाजके मनुष्य ही करते हैं। जैसे मनुष्य प्राकृतिक
सामग्री और शक्तियोंकी सहायतासे भाँति-भाँतिकी वस्तुओंका निर्माण करते हैं, उसी
प्रकार मस्तिष्कपर उत्पादक शक्तियोंकी प्रतिक्रियाके फलस्वरूप सामाजिक, राजनीतिक
४३० मार्क्सवाद और रामराज्य
और न्यायसम्बन्धी विधानों तथा धार्मिक, चारित्रिक, दार्शनिक सिद्धान्तोंका भी
निर्णय वे ही करते हैं।'
उत्पादक-उत्पादन-शक्तियो और उनके द्वारा होनेवाले परिणामोंपर
विचार करते हुए यह कभी न भूलना चाहिये कि उच्चावच अनन्तानन्त सब
भौतिक पदार्थ भोग्य हैं। वे अपने लिये नहीं, किंतु भोक्ताके लिये होते हैं। भोक्ता
भोग्यके लिये नहीं होता, किंतु भोग्य भोक्ताके लिये होता है। पलंग अपने लिये
नहीं, किंतु सोनेवाले भोक्ताके लिये होता है। करोड़ों रुपयोंकी माला, मालाके लिये
नही, अपितु पहननेवालेके लिये होती है, अतएव पलंग यदि छोटी पड जाय तो
पलंगमें सुधार होना चाहिये, न कि सोनेवालेको काट-पीटकर पलंगके लायक बनाना
चाहिये । माला छोटी पड़ती है, सिरसे गलेमें नहीं उतरती, तो मालाको तोड़कर
सुधारना ठीक है, पहननेवालेका सिर छीलकर मालाका गले उतारना बुद्धिमानी
नही। ठीक इसी प्रकार भोक्ता नित्य, चेतन, आत्माके लौकिक पारलौकिक हित-
की दृष्टिसे भौतिक वैभव एवं उनके रद्दोबदलका उपयोग किया जा सकता है,
परंतु आत्माके लौकिक, पारलौकिक हितोंके विपरीत असर डालनेवाले भौतिक
प्रभावोंको हर प्रकार रोकना ही उचित है। जैसे स्थूल देह सूक्ष्म मनके अधीन
रहता है, वैसे ही देह, इन्द्रियाँ, मन, बुद्धि आदि सभी संहत आत्माके लिये होते
हैं, वैसे ही देहादिसंघात स्वविलक्षण स्वप्रकाश असंहत आत्माके लिये हैं। रथादि
अचेतनकी प्रवृत्ति सारथि चेतनसे अधिष्ठित होती है, वैसे ही जड देहादिकी
प्रवृत्ति चेतन आत्मासे अधिष्ठित होती है। देहादि यदि आत्माके अधीन न हो तो
भारभूत हो जाते हैं, इसी तरह अचेतन भौतिक सभी व्यवस्थाएँ भी समष्टि चेतन-
नियन्त्रित रहकर ही सुख-साधक हो सकती हैं। आधुनिक वैज्ञानिक लोग जड प्रकृति-
वशीकारके लिये प्रयत्नशील होते हैं। आधिभौतिक बड़ी-से-बड़ी उन्नति यदि आत्माके
अनुकूल है, आत्माके नियन्त्रणमें है तभी उसका महत्त्व है, अन्यथा वह भार-
भूत दुःखरूप ही है। इस तरह भौतिक अवस्थाके अनुसार चेतनके सब नियमोंमें
रद्दोबदल अत्यन्त असंगत है, आंशिक रूपसे भौतिक अवस्थाओका उपयोग एवं
अनुसरण मान्य है ही। फिर भी चेतनपर अचेतनका हावी हो जाना कथमपि
उचित नहीं है, चेतन उत्पादक होनेसे एव भोक्ता भी होनेसे महत्त्वपूर्ण है, वह पूँजी
एवं यन्त्र दोनोंपर ही अधिकारी होता है, अतः चेतनसे अचेतनकी तुलना ही नहीं
हो सकती। फिर भी श्रमजीवीको श्रमका फल जैसे मिलना आवश्यक है, वैसे
ही पूँजीपतिको पूँजीका फल भी मिलना आवश्यक है और यह कम्युनिष्टको भी
मानना ही होगा, भले ही उसकी दृष्टिमें ही यह फल व्यक्तिको न मिलकर समाजको
मिले। यहाँ रामराज्यके अनुसार आधुनिक शोषक पूँजीवाद या व्यक्तियोंका अधि-
नायकवाद या निःस्वत्ववाद नहीं मान्य है, किंतु वह पूँजी सबको मान्य है, जिसके
द्वारा यन्त्र एवं आविष्कारक, अन्वेषक एव श्रमजीवियोंका भी काम चला है।
आधुनिक रूपमें आजकल भी व्यक्ति बैंकोंमें रुपया जमा करता है और उसका सूद
भी प्राप्त करता है ।
माली हालत या भौतिक अवस्था भले ही तत्सम्बन्धित नियमोंकी आधार-
भित्ति हो, परन्तु 'दार्शनिक धार्मिक सभी नियमोंकी आधारभित्ति या नींव भी माली
हालत ही है'—यह कहना सर्वथा असंगत है । भले पुरुष चाहे निष्किञ्चन हों या
धनवान्; किंतु अहिंसा, सत्य, अस्तेय आदिका आदर सभी करते हैं । प्राचीन कालमें
जैसे अकिंचन ब्रह्मचर्यका, तपस्याका सम्भावन करते थे, वैसे ही एक सर्वसाधन-
सम्पन्न सम्राट् भी सब त्यागकर ब्रह्मचर्य एवं त्याग-तपमें परिनिष्ठित होता था ।
आज भी भले लोग धनी हों या गरीब, धर्मका आदर करते हैं । बुरे चाहे धनी हों
या गरीब, धर्मकी उपेक्षा करते हैं । देह-भिन्न आत्माका अस्तित्व तथा ईश्वर सदा,
राजा, रङ्क, अमीर, गरीब सभी मानते हैं, फिर माली हालतमें रद्दोबदल होनेसे धर्म
एवं दर्शनमें रद्दोबदल होना कहाँतक संगत है ?
कथंचित् भावनाओंपर वातावरणका किंचित् प्रभाव पड सकता है,
परन्तु तत्त्वज्ञान एवं वस्तुस्थितिसे सम्बन्ध रखनेवाले धर्म-दर्शनोंमें भी माली
हालतके रद्दोबदल होनेसे रद्दोबदल मानना अत्यन्त मूर्खता है । लूट, खसूट, चोरी,
हत्या, कभी भी धर्म बन जायेंगे, परोपकार, दया, सत्य, कभी अधर्म बन जायेंगे,
तब तो कभी संखियाका अमृतरूपसे और अमृतका संखियारूपमें बदलना भी मान
लिया जायगा । तत्त्वज्ञानकी व्यवस्था ही लीजिये—रज्जुमें रज्जुज्ञान ही यथार्थ ज्ञान
है, रज्जुमें सर्प, धारा, माला आदिका ज्ञान सदा ही अयथार्थ रहेगा, चाहे माली
हालतमें रद्दो-बदल हो, चाहे कितना ही भौतिक परिवर्तन हो, परंतु किसी भी
हालतमें रज्जुमें रज्जुज्ञानकी अयथार्थता नहीं हो सकती । वस्तुतः मार्क्सवादी
व्यक्तिगत भूमि सम्पत्ति, खानो, कल-कारखानोंपर राष्ट्रीयकरणके नामपर
अधिकार करनेके लिये आदिपरम्पराप्राप्त शास्त्रीय नियमोंका अपलाप करके
अपने कृत्योंका समर्थन करना चाहते हैं । परस्त्री, पर-धनका अपहरण, हत्या एवं जाल-
धोखेको भी उचित या न्यायसिद्ध करनेके लिये यह वाग्जाल फैलाते हैं और
कहते हैं कि ईश्वरीय या शास्त्रीय कोई भी सत्य न्याय अथवा धर्म नहीं है । माली
हालत, भौतिक अवस्थाके अनुसार ही धर्म, सत्य, न्याय बनते हैं, अतः सभी
नियमोंकी नींव माली हालत या भौतिक अवस्था ही है । इस दृष्टिसे वे कहते हैं कि
'पुरानी माली हालत या भौतिक अवस्था बदल गयी तो पुराने सब नियम धरा-
शायी हो गये । इसलिये पुराने नियमोंके अनुसार जो पहले अधर्म था, वह अब
अधर्म नहीं है । अतः हमलोगोंका पर-धन, पर-स्त्री-हरण, हत्या, जाल-फरेब
आदि अधर्म या अन्याय नहीं है । जिन लोगोंने उत्पादन साधनों एवं उत्पादनोंमें
रद्दोबदल कर लिया, उन्हें धर्म एवं न्यायमें भी रद्दोबदल कर लेनेका हक
४३२ मार्क्सवाद और रामराज्य
है, उत्पन्न वस्तुओके वितरण-सम्बन्धी नियमोमे भी रद्दोबदल कर लेनेका हक
है—ये सब बाते अपने पापको, अन्यायोंको पुण्य या न्यायसिद्ध करनेका असफल
वागाडम्बरमात्र है, जिसमें कुछ भी दम नहीं है। कोई भी व्यसनी या अपराधी,
अपनी प्रवृत्ति या रुचिके अनुसार ही अधार्मिक धार्मिक सामाजिक राज-
नीतिक नियम चाह सकता है।
मार्क्सका कहना है कि 'मनुष्य स्वयं अपने इतिहासका निर्माण करता है।
वह यह कार्य अपनी इच्छाके अनुसार अभिलषित मार्गसे नहीं कर सकता, किंतु उसे
उस मार्गके अनुसार कार्य करना पडता है, जो कि उसके सामने प्रस्तुत होता है
और जिसे वह प्राप्त कर सकता है। उदाहरणार्थ अति प्राचीन युगमे थोड़े-थोड़े
मनुष्य गिरोह बनाकर रहते थे, रक्त-सम्बन्धके आधारपर संघटित होते थे।
उनके देवता भी उनकी परिस्थितिके अनुसार बनाये गये। इससे प्रकट होता है
कि उस परिस्थितिका प्रभाव उन जंगली लोगोंकी मानसिक अवस्था, उनके मजहब,
उनके चरित्र और उनके सामाजिक नियमोंपर कैसा पड़ता था। सर्पों, सिंहों
आदिकी पूजा उस कालकी निशानी है। इसी तरह मध्यकालके क्षत्रिय सरदारों,
जमींदारोंका आधार भूमि-सम्बन्धी अधिकार और शहरोंकी दस्तकारीपर था।
उस परिस्थितिके अनुसार उन लोगोंके धार्मिक विचार बदल गये और नवीन
मतोंकी स्थापना हुई, जो कि इस युगके अधिकार प्राप्त लोगोंके हितके अनुकूल
थे। जो नैतिक, धार्मिक, दार्शनिक विचार इस हितके विरोधी थे, उन्हे दबा
दिया गया।
'इसी प्रकार वर्तमान पूँजीवादी समाज व्यक्तिगत पूँजीके आधारपर रचा
गया है और वह सामूहिक तथा सहयोगमूलक भावोके उच्छेदनाथं प्रयत्नशील
है। यह स्वार्थसिद्धिके लिये व्यक्तिगत स्वतन्त्रताका प्रचार करता है तथा श्रम-
जीवियो और सम्पत्तिका एक स्थानपर संग्रह करता है, जमींदारी, जागीरदारीकी
प्रथा और उसके समर्थक विश्वासों (राजाको ईश्वररूपमें मानना) को नष्ट
करता है और उनके स्थानपर धार्मिक स्वतन्त्रता, व्यक्तिगत विवेकके सिद्धान्तका
विस्तार करता है। यह समाज व्यक्तिगत अधिकारोंका प्रचार करता है, प्राचीन
राजाओके एकतन्त्र शासनके विरुद्ध युद्ध करता है, राष्ट्रियताका भाव फैलाकर
व्यापार व्यवसायका विस्तृत क्षेत्र प्राप्त करनेका प्रयत्न करता है तथा जमींदारी आदि-
के विरोधार्थ ही वह एकतन्त्र सत्ताका समर्थन करता है। एकतन्त्र सत्ता भी जब
पूँजीवादमें बाधक होती है, तब उसके विरुद्ध भी वह संग्राम करता है और
एकतन्त्र शासनको नष्ट कर वैध राज्य-सत्ता या प्रजातन्त्रकी स्थापना करता है। यह
सब काम इसलिये नहीं सम्पन्न किये जाते कि कोई विलक्षण बुद्धिमान् मनुष्य
प्रवल विचार शक्तिद्वारा या नवीन ज्ञानोदयद्वारा या ईश्वरीय प्रेरणाद्वारा करता है,
ऐतिहासिक भौतिकवाद ४३३
किन्तु यह सब उस प्रभावसे सम्पन्न होता है, जो मनुष्यके भौतिक आधार या
आर्थिक आधारके परिवर्तन होनेसे मनुष्योंके मस्तिष्कपर पड़ता है । मार्क्सका
कहना है कि 'मनुष्यके अस्तित्वका आधार उसके विवेक या अन्तरात्माके आदेश-
पर नहीं होता, किंतु अन्तरात्माका आधार उसकी सामाजिक स्थिति या दशापर
होता है। कोई भी मनुष्य सामाजिक जीवनका निर्माण नहीं कर सकता और न
उसके अनुकूल कानून ही बना सकता है। वह तो केवल एक नौकर या कार्य-
कर्ताके समान होता है, जो समाजके भौतिक आधार या आर्थिक दशासे उत्पन्न
होनेवाली प्रवृत्तियो और विचारधाराओका अनुसरण करता है । तथापि कार्यकर्ता
व्यापक ज्ञानवान्, उद्योगी एव अधिक योग्य हो तो अपनी सीमाके भीतर महान्
कार्य कर सकते हैं, की गयी उन्नतिको बहुत दूरतक बढ़ा सकते हैं । ईसा,
मुहम्मद आदि इसी कोटिके थे ।'
अवश्य भौतिक परिस्थितियाँ कभी-कभी प्राणीको अपने अनुसार चलनेके
लिये बाध्य करती हैं, फिर भी लक्ष्य एव सिद्धान्तके अनुसार महापुरुष परिस्थितियों-
को ही बदल देते हैं, परिस्थितियोके दास नहीं बनते, परिस्थितियोंके वशीभूत होकर
भी अपना धर्म नहीं छोड़ते, भले प्राण छोड़ना पड़े तो प्राण छोड़ देते हैं । अति
प्राचीन युगका मार्क्सय इतिहास भी सर्वथा अप्रामाणिक है । गिरोह बनाकर
रहना' पहले भी अच्छा था, आज भी अच्छा है । रक्त-सम्बन्धसे विशिष्ट समूह
आज भी होता ही है । 'परिस्थितिके अनुसार सर्प, सिंह आदिको देवता बनाने' की
बात प्रलाप है । शास्त्रविश्वासी आज भी शेषनाग एवं नृसिंह भगवान्को परमे-
श्वरके अवताररूपमे पूजते ही हैं । इसी तरह 'मध्यकालमे धार्मिक विचार बदल
गये' यह कहना भी असगत है । अनादि अपौरुषेय शास्त्रोंका प्रामाण्य मानने-
वालोंका जैसा विचार करोड़ों वर्ष पूर्व रामायणके रामराज्यमें था, हजारों वर्ष पूर्व
महाभारतके युधिष्ठिर राज्यमें था, वैसा अब भी है । शास्त्रप्रमाण न माननेवाले जैसे
आज हैं वैसे पहले भी थे । उनके मत सदा ही बदलते रहते हैं । शास्त्र
अति प्राचीन कालके मालिकों, मध्य कालके सरदारों एव अर्वाचीन कालके
पूँजीपतियोके बनाये नहीं हैं । वे आप्तकाम, पूर्णकाम, वीतराग, महातपा, अरण्य-
वासी, कन्दमूलफलाशी, वल्कलवसनधारी महर्षियोंद्वारा रचे गये है, सो भी स्वतन्त्र-
रूपसे नही, अपितु अनादि, अपौरुषेय, परमेश्वरीय वेदादि शास्त्रोंके आधारपर रचे
गये हैं । उनकी व्यवस्थाओंमें आधुनिक ढुलमुल पन्थियोंकी अवसरवादिताका
स्पर्श भी नहीं है । बायबिलमें भी कहा गया है कि सूईके छेदसे ऊँटका निकल
जाना सम्भव है, पर धनिकोका स्वर्गीय राज्यमें प्रवेश करना कठिन है ।' इसी
प्रकार न केवल भारतीय धर्मग्रन्थ अपितु ससारके सभी धर्मग्रन्थ वीतराग,
अकिंचनो एव साधारण श्रेणीके लोगोंद्वारा बनाये गये हैं और उन मेधावियोंका
कोई पक्षपात नहीं है । मनु यद्यपि सम्राट थे, फिर भी उन्होने अकिंचनोंका ही
मा० रा० २८-
महत्त्व गाया है । यह कहना नितान्त मूर्खता है कि 'शास्त्रकार ऋषि धनिकोके
एजेण्ट थे । उनके हितोंकी रक्षाके लिये ये लोग पाप-पुण्यके चक्करमे जनसाधारण-
को फँसाये रखनेका प्रयत्न करते रहते थे।' भला, जो राजान्नग्रहणको घोर पाप
समझते थे, 'कुसूल-धान्यक' ब्राह्मणकी अपेक्षा जो अश्वस्तनिक ( कलके लिये
कुछ न रखनेवाले ) ब्राह्मणको ही श्रेष्ठ मानते थे, महात्यागको ही सर्वस्व मानते थे,
वे किस प्रलोभनसे ऐसा निष्ठुर कर्म करते ? आज भी तो धनिकवर्ग नास्तिकप्राय
है । वह किस भारतीय विद्वान्का सम्मान करता है ? यह वर्ग जितना उच्छृङ्खलो-
की पूजा करता है, उतना आस्तिक पक्षकी प्रतिष्ठा करता तो आस्तिक पुरुषों एवं
आस्तिक संस्थाओको आर्थिक संकटके कारण कार्य करनेमें बाधा क्यो पडती ?
फिर भी शास्त्रविश्वासी शास्त्र, युक्ति एवं लोकसिद्ध न्यायके अनुसार उचित
होनेसे व्यक्तिगत भूमि, सम्पत्ति आदिका समर्थन करते हैं । इसी तरह आस्तिकपक्ष-
का राजाओंके एकतन्त्र शासनसे न विरोध है और न आधुनिक लोकतन्त्रके साथ
कोई राग है। धर्म-नियन्त्रित एकतन्त्र-शासन भी लाभदायक होता है । धर्म-
नियन्त्रित होनेसे ही लोकतन्त्र या प्रतिनिधितन्त्र लाभदायक हो सकता है ।
उच्छृङ्खल, धर्मशून्य, रावण, वेन आदिका एकतन्त्र भी हानिकारक हुआ था ।
वैसे उच्छृङ्खल लोकतन्त्र आजकल भी देशके लिये खतरनाक है ।
शास्त्रोंके अनुसार कोई भी कार्य विचारशील ईश्वर, महर्षियों, बुद्धिमान्
व्यक्तियो अथवा व्यक्तिसमूहोकी गम्भीर विवेचनाओ एवं लोकहित भावनाओसे
होता है । भले कामोंका मूल भले विचार, भली प्रेरणाएँ तथा सावधानी और
बुरे कामोंके मूल कारण बुरे विचार, बुरी प्रेरणाएँ एवं प्रमाद आदि होते हैं ।
इस तरह सिद्ध है कि बुद्धिपूर्वक कार्यकारी पुरुष विचारपूर्वक ही कोई कार्य
करता है। शास्त्र भी 'ईक्षतेर्नाशब्दम्' ( ब्रह्मसूत्र १।१।५) इत्यादि सूत्रोसे कहते
हैं कि जड प्रकृतिसे विलक्षण विश्वका निर्माण नहीं होता, क्योकि विलक्षण कार्य
ईक्षण अर्थात् विचारपूर्वक होता है । जड प्रकृतिमें विचारशक्ति नहीं है । अतः वह
विश्वसृष्टिका स्वतन्त्र कारण नहीं है । प्रत्यक्ष, अन्वय-व्यतिरेकसिद्ध चेतनोंके
सावधानी एवं प्रमादके आधारपर होनेवाले कार्योंकी भलाई-बुराईका प्रत्यक्ष
कार्यकारण-भाव छोड़कर अचेतन भौतिक अवस्थाओके अनुसार यन्त्रसंचालित
ढंगसे घटनाओंका परिवर्तन मानना सर्वथा निराधार है । एक तरफ बुद्धिसङ्गत
ईश्वर-प्रेरणा, शुभाशुभ कर्मरूप प्रारब्ध या दैवकी प्रेरणाको अन्धविश्वास बतलाना
और दूसरी तरफ बुद्धिपूर्वक चेतनद्वारा होनेवाले कार्योंको यन्त्रसचालित ढगसे
भौतिक अवस्थाओं या भौतिक ऐतिहासिक प्रभावोंका परिणाम मानना, यह कितनी
उपहासास्पद वात है ? यदि चेतन प्राणी अपना, और समाजका लौकिक-
पारलौकिक हिताहित सोच-विचारकर बुद्धिपूर्वक कार्य नहीं करता, किसी भौतिक
ऐतिहासिक भौतिकवाद ४३५
प्रवाहके परतन्त्र होकर ही कार्य करने एवं सोचनेको बाध्य होता है', तो फिर
व्यक्तियों या समूहोंका गुण दोष क्यों माना जाय ? फिर तो कानूनोंके द्वारा किन्हीं
गुणोंका विधान या निषेध भी क्यों होना चाहिये ? कोई भी विधान एवं निषेध
स्वतन्त्रके लिये ही सम्भव होता है । लोहशृङ्खलासे निगडित हस्तपादादियुक्त
व्यक्तिको जलादि लानेके लिये कौन बुद्धिमान् आदेश देगा ? ऐसे ही बलात्
नियोजित कार्यसे किसीको कोई कैसे रोक सकता है, तथा विहिताकरण, निषिद्धा-
नुष्ठानके लिये दण्ड एव शुभानुष्ठानके लिये पुरस्कारकी व्यवस्था कौन करेगा ?
'स्वतन्त्रः कर्त्ता' पाणिनिके इस सूत्रके अनुसार-'कर्त्तुमकर्त्तुमन्यथाकर्तुं समर्थ' को ही
कर्ता कहा जाता है। अश्वसे चलने, पाँवसे चलने या न चलनेमे जो स्वतन्त्र होता
है, वही कर्ता होता है । उसीके लिये अश्वसे जाना चाहिये या पैरसे जाना
चाहिये यह विधान तथा अश्वादिस न चलना चाहिये यह निषेध सार्थक होता
है । उसीके लिये दण्ड एवं पुरस्कारकी व्यवस्था होती है । भूत, भौतिक
अवस्था तथा उसका प्रवाह सब-के-सब जड ह । वे अपने-आपको नहीं जानते ।
समाजका हानि-लाभ सोच नहीं सकते । प्रेरणा भी कर नहीं सकते । फिर उनके
आधारपर किन्हीं भी घटनाओं, प्रवृत्तियो या आन्दोलनोंको मानना कहाँतक
उचित है ?
प्रवाह प्रवाहीसे भिन्न नहीं होता । जैसे पिपीलिकाओसे भिन्न पिपीलिकाओं-
की पङ्क्ति नहीं होती, सैनिकोसे भिन्न सेना नहीं होती, एक-एक वृक्षोंसे भिन्न वन
नहीं होता, वैसे जड भूतोंसे भिन्न उसका प्रवाह भी नहीं होता है । साथ ही
जट भूतोंमें या उनके प्रवाहमें विचार्यकारिता भी नहीं होती । अतः उनके परतन्त्र
चेतन बुद्धिमान्को कार्य करने एव सोचनेको बाध्य होना पड़े, यह असंगत है।
अवश्य सम्पत्तिया विपत्तिके रूपमें आनेवाली भूत या भौतिक घटनाएँ विचारणीय होती
हैं। विचारशील शक्तिशाली प्राणी शक्ति रहनेपर भूतो या भौतिक घटनाओको अनुकूल
बनाता है, शक्ति न रहनेपर लाचारीसे सहन करता है । यदि प्रवाह-परतन्त्र ह
सब घटनाएँ हों तो भलाई-बुराईका उत्तरदायित्व भी चेतन व्यक्तियों या
समुदायपर न होना चाहिये और न तो उन्हें उसका फल ही भोगना चाहिये ।
फिर तो किसी परिस्थितिके अनुसार ही हिटलर एव उसके साथियोका जन्म हुआ,
युद्ध छिड़ा एव अभूतपूर्व विश्वव्यापी सग्राम हुआ । फिर उसके साथियोंको युद्धा-
पराधी बनाकर फाँसीपर लटकानेका क्या अर्थ है ?
कहा जाता है, गान्धीजी बडे प्रभावशाली थे । फिर भी उनके यन्त्रीकरण-
के विरुद्ध खद्दर आदिकी योजना प्रवाहविरुद्ध होनेसे सफल नहीं हुई । पर इससे
यही क्यो न माना जाय कि उस योजनाके पीछे जितनी शक्ति अपेक्षित थी,
गान्धीजीके पास उतनी शक्ति न थी । इसके विरुद्ध यह भी कहा जा सकता है कि
४३६ मार्क्सवाद और रामराज्य
बढ़े-चढ़े बौद्ध-धर्मको रोकनेके लिये कुमारिल एवं शंकराचार्य सफल हुए । अतः
चेतन शक्तिशाली पुरुष भौतिक प्रवाहको मोड़ते हैं, वे प्रवाहमें नहीं बहते । इसी-
लिये भारतीय सिद्धान्त है कि 'कालो वा कारणं राज्ञः राजा वा कालकारणम् ।
इति ते संशयो मा भूद् राजा कालस्य कारणम् ॥ (महा०) काल राजाका कारण
है या राजा कालका कारण है, यह संशय नहीं होना चाहिये—राजा ही कालका
कारण होता है । काल प्रवाह, भौतिक प्रवाह या इतिहासचक्रको चेतन प्राणी,
राजा, विशिष्ट महापुरुष तथा ईश्वर अवश्य ही बदल सकते हैं ।
कहा जाता है कि 'उत्पत्ति और समाजका एक रूप नष्ट होता है तो उसका
स्थान दूसरा रूप ले लेता है। इस क्रान्तिकारी परिवर्तनका कारण दो प्रकारके घटना-
समूह होते हैं । दोनों यद्यपि कभी संयुक्त रूपसे दिखायी देते हैं, फिर भी दोनों-
पृथक् रूपसे काम करते हैं । इनमें एक यन्त्र विद्यासम्बन्धी है, जिसके फलस्वरूप
उत्पादन-शक्तियोंमें परिवर्तन होता है । दूसरा घटनासमूह व्यक्तिसम्बन्धी है,
जिसका सम्बन्ध सामाजिक वर्गों और दलोंसे होता है । काम करनेवाले मजदूरोंकी
बढ़ती हुई दक्षता, नवीन कच्चे माल और बाजारोंका अन्वेषण, माल बनानेकी
नवीन पद्धति, औजारों और मशीनोंका आविष्कार व्यापार तथा विनिमयके
अधिक उत्तम संघटनके फलसे जब उत्पादक शक्तियोंकी वृद्धि हो जाती है और
समाजका भौतिक आधार अथवा आर्थिक नींव बदल जाती है, तब उत्पत्तिकी
पुरानी प्रणालीसे माल तैयार करनेका पुराना तरीका लाभदायक नहीं रह जाता;
क्योंकि माल बनानेका पुराना तरीका, पुराने सामाजिक विभाग, पुराने कानून, पुरानी
शासनसंस्थाएँ, पुराने विद्यासम्बन्धी सिद्धान्त (ऐसी उत्पादक शक्तियोंके अनुकूल जो
या तो लुप्त हो चुकी हैं या लुप्त हो रही हैं) रह नहीं जाते ? अतः अब वह समाजरूपी
भवन उसकी आर्थिक दशारूपी नींवके सदृश नहीं रह जाता । इस प्रकार उत्पादक
शक्तियाँ और उत्पत्तिकी प्रणाली एक दूसरेके विरुद्ध हो जाती हैं । प्राचीनता,
नवीनताका यह विरोध धीरे-धीरे मनुष्यके विचारोंपर प्रभाव डालता है । मनुष्य
एक नवीन युगका आरम्भ अनुभव करने लगता है । इस घटनासे समाजका
संघटन भी बदलने लगता है । जो वर्ग पहले तुच्छ समझे जाते थे, वे ही महत्त्वपूर्ण
और सम्पत्तिके स्वामी बन जाते हैं । जिन वर्गोंकी पहले प्रधानता थी, उनका पतन
होने लगता है । इस प्रकार समाजके मूल आधारमें परिवर्तन होनेसे प्राचीन
धार्मिक, कानूनी, दार्शनिक और राजनीतिक प्रणालियाँ पहले तो अपने अस्तित्व
कायम रखनेके लिये हाथ-पैर मारती हैं, परंतु समय-परिवर्तनके कारण वे अव्यव-
हार्य और निकम्मी हो जाती हैं, लोगोंके उपयोगार्ह नहीं रह जातीं । मनुष्योंके विचार
भी प्रायः परिवर्तनविरोधी स्थितिपालक होते हैं, पर फिर वे भी धीरे-धीरे घट-
नाओंका अनुसरण करने लगते हैं । महान् विचारक उत्पन्न होते हैं, वे नवीन
परिस्थितिका रहस्य समझाते हैं । उसके अनुसार नवीन भावनाओं, विचारधाराओं-