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मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished866 पृष्ठ

पृष्ठ 731, कुल 866 में से

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पृष्ठ 731

है; तभी तो आज सह-अस्तित्वका राग अलापा जा रहा है । यदि रूसी साम्राज्य-
वादियोंके साथ सह-अस्तित्व सम्भव समझते हैं, तब तो साम्राज्यवादी भी परस्पर
तथा आत्महितकी कामनासे अपने लोभकी मात्राको संकुचित कर सकते हैं ।
इस समय संयुक्तराष्ट्रसंघद्वारा भी बहुत कुछ नियन्त्रण और समन्वय हो सकता
है । मार्क्सवादियोंके मतानुसार भी जब अन्ताराष्ट्रिय मजदूर-राज्य स्थापित हो
जायगा, तभी सब संघर्षोंका अन्त हो सकता है । धर्मनियन्त्रित रामराज्यवादीके
सार्वभौम शासनमें तो स्पष्ट ही उसके द्वारा सब अन्यायोंका निराकरण हो जायगा ।
इसे ऐतिहासिक अनुभवोंके विपरीत नहीं कहा जा सकता । भले ही आधुनिक
मनगढंत मिथ्या इतिहासके अनुसार रामराज्य ऐतिहासिक तथ्य न हो, परन्तु
आर्ष प्राचीन इतिहासके अनुसार अखण्ड भूमण्डलव्यापी सार्वभौम रामराज्य
परम ऐतिहासिक तथ्य है । हाँ, मार्क्सका सर्वहारा राज्य अभीतक निराकार
स्वप्न ही है । इतिहास साक्षी है कि धर्महीन, जडवादी राज्य कभी पनप नहीं सका है।
शान्ति और समन्वय तो धर्महीन राज्यमें असम्भव है । काट्स्कीका अन्ताराष्ट्रिय
पूँजीवादी साम्राज्यवाद तथा मार्क्सका विश्वव्यापी सर्वहारा राज्य मुकाबिलेकी ही
चीज है । किंतु रामराज्यवादीका धर्मनियन्त्रित सार्वभौम राज्य सहस्रशः अनुभूत
प्रयोग है । मान्धाता, दिलीप, अज, रामचन्द्र, नहुष, पुरूरवा, अलर्क आदिका
अखण्ड भूमण्डलवर्ती धर्मराज्य पूर्णतया शान्तिके स्थापक रह चुके हैं । लाखो
वर्षोंके अनुभवोंके सामने सौ-दो सौ-वर्षके मार्क्सवादी अनुभव कुछ भी मूल्य
नहीं रखते । मार्क्सवादी सर्वहारा राज्य या पूँजीवादियोका अन्ताराष्ट्रिय साम्राज्य-
वाद किसी पथको अपनाये, उसमें धर्म-नियन्त्रणके बिना लूट-खसोटका अन्त
नहीं हो सकता ।

मार्क्सवादमें यह भी कहा जा सकता है कि वहाँ किसीके पास कुछ चीज़
नहीं रह जायगी, फिर कौन किसकी क्या चीज लूटेगा ? इसमें तो सभी फाँकेमस्त
ही होगे, परंतु रामराज्य-प्रणालीमें तो सार्वभौमका नाममात्रका ही नियन्त्रण होगा,
वस्तुतः सर्वोपरि धर्मका ही नियन्त्रण मुख्यरूपसे रहेगा । मार्गमे पड़े हुए दो लाख-
कें नोट पाकर जिसका है उसे लौटा देनेकी सलाह मार्क्सवादी नही दे सकता । यह
तो रामराज्यवादी ही कह सकता है । परान्न या परद्रव्य मार्गमें हो चाहे गृहमें
ही पड़ा हो, विधिपूर्वक बिना पाये नही लेना चाहिये । यहाँ तो बाजारोंमें माल भेजनेका
उद्देश्य केवल मुनाफा नहीं, किंतु वितरण ही है । लाभ भी अवश्य हो सकता है,
किंतु वह आनुषङ्गिक है, मुख्य नहीं । अतएव किसीके द्वारा किसी राष्ट्रके शोषण-
की भी बात नहीं आयेगी, क्योकि समानता, स्वतन्त्रता, भ्रातृत्ताके दृष्टिकोणसे
जैसे एक व्यक्ति दूसरेका पोषक होगा, वैसे ही एक राष्ट्र, एक वर्ग भी दूसरे राष्ट्र,
दूसरे वर्गोंका शोषक न होकर पोषक ही होगा ।