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मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished866 पृष्ठ

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पृष्ठ 739

४२६ मार्क्सवाद और रामराज्य

क्रान्ति और सर्वहाराके अधिनायकत्वमें एक नयी साम्यवादी व्यवस्थाका जन्म
होगा। रूसोकी यह स्वतन्त्रता प्राचीन प्राकृतिक स्थितिके स्वतन्त्रतासे भिन्न
थी। वैसे ही मार्क्सका साम्यवाद भी अति प्राचीन साम्यवादसे भिन्न है। भेद इतना
ही है कि रूसो आदर्शवादी था और मार्क्स भौतिकवादी।
मार्क्सके अनुसार 'मानव-इतिहास वर्ग संघर्षका इतिहास है। यह संघर्ष
युगानुरूप होता है। कभी प्रत्यक्ष, कभी अप्रत्यक्ष भी रहा है। कभी विजेताद्वारा
नये समाजका निर्माण हुआ, तो कभी दोनों वर्गोंका विध्वंस हुआ है। सर्वहाराकी
क्रान्तिद्वारा ही इस वर्ग-संघर्षका अन्त होगा; क्योंकि इसके द्वारा वर्गका अन्त
होकर एक वर्गविहीन समाज बनेगा।' आधुनिक लोगोंकी दुनिया ही छः हजार
वर्षकी है। इसके ही भीतर इन्हें अनेकों युगोंकी कल्पना करनी पड़ती है। परंतु
भारतीय महर्षियोंकी दृष्टिसे वर्तमान सृष्टि ही दो अरब वर्षकी मानी जाती है।
आधुनिक वैज्ञानिक भी अब सृष्टिकी प्राचीनताकी ओर बढ रहे हैं। इस दृष्टिसे
धर्म-राज्य राम-राज्य और सोपद्रव, क्षुद्रराज्य—तीन ही प्रकारका युग प्रतीत होता
है। मार्क्सके छः युग सोपद्रव क्षुद्रराज्यके भीतर ही हैं।
अनेक दार्शनिक हाब्सके प्राकृतिक खूँखार मानव एवं उसके द्वारा अनु-
बन्धपूर्वक 'दीर्घकाय'को सर्वाधिकार समर्पण आदि-जैसे ही मार्क्सके ऐतिहासिक
वर्णनको भी अप्रामाणिक समझते हैं। अतीत घटनाओंके सम्बन्धमें प्रत्यक्षकी
प्रवृत्ति हो ही नहीं सकती, अतः अनुमान या आगमद्वारा ही उस सम्बन्धमें कुछ
जानकारी हो सकती है। आगमोंपर मार्क्सका विश्वास नहीं था। अपुष्ट कारणोंके
आधारपर इतिहासके सम्बन्धमें अटकल लगाकर किसीने तीन, किसीने पाँच तो
किसीने छः युगकी कल्पना कर डाली। ये कल्पनाएँ निराधार हैं। रूसोकी प्राकृतिक
स्थितिमें स्वर्णयुग ही था, उसी प्रकार मार्क्सकी भी अति प्राचीन मनुष्योंकी
साम्यवादी संघकी स्थिति थी। फिर उसका अन्त क्यों हुआ ? जिस तरह उसका
अन्त हुआ उसी तरह मार्क्ससम्मत सर्वहाराके डिक्टेटरशिपमें होनेवाली क्रान्ति-
द्वारा वर्गहीन राज्यका भी अन्त क्यो न होगा ? हीगेलके अनुसार कोई भी संवाद
अन्तमें वाद बन जाता है; क्योंकि कुछ-न-कुछ लोग उस संवादके भी विरोधी
रहते ही हैं। उन्हींका समुदाय उस संवादका प्रतिवादी बन जाता है। जब अति
प्राचीन साम्यवादी संघवादी बन सका तो अन्तिम वर्गविहीन समाज क्या स्थायी-
रूपसे हो सकेगा ? और उसका विरोधी कोई न होगा ? फिर हिगेलका आदर्श
राज्य भी द्वन्द्वमानके अनुसार अन्तिम ही है। इसमे भी सिवा अन्धविश्वासके
और क्या प्रमाण है ? फिर यह भी तो कहा जा सकता है कि जैसे रूसोकी सामान्ये-
च्छाद्वारा प्राप्त स्वतन्त्रताका स्वप्न पूरा नहीं हुआ, उसी तरह मार्क्सके भी वर्गविहीन
राज्यका स्वप्न पूरा होनेवाला नहीं। धर्मनियन्त्रित शासन-तन्त्रवादीके यहाँ ह्रास-