मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)
Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
मार्क्स और आत्मा ६९५
अवगति ही अनित्या है, वही प्रमा है, वही प्रमाणफल है, विम्बभूत अवगति नित्य
ही है। यदि अवगति नित्य है, तब तो प्रमाण व्यापार व्यर्थ होगा और अनित्य
है तो प्रमाण व्यापार आवश्यक होगा । परंतु प्रमाताकी अवगति तो प्रमाण-
निरपेक्ष स्वतःसिद्ध है ही। यदि प्रमाताको आत्मसिद्धिमें प्रमाणकी अपेक्षा हो तो
किसे प्रमित्सा होगी, यह भी विचारणीय है। जिसे प्रमित्सा होती है, वही प्रमाता
होता है। प्रमित्सा प्रमेयविषयक ही होती है, प्रमातृविषया नहीं । प्रमातृविषयक
प्रमित्सा होनेसे अनवस्था-दोष भी होता है। प्रमाताकी प्रमित्सा अव्यवहित होनेसे
प्रमातृविषया नहीं हो सकती । लोकमें प्रमाताकी इच्छा, स्मृति, प्रयत्न एवं
प्रमाणजन्यके अनन्तर प्रमेय सिद्ध होता है। प्रमेय-विषया-अवगति अभीष्ट होती
है। स्वयं प्रमाता अपनेसे या अन्य इच्छादिसे व्यवहित नहीं हो सकता । स्मृति
भी स्मर्तव्यविषया होती है, स्मर्तृविषया स्मृति नहीं होती । इसी तरह इच्छा
भी इष्टविषया होती है, इच्छावद्विषया इच्छा नहीं होती । यदि स्मृति
एवं इच्छा स्मर्ता एवं इच्छावान्को विषय करे तब इसमें भी अनवस्था-दोष
आयेगा । स्मृति, इच्छा, प्रयत्न एवं प्रमाण जन्मके अनन्तर ही स्मर्तव्य, इष्यमाण,
प्रयत्नितव्य एवं प्रमेयका व्यवहार हो सकता है।
कहा जा सकता है कि 'प्रमातृविषयक अवगति-उपपत्ति उपपन्न न होनेसे
आत्मा अनवगत ही रहेगा', परंतु यह कहना ठीक नहीं। अवगन्ताकी अवगति
अवगन्तव्यविषयक होती है, अवगन्तृविषयक अवगति नहीं होती । यदि ऐसा होगा
तो अनवस्था-प्रसङ्ग होगा । आत्माकी अवगति स्वरूपभूत ही है अर्थात् अवगन्ताकी
अवगति उत्पन्न नहीं होती । अग्निकी उष्णता और प्रकाशके तुल्य ही आत्माका
स्वभाव ही अवगति है। 'अत्रायं पुरुषः स्वयंज्योतिः' 'आत्मैवास्यज्योतिः' 'एषोऽस्य
परमो लोकः' 'न हि विज्ञातुर्विज्ञातेर्विपरिलोपो विद्यते' (बृहदा० उप० ४।३।३०)
इत्यादि श्रुतियोंके अनुसार आत्माकी स्वरूपभूत ज्योति है। चैतन्यात्मज्योतिकी अवगति
अनित्य है ही नहीं । असंहत, स्वप्रकाश एव अपरार्थ ही आत्मा है। यदि आत्मा-
की अवगति अनित्य होगी तो उत्पत्तिसे प्रथम एव प्रध्वंससे ऊर्ध्व उसका अभाव
कहना पड़ेगा । फिर आत्माकी अपरार्थता आदि सभी बाधित होंगे । अवगति
प्रमा है, वह स्मृति इच्छादिपर्णिता अनित्या है, आत्मा स्वरूपभूत नित्य है।
जैसे तिष्ठति शब्द अचलत्व-अर्थमें प्रयुक्त होता है, जङ्गम पदार्थ गतिपूर्वक अचल
होते हैं; आकाश-पर्वतादि स्थावर पदार्थ सदा ही अचल रहते हैं, दोनोंमें ही
तिष्ठति शब्दका प्रयोग होता है । 'तिष्ठन्ति मनुष्याः, तिष्ठन्ति पर्वताः, तिष्ठत्याकाशः'
उसी तरह अनित्य अवगति एव नित्य आत्मस्वरूप-अवगतिमें भी प्रमात्व-
व्यवहार बन जाता है । फलस्वरूप प्रमामें कोई अन्तर नहीं । प्रमाण फल ही
प्रमा है । वह प्रमातृगतचित्स्वरूप प्रकाश ही है । यद्यपि वृत्तिव्याप्त विषयस्य-
चित्प्रतिविम्ब ही फल है तथापि 'मयेदं विदितम्' मैंने यह जाना, इस तरह प्रमाण-
६९६ . मार्क्सवाद और रामराज्य
प्रमेयसम्बन्ध आत्मामें प्रतीत होता है, अतः प्रमातृगतचित्प्रकाशसे सम्बन्ध
मानना ही पड़ता है । जड अन्तःकरण यद्यपि व्यापारका आश्रय हो सकता है तथापि
वह चित्का आश्रय नहीं हो सकता । चिदात्मा कूटस्थ होता है, अतः वह
व्यापारका आश्रय नहीं हो सकता । इसीलिये वह प्रमाके प्रति कर्ता भी नहीं हो
सकता और मुख्यवृत्तिसे जड-अजड कोई भी प्रमाता नहीं बन सकता । अतः
परस्पराध्याससे ही आत्मा ही बाह्य-विषयका भी प्रमाता बनता है । फिर स्वात्मामें
स्वयंप्रकाश होनेसे प्रमातामें कोई शङ्का ही नही । अतएव अनवगत होने या
प्रमाणकी अपेक्षा रखनेकी कोई कल्पना ही नही हो सकती । अर्थात् कूटस्थ
नित्य आत्मज्योतिमे ही अन्तःकरणादि-उपाधिद्वारा औपाधिक ही प्रमातृत्व होते हैं ।
प्रमाणसापेक्ष शब्दादि सभी अचेतन, संहत एवं अनात्मा हैं । अवगति
स्वयं अन्यानपेक्ष स्वतःसिद्ध है, वही आत्मा है । उसमे भी सोपाधिक अवगति
अनित्य है, निरुपाधिक नित्य है । यद्यपि कहा जा सकता है कि ‘मै
मनुष्य हूँ, जानता हूँ’ इस व्यवहारमें प्रत्यक्षादि प्रमाणकी अपेक्षा नहीं
रहती है, तथापि मृति, सुषुप्ति आदिमें देहसिद्धिके लिये भी प्रमाणकी अपेक्षा
होती ही है । उसकी भी अवगति कूटस्थ, स्वयंसिद्ध आत्मज्योति ही है । अवगतिसे
भिन्न देहादि, ग्राह्य, ग्राहक, करणादि रूपसे भूत ही परिणत होते हैं । अवगति
यद्यपि स्वयं नित्यसिद्ध है तथापि प्रमाणजन्य प्रत्यक्षादि वृत्तिरूप प्रत्ययकी
अनित्यतासे ही तदभिव्यक्त अवगतिमें भी अनित्यता एवं प्रमाणफलताका व्यवहार
होता है । सभी वृत्तियाँ परस्पर व्यभिचरित होती हैं । बोध, स्फुरण उनमें एक
रूपसे ही समान होता है, अतः वही स्फुरण, बोध या अवगति नित्य एकरस हैं ।
जैसे स्वप्नके नील-पीतादि प्रत्यय-भेद व्यभिचरित होनेसे असत्य हैं, अवगति ही
सत्य है, वैसे ही सर्वत्र प्रत्ययोमें भिन्नता होनेसे मिथ्यात्व है । बोधमात्र ही
अभिन्न एव एक है । उस अवगतिका अवगन्ता अन्य कोई नहीं है । वह स्वयं
नित्य है । उसका हान या उपादान नहीं हो सकता । जैसे शब्दादि, लोष्ठादि
ज्ञेय हैं, ज्ञात नही, उसी तरह भूतपरिणाम देहादि भी ज्ञेय ही हैं, ज्ञाता नहीं ।
जो वस्तु स्वतःसत्तास्फूर्तिवाली नहीं है वह जड है, उसे सत्तास्फूर्ति देनेवाला ही
चेतन है । वही ‘सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म’ ‘विज्ञानमानन्दं ब्रह्म’ है । ज्ञाता
आत्मा, ज्ञेय अनात्मा, इदमंश अनात्मा है, द्रष्टा अनिदमंश ही आत्मा है ।
अहमर्थमें भी दृश्य अहं इदमंश ही है, दृक् आत्मा ब्रह्म है । जैसे सौरालोकमें
स्फटिकादि मणियोंपर जपाकुसुमादिकी रक्ताद्याकारता प्रतीत होती है, उसी तरह
स्वप्रकाशबोधरूप आत्मप्रकाशमे ही बुद्ध्यादिमें विषयाकारताकी प्रतीति होती
है । जैसे सौरालोकसे ही स्फटिक एवं रक्ताद्याकारता दोनों ही भासित होती हैं,
वैसे ही नित्य-बोधसे ही बुद्ध्यादि एवं विषयाकारता दोनो ही भासित होती हैं ।
मार्क्स और आत्मा ६९७
बुद्धि होनेपर बुद्ध्यारूढ पदार्थ दृश्य होते हैं । निद्राकालमें बुद्धि विलीन
होनेपर दृश्य उपलब्ध नहीं होता, परन्तु द्रष्टा तो सदा एक सा ही रहता है ।
अविवेकसे बुद्धि सर्वसाक्षीका अभाव समझती है । विवेकसे स्वप्रकाश सर्वसाक्षीसे
भिन्न बुद्धि अपने आपको भी नहीं समझती । ब्रह्मादिस्थावरान्त प्राणी अखण्ड-
बोधस्वरूप आत्माके पुर ही हैं, फिर भी वह आत्मा सर्वभासक भान सर्वभूतोंसे
असम्पृष्ट ही रहता है । जैसे निर्विकार आकाशको बालकलोग नीला समझते हैं,
वैसे ही सर्वभासक भान निष्प्रपञ्च होते हुए भी सप्रपञ्च-सा प्रतीत होता है । सर्व-
प्राणि-बुद्धियाँ भी उस अखण्डभानके पूर ही हैं । जो भी पदार्थ उत्पत्तिमान्
हैं और ज्ञान विक्षेप हैं, वह स्वप्नवत् ही हैं । नित्यनिर्विषय ज्ञान सर्वविनाशसाक्षी
स्वतन्त्र ही है । ज्ञाताकी स्वरूपभूता ज्ञप्ति नित्य है, सुषुप्तिमें जो आत्मा शब्दादि-
को नहीं जानता वह जानता हुआ ही नहीं जानता । अन्य ज्ञेय नहीं है, इसलिये
नहीं जानता है, स्वरूपभूत ज्ञप्ति तो रहती है । विज्ञाताकी विज्ञातिका कभी भी
विलोप नहीं होता—
'यद्वै तन्न पश्यति पश्यन् वै तन्न पश्यति न हि द्रष्टुर्दृष्टेर्विपरिलोपो विद्यते ।'
(वृहदा० उप० ४।३।२३)
जाग्रदादिकालकी जो घटादि-ज्ञप्ति होती है, वह तो भ्रान्ति ही है । फिर
भी सभी बुद्धिवृत्तियाँ स्फुरणसे व्याप्त ही होती हैं, अतः सर्ववृत्तियोकी उत्पत्ति,
स्थिति, विनाशका साक्षीस्फुरण सर्वत्र एकरस ही रहता है । जागर, स्वप्नमें विषय,
समकालमें सुप्ति, समाधि आदिमें विषयाभाव सभी कालमें स्फुरण रहता है, अतः वह
शुद्ध है । शुद्ध दृशि ही अमर आत्मा है, जैसे दर्पणादिमें मुखका प्रतिबिम्ब होता
है, तब दर्पणादिगत दोषोंका मुखमे आरोप किया जाता है, उसी तरह दृशिका
अहङ्कारमें प्रतिबिम्ब होनेसे अहङ्कारगत दोषोका दृशिमें आरोप किया जाता है।
श्रुत्यादिसे विज्ञाति अर्थात् अनित्य विज्ञातिका विज्ञाता नित्यबोध नित्यदृशिस्वरूप
आत्मा विदित होता है । उस दृशिस्वरूपमें ज्ञान-अज्ञान—दोनों ही कल्पित होते हैं।
विज्ञातिका विज्ञाता शुद्ध विज्ञाता ही है, वह विज्ञेय नहीं होता । आत्मा अलुप्तदृक्
है । अनित्य बुद्धिवृत्तिरूप दृष्टिके कारण इसमे जन्यताकी प्रतीति होती है । जैसे
व्यञ्जक आलोक व्यङ्ग्यकी आकारताको प्राप्त होता है, उसी तरह शुद्ध नित्य ज्ञान-
स्वरूप ज्ञाता स्वभास्य प्रत्ययोंके आकारका प्रतीत होता है । जैसे दीप बिना यत्नके
ही उपस्थित विषयोंको एव विषयाकारवृत्तियोंको भी प्रकाशित करता है, जैसे ज्योति
अन्यका द्योतक होनेपर भी अपना प्रकाशक नहीं होता, वैसे ही ज्ञानस्वरूप आत्मा
अन्यका भासक होनेपर भी आत्मभासक नहीं होता । जैसे अग्नि अपना दहन-
प्रकाशन नही करता, वैसे ही आत्मा अपना प्रकाशन नहीं करता । फिर भी जैसे
रविके स्वात्म-प्रकाशके लिये अन्य ज्योतिकी अपेक्षा नहीं होती, उसी तरह बोध-
स्वरूप आत्माको स्वात्मप्रकाशके लिये अन्यबोधकी अपेक्षा नहीं होती । जो
जिसका स्वरूप होता है, उसे उसकी अपेक्षा नहीं होती। जैसे प्रकाश प्रकाशान्तरसे
दृश्य नहीं होता, प्रकाशके समागमसे अप्रकाश स्वरूपकी व्यक्ति होती है, परन्तु
प्रकाशस्वरूप सूर्यकी व्यक्ति प्रकाश-समागमकी अपेक्षा नहीं रखती। जैसे प्राणी
प्रकाशस्थ देहको सप्रकाश मानता है, उसी तरह चेतन द्रष्टासे प्रकाशित चित्तको
सप्रकाश मानकर 'अहं द्रष्टा' ऐसा व्यवहार करने लगता है। प्राणी इसी तरह सभी
दृश्य पदार्थोंके साथ अपना अभेद समझकर आत्माको तत्तद्दृश्यविशिष्ट मानने
लगता है। जैसे स्वप्न और स्मृतिमे घटादिका आकार भासित होता है, अतः
अनुभवावस्था में घटाद्याकारका आभास माना जाता है। अतः स्वप्न, स्मृतिमें
बाह्यार्थके बिना ही विषयाकारवृत्तिमदन्तःकरण ही प्रतीत होता है। इसी तरह
स्वप्नमें सिंहासनारूढ देह दृश्य होता है, द्रष्टा स्वयं वह नहीं है। उसी प्रकार
जाग्रत्कालमें भी दृश्य देहसे द्रष्टा भिन्न ही है। जैसे मूर्ति आदिके साँचेमें डाला
हुआ द्रवीभूत ताम्रादि साँचेके आकारका ही हो जाता है, जैसे व्यञ्जक-आलोक
व्यङ्ग्यके आकारका बन जाता है, उसी तरह सर्वार्थव्यञ्जक बुद्धि सर्वार्थाकार
हो जाती है। अर्थाकार बुद्धि ही द्रष्टा अखण्डबोधरूप आत्मासे दृष्ट होती है।
वही स्वप्नके दृशिस्वरूप आत्मासे दृश्य होती है। अखण्ड दृशिस्वरूप बोधसे ही
सर्वदेहोंकी बुद्धियाँ भासित होती हैं। जैसे घटादि प्रकाश सम्पर्कसे 'घट. प्रकाशते'
इस रूपसे प्रकाशके कर्त्ता होते हैं, वैसे ही सूर्यादि प्रकाश प्रकाशान्तर-सम्पर्कके
बिना ही 'सूर्यः प्रकाशते' इस तरह सूर्य प्रकाशका कर्त्ता कहा जाता है। इसी
तरह बुद्धयादि अखण्डबोधके सम्पर्कसे प्रकाशित होते हैं, परन्तु अखण्डबोध
स्वतः ही प्रकाशित होता है। जैसे सूर्यमे सत्तामात्रसे प्रकाशकर्तृत्वका व्यवहार
होता है, उसी तरह दृशिस्वरूप आत्मामें सन्निधानमात्रसे प्रकाशकत्वका व्यवहार
होता है। जैसे बिलसे निकलनेपर सूर्यकी सत्तामात्रसे सर्पादि भासित होते हैं,
सूर्यमे किसी कर्तृत्वादि विकारकी आवश्यकता नहीं पड़ती, इसी तरह दृश्यके
उपस्थित होनेपर दृशिस्वरूप आत्मासे दृश्यका प्रकाश होता है, एतदर्थ उसमें
कर्तृत्वादि विकारकी अपेक्षा नहीं होती।
इसी प्रकार दाह्यका संनिधान होनेपर उष्णस्वरूप अग्निमे दाहकत्वका
व्यवहार होता है। इसी तरह प्रयत्न बिना भी बोधस्वरूप आत्मा ज्ञाता, बोद्धा
आदि कहा जाता है। वस्तुतः आत्मा विदित-अविदित—दोनोंसे ही अन्य है।
जैसे प्रकाशस्वरूप सूर्यमें दिन-रात नहीं होते, वैसे ही बोधस्वरूप आत्मामें बोध,
अबोध नहीं होते। अतएव बौद्धों-जैसी इस अखण्डबोधमें स्वसंवेद्यता भी नहीं
है। साथ ही बोधको शून्य भी नहीं कहा जा सकता; क्योकि जैसे घटादि दृश्य
हैं, वैसे ही बुद्धि भी साक्षिभास्यरूपसे स्पष्ट प्रतीत होती है। जैसे घटादि
विकल्प कार्य निर्विकल्प-कारणपूर्वक होते हैं, उसी तरह बुद्धि आदि सविकल्प
सप्रकाश निर्विकल्प-प्रकाशपूर्वक होने ही चाहिये।
बौद्ध क्षणिक ज्ञानको ही आत्मा कहते हैं । जैसे दीपमें 'स एवायं दीपः',
यह वही दीपक है, इस प्रकार प्रत्यभिज्ञा ( पहचान ) से सादृश्यमूलक एकत्वकी
भ्रान्ति होती है । उसी तरह क्षणिक ज्ञानोंकी धारामें ही सादृश्यके कारण
'स एवाहम्' मैं वही हूँ, इस प्रकार एकत्वकी भ्रान्ति होती है । बाह्याकार भी
क्षणिक ज्ञान ही है, परंतु यह सब कहना ठीक नहीं । कारण कि ज्ञेयकी
उत्पत्तिके पहले उसका ज्ञान सम्बन्ध कैसे होगा । ज्ञान उत्पन्न होते ही नष्ट
होता है तब उसका ज्ञेयके साथ सम्बन्ध कैसे होगा ? ज्ञेयको प्रत्यक्षताका अनुभव
होता है, फिर उसे अनुमेय माननेवाला पक्ष भी असङ्गत ही है । अनुभविता
भी यदि क्षणिक ज्ञान ही है तब स्मृति भी कैसे सम्पन्न होगी ? अन्य अनुभूतका
अन्य स्मरण कर नहीं सकता । यदि कोई स्थायी आत्मा हो, तभी ज्ञानसे
संस्कार उत्पन्न हो तभी स्मृति हो सकेगी । संस्कारका स्थायी आधार न होनेसे
ही पूर्वापरकी तुल्यताका ग्रहण सम्भव नहीं होता । अतः सादृश्यमूलक एकत्वकी
भ्रान्ति भी नहीं कही जा सकती । क्षणिक विज्ञान व्यक्तियोंसे अतिरिक्त विज्ञान-
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बन सकता, इसलिये भी सुख ज्ञानग्राह्य नहीं हो सकता । यदि कहा जाय
कि सुख-दुःखादि ज्ञानग्राह्य मत हो, तो यह भी ठीक नहीं; कारण,
'सुखं मया ज्ञातम्' 'दुःखं मया ज्ञातम्' इस रूपसे सुख-दुःखकी स्मृति सुख-
दुःखके अनुभवको बोधित करती है । जो कहा जाता है कि 'ज्ञान-विशिष्ट
आत्मामें समवेत होनेसे सुखादिका भान होगा', यह भी ठीक नहीं । कारण, एक
कालमें आत्मा अनेक विशेष गुणोंका समवायी नहीं हो सकता । एक असमवायी-
कारण आत्ममनः संयोगसे एक ही कार्य उत्पन्न होनेका नियम मान्य है । यदि
ज्ञान-विशिष्ट आत्म-समवेत होनेसे सुखादिका ग्रहण हो तब तो आत्मगत
संख्या परिमाणादिका भी ग्रहण होना ही चाहिये । यदि कहा जाय कि
'सुख, दुःख, ज्ञानादिका आत्माके गुण या धर्म होनेसे आत्माद्वारा ही
प्रकाशित होना ठीक है', वह भी ठीक नहीं; कारण, नैयायिकोंका आत्मा प्रकाश-
स्वरूप नहीं है । फिर उससे सुखादिका प्रकाश कैसे होगा ? नैयायिक आत्माको
व्यापक और नित्य भी मानते हैं, अतः ज्ञान, सुखादि उसके विकार नहीं हो
सकते । व्यापक, नित्यको विकारी कहना भी असङ्गत ही है । अतः आत्मा न तो
ज्ञानादि गुणवाला ही सिद्ध होता है और न गुण-गुणीमें ग्राह्य-ग्राहकभाव ही
बन सकता है । फिर सभी अनेक व्यापक आत्मामें आत्ममनः-संयोग समान ही
है । अतः एक आत्माके सुखादिसे सभी आत्माओंको सुखादिमान् कहना पड़ेगा ।
अदृष्टादि भी किस आत्मामें हैं, किसमें नहीं, इसका निर्णय अशक्य होगा । अतः
सुख-दुःख एवं वृत्तिरूप ज्ञानादि स्वप्रकाश व्यापक आत्मासे भास्य मानना ही
युक्त है । वही आत्मा नित्य-बोध है । ज्ञानको ज्ञेय माननेसे अनवस्थित
ज्ञानमाला अनिवार्य होगी । यह भी विचारणीय है कि विषय-प्रकाश-कालमें
विषय-प्रकाशक ज्ञान भासमान होता है या नहीं, यदि नहीं तो विषय स्वयं भासित
होता है या ज्ञानाधीन होकर भासित होता है, यह निर्णय नहीं हो सकेगा ।
अतः विषय-प्रकाश-कालमें ही प्रकाशक ज्ञानका भानस्वरूप ज्ञानान्तर मानना
चाहिये । यदि वह ज्ञान भी भासमान नहीं है तो उसके द्वारा पूर्व ज्ञानका भान
नहीं बनेगा । फिर उस ज्ञानके भानके लिये भी ज्ञानान्तर मानना पड़ेगा ।
'पूर्व-पूर्व ज्ञान उत्तरोत्तर ज्ञानसे भासित होंगे', यह पक्ष भी सम्भव नहीं है ।
क्योंकि प्रथम ज्ञान उत्पन्न होनेके अनन्तर मनमें क्रिया उत्पन्न होगी, उससे विभाग
होगा, तब पूर्व संयोग नाश होगा, पुनः दूसरा संयोग उत्पन्न होगा, तब ज्ञानान्तर
उत्पन्न होगा । इस तरह बहुक्षणविलम्बसे जब उत्तर ज्ञान उत्पन्न होगा
तब पूर्वज्ञान रहेगा ही नहीं, फिर उसका भान कैसे होगा । यदि इन सब
दोषोंसे बचनेके लिये एक ही आत्म-मनःसंयोगसे दो ज्ञान या अनेक ज्ञानकी
उत्पत्ति मानी जाय तब तो एक ही आत्म-मनः-संयोगसे युगपत् संनिकृष्ट रूप,
रस, गन्धादिका भी समकालमें ही ज्ञान होना चाहिये । संस्कार-उद्बोध होनेपर
उसी समय स्मृतियों भी उत्पन्न होनी चाहिये, परंतु यह सब सिद्धान्तविरुद्ध
होगा। नैयायिकोंके सिद्धान्तमे न तो अनुभव एवं स्मृतियोंकी समकालता मान्य
है और न तो विशेष गुणोंकी समकालता ही मान्य है 'युगपज्ज्ञानानुपपत्तिर्म-
नसो लिङ्गम्' (न्यायदर्शन १।१।१६) एक कालमें अनेक ज्ञानोंका न उत्पन्न
होना अणुपरिमाण मनके होनेमें लिङ्ग है । इसलिये दीर्घशष्कुली (पापड)
खाते समय समकालमें शब्द, स्पर्श, रूप रस, गन्धकी अनुभूतिको भी नैयायिक
क्रमिक ही मानते हैं ।
यदि ज्ञान या चैतन्य आत्माका स्वरूप-लक्षण माना जाय तो जैसे गन्धादि
पृथ्वीका लक्षण है, वैसे ही ज्ञान आत्माका लक्षण हुआ, फिर तो जैसे गन्धादि
पृथ्वी आदिका स्वरूप ही है, वैसे ही ज्ञान भी आत्माका स्वरूप ही ठहरता है ।
फिर 'अनित्य ज्ञानवाला आत्मा है', यह कथन व्यर्थ ही है । यदि ज्ञान आत्माका
तटस्थ लक्षण है तो आत्माका स्वरूप लक्षण भी बतलाना चाहिये । पर वह
चेतनातिरिक्त अन्य कुछ भी नहीं हो सकता । अतः देहादि-जड़-विलक्षण ही
आत्मा है, यह कहना पड़ेगा । तथा च निर्विशेष चिद्रूप ही आत्मा हुआ ।
बोधस्वरूप आत्म-ज्योतिसे दीप्त होकर बुद्धि भ्रान्तिसे अपनेमें ही बोध मानती
है । 'अन्य साक्षी बोद्धा नहीं है, मैं ही बोद्धा हूँ', यह बुद्धिका भ्रम ही है ।
बुद्धि आगन्तुक है, किंतु बोध तो सुषुप्तिमें बुद्धिके न रहनेपर भी रहता है ।
अतः अविवेकसे ही बुद्धिमें बोधरूपताकी भ्रान्ति होती है । स्वप्नके सभी वेद्य-
प्रपञ्चको इसी बोधमे जाना जाता है । क्योंकि स्वप्नमें आदित्य, चन्द्र, चक्षु,
वाक् आदि सभी ज्योतियाँ लुप्त होती हैं, मन स्वयं वेद्यरूपसे ही परिणत है ।
भासक ज्योति आत्मासे भिन्न होकर कुछ भी नहीं है । अतएव स्वप्नमें जिसमें
रूपदर्शन, शब्दश्रवण, वाग्व्यवहार होता है वह चक्षु, श्रोत्र, मन एवं वाक्
आदि, आत्मज्योति ही है,—'सा श्रोतु श्रुतिर्यया स्वप्ने शृणोति । सा
वक्तुर्वक्तिर्यया स्वप्ने वदति।'
जैसे एक ही स्फटिक मणिमें नील, पीत, हरित उपाधिके भेदसे अनेक
रूप परिलक्षित होते हैं, उसी तरह एक ही नित्य ज्ञान स्वप्नकल्पित शब्दादि
अनेक उपाधिभेदसे श्रुति, मति, विज्ञाति आदि रूपमें प्रतीत होता है ।
इसी चिद्रूप ज्ञानका ही विकल्प जाग्रत् भी है । अज्ञानोपाधिक ज्ञानस्वरूप
आत्मा बुद्धिकी कल्पना करता है । बुद्धिसे उपहित होकर बुद्धिस्थ अर्थका
ही व्याकरण करता हुआ उनका प्रकाशक वही ज्ञानस्वरूप आत्मा सर्वव्यवहार-
भागी होता है । जैसे स्वप्नका व्यवहार, ठीक वैसा ही जाग्रत्का भी व्यवहार
होता है । फिर भी शुद्धचित्तमें निर्विकल्प नित्यज्ञानका साक्षात्कार होता है ।
बाह्येन्द्रियोंसे विषयोपलम्भ जागर है । संस्कारवशात् निद्राकालमें प्रतीत प्रपञ्च-
स्वप्न एक प्रकारकी स्मृति है। दोनोंहीका अभाव सुषुप्ति है। तीनोंका ही साक्षी
नित्य ज्ञान है। सुषुप्तिका तम ही जागर, स्वप्नका बीज है। स्वात्म-प्रबोधसे बीज
दग्ध होनेपर अनन्तज्ञान निष्प्रपञ्चरूपसे भासित होता है। जैसे अदृश्य भी राहु
चन्द्रविम्बपर उपरक्त होकर दृश्य होता है, जैसे जलमें चन्द्रादिका प्रतिबिम्ब
लक्षित होता है, वैसे ही शुद्ध बुद्धिपर ही निर्विकल्प-बोध लक्षित-होता है। जैसे
जलमें भानुका बिम्ब एवं उष्णता प्रतीत होनेपर भी वह जलका धर्म नहीं, किंतु
भानुका ही धर्म है, उसी प्रकार बुद्धिमें बोध लक्षित होनेपर भी बोध बुद्धिका
धर्म नहीं है। जैसे जलका शैत्य एवं अप्रकाश धर्म निश्चित है, वैसे ही बुद्धिका
भी जडत्व धर्म निश्चित है। अतः जैसे जलमें प्रतीत होते हुए भी उष्णता और
प्रकाश भानुका ही धर्म है, वैसे ही बुद्धिमें स्फुरण या बोध प्रतीत होनेपर भी
आत्माका ही स्वरूप है। चक्षुके द्वारा रूपाकारवृत्तिका अवभासन करता हुआ
साक्षी अलुप्तदृक् रहता है। वही दृष्टिका द्रष्टा, श्रुतिका श्रोता है। केवल मानसी
वृत्तिका भासन करता हुआ वही मतिका मन्ता कहा जाता है। वह विज्ञातिका
विज्ञाता है। उसीके सम्बन्धमें श्रुतिने कहा है—
न दृष्टेर्द्रष्टारं पश्येः, न श्रुतेः श्रोतारं शृणुयाः, न मतेर्मन्तारं मन्वीथाः ॥
‘मतिका मन्ता है’ यह कहनेपर भी उसमें मन्तृत्वादि विकार नहीं होते। बुद्धि
आदिके ही व्यापारसे केवल तद्भासकमें मन्तृत्वादिकी प्रतीति होती है। सुषुप्तिमे भी
ज्ञस्वरूप बना ही रहता है। केवल दृश्य न होनेसे विशेष दर्शनादिका अभाव रहता
है। घटादि बाह्य वस्तु दृष्टिसे व्यवहित होता है अतः परोक्ष है। आत्मा तो दृष्टिका भी
आत्मा है, अतः आत्मा अपरोक्ष है। श्रुतिमे भी ब्रह्मात्माको साक्षात् अपरोक्ष
कहा गया है—'यत्साक्षादपरोक्षाद्ब्रह्म' (बृहदा० उप० ३।४।१) जैसे दीपको
स्वात्मप्रकाशमें दीपान्तरकी अपेक्षा नहीं होती, वैसे ही बोधस्वरूप आत्माको भी स्वात्म-
प्रकाशमें बोधान्तरकी अपेक्षा नहीं है। उसी स्वयंज्योति उपलब्धिस्वरूप आत्माके
संनिधानसे साभास अन्तःकरण ही आत्मा मालूम पड़ता है। स्वतःसिद्ध आत्मामें
जाति, गुण, क्रिया आदि न होनेसे कोई भी शब्द उपाधिद्वारा ही उसमे पर्यवसित
होते हैं। अहंकारादिमें आत्मचैतन्याभासका उदय होता है, अतः अहंकार
आत्मशब्द वाच्य होता है। जैसे 'उल्मुकं दहति' अयो दहति' इत्यादि प्रयोगोंमें
उल्मुक या लोहादिमें दाहकत्वका व्यवहार होता है, परंतु केवल उल्मुक या
लोहादिमें दाहकत्वका व्यवहार नहीं बन सकता, अतः वह्निमें ही दाहकत्वका
पर्यवसान होता है। उसी तरह 'अहं जानामि' इत्यादिरूपसे साभास अन्तःकरण
या अहंकारमें ज्ञातृत्व-आत्मत्वका व्यवहार होता है, परंतु अहंकार जड एवं
प्रकाश्यके अधीन है। अतः ज्ञातृत्व-आत्मत्वका पर्यवसान नित्यबोधमें ही होता है।
जैसे दर्पणादि उपाधिवशात् मुखसे अन्य मुखाभास दर्पणस्थ प्रतिबिम्ब होता
है, फिर भी स्वरूपसे पृथक् नहीं होता; क्योंकि बिम्बकी चेष्टा बिना प्रतिबिम्बमें
चेष्टा नहीं होता। आभाससे मुख भी अन्य होता है; क्योंकि वह आदर्शानुविधायी
नहीं होता। ग्रीवास्थ मुख दर्पणादिककी अपेक्षा करके ही स्फुटित होता है।
मुखाभासके तुल्य अहङ्कार आत्माभास है। वैसे ही आत्मा और आत्माभास-बुद्धिमें
चैतन्याभास होता है। आत्मामें चैतन्यरूपता होती है। तभी वेदादिशास्त्र ब्रह्मतत्त्वका
ज्ञानशब्दसे प्रतिपादन करते हैं। चैतन्याभासयुक्त बुद्धि ज्ञानशब्दका वाच्य है।
शुद्ध चैतन्य ज्ञानशब्दका तात्पर्यार्थ है। प्रकाशस्वभाव वस्तु जिसमें प्रतिबिम्बित
होती है उसके प्रकाशोदयका हेतु होती है। जैसे जलमें प्रतिबिम्बित सूर्य जल-
प्रकाशका हेतु होता है, वैसे बुद्धिमें प्रतिबिम्बित चैतन्यबुद्धिमें चित्प्रकाशके
उदयका हेतु होता है। उसी चिदाभासयुक्त बुद्धिमें जानाति शब्दोंका प्रयोग होता
है। लक्षणासे शुद्ध चैतन्यका बोध होता है।
कहा जा सकता है कि 'करोति, गच्छति' इत्यादि स्थानोंमें प्रकृत्यर्थ क्रिया
एवं प्रत्ययार्थ कर्तृत्व—दोनोंका ही आश्रय एक ही है। कहीं भी क्रिया और
कर्तृत्वकी भिन्नाश्रयता नहीं होती, परंतु 'जानाति' में भिन्नाश्रयता क्यों ? इसपर
वेदान्तियोंका कहना है किबुद्धिगत आत्माभास (चिदाभास) 'तिङ्' प्रत्ययका अर्थ
है और 'ज्ञा'धातुरूप प्रकृतिका अर्थ वृत्तिरूपा क्रिया बुद्धिमें रहती है। बुद्धि एवं
चिदाभासके अन्योन्य अविवेकसे 'जानाति' का प्रयोग होता है। इस दृष्टिसे चिदा-
भासन्यास सक्रिय बुद्धिके साथ आत्माका ऐक्याध्यास होनेसे ही 'आत्मा जानाति'
यह व्यवहार होता है। इस तरह साभास साधिष्ठान बुद्धिमें ही प्रत्ययार्थ कर्तृत्व
एवं प्रकृत्यर्थ वृत्ति—दोनों ही बन जाते हैं। बुद्धिमें चित्प्रकाशरूप बोध नहीं होता।
बोधस्वरूप आत्मामें क्रिया नहीं बनती है। इसीलिये दोनोंमेंसे किसी एकमें
'जानाति' व्यवहार नहीं बन सकता। अतः बुद्धि एवं बोधस्वरूप आत्माके आरोपित
ऐक्यमें ही 'जानाति' व्यवहार होता है। वही प्रकृत्यर्थ क्रिया और प्रत्ययार्थ दोनोंका
ही आश्रय है। 'ज्ञप्तिर्ज्ञानम्' इस प्रकार भाव-व्युत्पत्तिसे भी ज्ञानशब्द आत्मामें
नहीं प्रयुक्त हो सकता; क्योंकि नित्य आत्मा भाव अर्थात् धात्वर्थ सामान्य भी
नहीं हो सकता; नित्य निर्विकार आत्मामें किसी प्रकारकी विक्रिया नहीं हो
सकती। इस तरह 'ज्ञायतेऽनेन' इस कारण व्युत्पत्तिसे ज्ञानशब्द आत्मामें सङ्गत
नहीं है। इस व्युत्पत्तिसे तो बुद्धि ही ज्ञान-शब्दार्थ ठहरती है। यदि आत्मा
ज्ञानका करण होगा, तब कर्ता उससे कोई अन्य ढूँढना पड़ेगा; जो कि असम्भव
है। अतएव चिदाभास और चिदात्माके अन्योन्याध्याससे ही ज्ञातृत्व व्यवहार
आत्मामें सम्भव होता है। बुद्धिके कर्तृत्वका आत्मामें अध्यास करके आत्मामें
ज्ञातृत्व होता है। आत्माका अचैतन्यबुद्धिमें अध्यास करनेसे बुद्धिमें ज्ञत्वका व्यवहार
होता है। आत्मा ज्ञानस्वरूप है और वही ज्योतियोंका भी ज्योति कहा जाता है।
अतः बुद्धि एवं चक्षुरादिसे भी ज्ञान उत्पन्न नहीं होता--
७०४ मार्क्सवाद और रामराज्य
तद्देवा ज्योतिषां ज्योतिरायुर्होपासतेऽमृतम् ( बृहदा० ४ । ४ । १६ )
अन्तः पुरुषे ज्योतिः । ( छान्दो० ३ । १३ । ७ )
जैसे तत्त्वज्ञान बिना अविवेकी देहको ही आत्मा मानता है, वैसे ही अवि-
वेकी बुद्धिको ही ज्ञानकर्ता कहता है । चिदाभासयुक्त बुद्धिवृत्तियाँ उत्पन्न होती
हैं, यही देखकर ज्ञानकी उत्पत्तिका व्यवहार होता है । जैसे प्रतिबिम्ब दर्पणानु-
विधायी होता है वैसे ही चिदाभास भी बुद्धिधर्मका अनुविधायी होता है । चिदा-
भाससे दीपित बुद्धिवृत्तियाँ विषयग्राहिका उसी तरह होती हैं, जैसे उल्मुकका दाहकत्व-
व्यवहार । वे ग्राहिका वृत्तियाँ स्वयं भासित होती हैं, इसीलिये बौद्धोंने प्रत्ययोंके
भासक साक्षीका अपलाप किया है, तथापि उनका आत्मा भासयुक्तबुद्धि प्रत्ययोंके
भाव एवं अभाव जिस साक्षीसे विदित होते हैं वह साक्षी ही उनकी उत्पत्ति-
विनाशको जानता है । साक्षीके रहनेपर भी चिदाभास आवश्यक है; क्योंकि
वस्तु-स्फुरणके लिये वृत्तिव्याप्त वस्तुपर चिदाभास आवश्यक है । केवल साक्षीद्वारा
यदि वस्तुका प्रकाश होता हो, तब तो वृत्तिके समान ही काष्ठ-पाषाणादिका भी
स्फुरण होना चाहिये । प्रकाशस्वरूप आत्माके सम्बन्धसे ही अचेतनबुद्धि
चेतन-सी प्रतीत होती है । फिर तो उसकी वृत्तियाँ भी चेतन-सी ही प्रतीत
होती हैं । जैसे तप्त लौहपिण्डसे निकलनेवाले विस्फुलिङ्ग भी अग्निवत् प्रतीत
होते हैं । वृत्ति-तदभाव, आभास तथा आभासाभावका ग्राहक तादृक् प्रत्यय नहीं
हो सकता । अतः अत्यन्त विविक्त साक्षीसे ही वे भासित होते हैं । फिर भी जैसे
लौहपिण्डमें अग्निकी संक्रान्ति होती है, वैसे बुद्धिमें चित्की विकाररूप संक्रान्ति
नहीं होती । दर्पणमें प्रतिबिम्बके तुल्य ही बुद्धिमें चित्की संक्रान्ति होती है ।
जैसे लौहपिण्ड अग्न्याभास होता है, उसी तरह बुद्धि चेतनाभास प्रतीत
होती है । चित्त ही चेतन है, यह वैसे ही असङ्गत है, जैसे देहको चेतन कहना ।
इसी तरह चक्षुरादिमें भी चेतनत्व कहना भ्रममूलक है । अहङ्कारसहित बुद्ध्यारूढ़
सभी वस्तु साक्षीसे ही भासित होते हैं । इसलिये अखण्डबोधरूप साक्षी सर्वाव-
भासक कहलाता है । सुषुप्तिमें 'नाद्राक्षम्' इस रूपसे प्रत्ययका ही निषेध है, फिर
भी भावरूप अज्ञान एवं प्रत्ययाभावका बोध तो रहता ही है । प्रमातृ-प्रमाण-
प्रमेयादिरूप विशेष ग्राह्य नहीं अनुभूत होता । किंतु भाव-अभावका साक्षी चिद्रूप
आत्मा एकरस है ।
शास्त्रोंके अनुसार प्रत्यय स्पष्ट ही उत्पत्ति-विनाशशील एवं कूटस्थ चैतन्य-
स्वरूप अलुप्तदृक् है । प्रत्यगात्मा-नित्यज्योतिमें ही अहंका पर्यवसान है । अनुभवके
आधारपर ही सब कुछ सिद्ध होता है । आत्मा अनुभवस्वरूप है । प्रत्यय और
प्रत्ययी अन्तःकरण—दोनों ही जड़ हैं । नित्य चैतन्यसे ही इन सबका भान होता
है । जैसे सेनाका जय राजामें आरोपित होता है, उसी तरह प्रमाणफल कूटस्थ
साक्षीसे आरोपित होता है । अविकृत चिदात्माका अन्तःकरणमें प्रतिबिम्ब होता
है। वह प्रतिबिम्ब ही स्वोपाधिबुद्धिके व्यापारद्वारा प्रमाता बनता है । आभास
भी परिणाम नहीं है, किंतु जैसे रज्जुके अज्ञानसे सर्पभ्रम होता है, जैसे दर्पणमें
मुखाभासत्वकी प्रतीति होती है, उसी तरह बुद्धिमे आत्माभासत्वकी प्रतीति होती
है । प्रत्यय और दृष्टिका भेद स्वप्नमें प्रसिद्ध ही है । वहाँ विषयाकाराकारित
प्रत्ययका साक्षी आत्मा ही है । जिस चिद्रूप आत्माके आभाससे विषयाकार-प्रत्यय
विदित होता है, वही आत्मा है । प्रमाता, प्रमाण, प्रमेय—तीनोंका भासक साक्षी
ही ब्रह्म है—‘त्रितयं तन्न यो वेद स भात्मा स्वाश्रयाश्रयः ।’ (श्रीमद्भा० २ । १० । ९)
सम्यग्ज्ञान, संशयज्ञान, भ्रान्ति ज्ञानमें अवगति और बोध-आत्मा एक ही ढगका है ।
इन ज्ञानोंमें भेद केवल प्रत्ययोंका ही है । पुष्पादि उपाधिके वशसे स्फटिकादिमें भेद
प्रतीत होता है, उसी तरह प्रत्ययरूप उपाधिके भेदसे अखण्डबोधमें भेद प्रतीत होता
है । जाग्रत्काल, स्वप्नकालके प्रत्ययोंका स्फुरण नित्य-अपरोक्षभाव साक्षी आत्मासे
ही होता है । जैसे प्रदीपसे घटादिका प्रकाश होता है, परंतु प्रदीपका भी प्रकाश
द्रष्टासे ही होता है—
तस्य भासा सर्वमिदं विभाति, ( कठोप० २ । १ । १५ )
अत्रायं पुरुषः स्वयञ्ज्योतिर्भवति । ( छान्दोग्योप० )
अन्य निषेधसे भी सर्वनिषेध साक्षी चेतन आत्मा प्रसिद्ध होता है । 'अज्ञा-
सिषमिदं मां च' मैने इसे और अपने आपको जाना, इस प्रकारकी स्मृति प्रमाता,
प्रमाण, प्रमेयके स्मरणसे तीनोका ही प्रकाश निश्चित होता है ।
एक प्रमाणज्ञानमें ग्राहक और ग्राह्य दोनोंका स्फुरण नहीं हो सकता । अतः
बोधस्वरूप साक्षीसे ही स्फुरण होना उपपन्न होता है । बौद्ध कर्ता कर्म-विहीन
प्रत्ययका स्वमहिमासे प्रकाश है ऐसा मानते हैं । परंतु फिर तो अनुभविताकी अपेक्षा ही
न रहेगी । वैसे अनुभवितामें ही अनुभव इष्ट होता है । इसके अतिरिक्त अनुभविता
भी तो अनुभव ही है । बुद्धि ही भ्रान्तिसे पुरुषोंको ग्राह्य-ग्राहक-भेदवान् होकर
प्रतीत होती है । जिसके मतमें अनुभूति क्रिया है, वही कारक भी है । यदि इसका
सत्त्व एवं क्षणिकत्व मान्य है तो दृष्टबलात् सकर्तृक भी मानना ठीक है । वस्तुतस्तु
ग्राह्य नीलपीतादि वस्तु और वस्तु-प्रत्यय भासक साक्षी मान्य है, जैसे रूपादि
ग्राह्य हैं उनके ग्राहक दीपादि हैं उसी तरह प्रत्यय भी ग्राह्य है, अतः उसका
ग्राहक साक्षी मान्य होना चाहिये । व्यञ्जक होनेसे अवभासक अवभास्यसे अन्य
होता है । जैसे घटादिका प्रकाशक दीपक होता है, उसी तरह प्रत्यय ग्राह्य
है, उसका भी ग्राहक साक्षी पृथक् है । द्रष्टा और दृश्यका आध्यासिक ही
सम्बन्ध होता है । जैसे घटादिपर आलोककी व्याप्ति होती है, वैसे ही घटादिपर
बुद्धि-व्याप्ति होती है । जैसे आलोकस्थ घट आलोकारूढ़ कहा जाता है, वैसे ही
बुद्धिस्थ घट बुद्ध्यारूढ़, कहा जाता है । बुद्धिव्याप्त घटादिपर, चित्प्रतिबिम्ब होता है,
उसीसे घटादि प्रकाश होता है ।
मा० आ० ४५-
७०६ मार्क्सवाद और रामराज्य
कार्यकारणसंघातरूप प्राणीका जाग्रत्कालमें बैठना, चलना, काम करना
आदि व्यवहार, आदित्य, चन्द्रमा, अग्निरूप ज्योति या प्रकाशके द्वारा सम्पन्न
होता है । यहाँ सर्वत्र कार्यकारणावयवसंघातव्यतिरिक्त आदित्यादि ज्योतिसे
ही व्यवहार चलता है । इसी तरह मेघाच्छन्न अमावस्याकी रात्रिमें जहाँ कोई
भी ज्योति नहीं होती, अपना हाथ भी नही भासित होता, वहाँ भी दूरस्थ
श्वान तथा गर्दभ आदिके-शब्दको सुनकर मनसे निश्चित करके उसी शब्दके
सहारे प्राणी वहाँतक पहुँच जाता है । ऐसे ही गन्धके सहारे भी जिधरसे गन्ध
आती है, उधर प्राणी पहुँच जाता है। यहाँ सर्वत्र देहादि-संघातभिन्न ज्योतिसे
ही व्यवहार होता है । ठीक इसी तरह स्वप्न एवं सुषुप्तिकालमें स्वाप्निक-वस्तुओं
तथा निद्रामें सौषुप्त अज्ञान एवं सुखका प्रकाश भी किसी संघातव्यतिरिक्त
संघातप्रकाशक ज्योतिसे ही मानना उचित है । स्वप्नके बन्धु-संगम, देशान्तर-
गमनादि व्यवहार देहादि-संघातव्यतिरिक्त देहादिभासक आत्मज्योतिसे मानना
उचित है । स्वप्नादि व्यवहार भी संघातव्यतिरिक्त ज्योतिःपूर्वक है । व्यवहार होनेसे
जाग्रत्-व्यवहारके तुल्य जैसे जाग्रतका व्यवहार देहातिरिक्त आदित्यादि ज्योतिर्मूलक
हैं, वैसे ही स्वाप्निक व्यवहारको भी देहादिभिन्न ज्योतिर्मूलक मानना चाहिये ।
स्वप्नव्यवहारमें आदित्यादि ज्योतियोंका सम्बन्ध सम्भव ही नही । अतः
कोई अन्तःस्थ आदित्यादि ज्योतिसे विलक्षण अभौतिक आत्मज्योति मानना उचित
है । उसीसे स्वप्नका व्यवहार सम्भव हो सकता है । आदित्यादि ज्योति चक्षुरादिसे
उपलब्ध होती है । परंतु स्वप्न-व्यवहारका हेतुभूत कोई बाह्यज्योति चक्षुरादिसे
उपलब्ध नहीं होती, परंतु ज्योतिका कार्य-व्यवहार स्पष्ट उपलब्ध होता है । अतः
संघातभिन्न अदृश्य अन्तःस्थ आदित्यादि विलक्षण अभौतिक ज्योति मानना
आवश्यक है । इस सम्बन्धमें यह अनुमान है कि 'विमतं अन्तःस्थमतीन्द्रिय-
त्वाद् व्यतिरेकेणादित्यादिवत् ।' विवादास्पद स्वप्नादिव्यवहार-हेतु ज्योति अन्तःस्थ
है । अतीन्द्रिय या अदृश्य होनेसे जो अदृश्य नहीं, वह अन्तःस्थ नहीं, जैसे
आदित्यादि ।
इस सम्बन्धमें भौतिकवादीका कहना है कि "उपकारी उपकारकभाव
सजातीयमें ही देखा जाता है । जाग्रत-व्यवहार कारक-हेतुभूत आदित्यादि
ज्योति देहादिके समान भौतिक ही है । उसी तरह स्वाप्निकव्यवहारके हेतुभूत
संघातव्यतिरिक्त ज्योतिको भी संघातके समान भौतिक ही होना चाहिये । जैसे
आदित्यादि उपकारक उपक्रियमाण देहादि-संघातके सजातीय होते हैं, वैसे ही
स्वाप्निकव्यवहार हेतुभूत उपकारक ज्योतिको भी उपक्रियमाणका सजातीय ही
होना चाहिये । अतः जैसे आदित्यादि उपकारक ज्योति भौतिक हैं, वैसे ही
स्वाप्निकव्यवहारका उपकारक ज्योति भी भौतिक ही होना चाहिये ।
“जो कहा जाता है कि 'अतीन्द्रिय एव अदृश्य होनेसे वह ज्योति अभौतिक
है', यह भी ठीक नहीं; क्योंकि चक्षुरादि इन्द्रिय ज्योति भी अतीन्द्रिय तथा
अदृश्य है । तो भी वे जैसे अभौतिक नहीं, भौतिक ही हैं, उसी तरह उस
ज्योतिको भी भौतिक ही होना चाहिये । इसके अतिरिक्त देहादिसंघातके रहनेपर
ही चैतन्यरूप अन्तःस्वज्योति रहती है । देहादिके न रहनेपर नहीं रहती ।
अतः उसे देहादिका ही धर्म मानना उचित है । जैसे रूपादि सघातके
रहनेपर ही उपलब्ध होते हैं, अतः वे देहादिके ही धर्म हैं, वैसे ही
यहाँ भी समझना चाहिये—'विमतं चैतन्यं शरीरधर्मस्तद्भावभाविन्त्वाद्
रूपांदिवत् । विमतं ज्योतिः संघाताद्भिन्नं तद्भासकत्वादित्यादिवत् ।
विवादास्पद-चैतन्य संघातसे भिन्न है, संघातके भासक होनेसे आदित्यादिके
तुल्य यह सामान्यतो दृष्ट-अनुमान व्यभिचारी होनेसे स्वयं अप्रमाण है ।
क्योंकि भौतिकवादीके मतानुसार देहका भासक होनेपर भी चक्षु देहसे भिन्न
नहीं है, उसी तरह चैतन्य भी देहका भासक होनेपर भी देहसे भिन्न न होकर
उससे अभिन्न उसका धर्म ही है । अनुमानके द्वारा प्रत्यक्षका बाध भी नहीं
होता । मैं मनुष्य हूँ, मै देखता, सुनता और जानता हूँ, इस प्रकार प्रत्यक्ष
ही देहादि-संघातमें द्रष्टृत्व, ज्ञातृत्वादि विदित होता है । फिर प्रत्यक्षके विरुद्ध
अनुमान कैसे आदरणीय हो सकता है ?
“कहा जा सकता है कि 'यदि देह ही आत्मा है और वही द्रष्टा, ज्ञाता
आदि है तो अविकल रहनेपर भी वह क्यों कभी द्रष्टा, ज्ञाता होता है, कभी
नहीं होता ?' किंतु यह कोई दोष नहीं है; क्योंकि जो वस्तु जिस तरह प्रमाण-
सिद्ध हो, उसको वैसी मानना उचित है । खद्योतमें प्रकाश, अप्रकाश दोनो
ही देखा जाता है, अतः दोनों ही मान्य हैं । उसमें किसी कारणान्तरकी कल्पना
नही की जाती । अग्निकी उष्णता, जलकी शीतलता जैसे स्वाभाविक है, वैसे
ही देहमें कभी ज्ञातृत्व, द्रष्टृत्वादि होना, कभी न होना स्वाभाविक ही है ।
यदि प्राणियोके धर्माधर्मके कारण औष्ण्य, शैत्यादि माना जायगा, तब तो
अनवस्था-दोष होगा ।”
भौतिकवादीका उपर्युक्त कथन ठीक नहीं है, कारण कि स्वप्न एव स्मृतिके
आधारपर यही सिद्ध होता है कि देहादि-संघातसे भिन्न अभौतिक आत्मा ही
द्रष्टा होता है, देहादि नहीं । यह नियम है कि जाग्रत्-कालमें दृष्टका ही स्वप्नमें
दर्शन होता है, इस तरह जाग्रत् और स्वप्नका द्रष्टा एक ही होता है । किंतु
स्वप्नमें अनेक वस्तुओका दर्शन होता है, वहाँ देह या नेत्रादि नहीं होते । देहादि
निर्व्यापार तथा नेत्र निमीलित ही रहते हैं । अतः स्वप्नके प्रपञ्चका द्रष्टा देह
नहीं है । साथ ही यह भी स्पष्ट है कि अन्य दृष्टका स्वप्न-द्रष्टा अन्य नहीं
७०८ मार्क्सवाद और रामराज्य
होता अतः जो स्वप्नका द्रष्टा है, वही जाग्रत्का भी द्रष्टा है। यदि स्वप्नका द्रष्टा
देहसे भिन्न सिद्ध हो गया तो जाग्रत्का द्रष्टा भी देहसे भिन्न ही मानना उचित
है। जब कभी किसी प्राणीके नेत्र नष्ट हो जाते हैं तो वह अन्धावस्थामें
भी पूर्वदृष्ट पदार्थोंको स्वप्नमें देखता है। स्पष्ट है कि स्वप्नके पदार्थोंका द्रष्टा
देह नहीं है, क्योकि देहमें नेत्र हैं ही नहीं। तात्कालिक नवीन देह या नवीन
नेत्र उत्पन्न होते हैं, उनसे स्वाप्निक पदार्थ दीखते हैं, यह कल्पना या संस्कारकी
कल्पना भी भौतिकवादमें असङ्गत ही है।
जिसने चक्षुके बिना भी स्वप्नमें पूर्वदृष्टका दर्शन किया, चक्षु रहनेपर
भी उसीको प्रबोधकालमें द्रष्टा मानना उचित है। कहा जाता है कि स्वप्नमें
पूर्वदृष्टके दर्शनका ही नियम नहीं; क्योंकि जन्मान्धोंको भी कभी-कभी स्वप्नमें
विविधरूपोंके दर्शन होते हैं। परंतु यह ठीक नहीं, कारण कि जन्मान्धोंको भी
जन्मान्तरानुभूतका ही स्वप्नमें दर्शन मानना उचित है, यही जन्मान्तरमें प्रमाण
भी है। अतः स्वप्नमें पूर्वदृष्टका ही दर्शन होता है, यह नियम स्थिर है।
इसी तरह स्मर्ता और द्रष्टाके भी एकत्वका नियम है। जो द्रष्टा होता है
वही स्मर्ता होता है। यह देखा जाता है कि आँख मींचकर मनुष्य पूर्वदृष्टको
स्मरण करता हुआ पूर्वदृष्टके समान ही देखता है। यहाँ भी जो नेत्र मीचनेपर
पूर्वदृष्टको देख सकता है खुले नेत्र रहनेपर भी उसीको द्रष्टा मानना उचित
है। साथ ही यह भी देखा जाता है कि मृत देहमें किसी प्रकारकी विकलता
दृष्टिगोचर न होनेपर भी दर्शनादि क्रियाएँ नही होती। अतः मानना पड़ेगा कि
जिसके न रहनेपर देहमें दर्शन आदि क्रियाएँ नही हो सकतीं, जिसके रहनेपर
दर्शन आदि क्रियाएँ होती हैं, वही द्रष्टा है, देह नहीं। कुछ लोग कहते हैं
कि 'चक्षुरादि इन्द्रियाँ ही दर्शनादि क्रियाओकी कर्ता हैं', किंतु यह भी ठीक नहीं।
क्योंकि जो मैंने देखा है, वही मै स्पर्श कर रहा हूँ, इस प्रत्यभिज्ञाके अनुसार
मालूम पड़ता है कि दर्शन तथा स्पर्शन क्रियाका कर्ता एक ही है।
पर चक्षु स्पर्श नहीं कर सकता, त्वक् दर्शन नहीं कर सकता, अतः यही
मानना ठीक है कि इन्द्रियोंसे भिन्न आत्मा ही चक्षुरादि विभिन्न इन्द्रियोसे देखने-
सुननेवाला है। कुछ लोग कहते हैं कि मन ही द्रष्टा, श्रोता, मन्ता आदि है,
किंतु यह भी ठीक नहीं। मन भी रूपादिके तुल्य विषय ही है, फिर वह
द्रष्टा नहीं हो सकता। अतः आदित्यादिके समान अन्तःस्थ ज्योति-सघातसे
अतिरिक्त है।
कहा जाता है कि 'वह ज्योति कार्य-करण सघातका सजातीय ही होना
चाहिये, क्योंकि जैसे आदित्यादिज्योति सजातीयके ही उपकारक होते हैं, उसी
तरह अन्तर-ज्योति भी सजातीयके ही उपकारक होनेसे उपकार्य भौतिक प्रपञ्चके
समान भौतिक ही होना चाहिये', परंतु यह ठीक नहीं है । कारण कि उपकार्योप-
कारकभाव सजातीयमें होनेका कोई नियम नहीं है । पार्थिव ईंधनसे—तृण-काष्ठादिसे,
अग्निका प्रज्वलनरूप उपकार होता है, यहाँ अग्निका काष्ठादिसे कोई साजात्य
नहीं है और यह भी नहीं कहा जा सकता कि पार्थिव तृणादिसे प्रज्वलनोपकार
देखा गया है, अतः पार्थिवत्वादि जातीयसे ही अग्निका उपकार हो, क्योकि वैद्युत
अग्नि एव जाठर अग्निका उपकार जलसे ही होता है । इस दृष्टिसे उपकार्योपकारक-
भावमें सजातीयता-असजातीयताका कोई नियम नहीं है । अनेक बार देखा जाता
है कि स्थावरों तथा पशु आदिकोसे मनुष्योंका उपकार होता है ।
जो कहा जाता है कि 'अदृश्यत्व अतीन्द्रियत्वके कारण कार्य-करण-
सघातका भासक तथा उपकारक ज्योतिको अभौतिक नहीं कहा जा सकता,
क्योकि चक्षुरादि अतीन्द्रिय एवं अदृश्य होनेपर अभौतिक नहीं, किंतु भौतिक
ही हैं । इसी तरह कार्य-करणसघातकी भासक ज्योतिको सघातका ही धर्म
मानना
यहाँके समान व्यतिरेक व्याप्ति नही निश्चित होती है; क्योंकि चैतन्य आकाशकी
तरह व्यापक होनेसे वह केवलान्वयी है, अतः उसका व्यतिरेक नहीं कहा जा
सकता । देहसे अतिरिक्त स्थलमें चैतन्य उपलब्ध न होनेपर भी यह नहीं कहा
जा सकता कि 'वह नहीं है'। अभिव्यञ्जक न होनेसे भी अनुपलब्धि कही जा
सकती है । जैसे गो व्यक्तिरूप अभिव्यञ्जक होनेसे व्यापक गोत्वजातिकी
अभिव्यक्ति न होनेपर भी अनुपलब्धि उत्पन्न हो जाती है ।
वस्तुतः गोपाल कुटीरमें, हुक्कामें अग्नि बुझ जानेपर भी धूम रहता है ।
अतः अग्नि एवं धूमकी अभिन्नता या धर्म-धर्मीभाव भी असङ्गत ही है ।
वस्तुतः 'तद्भावे तद्भावः, तदुपलब्धौ उपलब्धिः ।' तद्भावमे तद्भाव एव
तदुपलब्धिमें तदुपलब्धि होनेसे ही तदभिन्नता होती है । मृत्तिकाके भावमें
ही घटादिका भाव होता है । मृत्तिकाके उपलम्भमें ही घटादिका उपलम्भ
होता है । इसलिये मृत्तिकासे वटादिकी अभिन्नता सिद्ध होती है । अग्निके न
रहनेपर भी गोपालकुटीर या हुक्कामें धूम रहता है, अग्निके उपलम्भ बिना भी
धूमका उपलम्भ होता है । अतः अग्निसे धूमकी भिन्नता ही है । ठीक इस
नियमकी कसौटीपर भूत तथा चैतन्यकी अभिन्नता ठीक नहीं उतरती । भूत
रहनेपर भी चैतन्य नहीं रहता और भूतके उपलम्भमें चैतन्यका उपलम्भ नहीं
होता है ।
अग्निकी जल तथा पार्थिव काष्ठादिसे अन्यत्र उपलब्धि न होनेपर भी
यह नहीं कहा जा सकता कि अग्नि, जल या काष्ठादिका ही धर्म है । किंतु
सर्वसम्मतिसे अग्नि स्वतन्त्र वस्तु है, जल काष्ठादिका धर्म नही । उसी तरह
देह, दिल, दिमाग आदि नित्य सिद्ध व्यापक चैतन्यके अभिव्यञ्जक हैं, अतः
उनके बिना चैतन्यका उपलम्भ नहीं । फिर चैतन्य देहादिका धर्म नहीं, किंतु
वह उनसे भिन्न स्वतन्त्र ही है । सामान्यतो दृष्टानुमानसे ही प्राणियोंकी
भोजन-पानादि प्रवृत्ति होती है । यदि उसकी मान्यता न होगी तब तो अभुक्त
अपीत भोजनादिमें प्रवृत्ति ही नहीं होगी । खद्योत आदिमें पक्षके संकोच-
विकाससे प्रकाश-अप्रकाश उपपन्न है । किंतु यदि देहका दृष्टत्व धर्म है, तो
कभी उसका उपलम्भ कभी उसका अनुपलम्भकी व्यवस्था नही उपपन्न हो
सकेगी । भूत रहनेपर भी चैतन्य नहीं रहता और भूतके उपलम्भमें भी
चैतन्यका उपलम्भ नही होता । अतः भूत एवं चैतन्यका न अभेद ही सिद्ध
होता है न धर्म-धर्मी-भाव ही सिद्ध होता है ।
[
श्रुतियोंसे ज्ञात होता है कि व्यष्टि-समष्टि, स्थूल-सूक्ष्म कार्य-कारणात्मक, अनन्तकोटि
ब्रह्माण्डावलि-स्वरूप अखिलप्रपञ्चके भानके पहले ही भासित होनेवाले अखिल निगमा-
गमादि सच्छास्त्रोंके महातात्पर्यविषय अद्वय होते हुए भी अपरोक्ष होनेके कारण
स्वप्रकाशरूप होनेसे भगवान् साक्षात् अपरोक्ष ही हैं। प्रमाता भी प्रमेयकी अवगतिके
लिये ही प्रमाणकी अपेक्षा करता है, अपनी अवगतिके लिये नहीं । यदि कहा
जाय कि 'एकहीको कर्म और कर्ता मानना विरुद्ध है, अतः प्रमाताकी अवगतिके
लिये भी अन्य प्रमाताकी अपेक्षा है' तो यह ठीक नहीं। ऐसा माननेपर उस
प्रमाताकी अवगतिके लिये किसी अन्य प्रमाताकी तथा उसकी अवगतिके लिये किसी
दूसरे प्रमाताकी अपेक्षा होगी और इस तरह अनवस्था-दोष प्रसक्त होगा ।
साथ ही उसमें भ्रान्ति, संशय और अज्ञान भी नहीं दिखायी पड़ते हैं। जिसके
अनुग्रहसे मातृ, मान और मेयका यथार्थ अवभास होता है, वह मातृ-मानकी
अपेक्षा किये बिना संशय आदिका अविषय होकर साक्षात् अपरोक्ष हो तो क्या
आश्चर्य ? फिर भी अनादि, अनिर्वाच्य, अचिन्त्य, महामहिमशालिनी भगवच्छ-
क्तिभूत मायासे प्रत्यक्चैतन्याभिन्न, सजातीय-विजातीय स्वगतभेदशून्य,
अद्वय आनन्दका अस्तित्व भी जब तिरोहित हो गया है, तब स्वप्रकाशता
आदिका तो कहना ही क्या ? क्योंकि प्रत्यक्ष आदिसे स्फुरद्रूपप्रपञ्च ही सर्वत्र
दिखायी पड़ रहा है । मायाके सम्बन्धमें श्रीमद्भागवतमें बतलाया गया है कि
अर्थके बिना प्रतीत होती हुई भी जो आत्मामें प्रतीत नहीं होती, उसे ही आत्माकी
माया समझना चाहिये—‘ऋतेऽर्थं यत्प्रतीयेत न प्रतीयेत चात्मनि । तद्
विद्यादात्मनो मायाम्’ (श्रीमद्भा० २।९।३३) ।
अनधिगत अबाधित अर्थकी ज्ञानस्वरूप प्रमाकी उत्पत्तिके लिये उसके
कारणभूत प्रमाणोंकी अपेक्षा हुआ करती है; क्योंकि प्रमाणोंके अधीन ही
प्रमेयकी सिद्धि हुआ करती है । प्रत्यक्षमात्र प्रमाण माननेवाले चार्वाक
और तदनुयायी अनात्माभिमुख साम्यवादी, समाजवादी आदि आधुनिक लोग
आम्रसम्बन्धी बीजसे अङ्कुर, नाल, स्कन्ध, शाखा, उपशाखा, पल्लव, पुष्प,
फल और रसरूप परिणामकी तरह मस्तिष्क, मन, बुद्धि आदिकी तरह आत्माका
भी परिणाम मानते हुए पृथिव्यादि चार भूतोंके अतिरिक्त तत्त्व तथा अर्थ, कामके
अतिरिक्त पुरुषार्थ और प्रत्यक्षातिरिक्त प्रमाण नहीं मानते । इनमें कोई देहको,
कोई चक्षुरादि इन्द्रियों और कोई प्राणको ही आत्मा मानते हैं ।
प्रतिपत्ति (बोध) का फल संशय, विपर्यय तथा अज्ञानकी निवृत्ति है ।
प्रतिपादयिता (वक्ता) प्रतिपित्सित (ज्ञातव्य) पदार्थकी प्रतिपिपादयिषा
(प्रतिपादनेच्छा) से वाणीका प्रयोग किया करता है। अनुमान एवं वाक्यको
७१२ मार्क्सवाद और रामराज्य
प्रमाण न माननेवाले लोग परस्परके संशय, भ्रान्ति, अज्ञानको किस तरह जान
सकेंगे, किस तरह उन्हे दूर करनेका प्रयत्न कर सकेंगे और किस तरह परप्रति-
पित्सितको जाने बिना प्रेक्षावान् व्यक्ति अप्रतिपित्सित अर्थका उपदेश कर सकेंगे ?
अतः अनुमान प्रमाण माने बिना 'अनुमान प्रमाण नहीं है' यह वचनप्रयोग भी
अनुपपन्न है । साथ ही परप्रत्यक्षमें अनधिगत अबाधित तथा अनुमानमें उसका
अभाव भी बिना अनुमान-प्रमाण माने कैसे जाना जा सकता है ? पशु-पक्षी भी
मोदकादिका ग्रास हाथमें लिये हुए पुरुषोको देखकर उधर प्रवृत्त होते तथा
दण्डादि देखकर अनिष्टकारणताका अनुमानकर उस ओरसे निवृत्त होते देखे जाते हैं।
आत्मा इदंकारके आस्पद देह-इन्द्रिय, मन और विषयोंसे पृथक् 'मै'
इस तरह असंदिग्ध अविपर्यस्तरूपसे अपरोक्ष अनुभवसिद्ध ही हैं, क्योकि 'मै हूँ
या नहीं हूँ' अथवा 'नहीं हूँ' ऐसे संशयका अनुभव नहीं होता । 'मैं स्थूल हूँ,
कृश हूँ, बोलता हूँ, जाता हूँ,' इत्यादि देहधर्मका सामानाधिकरण्य देखकर
यह नहीं कहा जा सकता कि अहंप्रत्यय देहविषयक होता है । यदि ऐसा ही
मान ले तो बाल्य, यौवनादिका भेद होनेपर भी अहंप्रत्यालम्बनकी 'मै वही
हूँ, जो बाल्य-यौवन आदिमें था', ऐसी प्रत्यभिज्ञा न हो सकेगी, किन्तु वैसी
प्रत्यभिज्ञा होती है । अतः व्यावृत्त अनेक पुष्पोंमें अनुवृत्त एक सूत्रके समान
बाल-युवा आदि अनेक व्यावृत्त शरीरोंमें अनुवृत्त एक अहंकारास्पद उन
शरीरादिसे भिन्न आत्मवस्तु मानना अनिवार्य है ।
समस्त-व्यस्त बाह्य पृथिवी आदि भूतोमे चैतन्यका उपलम्भ न होनेके
कारण चैतन्यको भूतोका धर्म भी नहीं कहा जा सकता । यदि कहा जाय कि
'मद्याकारसे परिणत यवादिकणोके अनुभूयमान मादक शक्तिके समान देहाकारसे
परिणत भूतोंका ही धर्म चैतन्य शक्ति है' तो यह भी ठीक नहीं; क्योकि देहके
रहनेपर भी मृतावस्थामें चैतन्यका उपलम्भ नहीं होता । संयोगादिके समान
जबतक देह रहता है, तबतक चैतन्य रहता है—यह भी नहीं कहा जा सकता;
क्योंकि चैतन्यको तब रूपादिके समान विशेष गुण मानना पड़ेगा और ऐसा
माननेपर यावद्देहभावित्वेन चैतन्यकी उपपत्ति सङ्गत नहीं हो सकती; क्योंकि
भूत जैसे रूपरहित नहीं होता, वैसे ही देहको कभी चैतन्यरहित होकर नहीं
रहना चाहिये, यही बात इच्छादिके सम्बन्धमे समझ लेनी चाहिये । मृतावस्थामें
प्राणचेष्टादि नहीं दिखायी पड़ते, अतः यह भी मान लेना चाहिये कि उक्त
देहधर्म आत्माके अधिष्ठानसे ही व्यक्त होते हैं । रूप आदि देहसम्बन्धी धर्मोंके
अन्य व्यक्तिद्वारा प्रत्यक्ष होनेपर भी ज्ञान, इच्छा आदि आत्मधर्म अन्यसे
प्रत्यक्ष नहीं किये जाते, अपितु वे स्वप्रत्यक्ष ही हुआ करते हैं ।
मार्क्स और आत्मा ७१३
यदि समुदायभूत अवयवीको चेतयिता कहे तो एक भी अवयवके कट
जानेपर अवयवी-समुदाय ही कट जायगा और इस तरह प्रेतत्वापत्ति होगी। इसे
इष्टापत्ति भी नहीं कहा जा सकता, क्योंकि अवयव कट जानेपर भी अवयवीमें
चैतन्य उपलब्ध होता है। यदि प्रत्येक अवयवको चेतयिता माने तो
बहुतोंका अन्योन्याभिमुख होकर रहना सदा सम्भव नहीं है। उन परस्पराभिमुखोंका
स्वातन्त्र्य मानने या परस्पर प्रतिबद्ध सामर्थ्यवालोंका स्वातन्त्र्य अथवा
विरुद्धदिशाकी ओर क्रिया करनेमे अभिमुखका स्वातन्त्र्य मानने किंवा परस्परका
स्वातन्त्र्यपरस्परसे प्रतिबद्ध माननेपर या तो शरीर नष्ट हो जायगा या निष्क्रिय
हो जायगा।
देहके रहनेपर जीवित दशामें ज्ञान, इच्छा आदिके रहनेपर भी देहाभाव-
दशामें उनकी सत्ता नहीं रहती, ऐसा नहीं कहा जा सकता। उनकी अनुपलब्धि
होनेसे उनके असत्त्वका निर्णय नहीं किया जा सकता; क्योंकि विद्यमान रहनेपर भी
व्यञ्जकके अभावमें उपलब्धि न होना सम्भव है। विभु ( व्यापक ) होनेके कारण
जाति सर्वत्र विद्यमान रहनेपर भी व्यञ्जक व्यक्तिके अभावमे जैसे उसका उपलम्भ
नहीं हुआ करता, वैसे ही व्यञ्जक देहके न रहनेपर चैतन्यका अनुपलम्भ उपपन्न
हो सकता है। अथवा जैसे काष्ठ आदि अग्निके व्यञ्जक हैं, अतः उनके रहनेपर
ही अग्निकी अभिव्यक्ति होती है, तथापि यह नहीं कहा जा सकता कि काष्ठके
अभावमें अग्निका अभाव होता है अथवा काष्ठ तथा अग्निका धर्म-धर्मिभाव है।
धर्म धर्मिभावका निर्णय अन्वय-
७१४ मार्क्सवाद और रामराज्य
जा सकता, अपितु उन्हें भूतपरिणामभेद ही कहना पड़ेगा । तथाच भूतधर्म रूपादि
जड़ होनेके कारण जैसे विषय हैं, विषयी नहीं, वैसे ही भूतधर्म । जड़ होनेके
कारण चैतन्यको भी विषय मानना पड़ेगा, विषयी नहीं । यदि कहा जाय कि
'भूतधर्म होनेपर भी किन्हींका विषयित्व भी मान्य है, तो यह उचित नहीं, क्योंकि
अपने-आपमें वृत्तिरूप विरोध होगा, जैसा कि अभी कहा गया ।
लोकायतिक पृथिव्यादि चार भूतोंके अतिरिक्त अन्य किसी तत्त्वका अस्तित्व
अङ्गीकार नहीं करते । भूत-भौतिक पदार्थोंके अनुभवको यदि चैतन्य वस्तु कहा
जाय, तो वे विषय हैं, अतः अपने-आपमें क्रियाविरोधके कारण चैतन्यको उनका
धर्म कहना उचित नहीं है । अग्नि दाहक होनेपर भी अपने-आपको नही जला सकता,
सुशिक्षित भी नट अपने स्कन्धपर नहीं चढ सकता । इसी प्रकार चैतन्य यदि भूत-
भौतिकधर्म हो, तो वह भूत-भौतिकोको विषय नहीं कर सकता । रूप आदि अपने
और दूसरेके रूपको विषय नहीं कर सकते, किंतु बाह्य, आध्यात्मिक भूत-भौतिको-
को चैतन्य विषय करता है । यदि भूतादिविषयक चैतन्यरूप उपलब्धिका अस्तित्व
मान लिया जाता है, तो भूतव्यतिरिक्त पदार्थका अस्तित्व भी मान लेना पड़ेगा ।
तथाच उपलब्धिरूप आत्मा देहादिसे अतिरिक्त सिद्ध हो जाता है । 'मैने उसे
देखा था' जिस प्रकार अवस्थान्तरमें भी उपलब्धिरूपसे प्रत्यभिज्ञान होने और
स्मृति आदि उत्पन्न होनेके कारण उस स्वरूपात्माकी एकरूपता स्पष्ट है, अतः
उसको नित्य माननेमे कोई आपत्ति नहीं । इस प्रकार दीपक आदिके रहनेपर
यद्यपि उपलब्धि होती है, उसके अभावमें नहीं, तथापि उपलब्धिको जैसे दीपकका धर्म
नहीं कहा जाता, वैसे ही देहके रहनेपर उपलब्धि होती है, उसके न रहनेपर नहीं,
फिर भी उपलब्धिको देहका धर्म नहीं कहा जा सकता । दीपककी तरह केवल
उपकरणमात्र मान लेनेसे भी देहका उपयोग उपपन्न हो जाता है । स्वप्नावस्थामें
इस देहके निश्चेष्ट पड़े रहनेपर भी अनेक प्रकारकी उपलब्धियोंका होना अनुभव
सिद्ध है, अतः यह स्पष्ट है कि चैतन्य भूत-भौतिकोका धर्म नहीं है ।
'एतेभ्यो भूतेभ्यः समुत्थाय तान्येवानुविनश्यति' इत्यादिके अनुसार यह
नहीं कहा जा सकता कि देहादिसे व्यतिरिक्त होता हुआ भी आत्मा उन देहादिको-
के साथ ही उत्पन्न होता है और उनके साथ ही विनष्ट हो जाता है । जन्मान्तरीय
अदृष्टको माने बिना न तो देहादिका वैलक्षण्य उपपन्न हो सकता है और न प्राक्तन
संस्कारोंके अभावमें शिशुकी स्तन्यपानमें प्रवृत्ति ही बन सकती है । अतः देहादिसे
अतिरिक्त नित्य आत्मा मानना अनिवार्य है ।
इन्द्रियोंको आत्मा माननेवालोके पक्षमे भी बहुत चेतन माननेवालोके पक्षमे
बतलाये दोष उपस्थित होते हैं । 'मै देखता हूँ, सुनता हूँ, स्वाद लेता हूँ,