मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)
Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें७१२ मार्क्सवाद और रामराज्य
प्रमाण न माननेवाले लोग परस्परके संशय, भ्रान्ति, अज्ञानको किस तरह जान
सकेंगे, किस तरह उन्हे दूर करनेका प्रयत्न कर सकेंगे और किस तरह परप्रति-
पित्सितको जाने बिना प्रेक्षावान् व्यक्ति अप्रतिपित्सित अर्थका उपदेश कर सकेंगे ?
अतः अनुमान प्रमाण माने बिना 'अनुमान प्रमाण नहीं है' यह वचनप्रयोग भी
अनुपपन्न है । साथ ही परप्रत्यक्षमें अनधिगत अबाधित तथा अनुमानमें उसका
अभाव भी बिना अनुमान-प्रमाण माने कैसे जाना जा सकता है ? पशु-पक्षी भी
मोदकादिका ग्रास हाथमें लिये हुए पुरुषोको देखकर उधर प्रवृत्त होते तथा
दण्डादि देखकर अनिष्टकारणताका अनुमानकर उस ओरसे निवृत्त होते देखे जाते हैं।
आत्मा इदंकारके आस्पद देह-इन्द्रिय, मन और विषयोंसे पृथक् 'मै'
इस तरह असंदिग्ध अविपर्यस्तरूपसे अपरोक्ष अनुभवसिद्ध ही हैं, क्योकि 'मै हूँ
या नहीं हूँ' अथवा 'नहीं हूँ' ऐसे संशयका अनुभव नहीं होता । 'मैं स्थूल हूँ,
कृश हूँ, बोलता हूँ, जाता हूँ,' इत्यादि देहधर्मका सामानाधिकरण्य देखकर
यह नहीं कहा जा सकता कि अहंप्रत्यय देहविषयक होता है । यदि ऐसा ही
मान ले तो बाल्य, यौवनादिका भेद होनेपर भी अहंप्रत्यालम्बनकी 'मै वही
हूँ, जो बाल्य-यौवन आदिमें था', ऐसी प्रत्यभिज्ञा न हो सकेगी, किन्तु वैसी
प्रत्यभिज्ञा होती है । अतः व्यावृत्त अनेक पुष्पोंमें अनुवृत्त एक सूत्रके समान
बाल-युवा आदि अनेक व्यावृत्त शरीरोंमें अनुवृत्त एक अहंकारास्पद उन
शरीरादिसे भिन्न आत्मवस्तु मानना अनिवार्य है ।
समस्त-व्यस्त बाह्य पृथिवी आदि भूतोमे चैतन्यका उपलम्भ न होनेके
कारण चैतन्यको भूतोका धर्म भी नहीं कहा जा सकता । यदि कहा जाय कि
'मद्याकारसे परिणत यवादिकणोके अनुभूयमान मादक शक्तिके समान देहाकारसे
परिणत भूतोंका ही धर्म चैतन्य शक्ति है' तो यह भी ठीक नहीं; क्योकि देहके
रहनेपर भी मृतावस्थामें चैतन्यका उपलम्भ नहीं होता । संयोगादिके समान
जबतक देह रहता है, तबतक चैतन्य रहता है—यह भी नहीं कहा जा सकता;
क्योंकि चैतन्यको तब रूपादिके समान विशेष गुण मानना पड़ेगा और ऐसा
माननेपर यावद्देहभावित्वेन चैतन्यकी उपपत्ति सङ्गत नहीं हो सकती; क्योंकि
भूत जैसे रूपरहित नहीं होता, वैसे ही देहको कभी चैतन्यरहित होकर नहीं
रहना चाहिये, यही बात इच्छादिके सम्बन्धमे समझ लेनी चाहिये । मृतावस्थामें
प्राणचेष्टादि नहीं दिखायी पड़ते, अतः यह भी मान लेना चाहिये कि उक्त
देहधर्म आत्माके अधिष्ठानसे ही व्यक्त होते हैं । रूप आदि देहसम्बन्धी धर्मोंके
अन्य व्यक्तिद्वारा प्रत्यक्ष होनेपर भी ज्ञान, इच्छा आदि आत्मधर्म अन्यसे
प्रत्यक्ष नहीं किये जाते, अपितु वे स्वप्रत्यक्ष ही हुआ करते हैं ।