मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)
Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें७०४ मार्क्सवाद और रामराज्य
तद्देवा ज्योतिषां ज्योतिरायुर्होपासतेऽमृतम् ( बृहदा० ४ । ४ । १६ )
अन्तः पुरुषे ज्योतिः । ( छान्दो० ३ । १३ । ७ )
जैसे तत्त्वज्ञान बिना अविवेकी देहको ही आत्मा मानता है, वैसे ही अवि-
वेकी बुद्धिको ही ज्ञानकर्ता कहता है । चिदाभासयुक्त बुद्धिवृत्तियाँ उत्पन्न होती
हैं, यही देखकर ज्ञानकी उत्पत्तिका व्यवहार होता है । जैसे प्रतिबिम्ब दर्पणानु-
विधायी होता है वैसे ही चिदाभास भी बुद्धिधर्मका अनुविधायी होता है । चिदा-
भाससे दीपित बुद्धिवृत्तियाँ विषयग्राहिका उसी तरह होती हैं, जैसे उल्मुकका दाहकत्व-
व्यवहार । वे ग्राहिका वृत्तियाँ स्वयं भासित होती हैं, इसीलिये बौद्धोंने प्रत्ययोंके
भासक साक्षीका अपलाप किया है, तथापि उनका आत्मा भासयुक्तबुद्धि प्रत्ययोंके
भाव एवं अभाव जिस साक्षीसे विदित होते हैं वह साक्षी ही उनकी उत्पत्ति-
विनाशको जानता है । साक्षीके रहनेपर भी चिदाभास आवश्यक है; क्योंकि
वस्तु-स्फुरणके लिये वृत्तिव्याप्त वस्तुपर चिदाभास आवश्यक है । केवल साक्षीद्वारा
यदि वस्तुका प्रकाश होता हो, तब तो वृत्तिके समान ही काष्ठ-पाषाणादिका भी
स्फुरण होना चाहिये । प्रकाशस्वरूप आत्माके सम्बन्धसे ही अचेतनबुद्धि
चेतन-सी प्रतीत होती है । फिर तो उसकी वृत्तियाँ भी चेतन-सी ही प्रतीत
होती हैं । जैसे तप्त लौहपिण्डसे निकलनेवाले विस्फुलिङ्ग भी अग्निवत् प्रतीत
होते हैं । वृत्ति-तदभाव, आभास तथा आभासाभावका ग्राहक तादृक् प्रत्यय नहीं
हो सकता । अतः अत्यन्त विविक्त साक्षीसे ही वे भासित होते हैं । फिर भी जैसे
लौहपिण्डमें अग्निकी संक्रान्ति होती है, वैसे बुद्धिमें चित्की विकाररूप संक्रान्ति
नहीं होती । दर्पणमें प्रतिबिम्बके तुल्य ही बुद्धिमें चित्की संक्रान्ति होती है ।
जैसे लौहपिण्ड अग्न्याभास होता है, उसी तरह बुद्धि चेतनाभास प्रतीत
होती है । चित्त ही चेतन है, यह वैसे ही असङ्गत है, जैसे देहको चेतन कहना ।
इसी तरह चक्षुरादिमें भी चेतनत्व कहना भ्रममूलक है । अहङ्कारसहित बुद्ध्यारूढ़
सभी वस्तु साक्षीसे ही भासित होते हैं । इसलिये अखण्डबोधरूप साक्षी सर्वाव-
भासक कहलाता है । सुषुप्तिमें 'नाद्राक्षम्' इस रूपसे प्रत्ययका ही निषेध है, फिर
भी भावरूप अज्ञान एवं प्रत्ययाभावका बोध तो रहता ही है । प्रमातृ-प्रमाण-
प्रमेयादिरूप विशेष ग्राह्य नहीं अनुभूत होता । किंतु भाव-अभावका साक्षी चिद्रूप
आत्मा एकरस है ।
शास्त्रोंके अनुसार प्रत्यय स्पष्ट ही उत्पत्ति-विनाशशील एवं कूटस्थ चैतन्य-
स्वरूप अलुप्तदृक् है । प्रत्यगात्मा-नित्यज्योतिमें ही अहंका पर्यवसान है । अनुभवके
आधारपर ही सब कुछ सिद्ध होता है । आत्मा अनुभवस्वरूप है । प्रत्यय और
प्रत्ययी अन्तःकरण—दोनों ही जड़ हैं । नित्य चैतन्यसे ही इन सबका भान होता
है । जैसे सेनाका जय राजामें आरोपित होता है, उसी तरह प्रमाणफल कूटस्थ
साक्षीसे आरोपित होता है । अविकृत चिदात्माका अन्तःकरणमें प्रतिबिम्ब होता