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मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished866 पृष्ठ

२१० मार्क्सवाद और रामराज्य
डेविसका 'हार्मोनिया' में कहना है कि 'भाषाके मुख्य उद्देश्यमें विकास
होना सम्भव नहीं है, क्योकि उद्देश्य सर्वदेशी एवं पूर्ण होता है। उसमें किसी
प्रकारका परिवर्तन सम्भव नहीं है।' मैक्समूलरके मतानुसार 'सभी भाषाएँ मूलमें
एक ही थीं। मनुष्यकी असावधानीसे ही उनमें बिगाड हुआ।' इससे विकासके विपरीत
ह्रास प्रतीत होता है। डा० पाटके अनुसार 'भाषाके मूल स्वरूपमे परिवर्तन नही
हो सकता, केवल कुछ बाह्य परिवर्तन ही होते हैं। पिछली जातिने एक भी नया धातु
नहीं बनाया। ज्ञान, अज्ञानका ज्वारभाटा सदासे ही आता रहता है। जो जातियों
कभी जंगली थी, वही कभी ज्ञान-विज्ञानयुक्त हो जाती हैं और ज्ञान-विज्ञानयुक्त
जातियाँ कभी अज्ञानसे जगली बन जाती है।' पीछे यह भी कहा गया है कि
'द्रविड़ भाषाका आस्ट्रेलियान आदि अनेक भाषाओंसे सम्बन्ध प्रतीत होता है और
केम्बल्स् द्रविड़, तेलगू आदि भाषाओंका वैदिक भाषासे ही निकलना मानता है।
इनके सैकड़ों शब्द अबतक एक ही समान पाये जाते हैं। इन भाषाओकी तुल्यता
मिलती है। संस्कृतमें अम्ब, सीरियनमें आमो, द्रविड़में अम्मा, सामोपे डिकमें अम्म,
सीथियनमें अम्माल, अरबीमे उम्म, मलयालीमें अम, तुलूमें अप्पा और चीनीमें
मॉ इत्यादि । जैसे सस्कृत, जेन्द और लैटिन भाषाओंमें लिङ्ग एवं वचन तीन तीन
होते हैं, वैसे ही सेमेटिक, अरबी और हिब्रू भाषामें भी लिङ्ग, वचन तीन-तीन
होते हैं। पुँल्लिङ्गसे स्त्रीलिङ्ग बनानेका ढग वही है। जैसे रामका रामा, वैसे ही साहबको
साहिबा और मलकको मलिका बनाकर पुँल्लिङ्गसे स्त्रीलिङ्ग किया जाता है। पुराने
भेदके अन्तर्गत यूरल, अल्ताइक, तुंगसिक, मंगोलिक, तुर्की और तिलगू आदि
भाषाएँ आती हैं। इनमें एक शाखा सामोपेडिक है, जो चीनकी पैतिसी तथा
साइबेरियाकी ओवि नदीके किनारे विस्तृत रूपसे बोली जाती है। इस भाषामे
सस्कृतकी भाँति तीन वचन और आठ विभक्तियाँ होती हैं।
अनादिसिद्ध शुद्ध शब्दोंके उच्चारणमें शिक्षाकी कमीके कारण गड़बड़ी होती
है। उच्चारणमें व्यत्यास हो जानेसे शुद्ध शब्द अपभ्रष्ट हो जाते हैं। जैसे असुर
लोग 'हे आर्य !' के स्थानमें 'हेलय' उच्चारण करने लगे। आज भी इसी कारण सूक्ष्मको
'छुच्छम' और 'टिकिट'को 'टिकस' उच्चारण करते हैं। लिपिके अक्षरोंमें कमीके कारण
अरबीमे 'चरक'को 'सरक', 'कोटपाल'को 'कोतवाल' कहा जाता है। तीन वचन-
वाली संस्कृत भाषासे उत्पन्न हिंदी, मराठी, गुजराती, बगाली आदि भाषाओंमें
दो ही वचन होते हैं, तीन नही । इसी प्रकार जेन्द भाषामें तीन वचन हैं, उससे
उत्पन्न फारसी, पश्तो, उर्दू आदि भाषाओंमे दो ही वचन हैं। लैटिनमे तीन
वचन होते हैं, उससे उत्पन्न भाषाओंमें दो ही वचन होते हैं। इसी तरह हिंदीमे
नपुंसक लिङ्गका प्रयोग लुप्त हो गया । गुप्त कामोके लिये इसी तरह अपभ्रष्ट करके
कुछ संकेतमयी भाषाएँ बना ली जाती हैं। क्लिष्ट और विस्तृत संस्कृत भाषासे ही

सरल और संकुचित करके उच्चारणकी दृष्टिसे अन्य भाषाएँ बनी हैं । जैसे 'ऋत'
को 'राइट', 'उष्ट्र' को 'ऊन्तर', 'स्थान' को 'स्तान,' 'घनी' को 'गनी,'
'विधवा' को 'विडो,' 'गृभ' को 'ग्रिफ्ट,' 'भ्रातर' का 'ब्रदर,' 'मातर' का 'मदर',
'पितर' का 'फादर', संस्कृत एवं जेन्दमें 'असुर'को 'अहुर,' 'सोम' को 'होम,'
'सप्त' को 'हफ्त,' 'आहुति' को 'आज़ुति,' 'वाहू' को 'वाजू,' 'पशु' को 'पसू,'
'उक्षन्' को 'आक्स' तथा संस्कृत एवं फ़ारसीमें 'तनु' को 'तन', 'जानु' को
'जानु,' 'बाहु' को 'बाज़ू,' 'अंगुष्ठ' को 'अंगुस्त,' 'हस्त' को 'हस्त,' 'पाद' को
'पा', 'शिर'को 'सर' कहते हैं । संस्कृत और यूनानीमें 'गते' को 'केटन,' 'दश'
को 'डेक,' 'अश्मन' को 'अकमन्' कहते हैं । संस्कृत और मिस्रीमें 'अथ' वो
'अख,' 'आप' को 'आप' कहते हैं । संस्कृत और अरबीमें 'हर्म्य' को 'हरम्'
'सुर' को 'हुर' कहते हैं । संस्कृत और अफ्रीकीमें 'ध्यान' को 'बानी', 'कर्त्त' को
'काटा' कहते हैं । संस्कृत और चीनीमें 'स्थान' को 'तान,' 'जन'को 'जिन',
'अम्बा' को 'माँ,' 'होम' को 'ह्योम' कहते हैं । संस्कृत एवं जापानीमें 'का' को
'का,' 'बहुत्व' को 'मोत्तो' आदि कहते हैं । संस्कृत और द्रविड़में 'तालु'
को 'तला', 'मजु' को 'मछी,' 'मेष' को 'मेक,' 'राजा' को 'राजू' कहते हैं ।
इस तरह इन उदाहरणोंसे यह सिद्ध होता है कि उच्चारणमें असावधानीसे
ही अनेक भाषाएँ बनी हैं । संस्कृतमें, विशेषतः वेदमें उच्चारणकी सावधानी
बहुत ही आवश्यक होती है । स्वर एवं वर्णसे हीन मन्त्रका प्रयोग मिथ्या
प्रयोग कहा जाता है । वह जिस अर्थके लिये प्रयुक्त हुआ है, उसका बोध
नहीं कराता । इतना ही नहीं, वह वाग्वज्र बनकर यजमानका नाश कर देता है ।
जैसा कि—'इन्द्रशत्रो विवर्द्धस्व' में स्वरके दोषसे अर्थात् अन्तोदात्तके स्थानमें
आद्युदात्तका प्रयोग करनेसे तत्पुरुष समासके अनुसार इन्द्रका शत्रु अर्थात्
घातक अर्थ नही हुआ, अपितु बहुव्रीहि समासके अनुसार 'इन्द्र है घातक
जिसका' ऐसा अर्थ हुआ । इस स्वरापराधसे यजमान वृत्र मारा गया । वैदिक-
लौकिक दोनों ही प्रकारके व्याकरण वैदिक-लौकिक संस्कृत भाषाको बिगड़ने
नहीं देते ।
वैदिक भाषाकी लिपि भी प्राचीन ही है और उसी आधारपर लिपि भी
यन्त्र आदिके काम आती है । अब बहुत-से प्राचीन लेख मिल रहे हैं । ब्राह्मी
लिपिके पहलेके कहे जानेवाले लेखोंमें कोई स्पष्ट लिपि नहीं । कितने ही शिलालेख
तो काल्पनिक ही हैं ।
धातुपाठ, प्रत्यय, नियम, तीन वचन, आठ विभक्तियाँ, दस लकार,
सन्धि-कौशल तथा स्वर-विज्ञानमें संस्कृत व्याकरणसे तुलना संसारका कोई भी
व्याकरण नहीं कर सकता । इन सब प्रक्रियाओंका प्रयोग करनेसे शब्दोंके

स्वरूप अटल रहते हैं । उनमें अपभ्रंशका अवसर ( गुंजाइश ) नही रहता ।
यही कारण है कि लाखो वर्षोंका प्राचीन साहित्य एक ही ढगसे सर्वत्र उच्चरित
और अवगत किया जा सकता है ।
कुछ लोग समझते हैं कि प्राकृत भाषाका सस्कार करके सस्कृत भाषा
बनायी गयी है । जैसे किसी प्राकृत काष्ठ, पाषाणका संस्कार कर मलापनयन,
अतिशयाधानद्वारा उससे विशिष्ट संस्थानकी वस्तुएँ बनायी जाती हैं । परतु
वस्तुतः यहाँका संस्कार इस प्रकारका है कि जैसे मिश्रित ग्राह्य-अग्राह्य पदार्थोंमेसे
गालिनी ( छलनी ) द्वारा अग्राह्य और ग्राह्यका पृथक्करण किया जाता है,
इसे भी सस्कार ही कहा जाता है । इसी तरह मिश्रित साधु-असाधु शब्दोंमेसे
व्याकरणके लक्षणों-सूत्रोंद्वारा असाधु शब्दोसे साधु शब्दोका विवेचन ही
शब्दोका संस्कार है । इस तरह नित्य शब्दोमें भी संस्कारका व्यवहार होनेसे
संस्कृतत्वका व्यवहार होता है ।
कहा जाता है कि भौतिक विज्ञानसे उत्पन्न भौतिक उन्नति अनिश्चित
होती है । बड़े-बड़े विद्वान् बड़ी बुद्धिसे, साधनोंसे जो निश्चित करते हैं,
कालान्तरमें उसका खण्डन हो जाता है । कारण यह है कि जितने सूक्ष्म तत्त्वोंसे
मस्तिष्क बना होता है, उनसे भी अधिक सूक्ष्म पदार्थ ससारमें विद्यमान हैं ।
जैसे नेत्रकी दर्शन शक्तिसे भी दृश्य पदार्थ अधिक सूक्ष्म पाये जाते हैं, वैसे ही
सोचनेवाले यन्त्र मस्तिष्कसे भी सूक्ष्म पदार्थ हो सकते हैं । इसीलिये विद्वान्
थॉम्सनका कहना है कि 'ससारके जब छोटे रहस्य खुल जाते है, तब आगे बड़े
रहस्य आ खड़े होते है । संसारके आश्चर्योंको विज्ञान कभी मिटा नहीं सकता,
प्रत्युत उन्हे अगाध बना देता है ।' मनोविज्ञानके पण्डितोका कहना है कि
'किसी भी जीवन कार्यकी सगति भौतिक नियमोंसे अबतक स्पष्ट नहीं की जा
सकी है । ऑसू निकलने, पसीना बहनेके छोटे-छोटे जीवन कार्य भी भौतिक
तथा रासायनिक नियमोंसे स्पष्ट नही होते ।' एफ० सोडीका कहना है कि
'परस्पर दो पदार्थ क्यो आकर्षित होते हैं और क्यों जुदा होते हैं यह भी ज्ञात
नही है । यही स्थिति अन्य विज्ञानोमे भी है । कल्पनाएँ बदलती रहती हैं ।'
यहाँतक विकासवादके पक्षमें रखे जानेवाले तर्कोंपर विचार किया और
सक्षेपमें अपने शास्त्रोका मत रखा । अब उन्हीपर कुछ विस्तारपूर्वक विचार
करनेकी आवश्यकता है । मूल प्रश्न यही है कि सृष्टि जड़से हुई या चेतनसे ?
पहले इसीपर विचार करना है—
जड़ या चेतन ?
जड़ ससार जड परमाणुओके एकत्रित होने या जड विद्युत्कणोंके संघर्ष
अथवा प्रकृतिके हलचलमात्रका परिणाम नहीं है; किंतु अखण्ड सत्ता अखण्ड

बोध परमानन्दस्वरूप परमात्माकी अघटितघटनापटीयसी मायाशक्तिका
परिणाम है। जैसे कल-कारखाने, रेल, तार, रेडियो, वायुयान, परमाणुबम
हाइड्रोजन बम आदि उत्पादक, पालक, संहारक अनेक यन्त्रोंका निर्माण जड-
प्रकृति आदिसे सम्पन्न नहीं होता, किंतु उनके लिये कोई बुद्धिसम्पन्न परिष्कृत
मस्तिष्कवाला वैज्ञानिक उनका निर्माता अपेक्षित होता है। वैज्ञानिकोंके परिष्कृत
मस्तिष्क, बुद्धि एवं शरीर आदिका निर्माता, विविध पशुओ, पक्षियों, फलोंका
निर्माता सर्वेश्वर अपेक्षित है। मोहन-जो-दड़ो और हड़प्पाकी खुदाइयोंमें मिलनेवाली
रंग-बिरंगी और विचित्र वस्तुओंके आधारपर यदि कोई विशिष्ट बुद्धिमान् चेतन
कर्ता अपेक्षित होता है तो कोई कारण नहीं कि उपर्युक्त रंग-बिरंगे विचित्र
फूलों-फलों, विचित्र साड़ी पहननेवाली तितलियों, पक्षियों, पशुओं तथा विचित्र
बुद्धिपूर्ण मनुष्यका निर्माता कोई चेतन ईश्वर न हो। चन्द्र-सूर्य-सागर-पर्वतादि
वस्तुएँ सावयव होनेसे कार्य हैं। कार्य होनेसे उनका सकर्तृक होना
आवश्यक है। किसी भी कार्यको सकर्तृक, साधार एवं सोपादान होना
अनिवार्य ही है। इस दृष्टिसे प्रपञ्चोत्पादिनी शक्तिसम्पन्न चेतनसे विश्वकी
उत्पत्ति होना उचित है। पार्थिव प्रपञ्चका कारण पृथिवी, पृथिवीका कारण जल,
उसका कारण तेज, उसका कारण वायु, वायुका आकाश, आकाशका अहंतत्त्व,
अहंतत्त्वका महत्तत्त्व, महत्तत्त्वका अव्यक्ततत्त्व और उसका कारण स्वप्रकाश
सत्तत्त्व है। जैसे वह्निमें दाहिका शक्ति एव मृत्तिकामें घटोत्पादिनी शक्ति होती
है, वैसे ही सत्में प्रपञ्चोत्पादिनी शक्ति होती है। जैसे व्यष्टिगत व्यवहारमें
निद्रायुक्त चेतनसे निद्रा भंग होनेपर कुछ बोध उत्पन्न होता है, तत्पश्चात्
अहंका उल्लेख होता है, अनन्तर वायु, आकाश आदिका उपलम्भ होता
है। आकाश होनेपर हलचल, हलचलसे ऊष्मा, ऊष्मासे स्वेद, स्वेदसे
घनीभूत स्वेद अर्थात् पार्थिव मल उत्पन्न होता है। ठीक यही स्थिति समष्टि
जगत्की उत्पत्तिकी है। कारण सूक्ष्म तथा व्यापक एव निर्विशेष होता है।
कार्य उसकी अपेक्षा स्थूल, सविशेष एव व्याप्य होते हैं। पृथिवीमें शब्द, स्पर्श,
रूप, रस, गन्ध—ये पाँच गुण हैं। जलमें गन्धविहीन पूर्वोक्त चार गुण हैं। तेजमें
शब्द, स्पर्श, रूप तीन गुण, वायुमें शब्द, स्पर्श दो गुण तथा आकाशमें
केवल एक शब्द ही गुण है। उत्तरोत्तर व्यापकता भी इनमें प्रसिद्ध है।
आधाराधेयकी दृष्टिसे भी व्यापक, सूक्ष्म एव निर्विशेष आधार है। स्थूल,
व्याप्य आधेय हैं। सर्वाधार, सर्वकारण, स्वप्रकाश सत् निराधार एव अकारण
है। 'मूले मूलाभावादमूलं मूलं' अन्तिम मूल समूल माननेसे अनवस्था प्रसंग
होगा। अतः उसे अमूल मानना आवश्यक है।
यद्यपि भौतिकवादी भूतको ही मूल मानता है। फिर भी किसी

२१४ मार्क्सवाद और रामराज्य
भी कार्यमें प्रकाश, हलचल, अवष्टम्भ ( रुकावट ) अपेक्षित है । परमाणु,
विद्युत्कण या भूतसे बिना उपर्युक्त तीनों गुणोंके काम नहीं चल सकता ।
प्रकाश बिना हलचल नहीं, हलचल बिना कार्य नहीं । साथ ही उचित रुकावट
( अवष्टम्भ ) बिना भी कार्य नहीं सम्पन्न हो सकता । कोई बढ़ई आलमारी
तभी बना सकता है, जब उसे पहले उसका बोध हो, पुनः वह बसूला लेकर क्रिया
प्रारम्भ करे । निरन्तर बसूला चलता ही जाय तो काष्ठ ही समाप्त हो जायगा,
कोई कार्य सम्पन्न नहीं होगा । अतः यथायोग्य क्रिया और रुकावट भी
होनी चाहिये । बस, ये ही तीन चीजें सत्त्व, रज और तम हैं । सत्त्व प्रकाशात्मक,
रज क्रियात्मक तथा तम अवष्टम्भात्मक है । सांख्य और कई उसके अनुयायियोंने
इन तीनों गुणोंकी समष्टि प्रकृतिको ही मूल मान लिया है; परन्तु प्रकृति या
गुणोंका भी अस्तित्व एवं स्फुरण अपेक्षित है । उसके बिना सब असत् एवं
स्फूर्तिविहीन हो जाते हैं । अतः सत्स्फुरण अर्थात् अबाधित स्फुरण या
स्वप्रकाश सत्के भीतर सबका अन्तर्भाव हो जाता है । सत्का अन्तर्भाव अन्यत्र
नहीं हो सकता, अतः स्वप्रकाश सत् ही मूल कारण है । वही अबाधित बोधस्वरूप
है । वही सब विश्वका मूल है । एक वृक्ष, एक सरोवर, एक अङ्गुल भूमितक
बिना स्वामीके नहीं है तो कैसे माना जाय कि चन्द्रमण्डल, सूर्यमण्डल, नक्षत्र-
मण्डल, गगन, भूधर, पर्वत, सागर, भूमि, अरण्य बिना स्वामीके होंगे । इस तरह-
सर्वकारण सर्वाधार सर्वकर्ता सर्वस्वामी सर्वशासक परमेश्वर सिद्ध होता है ।
उसीका सनातन अंश क्षेत्रज्ञ आत्मा सिद्ध होता है । देह, इन्द्रिय, मन,
बुद्धिका द्रष्टा साक्षी आत्मा देहादिसे भिन्न है । जाग्रत्, स्वप्न, सुषुप्ति तीनों
बुद्धिकी अवस्थाओंका वही साक्षी है । जैसे महाकाशका अंश घटाकाश होता
है, वैसे ही अनन्तबोध अखण्ड सत्स्वरूप परमात्माका ही अंश जीवात्मा है । वह
भूतोंका परिणाम नहीं है । अतएव चेतनविहीन देहादि जडमात्र रह जाते हैं ।
भले ही देह, दिल-दिमाग या मस्तिष्क एवं बुद्धिके बिना स्वतन्त्र चेतनाका
उपलब्ध नहीं होता, फिर भी चेतना देह या दिल-दिमाग आदिका धर्म नहीं
है । जैसे तेज या अ ग्नेका दाहकत्व, प्रकाशकत्व, लोहालक्कड, तार आदि पार्थिव
आप्य पदार्थोंके ही सम्बन्धसे व्यक्त होता है तो भी पार्थिव आप्य पदार्थोंका
धर्म दाहकत्व, प्रकाशकत्व नहीं माना जाता, इसी तरह दिल-दिमाग आदिके
सम्बन्धसे आत्माका चैतन्य अभिव्यक्त होता है, परन्तु चैतन्य उनका धर्म
नहीं है । व्यक्तिके सम्बन्धसे ही जातिकी अभिव्यक्ति होती है । फिर भी जाति
स्वतन्त्र वस्तु मान्य है । जालान्तर्गत सूर्यरश्मियोंके सम्पर्कसे त्रसरेणु आदि
प्रतीत होते हैं, फिर भी उनका स्वतन्त्र अस्तित्व है । उसी तरह जिस बोधके
द्वारा सब प्रमाण-प्रमेय आदिकी प्रतीति होती है, उस बोधका स्वतन्त्र अस्तित्व

है । इतना ही क्यों ? उसकी ही सत्तासे अन्य पदार्थ सत्तावान् होते हैं । उसीकी
स्फूर्तिसे इतर पदार्थोंमें स्फूर्ति होती है । जैसे दर्पणभानके अनन्तर ही दर्पणस्थ
प्रतिबिम्बकी प्रतीति होती है, इसी तरह अथवा आलोककी प्रतीतिके अनन्तर ही
रूपकी प्रतीति होती है उसी तरह प्रमेय, प्रमाण तथा प्रमाता तीनोंकी प्रतीतिसे
पहले ही सर्वभासक भानकी प्रतीति होती है । प्रकाश सम्पर्क होनेसे अथवा
प्रकाशस्वरूप होनेसे वस्तु प्रकाश होता है । प्रमाण बिना प्रमेयसिद्धि नहीं
'होती । प्रमाण भी प्रमाताके पराधीन होता है । प्रमाता स्वभिन्न प्रमेयकी
प्रमितिके लिये प्रमाण ढूँढता है । अपनी प्रमितिके लिये प्रमाणकी आवश्यकता
नहीं समझता । यदि प्रमाता भी प्रमाणसिद्ध माना जाय तब तो वह प्रमेय-
कोटिमें आ जायगा । फिर उसका प्रमाता कोई अन्य आवश्यक होगा,
उसका भी अन्य, फिर उसका भी अन्य प्रमाता आवश्यक होगा । इस तरह अनवस्था-
प्रसक्ति होगी । एक ही प्रमाता स्वयं प्रमाता और स्वयं प्रमेय नहीं हो सकता,
क्योंकि एकमें कर्मकर्तृभाव नहीं बन सकता । किसी भी वस्तुका प्रागभाव
या प्रध्वंसाभाव सिद्ध करनेके लिये प्रमाता प्रमाण या साक्षी अपेक्षित है ।
साक्षीविहीन भाव या अभाव कुछ भी सिद्ध नहीं हो सकता । सुषुप्तिमें प्रमाता
प्रमाणका भी अनुपलब्ध सिद्ध है । परंतु सर्वभासक बोध या संवित्का प्रागभाव,
प्रध्वंसाभाव या अत्यन्ताभाव कुछ भी नहीं सिद्ध होता । बोधाभावका बोध
नहीं तो बोधाभाव सिद्ध नहीं हो सकता । बोधाभावका बोध है तो बोधाभाव
भी कैसे कहा जा सकता है ? इस तरह यह अतीत अनागत अहोरात्र, पक्ष,
मास, वर्ष, युग, कल्प सब देशकालका भासक है, स्वयं अनाद्यनन्त है । बीजसे
पहले अङ्कुर, अङ्कुरसे पहले बीज होता है । जागरणसे पहले सुषुप्ति ( निद्रा )
एव उससे पहले जागरण होता है । प्राणी जागनेके बाद सोता है और सोनेके
बाद जागता है । इसी प्रकार जन्म-मरण, सृष्टि-संहार तथा जन्मों और कर्मोंकी
परम्परा अनादि है । संसारमें देखा ही जाता है कि कारणमें विलक्षणता हुए
बिना कार्यमें विलक्षणता नहीं होती । रेल, तार, रेडियो आदि विलक्षण कार्योंके
लिये विलक्षण हेतु अपेक्षित होते ही हैं । इसी तरह देव, मनुष्य, पशु आदि
उच्चावच योनियोंमें जन्म बिना धर्माधर्मरूपी कर्मोंकी विलक्षणता सम्भव
नहीं है । लोकमें भी भले कर्मोंका भला फल और बुरे कर्मोंका बुरा फल होता
है । ठीक इसी तरह धर्म अधर्मके वैचित्र्यसे ही जन्मोंमें वैचित्र्य होता है ।
कोई भी शासक शासनके लिये शासन-विधान आवश्यक समझता है ।
सुतरा सनातन परमेश्वर भी सनातन जीवोंपर शासन करनेके लिये सनातन
विधान आवश्यक समझते हैं । सनातन जीवात्माओंको सनातन परमपद प्राप्त
करानेके लिये सनातन परमात्माने अपने सनातन निःश्वासभूत सनातन वेदादि

२१६ मार्क्सवाद और रामराज्य
शास्त्रोद्वारा जिन सनातन नियमोको निर्धारित कर रखा है, वे ही सनातनधर्म
या सनातन नियम संसारके कल्याणकारी हैं । यह अनुभवसिद्ध बात है कि
संसारमें छोटे-बड़े किसी कार्यके करनेके पहले प्राणीको उसका संकल्प या ज्ञान होता
है। इस तरह ज्ञानपूर्वक ही प्रत्येक कार्य होते हैं । साथ ही हरेक ज्ञान या
संकल्पमें शब्दोंका अनुवेध अवश्य रहता है। ऐसा कोई भी प्रत्यय (बोध)
नहीं होता जिसमें सूक्ष्मरूपसे शब्दका अनुगम न हो—
न सोऽस्ति प्रत्ययो लोके यः शब्दानुगमादृते ।
(वाक्यपदीय)
यद्यपि चार्वाक एवं उसके अनुयायी मार्क्स आदि भौतिकवादी प्रत्यक्ष प्रमाण-
के अतिरिक्त कोई प्रमाण नहीं मानते, तथापि दूसरोंके अज्ञान, संशय, भ्रान्ति
या जिज्ञासा-प्रशमनके लिये वाक्य-प्रयोग वे भी करते हैं । परन्तु केवल प्रत्यक्षवादी
दूसरोंके अज्ञान, संशय, भ्रान्ति, जिज्ञासा आदि प्रत्यक्ष प्रमाणसे कैसे जान सकेंगे?
श्रोत्र, त्वक्, चक्षु, रसना, घ्राणसे शब्द-स्पर्शादिरहित अन्यनिष्ठ संशयादि
सर्वथापि नहीं जाने जा सकते । बिना संशयादि जाने जिस किसीके प्रति अजिज्ञासित
अर्थका प्रतिपादक वक्ता उन्मत्त ही कहा जा सकता है । अतः स्वीकार करना
पड़ेगा कि मुखाकृति या वाग्व्यवहार आदिसे दूसरोंके संशयादिकोंका अनुमान
करके ही कोई भी वक्ता वाक्यप्रयोग कर सकता है । अतः प्रत्यक्षातिरिक्त प्रमाण
नहीं है, इसे कहनेके लिये भी अनुमान प्रमाण मानना आवश्यक है । अतएव
पशु-पक्षीतकका व्यवहार भी अनुमानमूलक होता है । भोजन आदि लेकर आते
मनुष्यकी ओर प्रवृत्त होना, दण्डोद्यतकर मनुष्यसे पलायन करना आदि भी
अनुमानसे ही सिद्ध होता है । इसी प्रकार व्यवहारमें कोई भी व्यक्ति पिता-
पितामहादिकी सम्पत्तिका उत्तराधिकारी तभी होता है, जब वह अपनेको
पिता-पितामहका पुत्र-पौत्र सिद्ध कर सके । प्रत्यक्ष प्रमाणसे कोई प्राणी अपने
माताकी सिद्धि नहीं कर सकता, पिता-पितामहकी सिद्धि तो दूरकी बात है ।
अतः पार्श्ववर्तियों तथा माता आदिकी बातोंपर विश्वास करनेसे ही पिता आदिकी
सिद्धि होती है । पशु आदिको पिता आदिकी सम्पत्तिमें अधिकारी नहीं होना
होता है, अतएव उन्हें वचनप्रमाणसे पिता आदिकी सिद्धिकी अपेक्षा नहीं होती ।
पशु आदि वचनप्रमाणरहित होते हैं, अतः उनकी दृष्टिसे माता, भगिनी,
पुत्री आदिका भेद भी मान्य नहीं होता । वे पत्नी, भगिनी, किसीसे भी संतान
उत्पन्न कर सकते हैं । पर मनुष्य वचनप्रमाण मानता है, इसीलिये यह माता,
भगिनीका भेद मानकर यथायोग्य व्यवहार करता है । अतः आप्त पुरुषोंका
कहना है—

विकासवाद २१७
मतयो यत्र गच्छन्ति तत्र गच्छन्ति वानराः ।
शास्त्राणि यत्र गच्छन्ति तत्र गच्छन्ति ते नगः ॥
प्रत्यक्षानुमानादिमूलक मति जहाँतक जाती है, वहाँतक जानेवाले
वानरादि पशु होते हैं । परंतु प्रत्यक्षानुमान एव शास्त्र जहाँतक चलते हैं, वहाँतक
चलनेवाला प्राणी ही नर होता है । हाँ, पौरुषेय वचन प्रत्यक्षानुमानादिमूलक
होते हैं । पर अपौरुषेय वचन स्वतन्त्ररूपमे प्रमाण होते हैं । जैसे रूपग्रहणमें नेत्र
स्वतन्त्र प्रमाण होता है, वैसे ही धर्म-ब्रह्मादिग्रहणमें वेदादि शास्त्र स्वतन्त्र प्रमाण
होते हैं । इस तरह प्रत्यक्ष, अनुमान तथा वेदादि आगमोंद्वारा यही सिद्ध होता
है कि शुभाशुभ कर्मोंके अनुसार ईश्वरसे ही विश्वकी सृष्टि एव उसकी व्यवस्था
होती है । विचित्र सूर्यमण्डल अपने आप कैसे बन गया ? उससे चन्द्रमण्डल,
भूमण्डलके टुकड़े कैसे टूटे ? अब ऐसे टुकड़े क्यों नहीं टूट रहे हैं ? अब वानरसे
मनुष्य क्यों नहीं उत्पन्न होते, इन अतीत इतिवृत्तोंमें क्या प्रमाण है ? केवल कुछ
मनुष्योंकी दिमागी कल्पनाको छोड़कर इन तत्त्वोंका क्या आधार है ? आर्ष
विज्ञान् अपौरुषेय शास्त्रोंके सामने इन कल्पनाओंका क्या मूल्य है ?
इन कल्पनाओंकी निस्सारता इसीसे स्पष्ट है कि अग्नि, सूर्य, इन्द्रादि
देवता उपयोगिताके आधारपर माने गये हैं । परंतु यह कोई भी नहीं कह सकता
कि जिसका उपयोग करना हो उसकी पूजा भी करनी चाहिये ।' पूजा तो उसी
दशामें होती है, जब दृश्य जडवस्तुसे भिन्न कोई चेतन वस्तु मान्य होता है ।
आस्तिक लोग उपयोगी अग्नि आदिमें एव अनुपयोगी पाषाण आदिमें भी चेतन
अधिष्ठान देवता मानकर उनकी पूजा करते हैं । इसी तरह इन्द्र या ईश्वर आदि-
की कल्पना भी भीरु प्राणीकी भीरुताका परिचायक नहीं, किंतु भय, शोक, मोह,
सुख-दुःख आदि प्रापञ्चिक भावोंसे ऊपर उठे हुए महापुरुषोंद्वारा परम
तथ्यका ऋतम्भरा प्रज्ञाद्वारा साक्षात्कार है । निर्विकल्पसमाधिदशामें ईश्वरतत्त्वका
साक्षात्कार होता है । एव दार्शनिक दिव्य तर्कोंद्वारा अशृङ्खल भौतिकवादी
कुतार्किकोंके अखर्व गर्वोको चूर करके अध्यात्मवादी आत्म परमात्मवाद सिद्ध
करते हैं । वशिष्ठ, व्यास, कण्व, गौतम, श्रीहर्ष, उदयन, कुमारिल आदिकोंके
महान् तर्क आज भी नास्तिकोंके लिये दुर्भेद्य हैं ।
विकासवाद और जाति
जल, वायु एव देशोंके प्रभावसे रंगमें परिवर्तन होना प्रत्यक्ष अनुमान
एव शास्त्रसे भी सिद्ध है । कफ, वात, पित्तकी प्रधानता-अप्रधानताने भी रंग,
रूप, स्वभावमें भेद होना शास्त्रसिद्ध है । जैसे संकल्पों, विचारों एवं
वातावरणोंसे रजस्वला स्त्री प्रभावित हो, स्त्री-पुरुष जैसे देश, काल,

२१८ मार्क्सवाद और रामराज्य
वातावरणसे प्रभावित होकर गर्भाधान करते हैं, वैसे ही संतानका प्रादुर्भाव होता
है। वात, पित्त, कफका प्रभाव भी संतानपर पड़ता है। 'बृहदारण्यक' मे स्पष्ट
मिलता है कि जो चाहे कि मेरा पुत्र शुक्लवर्ण और एक वेदका विद्वान् हो, वह
विधानसहित क्षीरोदन पकाकर घृतके साथ प्राशन करे। जो चाहे कि कपिल
एवं पिंगलवर्णका पुत्र हो और दो वेदका पण्डित हो, वह विधिपूर्वक घृतयुक्त
दध्योदनका प्राशन करे। ऐसे ही श्याम, लोहिताक्ष और तीन वेदका पण्डित
होनेके लिये भी प्रकारान्तरका उल्लेख है। पुष्पो, फलो, पौधोंका भी रूप-रग,
स्वाद बाह्य उपचारोंसे बदला जा सकता है, यह स्पष्ट ही है। तात्कालिक
या प्राचीन लौकिक एवं शास्त्रीय कर्मोंसे रूप-रंगमें प्रमाणानुसार परिवर्तन
माननेमें विकासवादके प्रसंगकी उपस्थितिका कोई भी अवसर नही रहता।
इतना ही क्यो, देवताओ, ऋषियोके वर या शाप अथवा तीव्र पुण्य या पापसे
तत्क्षण जातिका परिवर्तन हो जाता है। विश्वामित्रके शापसे रम्भा पहाड़ी हो गयी,
सप्तर्षियोके वचनसे नहुष अजगर हो गया और देवताके वरसे नन्दी देवता हो गये।
परन्तु इतनेसे ही विकासवादियोके बदरोसे मनुष्यकी उत्पत्ति हुई, इस मतकी
पुष्टि नही होती। वैदिकोके मतमें किसी भी विलक्षण कार्यका आविर्भाव-
तिरोभाव किसी हेतुसे किसी बुद्धिमान्द्वारा होता है, यह पक्ष तो सर्वसम्मत है।
इस दृष्टिसे कर्मोंके वैचित्र्यसे सर्वज्ञ ईश्वरद्वारा विलक्षण कार्योंका आविर्भाव-
तिरोभाव होना ठीक है। परन्तु कर्मनिरपेक्ष जड (प्रकृति या अन्यान्य जड)
परमाणु या विद्युत्कणसे विलक्षण कार्य बन जाने या बंदरसे मनुष्य आदिकोंकी
उत्पत्तिका कोई आधार नही है।
जब कर्म, वर, शाप, भावना, सङ्कल्प आदि अन्यान्य हेतु परिवर्तनके
विद्यमान हैं, तब खामखाह व्यभिचारकी ही कल्पना करना, सबको झूठा
समझकर केवल अपने अटकलपर ही डटे रहना कहाँतक ठीक है? भले ही
किसीको कोई रोग परस्त्री-सम्भोगसे ही हुआ हो, परन्तु अन्यान्य प्रकारके
सम्पर्कसे वह रोग हो ही नहीं सकता, ऐसा नहीं कहा जा सकता। श्रीदशरथके
राम, भरत ये दो श्यामल पुत्र और लक्ष्मण, शत्रुघ्न गौरवर्णके हुए। वसुदेवसे
भी बलराम गौर, कृष्ण श्यामल हुए। प्रद्युम्न, अनिरुद्ध श्यामल हुए, व्यास,
शुक आदि श्यामल थे, अतः यह तो कहा ही नहीं जा सकता कि आर्य सब
गोरे ही होते थे। भारतमें छहों ऋतुओंका पूर्ण विकास होता है, अतः देश-
कालभेदसे तथा अन्यान्य हेतुओंसे भी रूप-रंगमें भेद हो ही सकता है।
मैथिल, बंगाली, पंजाबी, युक्तप्रान्तीय, महाराष्ट्रीय, द्रविड़ आदिकोंके रूप-रंग,
स्वरूपमें स्पष्ट भेद पड़ जाते हैं। वे सभी आर्य हैं, सभीके समान गोत्र होते
हैं। शंकर गौरवर्ण, ब्रह्मा रक्तवर्ण, विष्णु श्यामल वर्णके है। यही स्थिति

विकासवाद २१९
महाकाली, महालक्ष्मी और महासरस्वतीकी भी है। सत्त्व शुक्ल, रज रक्त, तम
कृष्ण होता है। भगवान्के अवतारोंमें भी शुक्ल, रक्त, पीत, कृष्ण—ये चार भेद
आये हैं—
शुक्लो रक्तस्तथा पीत इदानीं कृष्णतां गतः। (श्रीमद्भा० १०।८।१३)
पृथिवी, जल, तेज, वायु, आकाश—इन पाँच तत्त्वोंमेंसे जिस तत्त्वकी
प्रधानता जिन प्राणियोंमें रहती है, उस प्रकारके रंग उन प्राणियोंमें होते हैं।
पृथिवीका पीतवर्ण, जलका शुक्ल, अग्निका रक्त, वायुका कृष्ण, आकाशका
धूम्रवर्ण है (योगतत्त्वोपनिषद्)। सूर्य, चन्द्र, मंगल, बुध, गुरु, शुक्र, शनि—
इन ग्रहोंका रंग क्रमशः ताम्र, श्वेत, रक्त, दृग, पीला, भास्वर, शुक्ल और
कृष्ण है। जन्मकालीन लग्नके नवांशका स्वामी ग्रह यदि बलवान् हो तो
उसके वर्णानुसार उस पुरुषका रंग होता है। लग्ननवांशाधिपति निर्बल हो और
यदि लग्नमें स्थित या लग्नको देखनेवाला ग्रह बलवान् हो तो उसके वर्णानुसार
उस पुरुषका रंग होता है। लग्ननवांशाधिपति निर्बल हो और यदि लग्नमें स्थित
या लग्नको देखनेवाला ग्रह बलवान् हो तो उस ग्रहके वर्णानुसार रंग होता है।
अथवा चन्द्रमा जिस राशिके नवांशमें हो, उसके स्वामी ग्रहके वर्णानुसार रंग
होता है। 'लग्ननवांशपतुल्यतनुः स्याद्वीर्ययुतग्रहतुल्यवपुर्वा । चन्द्रसमेतनवांशप-
वर्णः।' (बृहज्जा० ५। २३) हाँ, इसमें भी देश, जाति, कुल आदिके अनुसार
वर्णमें तारतम्य होना स्वाभाविक है—(परं विधार्याः कुलजातिदेशाः ।)
'विकासवाद युक्तिसंगत हो तो उसे माननेमें कोई आपत्ति नहीं, परंतु
जिस विकासवादकी अबतक कोई निश्चित व्यवस्था ही नहीं, उसके बारेमें कहाँतक
क्या कहा जाय ? विकास-ह्रास ये संस्कृत शब्द हैं। किसी विद्यमान वस्तुका
ही ह्रास और विकास होता है। इस दृष्टिसे हर एक वस्तुका 'जायते, अस्ति,
वर्द्धते' तक विकास कहा जा सकता है। 'परिणमते, अपक्षीयते, विनश्यति'
यहाँतक ह्रास होता है। इस तरह हर एक तत्त्वमें ह्रास-विकासका चक्र
चलता रहता है। यह विकास ह्रास भी बिना किसी नियन्ताके नहीं बनता।
सर्वज्ञ, सर्वशक्तिमान् परमेश्वरके नियन्त्रणमें तो यह सब सम्भव है, परंतु जिस
विकासवादमें सर्वज्ञ ईश्वर नहीं, जिसमें पूर्व-पूर्वके लोग अज्ञ, उत्तरोत्तरके लोग
विज्ञ होते हैं, जिसमें अभीतक सर्वज्ञ कोई हुआ ही नहीं, अतएव जिसका शास्त्र
भी अभीतक ठीक-ठीक नहीं बन पाया, ऐसा विकास सचमुच किसी आस्तिकको
मान्य नहीं हो सकता। इसके सिवा सबसे बड़ा दोष इस विकासवादमें यह है
कि इसमें कर्मवादका सम्बन्ध नहीं रहता। यदि अनन्त प्राणियोंके उत्कर्ष,
अपकर्ष, सुख-दुःख उनके धर्माधर्मरूप कर्मोंसे माने जायें और कर्मों तथा
फलोंका ज्ञाता, नियन्ता परमेश्वर माना जाय, तब कर्मोंके अनुसार ही विकास

२२० मार्क्सवाद और रामराज्य
और उसके अनुसार ही ह्रास भी मानना पड़ेगा । तब तो ह्रास-विकासका चक्र ही
समझमें आ सकता है ।
किसी पीढ़ीमें अकस्मात् परिवर्तन विकासवादमें परिगणित हो सकते हैं ।
परंतु संकल्प, धर्माधर्म, वर-शापादिसे परिवर्तन इस विकासवादमें नहीं आ
सकता । विकासवादियोंका यह कहना भी युक्तिविहीन है कि 'किसी जातिके
किसी पीढ़ीमें अकस्मात् आविर्भूत होनेवाले गुण-दोष दोनो ही प्रबल होते हैं ।
खतरनाक अवस्था आनेपर दोषवाली जातिके लोग नष्ट हो जायेंगे, परंतु
गुणवाली जातिके लोग और जातियोंके नष्ट होनेपर भी बचे रहेंगे।' तब ये
विशेषताएँ बिना कारणके कैसे होगीं ? फिर जब अकस्मात् ही सब कुछ होना
है, तब आकस्मिक दोषवाली जातिके नष्ट हो जाने, गुणवाली जातिके जीवित
रहनेका ही नियम कैसे रहेगा ? शास्त्रीय विचारधाराके लोगोंका तो कहना है कि
किसी भी परिवर्तनमें हेतु अवश्य है और जो विशेषताएँ आगन्तुक हैं, उनको
मिटाना भी अनिवार्य है । उत्तम दृढ हेतुसे व्यक्त विशेषताएँ कुछ दीर्घकालतक
ठहरती हैं । निम्नश्रेणीके हेतुसे उत्पन्न विशेषताएँ शीघ्र ही नष्ट होती हैं । कुष्ठ,
प्रमेह, मृगी आदि ऐसे कितने ही रोग हैं, जो प्रारब्ध एवं अन्यान्य बाह्य
हेतुओसे उत्पन्न होते हैं और फिर उनकी परम्परा चल पड़ती है । कितने रोग ऐसे
भी होते हैं कि जिनकी परम्परा नहीं चलती । वैसे दोषोका भी ज्ञान फल-बलसे
ही जानना चाहिये ।
रूप-रग एव मनपर वाह्य परिस्थितियोंका प्रभाव भी अवश्य पडता है ।
मैथिलो, पजाबियो, द्राविड़ोपर देश, जल, वायुका प्रभाव अवश्य है । पवित्र,
अपवित्र वस्तुओका सेवन, वैसे वातावरणका सेवन अवश्य मनपर प्रभाव
डालता है । भोग, मद्य आदिकेसेवनसे मनपर विकृति आती ही है । 'केवल आधुनिक
विकासवादियोंको मान्य नहीं है, इतनेहीसे कोई बात अयुक्त नहीं हो सकती ।
फिर जो आकस्मिक परिवर्तन माननेवाला है, उसकी दृष्टिमें किसी भी हेतुका
सम्मान कैसे हो सकता है ? इसके अतिरिक्त तीव्र पुण्य-पाप, ऋषियो, देवताओके
वर-शापसे भी विचित्र परिवर्तन शास्त्रसिद्ध है । रचनामे अलौकिक ईश्वरीय शक्तिका
हाथ होते हुए भी चित्रकारके समान परमेश्वरमें अल्पज्ञता एव अभ्याससापेक्ष
कुशलताकी आपत्ति नहीं होगी । मनुष्यजातिकी धीरे-धीरे उन्नति करनेपर ही उसकी
न्यूनता नहीं, क्योंकि सर्वज्ञ, सर्वशक्तिमान् भी परमेश्वर जीवोंकी उन्नति अवनतिके
सम्बन्धमे उनके कर्मोंपर अवलम्बित है । जीवोंके अङ्गोंके सौन्दर्य, माधुर्य आदि गुण-
गणोंके होनेमे जीवोके कर्म भी हेतु होते हैं, कर्मानुसार ही जीवोको रूप, रग,
सौन्दर्य, बुद्धि आदि मिलेगी । इतनेसे ही सृष्टिकी पूर्णता-अपूर्णताका निर्णय करना
निरर्थक है । जब जीवोके पुण्य विशेष होते हैं, तब उनका उत्तम विकास होता है,

पुण्यों की कमीमें विकासकी कमी होती है। रगो, रूपों, बुद्धियोंमें खराबी पापोंकी
विशेषतासे भी होती है। वैसे ही हर एक जीवमें सब तरहके गुण और शक्तियाँ
विद्यमान होती हैं। तपस्या और धर्मकी महिमासे उनका आविर्भाव, अधर्मसे
उनका ह्रास हो जाता है। प्रकृतिके विरुद्ध परमेश्वरका जातिपर हाथ लगानेका तो
कोई प्रसङ्ग ही नहीं, प्रेम, भक्ति आदिसे भी अनेक परिवर्तन होनेपर भी उस देहके
रहते-रहते जाति नहीं बदल सकती, दूसरे जन्ममें तो अभीष्ट जाति-परिवर्तन तीव्र
कर्मोंसे हो सकता है। यह भी योगादि शास्त्रोंको सम्मत है। भगवान् भक्तपर
अनुग्रह करे, यह भी पक्षपात नहीं है; क्योंकि जैसे अन्यान्य कर्म हैं वैसे ही
भक्ति भी मानस कर्मविशेष ही है। अग्निके समीप जो ही जायगा, उसकी शीत-
निवृत्ति होगी। वह सभीके लिये समान है। विशेष कर्मों, उपासनादि हेतुओंसे उसी
जन्ममें जातिपरिवर्तन होना अपवाद और उस देहमें जातिका न बदलना
उत्सर्ग है। फिर किसी पीढ़ीके रूप, रग, मनके परिवर्तनसे जाति बदलनेका
कोई प्रसङ्ग ही नहीं है। जो कहा गया है कि 'परमेश्वर किसी भक्त जातिको ब्राह्मणत्व
दे सकता है' यह कहना अनभिज्ञता है, क्योंकि ब्राह्मणत्व भी जाति ही है। फिर
एक जातिको दूसरी जाति कैसे मिल सकती है? यह ध्यान देनेकी बात है कि व्यक्ति-
को जाति प्राप्त होती है। जातिको जाति कभी भी नहीं मिल सकती, 'जातौ जाते-
रनङ्गीकारात्' किसी अन्य जातिके व्यक्तिसे अन्य जाति मिल सकती है, परंतु वह
अपवाद है।
जो तपस्या और योगकी शक्तिसे प्रकृतिपर अधिकार पा चुके हैं, जो प्राकृतिक
तत्त्वोंमें सङ्कल्पमात्रसे परिवर्तन कर सकते हैं, वे शूद्रादि जात्यारम्भक कर्मविशिष्ट
भूत, तन्मात्राओं या परमाणुओंको हटाकर ब्राह्मणजात्यारम्भक कर्मविशिष्ट भूतों
या परमाणुओंसे ब्राह्मणजातिको व्यक्त कर सकते हैं। परंतु यह सामर्थ्य उन्हीं लोगोंमें
सम्भव है, जो अपने सामर्थ्यसे नहुषको अजगर और रम्भाको पहाड़ी बना सकते हैं।
उन महर्षियोंके वचनोंमें वह सामर्थ्य रहती है कि जिससे उनके वचनोंका अनुगमन
अर्थ करते हैं। वचनोंको अर्थके अनुगमनकी आवश्यकता नहीं होती। वे यदि घटको
पट कहें, तो घटको पट होना पड़ता है—'ऋषीणां पुनराद्यानां वाचमर्थोऽनुधावति'
आद्य महर्षियोंके वचनोंका अनुधावन अर्थ करते हैं। अतएव परमेश्वरद्वारा किसी
जातिमे अनियमित परिवर्तनका प्रसङ्ग ही नहीं आता। जो यह कहा गया है कि
मिश्रणसे भी रग-रूपमे भेद होता है, जैसे काली मुर्गी ओर श्वेत मुर्गेसे उत्पन्न
चार बच्चोंमें एक काला और एक श्वेत होता है, बाकी दो मिश्रित होते हैं। दूसरी
पीढ़ीमें सोलह बच्चोंमें एक श्वेत, एक काला और चोदह मिश्र रगके तथा तीसरी
पीढ़ीमें चौंसठमें एक काला, एक श्वेत, बाकी सब मिश्र रगके होते हैं। इस तरह
मिश्र जातिमें भी शुद्ध विशेषताएँ आ जाती हैं। वैसे ही मनुष्योंमें भी पश्चिमी श्वेत

३२२ मार्क्सवाद और रामराज्य
और पीत मंगोलका मिश्रण होनेपर उनसे कुछ पश्चिमीय रूप-रंगके और कुछ
मंगोल रूप-रंगके होते हैं। परंतु अधिकांश पारसी, ईरानी ढंगके होते हैं। इसी
दृष्टिसे निश्चित किया जा सकता है कि पारसी जाति इन्ही दोनोंका मिश्रण है। यही
स्थिति उत्तर भारतकी उच्च जातियोंमें भी है। वहाँ मिश्रण स्पष्ट है। परंतु ऐसा
कहना ठीक नहीं है। जैसे मुर्गोंमें यह देखा जाता है, वैसे ही अन्य जातियोंमे
इसका व्यभिचार भी देखा जाता है। 'कलमी आमोंमें कभी भी मूल आमके समान
फल नहीं होते। व्यक्तियोंके रूप, रंग, ऊँचाईमे एकता, शरीरके हर एक अङ्गमें
स्पष्टता शुद्ध जातिके चिह्न हैं,' यह कथन भी असङ्गत है। शुद्ध जातिका अर्थ
क्या है ? क्या सृष्टिकालसे प्रकट होनेवाली कोई आदिम जातिको शुद्ध जाति कहा
जाता है ? यदि हाँ, तो उपर्युक्त चिह्न उसीके हैं, इसमें क्या आधार है ? वानर
आदि जातियोंके अङ्गोकी अस्पष्टताके कारण क्या उन्हें अशुद्ध माना जाय ? फिर
शुद्ध बंदर कौन ? कोई जाति ही स्पष्ट अङ्गवालोकी होती है, कोई अस्पष्ट
अङ्गवाली होती है।
'पाँचवी, छठी, सातवीं पीढ़ीमें अशुद्ध संतानोमें फिर शुद्धता आ जाती है,'
इसका ठीक अर्थ न समझकर विद्वान् लेखकने व्यर्थ ही क्षत्रिय, वैश्य, शूद्रके रक्तका
हिसाब-किताब लगा डाला है। 'पाँचवी पीढ़ीमें अशुद्ध संतान शुद्ध हो जाती है,'
इसका अभिप्राय यह नहीं है कि किसी तरहसे भी अशुद्ध संतानसे पाँचवीं पीढ़ीकी
संतान शुद्ध हो जाती है। उसका अभिप्राय है कि शूद्रकन्याका ब्राह्मणके साथ विवाह हो
और फिर उससे कन्या ही हो, उसका विवाह फिर ब्राह्मणसे ही हो, उससे फिर
कन्या हो और उसका फिर ब्राह्मणसे ही विवाह हो । इस परम्परासे सातवीं पीढ़ीमें
उत्पन्न कन्या ब्राह्मणी होगी । शूद्रकन्यामें ब्राह्मणसे उत्पन्न कन्यापरम्परासे ही
सातवीं पीढ़ीमें जातिका उत्कर्ष होगा, परंतु शूद्रपुत्रकी परम्परामें उत्कर्ष नहीं हो
सकेगा, बल्कि शूद्र यदि उत्कृष्ट वर्णकी कन्यासे उद्वाह करे तो उसका पतन हो
सकता है। 'अतः हर तरहसे निकृष्ट संतान भी उत्कृष्ट जातिको प्राप्त हो जाती है,'
ऐसा नहीं कहा जा सकता। 'रक्तमिश्रणसे भी जातिमे भेद नही होता,' यह बात नहीं
है। प्राचीन कालमें स्त्रियाँ बिल्कुल शुद्ध थी, यह तो कोई भी नही कहता, किंतु
जो अशुद्ध थीं, उनसे उत्पन्न संतान अनुलोम, प्रतिलोम सङ्कर कोटिमें गिनी गयीं,
जो आज भी अनेक उपजातियोके रूपमें प्रत्यक्ष हैं। शुद्ध जातियोंमें वे मिलायी नहीं
गयीं, यही वैदिकोंका कहना है। स्त्रियोंकी शुद्धिपर विश्वास न होनेका कारण भिन्न-
भिन्न देशोंका वर्तमान वातावरण ही है। अब भी देखा जाता है कि माता, पिता,
भ्राताके पूर्ण नियन्त्रणमें कन्या रहती है। वह नौ-दस वर्षकी अवस्थामें ब्याही जाती
है। श्वशुरकुलमें जाते ही पर्देमें रहती है। ज्येष्ठ, श्वशुरतकसे भी नही बोलती,
घरके भीतर सदा घूँघटकी आटमें रहती है। जहाँ घूँघटकी प्रथा नही है, वहाँ

भी दृष्टिसवरणरूप पर्दा है ही। बिना कुटुम्बियोंके अकेले उसका कहीं जाना-आना
सम्भव ही नहीं, किसी बाहरी व्यक्तिसे बोलनातक जब असम्भव है, तब स्वतन्त्र
मिलनेकी तो बात ही क्या ? ऐसी दशामें कुटुम्बमें कहीं व्यभिचार भले ही हो जाय,
परन्तु परजातिके साथ सम्बन्ध तो असम्भव ही है। रजस्वला होनेपर स्त्रीके मनमें
विकार आनेपर किसीपर मन जा सकता है। इसीलिये रजस्वला होनेके पहले ही
विवाह करनेका नियम है। पातिव्रतधर्म, वैधव्य-पालन, सतीधर्म आदिके प्रचारपर
जिनकी दृष्टि है, जो आज भी एक-एक गाँवमें सैकड़ों निर्दोष कुलोंको देख रहे
हैं, उन्हे स्त्रियो, विशेषतः प्राचीन कुलाङ्गनाओंकी शुद्धिपर अविश्वासका कोई
कारण नहीं। जहाँ कहीं कुछ भी गड़बड़ीका संदेह हो, वहाँ उनकी संतानोंको पृथक्
करनेका आशय यही था कि जातिकी शुद्धता बनी रहे । सारांश यह है कि
रूप, रंग, रक्त, वीर्य आदि सभीका परिवर्तन देश, काल, जल, वायु, प्रारब्ध एवं
अन्यान्य आगन्तुक दोषों और गुणोंसे हो जाता है। इतनेहीसे जाति-भेद निराधार
और निरर्थक नहीं सिद्ध होता। जैसे काली, श्वेत मृगीमें भी जाति वही रहती है।
नील, श्वेत, लाल, सब रंगकी गायोंमें 'गोत्व' और पूज्यत्व रहता ही है, वैसे
ही पजावी, मैथिल, वगाली, द्रविड़ ब्राह्मणोंके रूप-रंगमें भेद होनेपर भी ब्राह्मणत्व
समान ही रहता है। 'इनमें कौन शुद्ध है, कौन नहीं,' इसका निर्णायक प्रमाण
लेखकके साथ क्या है ? पजावियों, वगालियों, युक्तप्रान्तियो, मैथिलो सभीके आकार-
मे स्पष्टता है। फिर भी कुछ भेद केवल देश, जल, वायुका ही है। अतएव उन-
उन देशोंके ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्रतकके आकार-प्रकार, भाषामें एक खास
समानता होते हुए भी जातिमें भेद है। वगाली, मैथिल, दक्षिणी ब्राह्मणके गोत्र,
शाखा, सूत्र समान हैं। एक ही देशके ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्यके रूप, रंग वोल-
चालमें समानता होनेपर भी गोत्र आदिमे भेद है।
कौन चीज बदल सकती है, कौन नहीं, इसका ज्ञान अनुमान और शास्त्रसे
सुगम है, पर शास्त्र-अनुमानशून्य केवल कल्पनाकी उड़ान करनेवालेको वह अवश्य
दुर्गम है। जब यह स्पष्ट है कि रूप-रंग, मोटापन दुबलापनकी तरह परिवर्तनशील
है, मनमें भी सत्त्व, रज, तमकी प्रबलता निर्बलता घट-बढ़ सकती है, तब स्पष्ट
ही है कि इनके बदलनेसे ब्राह्मणता आदिमे परिवर्तन नहीं होता।
कर्मविपाक और विकासवाद
जड़ प्रकृतिसे विश्वका विकास माननेपर ईश्वरवाद और कर्मवादसे विरोध
बतलाया जाता है। यह पक्ष उचित ही प्रतीत होता है कि जैसे बीज, धरणी, अनिल
और जलके संसर्गसे अपने-आप अंकुर, नाल, स्कन्ध, शाखा, उपशाखा, पत्र,
पुष्प, फलसमन्वित होता है, वैसे ही प्रकृति अपने आप ही महदादिक्रमेण समस्त
प्रपञ्चाकारेण परिणत होती है ! विद्युत्कणों या परमाणुओंसे बहुत-से सूर्यादि

ग्रह, फिर पृथ्वी और उसपर घास, फूल, वृक्ष, फिर मांसमय ग्रन्थियाँ, फिर
जलजन्तु, पक्षी, वानरादि क्रमसे मनुष्यका प्रादुर्भाव हुआ। परंतु ईश्वरवादी कहता
है कि जड प्रकृतिको जब कुछ ज्ञान ही नहीं, तब वह सुव्यवस्थित विचित्र विश्वका
निर्माण कैसे कर सकती है? अतः सर्वज्ञ ईश्वर मानना चाहिये। साथ ही विश्व
वैचित्र्यका निमित्त कर्मवैचित्र्य भी मानना पड़ेगा। वृक्ष, लता, पशु, पक्षी,
कीट, पतंग, देवता, दानव, मानव आदिकोंमे सुख-दुःखकी विचित्रताके लिये कर्मोंकी
विचित्रता मानना ही चाहिये। कर्मोंको बिना माने वस्तुओंका सौष्ठव, असौष्ठव,
भोग-सामग्रीकी बहुलता-हीनता आदि कैसे सिद्ध हो सकते हैं? जडवादी सब
कुछ 'प्रकृतिके स्वभाव' से ही मान लेता है; परंतु ईश्वरवादी, धर्मवादी इसे
अनुचित मानते हैं।
विचार करनेसे ईश्वरवादीके कर्मानुसार व्यवस्थामें भी दोष प्रतिभासित
होते हैं। ईश्वरवादी कर्मके अनुसार समस्त व्यवस्थाका उपपादन करते हैं।
परंतु कर्म यदि समस्त जन्तुओंको कर्मोंका फल माना जाय तो अनन्त तृण,
वीरुध, वृक्ष, ज्ञानशून्य प्राणियोंको कर्मका ज्ञान ही नहीं है, फिर उनके किन
कर्मोंके अनुसार उनका अग्रिम जन्मादि माना जायगा? साथ ही पशु-पक्षियों,
कीट-पतंगोंको धर्माधर्मका ज्ञान ही नहीं, फिर वे कैसे धर्मका अनुष्ठान और
अधर्मका परिवर्जन कर सकते हैं? इसके सिवा सर्प, व्याघ्रादि कितने ही
स्वभावानुसारी प्राणियोंसे तो पाप ही अधिक बनता है, फिर तो उनके उद्धारका
समय ही न आयेगा। पापकर्मसे अधम योनियाँ, अधम योनियोंसे पुनरपि पाप
होता ही जायगा। परंतु कहा जाता है कि कर्मका अधिकारी केवल मनुष्य ही है
और सब भोगयोनि हैं। मनुष्यशरीरसे ही प्राणी कर्म करके अनेक योनियोंमें
कर्मफलोंको भोगता है। अधम कर्मोंसे अधम योनियोंमें, उत्तम कर्मोंसे देवादि
उत्तम योनियोंमें फिर भोगा जाता है। इस कथनके अनुसार यह भी मालूम पड़ता
है कि देवता, असुर, राक्षसादिकोंके लिये भी विधि-निषेध नहीं है। वे भी भोग-
योनियाँ ही हैं। यहाँतक कि भारतवर्षके ही मनुष्य कर्मके अधिकारी हैं, अतएव
उन्हींमें वर्णाश्रमानुसार कर्म एव तद्बोधक वेदादि शास्त्र हैं। तद्भिन्न अष्ट वर्ष,
जम्बूद्वीपके और समस्त छः द्वीप तथा त्रयोदश भुवनके सभी प्राण केवल कर्मोंके
फल ही भोगते हैं। वे कर्मके अधिकारी नहीं, इसलिये विधि-निषेधके भी
अधिकारी नहीं हैं। शास्त्रोंसे यह भी प्रमाणित होता है कि इन्द्रादि देवताओं,
असुरो एव राक्षसोमे भी पुण्य-पाप कुछ माना जाता था, अतएव यज्ञादिकोंका
अनुष्ठान उनमें भी सुना जाता है। और नहीं तो कुछ माता, दुहिता आदिकोंका
सम्भोग आदि पाप और उपासना ज्ञानादि पुण्य तो माने ही जाते थे। इसी
तरह सुग्रीव-बालि-जैसे वानरों, जटायु-सम्पाति-जैसे गृध्रादि, गरुड़ादि पक्षियोंमें

भी पुण्य पापकी भावना सुनी जाती है। फिर भी प्रधान सिद्धान्त यही है कि
भारतीय मनुष्य ही कर्माधिकारी हैं, अतएव यहींसे भोग, मोक्ष सब कुछ सिद्ध
होता है और यहींके समस्त कर्मठ कर्मफलभोगार्थ भिन्न योनियोंमें जाते हैं।
कुछको ईश्वरीय सृष्टिके मूल कर्मको माननेवालोंके इस सिद्धान्तपर भी संशय
होता है कि “कथञ्चित् उत्तरकुरु-जैसे देशोंके दिव्य मनुष्योंको भले ही भोगयोनि
मान लें, पर भारतके बाहर रहनेवाले मनुष्योंको कर्माधिकारी क्यों नहीं माना गया ?
कहा जा सकता है कि स्वर्गियोंके समान वे भी कर्मफलोंके भोगार्थ हैं। यदि सर्वत्र
कर्म-परम्परा मानते जायेंगे, तब तो फिर कर्मोंकी समाप्ति ही न होगी, अतः कहीं
कर्मभोग ही मानकर कर्म न माननेसे भोगद्वारा कर्मोंकी समाप्ति सम्भव है ।
परंतु आजके यूरोपीय, अमरीकन, रूसी, चीनी, अफ्रीकन आदि मनुष्योंमें तो
भारतीयोंसे कुछ भी भेद नहीं है, फिर उन्हें कर्मका अधिकारी क्यों न माना जाय
और वहाँ ईश्वरीय वेदादि शास्त्रोंका प्रचार क्यों नहीं हुआ ? यदि कथञ्चित् यह
सिद्ध किया जाय कि 'वर्तमान उपलब्ध समस्त पृथ्वी भारतवर्ष ही है, अतएव
उपर्युक्त सभी कर्मके अधिकारी हैं, इनमें सर्वत्र वेदका प्रचार भी था, प्रमादवश
ही लोग अवैदिक हो गये। ब्राह्मणोंका सम्बन्ध टूटनेसे भक्ष्याभक्ष्यादिके नियम
टूट गये, इसीलिये अब भी मानवधर्म, सामान्यधर्म, अहिंसा, सत्यादि नियमों,
ईश्वरोपासनादि नियमोंके मनुष्यमात्र अधिकारी हैं,' तो भी यह प्रश्न होगा
कि कितनी ही जंगली, हब्शी आदि अनेक मनुष्य जातियाँ हैं, जिनमें मालूम
पड़ता है, कभी भी धर्म-कर्मकी भावना ही नहीं थी। उन्हें पुण्य-पाप होता है या
नहीं ? यदि नहीं होता, तो क्यों ? यदि 'अज्ञानी होनेसे,' तब तो किसी अंशमें
ज्ञानी होना भी अपराध कहा जा सकता है । ज्ञानी होनेसे पुण्यके अनुष्ठानसे
स्वर्गादि सुख प्राप्त करना तो अच्छा है, परंतु ज्ञानी होकर पापकर्म करके नरकादि
महान् कष्टोंको भोगना तो अनिष्ट ही है। यदि अज्ञानी होनेसे ही वनमानुषादि
अनेक जंगली मनुष्य हिंसादि पापोंका फल नहीं भोगते, तब तो हिंदुओंके पापियोंका
ज्ञान ही अपराध हुआ । यदि ज्ञान न हो, तो वे भी पापफलसे मुक्त हो
जायेंगे, इसलिये पापफलसे डरनेवालोंको चाहिये कि वे अपने बच्चोंको ज्ञानी न
होने दें । इसके अतिरिक्त, एक ब्राह्मण बालक ज्ञानी होनेके लिये वेदादि शास्त्रों-
का अध्ययन न करे, तो यह भी पाप ही समझा जाता है। इस तरह जगलियोंका
भी ज्ञानके लिये प्रयत्न न करना भी पाप ही समझा जाना चाहिये । फिर जैसे
राजकीय कानूनमें अपराधका फल भोगना ही पड़ता है, 'मैं नहीं जानता था';
मा० रा० १५-

२. द्वितीय खण्ड: ऐतिहासिक भौतिकवाद, वर्ग-संघर्ष एवं आर्थिक नियतिवाद का खण्डन

२२६ मार्क्सवाद और रामराज्य
यह कहनेसे काम नहीं चल सकता, जैसे विष जाने, बिना जाने अपना फल देता
ही है, वैसे ही यदि धर्माधर्म कोई वस्तु हैं, तो वे जाने, बिना जाने अपना फल देंगे।
"कहा जा सकता है कि विज्ञान भी एक तरहका कर्म ही है, अतः इसका
होना, न होना भी फलोंमें विशेषता सम्पादन करता है। जैसे हथकड़ी-बेड़ीसे जिस
व्यक्तिके हस्त-पादादि जकड़े हैं, जो असमर्थ है, उसके लिये करने, न करनेका
विधि-निषेध नहीं हो सकता । समर्थके प्रति ही विधि-निषेध होते हैं, अतः जिनमें
जो सामर्थ्य है ही नहीं—(जैसे पशुओंमें किसी ग्रन्थ पढ़नेकी ) उन्हे उस सामर्थ्यके
सम्पादनका विधान भी नहीं किया जा सकता । अतएव उस विधानके पालन
न करनेसे वे अपराधी भी नहीं माने जा सकते । ऐसी स्थितिमें यह आया कि
भगवान्‌ने जिनको कर्म करनेके देश-कालमें और कर्म करने एवं तदुपयोगी ज्ञान-
सम्पादनमें योग्य—समर्थ बनाया, यदि वे विधि-निषेधका उल्लङ्घन करते हैं
तो वे ही अपराधी माने जाते हैं ।' परंतु इससे यह भी सिद्ध होगा कि जो लोग
भारतमें भी आर्यों या अन्य धर्मानुयायियोंमें हैं, उन्हे भी ज्ञान-सम्पादनकी सामग्री
न मिली, उचित माता-पिता, उचित संग-सहवास न प्राप्त हुआ; अतएव जिज्ञासा ही
न हुई । फिर उनके ज्ञान न सम्पादन करनेमें उनका कोई दोष न होना चाहिये।
साथ ही उनको पापादिका फल भी न भोगना चाहिये । इसी तरह जंगलियोंमें भी
मनुष्य होनेके कारण यद्यपि ज्ञान-सामर्थ्य है, तथापि संग-सहवास आदि ज्ञानकी
सामग्री नहीं है अथवा वेदोक्त धर्म, कर्म, ज्ञानके विपरीत ही सामग्री है। तब
शुद्ध ज्ञानके न सम्पादन करनेमे उनका क्या दोष है ? फिर यदि वे वेदके
विपरीत वेदोंसे निषिद्ध समस्त पातकोंको करे, तो उनका क्या दोष और उनको
नरकादि दुःख क्यो होगा ? यदि भावना न होनेसे उनके वेद-निषिद्ध आचरणसे
भी कोई दोष न माना जाय, तब तो यह मानना पड़ेगा कि भावना ही धर्मा-
धर्म है, उससे भिन्न कोई धर्माधर्म नामकी वस्तु नहीं है। फिर तो यह भी मानना
पड़ेगा कि वैदिक धर्म भी किसीकी दृष्टिसे पुण्य, किसीकी दृष्टिसे पाप होगा ।
उस दशामें धर्मका कोई निश्चित स्वरूप तथा निश्चित फल न रहा और फिर पशुओ,
पक्षियोंके समान ही पर-स्त्री-गमनादिमे या तो मनुष्योंको भी पापादि न होगा या
तो पक्षी-पशु आदिकोंको भी होगा ही, क्योकि कोई-न-कोई भावना सर्वत्र ही है।
"इसके सिवा भारतीयो या मनुष्यमात्रको भी यदि कर्मयोनि मान लें, तो
भी कर्मकी व्यवस्था नहीं बैठती; क्योकि मनुष्योंकी संख्या प्रतिपरार्ध एक भी
नहीं है । फिर इतने मनुष्य कब हुए जो मनुष्य-शरीरमें कर्म करके उनका फल
भोगनेके लिये पशु, पक्षी, कीट, पतंग और तृण-वीरुधोंमें गये ? जब मनुष्य
उत्पन्न हुए ही नहीं थे, तभी पहलेसे असंख्य तृण, वीरुध, वृक्ष पृथ्वीपर हैं,

वे भी जीव ही हैं। यदि वे कर्मफल भोग रहे हैं और कर्मयोनि मनुष्य ही है,
तो वे कभी मनुष्य रहे होंगे, यह भी मानना पड़ेगा। परंतु कभी भी इतने मनुष्य
रहे होंगे, यह कल्पना भी नहीं हो सकती। समुद्रोंमें अपरिगणित जातिके कीट,
टिड्डी, पिपीलिका, पतंग ऐसे अचिन्त्य जीव हैं, जिनकी संख्याका कभी भी पता नहीं
लग सकता। यह सब कभी मनुष्य रहे होंगे, यह कल्पना नहीं हो सकती।
यदि कहा जाय कि 'अनादि सृष्टिमें कभी-न-कभी वे सब मनुष्य रहे होंगे', तो यह भी
ठीक नही, क्योकि जब मनुष्य रहे, तब तृणादि तो अवश्य ही रहे होगे। कम-
से कम भोजनके लिये अन्न रहे होगे। अन्नकी भी सम्पूर्ण ओषधियाँ जीव ही
हैं। वे भी कर्मफल ही भोग रहे हैं। फिर कभी भी जन्तु न रहे हों, यह नहीं कहा
जा सकता। वैज्ञानिक लोग जलोंमें भी अपरिगणित कीटोंको दिखलाते हैं, प्राणियों-
के रूपोंको भी कीटमय ही बतलाया जाता है। फिर वे सब जीव, मनुष्य जब कभी
भी रहा होगा, तब भी अवश्य ही रहे होगे। ऐसी स्थितिमें उन सबका कभी
मनुष्य होना कैसे सम्भावित हो सकता है? हाँ यदि कतिपय कल्प या कतिपय
ब्रह्माण्ड ऐसे माने जायें, जहाँ केवल मनुष्य ही असंख्येय मात्रामें हों और कोई
भी जन्तु या तृणादि वहाँ न हों और वे ही जीव वर्तमान उपलब्ध संसारोंमें तृण,
कीटादि रूपमें भोग भोग रहे हैं, तब कुछ समाधान हो सकता है। परंतु इसमें कोई
प्रमाण भी तो होना चाहिये। उनके खानेकी चीज क्या थी? तृण, जल, अन्न
बिना वे रहते थे, रक्तादि उनके देहमें नहीं थे, कीटोका भी संसर्ग नहीं था, फिर
भी वे पाप करते थे, जिससे यहाँके तृणादि हुए। उस ब्रह्माण्डको इतना बड़ा
मानना होगा कि इस ब्रह्माण्डके परमाणु प्रदेशपर भी मरे हुए जीव वहाँ मनुष्य बन-
कर पाप करें। फिर जब उनको खाना नहीं, रक्त-वीर्य न होनेसे व्यभिचार नहीं,
तब पाप ही कैसे और कौन करेंगे? यह सब यदि दृढ़तर प्रमाणसे प्रमाणित हो,
तभी कर्मकी व्यवस्था हो सकती है, परंतु कोई भी ऐसा प्रमाण नहीं मिलता।
"कुछ लोग कहते हैं कि 'ज्ञानवान् और समर्थ होनेपर ही जीव कर्ममें स्वतन्त्र
होते हैं, इसके पहले वे प्राकृतिक कर्मप्रवाहमें ही बहते रहते हैं। अर्थात् प्रकृति
स्वभावसे तमोगुणप्रधाना होकर जिस समय जड राज्यकी ओर प्रवाहित होती
है, उस समय प्रायः तदन्तःपाती सभी जीव जडताको प्राप्त हो जाते हैं। फिर स्वभावसे
ही वही प्रकृति जब रजोगुणक्रमेण सत्त्वगुणकी ओर प्रवाहित होती है, तब स्वभावसे
ही जडता मिटती जाती है, चेतनता विकसित होती जाती है। फिर मनुष्य
होनेपर जीव स्वतन्त्र कर्म करके उन्नति या अवनतिकी ओर जा सकता है,
अन्यथा प्रकृति-प्रवाहके अनुसार ही उसकी देवादिपर्यन्त उन्नति होती है, क्रिया-
ज्ञानशक्तिका विकास चलता है, फिर स्वभावसे ही तमोगुणकी ओर प्रवाह बदलने-
से स्थावरान्ता अधोगति होती है। जैसे असमर्थ शिशुका समस्त कार्य माता करती

२२८ मार्क्सवाद और रामराज्य
है, वैसे ही जीवोंका समस्त कार्य माया ही करती है।”
परंतु यह पक्ष भी संगत नहीं जँचता, क्योंकि एक तो विकासवादसे भिन्न
यह कोई पक्ष ही नहीं है, दूसरे यदि हरएक कर्मोंका भी मूल कर्म ही है, तो
प्रकृतिका परिणाम भी किंमूलक है ? प्रकृतिकी साम्यावस्था और वैषम्यावस्था क्यों होती
है ? क्यों जडराज्यकी ओर उसका प्रवाह होता है ? क्यों चैतन्यराज्यकी ओर परिणाम
होता है ? यदि इन सबका मूल कर्म माने, तो वह किसका ? चेतनोंका या अचेतनोंका ?
यदि चेतन-सम्बन्ध-शून्य जड़ोंका ही कर्म कहा जाय, तो उसका फल भी उसीको
होना चाहिये, चेतन उसका फलभागी क्यों होगा ? यदि इतना महत्त्वपूर्ण कर्म
बिना कर्मसे ही हुआ, तो और भी अपेक्षित शय्या, प्रासादादि भी कर्मके बिना ही
सम्पन्न हो सकेंगे। फिर उनमें कर्मकी क्या अपेक्षा और फिर ईश्वर कर्म-सापेक्ष ही
प्राणियोंको भिन्न-भिन्न कर्मोंमें प्रवृत्त करता है, इसका क्या अर्थ है ?
'एष एव साधुकर्म कारयति यमेभ्योऽधो निनीषते', ( कौषी० उप० )
'वैषम्यनैर्घृण्ये न सापेक्षत्वात्।' ( ब्रह्मसूत्र २ । १ । ३४ )
इत्यादि श्रुति-स्मृतियोंका क्या अर्थ है ? फिर तो वह विकासवाद ही उचित
प्रतीत होता है, जिसमें स्वतन्त्र प्रकृतिसे ही विलक्षण प्रकारके पदार्थोंका विकास
होता है।
प्रकृति या परमाणु आदिकोंसे निर्मित ही किसी विलक्षण प्रपञ्चका प्रादुर्भाव
होना भी युक्तिसंगत प्रतीत नहीं होता। जब कोई भी लौकिक शय्या, प्रासाद, यन्त्र,
यानादि बिना ज्ञानेच्छाप्रयत्नसम्पन्न चेतनके नहीं बन सकते, तब मन, बुद्धि, इन्द्रिय,
मस्तिष्कादिसहित शरीर एव अनेक विचित्र सुख-दुःख सामग्रियाँ जीवको यो ही
प्राप्त हो गयीं, यह कैसे कहा जा सकता है ? फिर यदि चेतन जीव देहादिसे भिन्न
नित्य है, तो यह जिज्ञासा बनी ही रहेगी कि आखिर उसे शुभाशुभ शरीरोंकी
प्राप्तिमें क्या निमित्त है ? अतः 'अकृताभ्यागम, कृतविप्रणाशादि' अनेक दोषोंके
वारणार्थ देहादिसे भिन्न, नित्य, चेतन जीव और उसके विचित्र सुख-दुःख, तत्सामग्री
आदिकी प्राप्तिके अनुकूल शुभाशुभ कर्म मानना ही चाहिये। देह, इन्द्रिय, मन,
बुद्धि आदिकी चेष्टाओंकी विचित्रतासे लोकमें भी फलकी विचित्रता दृष्ट है। आयुर्वेद,
शिल्प, विज्ञान, संग्रामादि लौकिक स्थलोंमें कर्मकी विचित्रतासे फलकी विचित्रता
सम्प्रतिपन्न है। अतः सम्पूर्ण विश्व-वैचित्र्यका मूल भी कर्मवैचित्र्य ही होगा, यह
बात सरलतासे समझमें आ सकती है। जिन विचित्र कार्योंका हेतुभूत विचित्र कर्म
दृष्ट नहीं है, वहाँ भी अनुमान करना चाहिये । तथा च समष्टि-व्यष्टि विश्वकी
विचित्रताका मूल समष्टि-व्यष्टि प्राणियोंके विचित्र कर्म ही हैं। किस विचित्र कार्यका

हेतु कौन विचित्र कर्म है, यह जाननेके लिये जहाँ प्रत्यक्ष, अनुमान प्रमाण मिलते
हों, वहाँ प्रत्यक्षानुमानसे मानना चाहिये । जहाँ प्रत्यक्षादि प्रमाण न मिलते हों, वहाँ
शास्त्रसे जानना चाहिये । देखते ही हैं कि जिन बहुतसे कार्यकारणभावका निर्णय
प्राणियोंकी अल्पज्ञ बुद्धि नहीं निर्धारण कर सकती, उनका निर्णय योगियों, महर्षियोंकी
बुद्धिसे होता है । कोई भी प्राणी आयुर्वेदोक्त ओषधियोंके गुण-दोषोंका अन्वय-
व्यतिरेकादि युक्तियोंसे अनुभव करके सहस्रों जन्मोंमें निर्णय नहीं कर सकता, फिर
उन अपरिगणित ओषधियों और उनके अपरिगणित सम्प्रयोग-विप्रयोगसे व्यक्त होने-
वाले अपरिगणित गुण-दोषोंका निर्णय कौन कर सकता है ? फिर भी उनका प्रत्यक्ष
फल देखकर उनके निर्धारयिताओंकी धर्मयोगादिजन्य विशेषता माननी पड़ती है ।
यही स्थिति मन्त्रोंकी भी है । विभिन्न वर्णोंकी पौर्वापर्यरूप विचित्र आनुपूर्वीका
विचित्र सामर्थ्य प्रत्यक्ष दिखायी देता है । मन्त्र एवं आयुर्वेदादि शास्त्रोंकी सत्यता
देखकर उनके निर्माताओंकी विशेषता विदित होती है । फिर आयुर्वेदादि निर्माताओं-
द्वारा वेदादि धर्मशास्त्रोंकी महिमा सुनकर वेदोंकी ईश्वरीयता या अपौरुषेयता विदित
होती है और उन्हींके द्वारा देहादिसे भिन्न आत्मा, जगदुत्पत्ति, जगत्का वैचित्र्य
तथा उसके मूल धर्माधर्मका परिज्ञान होता है । किन कर्मोंसे क्या सुख दुःख एवं
तत्सामग्री आदि फल प्राप्त होता है, कौन योनि किन भावना और कर्मोंसे प्राप्त
होती है, यह सब शास्त्रोंसे ही मालूम पड़ता है ।
कुछ कर्म ऐसे हैं जिनकी समाप्ति फल प्राप्त कराकर ही होती है—जैसे गमन,
भोजनादि । कुछ कर्म अपना फल कालान्तरमें देते हैं, जैसे क्षेत्रमें बीज बोना आदि ।
कुछ वस्तुओंका खाना, छूना आदि भी शनैः-शनैः कालान्तरमें ही फल देता है ।
इसी तरह किन्हीं कर्मोंका फल कर्मकी ही महिमासे दृष्टानुसार होता है । उदाहरणार्थ
आयुर्वेदिक, होमियोपैथिक आदि औषधोंका । जैसे कुछ सेवादि कर्म स्वामी आदिकी
प्रसन्नता सम्पादनादिद्वारा फलपर्यवसायी होते हैं, वैसे ही कुछ कर्म इसी देहमें
फल देते हैं, कुछ परलोकमें दूसरे देहद्वारा फल देते हैं । समष्टि-व्यष्टि जगत्के
धारण-पोषण एव लौकिक-पारलौकिक उत्थानके अनुकूल देहेन्द्रियमनोबुद्धि
आदिकोकी ईश्वरीय शास्त्रादिष्ट हलचल ही धर्म है । विपरीत कर्म अधर्म है । उन
सबको जानकर यथावत् फलप्रदान करनेके लिये ही सर्वत्र सर्वशक्तिमान् परमेश्वर
भी मान्य होता है । फिर भी असमर्थके लिये विधि-निषेध नहीं हो सकता, अतएव
अन्ध, वधिर, उन्मत्त मनुष्य या विवेकशून्य अन्य प्राणियोंके लिये विधि निषेध
सम्भव नहीं है । केवल उनके स्वाभाविक कर्मोंके ही जो सुपरिणाम, दुष्परिणाम
होते हैं, वही हो सकते हैं, किंतु मनुष्योंके लिये शास्त्रोक्त कर्म हैं ही । विशेष
सस्कारसे जिन सुग्रीव, वालि-जैसे वानरों और जटायु, सम्पाति जैसे गृध्रों या
अन्यान्य खगों, मृगोंको, जिनको धर्माधर्म और अधिकारका ज्ञान है, उन्हें अधि-
कारानुसार उन कर्मोंका अनुष्ठान करनेसे पुण्य-पाप होता है । देवता, असुर, नाग,