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मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished866 पृष्ठ

पृष्ठ 225, कुल 866 में से

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पृष्ठ 225

२१० मार्क्सवाद और रामराज्य
डेविसका 'हार्मोनिया' में कहना है कि 'भाषाके मुख्य उद्देश्यमें विकास
होना सम्भव नहीं है, क्योकि उद्देश्य सर्वदेशी एवं पूर्ण होता है। उसमें किसी
प्रकारका परिवर्तन सम्भव नहीं है।' मैक्समूलरके मतानुसार 'सभी भाषाएँ मूलमें
एक ही थीं। मनुष्यकी असावधानीसे ही उनमें बिगाड हुआ।' इससे विकासके विपरीत
ह्रास प्रतीत होता है। डा० पाटके अनुसार 'भाषाके मूल स्वरूपमे परिवर्तन नही
हो सकता, केवल कुछ बाह्य परिवर्तन ही होते हैं। पिछली जातिने एक भी नया धातु
नहीं बनाया। ज्ञान, अज्ञानका ज्वारभाटा सदासे ही आता रहता है। जो जातियों
कभी जंगली थी, वही कभी ज्ञान-विज्ञानयुक्त हो जाती हैं और ज्ञान-विज्ञानयुक्त
जातियाँ कभी अज्ञानसे जगली बन जाती है।' पीछे यह भी कहा गया है कि
'द्रविड़ भाषाका आस्ट्रेलियान आदि अनेक भाषाओंसे सम्बन्ध प्रतीत होता है और
केम्बल्स् द्रविड़, तेलगू आदि भाषाओंका वैदिक भाषासे ही निकलना मानता है।
इनके सैकड़ों शब्द अबतक एक ही समान पाये जाते हैं। इन भाषाओकी तुल्यता
मिलती है। संस्कृतमें अम्ब, सीरियनमें आमो, द्रविड़में अम्मा, सामोपे डिकमें अम्म,
सीथियनमें अम्माल, अरबीमे उम्म, मलयालीमें अम, तुलूमें अप्पा और चीनीमें
मॉ इत्यादि । जैसे सस्कृत, जेन्द और लैटिन भाषाओंमें लिङ्ग एवं वचन तीन तीन
होते हैं, वैसे ही सेमेटिक, अरबी और हिब्रू भाषामें भी लिङ्ग, वचन तीन-तीन
होते हैं। पुँल्लिङ्गसे स्त्रीलिङ्ग बनानेका ढग वही है। जैसे रामका रामा, वैसे ही साहबको
साहिबा और मलकको मलिका बनाकर पुँल्लिङ्गसे स्त्रीलिङ्ग किया जाता है। पुराने
भेदके अन्तर्गत यूरल, अल्ताइक, तुंगसिक, मंगोलिक, तुर्की और तिलगू आदि
भाषाएँ आती हैं। इनमें एक शाखा सामोपेडिक है, जो चीनकी पैतिसी तथा
साइबेरियाकी ओवि नदीके किनारे विस्तृत रूपसे बोली जाती है। इस भाषामे
सस्कृतकी भाँति तीन वचन और आठ विभक्तियाँ होती हैं।
अनादिसिद्ध शुद्ध शब्दोंके उच्चारणमें शिक्षाकी कमीके कारण गड़बड़ी होती
है। उच्चारणमें व्यत्यास हो जानेसे शुद्ध शब्द अपभ्रष्ट हो जाते हैं। जैसे असुर
लोग 'हे आर्य !' के स्थानमें 'हेलय' उच्चारण करने लगे। आज भी इसी कारण सूक्ष्मको
'छुच्छम' और 'टिकिट'को 'टिकस' उच्चारण करते हैं। लिपिके अक्षरोंमें कमीके कारण
अरबीमे 'चरक'को 'सरक', 'कोटपाल'को 'कोतवाल' कहा जाता है। तीन वचन-
वाली संस्कृत भाषासे उत्पन्न हिंदी, मराठी, गुजराती, बगाली आदि भाषाओंमें
दो ही वचन होते हैं, तीन नही । इसी प्रकार जेन्द भाषामें तीन वचन हैं, उससे
उत्पन्न फारसी, पश्तो, उर्दू आदि भाषाओंमे दो ही वचन हैं। लैटिनमे तीन
वचन होते हैं, उससे उत्पन्न भाषाओंमें दो ही वचन होते हैं। इसी तरह हिंदीमे
नपुंसक लिङ्गका प्रयोग लुप्त हो गया । गुप्त कामोके लिये इसी तरह अपभ्रष्ट करके
कुछ संकेतमयी भाषाएँ बना ली जाती हैं। क्लिष्ट और विस्तृत संस्कृत भाषासे ही