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मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished866 पृष्ठ

पृष्ठ 244, कुल 866 में से

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पृष्ठ 244

हेतु कौन विचित्र कर्म है, यह जाननेके लिये जहाँ प्रत्यक्ष, अनुमान प्रमाण मिलते
हों, वहाँ प्रत्यक्षानुमानसे मानना चाहिये । जहाँ प्रत्यक्षादि प्रमाण न मिलते हों, वहाँ
शास्त्रसे जानना चाहिये । देखते ही हैं कि जिन बहुतसे कार्यकारणभावका निर्णय
प्राणियोंकी अल्पज्ञ बुद्धि नहीं निर्धारण कर सकती, उनका निर्णय योगियों, महर्षियोंकी
बुद्धिसे होता है । कोई भी प्राणी आयुर्वेदोक्त ओषधियोंके गुण-दोषोंका अन्वय-
व्यतिरेकादि युक्तियोंसे अनुभव करके सहस्रों जन्मोंमें निर्णय नहीं कर सकता, फिर
उन अपरिगणित ओषधियों और उनके अपरिगणित सम्प्रयोग-विप्रयोगसे व्यक्त होने-
वाले अपरिगणित गुण-दोषोंका निर्णय कौन कर सकता है ? फिर भी उनका प्रत्यक्ष
फल देखकर उनके निर्धारयिताओंकी धर्मयोगादिजन्य विशेषता माननी पड़ती है ।
यही स्थिति मन्त्रोंकी भी है । विभिन्न वर्णोंकी पौर्वापर्यरूप विचित्र आनुपूर्वीका
विचित्र सामर्थ्य प्रत्यक्ष दिखायी देता है । मन्त्र एवं आयुर्वेदादि शास्त्रोंकी सत्यता
देखकर उनके निर्माताओंकी विशेषता विदित होती है । फिर आयुर्वेदादि निर्माताओं-
द्वारा वेदादि धर्मशास्त्रोंकी महिमा सुनकर वेदोंकी ईश्वरीयता या अपौरुषेयता विदित
होती है और उन्हींके द्वारा देहादिसे भिन्न आत्मा, जगदुत्पत्ति, जगत्का वैचित्र्य
तथा उसके मूल धर्माधर्मका परिज्ञान होता है । किन कर्मोंसे क्या सुख दुःख एवं
तत्सामग्री आदि फल प्राप्त होता है, कौन योनि किन भावना और कर्मोंसे प्राप्त
होती है, यह सब शास्त्रोंसे ही मालूम पड़ता है ।
कुछ कर्म ऐसे हैं जिनकी समाप्ति फल प्राप्त कराकर ही होती है—जैसे गमन,
भोजनादि । कुछ कर्म अपना फल कालान्तरमें देते हैं, जैसे क्षेत्रमें बीज बोना आदि ।
कुछ वस्तुओंका खाना, छूना आदि भी शनैः-शनैः कालान्तरमें ही फल देता है ।
इसी तरह किन्हीं कर्मोंका फल कर्मकी ही महिमासे दृष्टानुसार होता है । उदाहरणार्थ
आयुर्वेदिक, होमियोपैथिक आदि औषधोंका । जैसे कुछ सेवादि कर्म स्वामी आदिकी
प्रसन्नता सम्पादनादिद्वारा फलपर्यवसायी होते हैं, वैसे ही कुछ कर्म इसी देहमें
फल देते हैं, कुछ परलोकमें दूसरे देहद्वारा फल देते हैं । समष्टि-व्यष्टि जगत्के
धारण-पोषण एव लौकिक-पारलौकिक उत्थानके अनुकूल देहेन्द्रियमनोबुद्धि
आदिकोकी ईश्वरीय शास्त्रादिष्ट हलचल ही धर्म है । विपरीत कर्म अधर्म है । उन
सबको जानकर यथावत् फलप्रदान करनेके लिये ही सर्वत्र सर्वशक्तिमान् परमेश्वर
भी मान्य होता है । फिर भी असमर्थके लिये विधि-निषेध नहीं हो सकता, अतएव
अन्ध, वधिर, उन्मत्त मनुष्य या विवेकशून्य अन्य प्राणियोंके लिये विधि निषेध
सम्भव नहीं है । केवल उनके स्वाभाविक कर्मोंके ही जो सुपरिणाम, दुष्परिणाम
होते हैं, वही हो सकते हैं, किंतु मनुष्योंके लिये शास्त्रोक्त कर्म हैं ही । विशेष
सस्कारसे जिन सुग्रीव, वालि-जैसे वानरों और जटायु, सम्पाति जैसे गृध्रों या
अन्यान्य खगों, मृगोंको, जिनको धर्माधर्म और अधिकारका ज्ञान है, उन्हें अधि-
कारानुसार उन कर्मोंका अनुष्ठान करनेसे पुण्य-पाप होता है । देवता, असुर, नाग,