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मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished866 पृष्ठ

भोगवालोके ही सम्बन्धसे संतान उत्पन्न होती है और वश चलता है । अतएव
मास खानेवालो और घास खानेवालोके सम्बन्धसे भी वश नहीं चलता ।
प्रायः जाति, आयु, भोगके साथ ही प्रसवका सम्बन्ध रहता है। भोगोके
सम्बन्धमे परिस्थितिवादी कह सकता है कि 'अमुक जातिको जब जीनेके लिये
खुराक न मिली, तब वह मास खाने लगी।' परंतु प्रत्येक जातिकी नियत
आयुका क्या कारण है, यह विकासवादी नही बतला सकता । मनुष्य, बंदर,
गाय, बकरी, ऊँट, गधा और छोटे कीडोकी आयुका महान् अन्तर है । मनुष्य-
के समान ही उससे भी बलवान् पशुओकी सौ वर्षकी आयु क्यो नही, इसका
उत्तर भी विकासवादसे बाहर है । विकासवादके अनुसार पृष्ठवंशधारी प्राणियोमें
कच्छप एव सर्प भी सर्पणशीलोकी श्रेणीमें है । आयुष् शास्त्रियोके मतानुसार
कछुआ १५० वर्ष जीता है और सर्प १२० वर्ष जीता है। विकासवादके
अनुसार सर्पणशील प्राणी ही पक्षी बने हैं, परंतु पक्षियोमें कबूतर ८ ही वर्ष
जीता है। पक्षियोका विकास स्तनधारी प्राणी है, उनमें शशक ८ वर्ष, कुत्ता
१४ वर्ष, घोड़ा ३२ वर्ष, बंदर २१ और मनुष्य १०० वर्ष जीता है। यहाँ स्पष्ट ही
विकासमे आयुका ह्रास हो रहा है। दीर्घायु कच्छप एव सर्पको पराजित करनेवाला
कबूतर ८ ही वर्ष जीता है । इससे भी योग्य प्राणी शशक, कुत्ता, घोड़ा भी
क्रमशः ८, १४ और ३२ ही वर्ष जीते हैं। मनुष्योका जिसे पूर्वज कहा जाता
है, उस बदरकी आयु २१ वर्ष ही है । मनुष्य भी तो कच्छप एव सर्पसे कम
ही जीता है । विकासवादका कहना है कि 'जीवन सग्राममें योग्य ही रह जाता
है, उसीसे नवीन जातियोका प्रादुर्भाव होता है, परंतु जीनेके लिये संग्राम करके
विकसित होकर और योग्यता प्राप्त करके भी प्राणी उलटे मृत्युके अधिक निकट
पहुँच गये। जो पहिलेके और सरलरचनाके हैं, वे अधिक जीते हैं तथा जो
क्लिष्ट रचनाके हैं और बादके हैं, वे कम जीते हैं। यह क्या मशीनोका सुधार
है कि जो पहली १२० या १५० वर्षकी थी, वही सुधरी हुई मशीन ८ ही
वर्ष टिकने लगी । यह अच्छा यान्त्रिक विकास है ।
शतमायुर्मनुष्याणां गजानां परम स्मृतम् ।
चतुस्त्रिशत्तु वर्षाणामश्वस्यायुः परं स्मृतम् ॥
पञ्चविंशति वर्षाणि परमायुर्वृषोष्ट्रयोः ।
यह भी स्पष्ट है कि एक मिनटमें शशक ३८, कबूतर ३६, वानर ३२, कुत्ता
२९, बकरी २४, बिल्ली २५, घोड़ा १९, मनुष्य १३, हाथी १२, सर्प ८
और कछुआ ५ बार श्वास लेता है । यह भी विचारणीय है कि 'अभिनवतम मशीन
बन जानेपर पुरानी मशीनोका बनना बंद हो जाता है।' परंतु यहाँ तो मनुष्यके
विकसित हो जानेपर भी पुराने कीडे-मकोडोके बननेमे किञ्चिन्मात्र भी कमी नहीं

हुई । मनुष्योंसे करोड़ों गुने अधिक गिजाई, मच्छर, मकोड़े तथा जलजन्तु
हैं । सर्पणशील जन्तु तो पक्षी हो गये, परन्तु जोड़वाले कीड़ा, भौरों, ततैया,
मक्खी आदिके पंख किस तरह हो गये ? उड़नेवाली मछलियोंको पंख किस
तरह पैदा हो गये ? इनसे पक्षियोंके शरीरकी तुलना कैसे होगी ? कृमियों,
मछलियोंके साथ पक्षियोंका सम्बन्ध कैसे हुआ ? क्या कोई पक्षी इन पंखधारी
कीड़ों एवं मछलियोंसे वंश चलायेगा ? क्या बन्दर और मनुष्यसे वंश
स्थापित होगा ?
यह तो हो सकता है कि पहले सादी रचनावाले प्राणी बने हों और बादमें
क्लिष्ट रचनावाले प्राणी, किंतु सादी रचनावाले ही क्लिष्ट रचनावाले हो जाते हैं,
यह कहना निष्प्रमाण है । वैसे तो कीटावस्थामें भी उड़नेवाले कीड़ों और
मछलियोंकी पक्षियों-जैसी क्लिष्ट रचना देखी जाती है । कनखजूरे सरीखी क्लिष्ट
रचना साँपकी नहीं होती, तितलियोंकी-सी कारीगरी कौओंमें नहीं पायी जाती;
परन्तु विकासवादके अनुसार तितली और कनखजूरा कौवे तथा साँपसे पहले ही
उत्पन्न हो गये । ऐसी स्थितिमें सादी और क्लिष्ट रचनाका कुछ भी मूल्य नहीं
रहता । यदि विकासवाद तितलीकी रचनाको क्लिष्ट रचना न माने, केवल
अस्थिवाले प्राणियोंकी ही रचनाको क्लिष्ट रचना कहे तो यह भी निराधार है ।
देखनेमें तो अस्थिवाले प्राणियोंसे वृक्षोंकी ही रचना अधिक क्लिष्ट है । विचित्र
पत्रों, पुष्पों, स्तवकों, फलोंकी सुन्दरता, सरसता, मधुरता अस्थिवाले उष्ट्रमें
कहाँ है ? मनुष्यका शरीर भी वृक्षोंकी शाखाओं, उपशाखाओं, पल्लवों, पुष्पों,
फलोंकी विचित्रताके सामने नगण्य है । एक फूलके रंग, बनावट और
सुगंधके सामने मनुष्य-रचनाका कोई महत्त्व नहीं, परन्तु पशुओं,
पक्षियों-जैसी स्वतन्त्रता और मनुष्य-जैसा ज्ञान वृक्षोंमें नहीं है । इसीलिये वे
सादी रचनावाले समझे जा सकते हैं । कर्मानुसार प्राणी ही भोग्य और भोक्ता
होता है । सादी रचनावाले भोग्य और क्लिष्ट रचनावाले भोक्ता होते हैं । वनस्पति
यदि भागनेमें स्वतन्त्र हों तो पशु कैसे जी सकते हैं ? घोड़ा यदि मनुष्यसे
अधिक बुद्धिमान् हो तो वह सवारीके काम कैसे आ सकता है ? इस व्यवस्थाके
अनुसार पहले वनस्पति फिर पशु उत्पन्न होते हैं । पशुओंमें ही हाथीसे
लेकर कृमिपर्यन्त आ जाते हैं, अन्तमें मनुष्यकी उत्पत्ति हुई । यह सिद्धान्त
अति प्राचीन है और वेदों, उपनिषदों आदिद्वारा स्वीकृत है—भगवान्ने
अपनी अजा-मायाशक्तिके द्वारा विविध प्रकारके वृक्ष, सरीसृप, पशु, खग,
दंश, मत्स्य आदि शरीररूपी पुरोंको बनाया तो भी उनसे संतुष्ट न हुए । फिर
ब्रह्मज्ञान-सम्पादनयोग्य मनुष्यको बनाकर संतुष्ट हुए ।
सृष्ट्वा पुराणि विविधान्यजयाऽऽत्मशक्त्या
वृक्षान् सरीसृपपशून् खगदंशमत्स्यान्
भा० ११।९। २१—

१६२ मार्क्सवाद और रामराज्य
तैस्तैरतुष्टहृदय. पुरुषं विधाय
ब्रह्मावलोकधिषणं मुदमाप देवः ॥
( भागवत ११ । ९ । २८ )
कहा जाता है कि संसारमे जितने प्राणी मिलते हैं, सब अनादि नहीं है।
पहले सीधी-सादी रचना हुई, पश्चात् क्लिष्ट रचनावाले प्राणी बने। भारतमें
व्याघ्र, सिंह होते हैं, इंगलैंडमें नही होते। साँप, बिच्छू आदि उष्ण-प्रदेशोमें
होते हैं, यूरोपके शीत-प्रदेशमें नही होते। जिराफ अफ्रीकामें और मोर भारतमे
ही होते हैं। जैसी भिन्नता पशु-पक्षियों, वनस्पतियोंमें होती है, वैसी ही मनुष्योंमें
भी होती है। आस्ट्रेलियामें यूरोपियनोंके जानेके पहले खरगोश नहीं थे, बादमें
जहाजसे पहुँचाये जानेपर वहाँ खरगोशोंकी बहुतायत होती गयी। गेलापेगस द्वीप विचित्र
प्राणियोंके लिये प्रसिद्ध है। वहाँ गोह, गिरगिट, छिपकली, सर्प तथा पक्षी-श्रेणीके
जन्तु बहुत हैं। इस प्रकारके जन्तु अफ्रीका, भारत, अमेरिकामे भी विद्यमान
हैं, परंतु सबकी अपेक्षा अमेरिकाके प्राणियोंके साथ गेलापेगसवाले प्राणियोंका
अधिक मेल है। ये अमेरिका निवासियोके वंशज हैं। अमेरिका इस द्वीपके
समीप है, इससे मालूम होता है कि कभी पूर्वमे जब अमेरिका और इस द्वीपकी
भूमि मिली रही होगी, तब अमेरिकासे प्राणी जाकर वहाँ रहने लगे होगे।
एक द्वीपसे दूसरे द्वीपमें, दूसरेसे तीसरेमे बसे। परिस्थितियोंके कारण कुछ भिन्नता
हो जाती है। वस्तुतः वे सब एक ही पूर्वजोकी संतति हैं। अफ्रीकाके समीप
स्थित नर्स द्वीपके प्राणियोंकी अफ्रीकाके प्राणियोंके साथ बहुत कुछ तुल्यता
है। प्रशान्त महासागर (पैसेफिक) के द्वीपोंमे घोंघोंकी अनेक जातियाँ हैं।
भूगर्भशास्त्री यह बतलाते हैं कि 'पूर्वकालमे इन द्वीप-समूहोंकी भूमि एकमे जुडी
थी। अर्थात् यह पहले महाद्वीप था, इसीसे सब घोंघोंका मेल है। सब एक
ही पिताकी संतति हैं।'
किन्हीं दो देशोके प्राणियोंकी भिन्नता और समानता दोनो प्रदेशोकी
दूरता और निकटतापर अवलम्बित है। दूर होनेसे भिन्नता होगी, समीपसे
समता होगी, किंतु कभी-कभी दूरस्थ प्राणियोंमें बहुत अधिक समानता होती
है। जैसे ब्रिटेन और जापानमें बहुत अन्तर होनेपर भी इन देशोके प्राणियोंमें बहुत
समानता है। आस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड बहुत पास पास हैं, परंतु वहाँके प्राणियोंमें
बहुत बड़ा वैषम्य है। अतः इनकी भेदक प्रकृति ही है। यदि दो नजदीकके
स्थानोको कोई पहाड़ जुदा करे तो एक जगहके नदी-नालेवाली मछलियाँ जैसी
होगी, उसी तरहकी दूसरी जगहवाली नहीं होगी, क्योकि मछलियाँ पहाड़
लाँघकर नहीं जा सकता। इसीलिये समीप होते हुए भी उन जीवोमे एक-
रूपता नहीं होगी। दूर-देश होनेपर भी यदि गमनागमन रहे तो समता अधिक

रहती है । ऐसे प्रमाणोंको देखकर विकासवादी कहते हैं कि 'सब प्रकारके
जीवित प्राणी एक ही जातिके आद्यवंशजोंसे उत्पन्न हुए हैं। इनके भिन्न-भिन्न
रूप परिस्थितियोंके अनुरूप बनते हैं।'
परंतु उपर्युक्त बातें विकासवादके लिये भयंकर हैं। जब प्रकृति हर जगह
मौजूद है, हर जगहके लिये जलवायु अनुकूल है, तब वहाँ अमीबा पैदा होकर
कोई नयी जाति क्यों नहीं बना डालता ? क्यों पुरानी ही सृष्टिके प्राणियोंमें
विकासवादकी स्वच्छन्द प्रकृति मत्था मार रही है ? भिन्न देशोंके प्राणियोंकी
समता सबके एक ही वंशके होनेकी सूचना देती है । परंतु यदि भिन्न देशोंके
प्राणियोंकी समता इस तरह की जाय कि बिल्ली और कुत्ता स्तनधारी एवं
मांसभक्षी हैं, अतः एक देशकी बिल्ली और दूसरे देशके कुत्तेको देखकर कह
दिया जाय कि दोनों ही प्राणी एक ही पिताकी संतान हैं, तो क्या ठीक
होगा ? किंतु यदि बुलडॉग, ताजी आदि कुत्तोंको देखकर कहा जाय कि
'एक ही पिताके पुत्र हैं', तो सत्य होगा । अतः केवल रचना देखकर ही
एक होनेका अनुमान नहीं किया जाना चाहिये । प्रत्युत समान प्रसव, समान
भोग एवं समान आयुका मेल मिलनेसे ही दोनोंके एक पिताके संतान होनेका
निर्णय किया जा सकता है।
कहा जाता है कि डार्विनको टेरोडेल्फिगोमें जब खर्वाकार मनुष्य दिखलायी
पड़े, तब वह विश्वास ही न कर सका कि ये भी मनुष्य ही हैं । जब उसने
गोरिल्ला और चिंपेंजी आदि वनमानुषोंको देखा, तब चिल्ला उठा कि 'ये भी
एक प्रकारके मनुष्य ही हैं।' डार्विनके इस भ्रमका कारण यही था कि उसने
केवल आकृतिसाम्यपर ही विश्वास किया, किंतु उस सृष्टि-नियममें समान-प्रसव-
का नियम आवश्यक है । तदनुसार खर्वाकार-दीर्घाकार मनुष्योंके संयोगसे संतति
होती है, परंतु मनुष्यो और वनमानुषोंके योगसे संतति नहीं होती । अतः
पहले दोनों एक जातिके हैं और दूसरे भिन्न जातिके। इसीलिये यद्यपि घोड़े और गधेमें
मनुष्यो और वनमानुषोंकी अपेक्षा अधिक समानता है, फिर भी खच्चरकी वंश-परम्परा
नहीं चलती । अतः घोड़े-गधे एक जातिके नहीं हैं । यह तो एक आस्तिकको
स्वीकृत हो सकता है कि एक ही जगह सृष्टि हुई और वहाँसे सब जगह जा-
जाकर प्राणी आबाद हुए; परंतु 'सब अमीबाका ही विकास है' यह सिद्धान्त
सर्वथा असंगत है । जैसे विभिन्न वनस्पतियोंके बीज पृथक्-पृथक् होते हैं, वैसे ही
सब प्राणियोंके बीज भी पृथक् ही थे । समानताका कारण दूरता एवं निकटता
नहीं, किंतु वंश और परिस्थिति ही कारण है ।
परिस्थितिके कारण ही बुलडॉग, ताजी आदि कुत्तोंमें भेद होता है । परंतु

१६४ मार्क्सवाद और रामराज्य
परिस्थितिवश साँप ऊँट नहीं हो जाता । यदि एक ही प्राणीका यन्त्रोकी तरह
अनेक योनियोंमें विभाग माना जाय तो अनेक आपत्तियाँ होगी ।
१-एक कोष्ठके अमीवामें स्त्री और पुरुष यह भेद कैसे हुआ ?
२-यदि अमीवाके बाद दो कोष्ठका हाइड्रा हुआ, तो क्रमसे उत्तरोत्तर
सभी योनियों दुगुने परिमाणसे बढ़नी चाहिये अर्थात् वजन और आकार आदि
उत्तरोत्तर दुगुने होने चाहिये । फिर तो मनुष्यको हाथी, ऊँट आदिसे कई गुना
बड़ा होना चाहिये । पखधारी प्राणी सर्पणशील प्राणियोंके बाद होता है, फिर
तितली आदि क्रिमि पखधारी कैसे हो गये ? अस्थियोकी उत्पत्ति कैसे हुई ?
अस्थिहीनोंसे अस्थिवालोंकी उत्पत्ति कैसे हुई ? जब पक्षी, जल-जन्तु एव कीड़ेतक
मांसाहारी होते हैं, तब मांसाहारियोका समावेश स्तनधारियोंमें ही क्यो किया
गया ? एक ही परिस्थितिमें उत्पन्न होनेपर भी स्त्रियोंको दाढ़ी-मूँछ क्यो नहीं ?
मयूरीको लंबी पूँछ क्यो नही ? मुर्गीके सिरपर कलँगी क्यो नही और हथिनीको
बड़े दाँत क्यो नहीं ? प्राणियोके दाँतोकी संख्यामें न्यूनाधिकता क्यो ? घास
खानेवाले स्तनधारियोंमें गाय, भैसके ऊपरी दाँत क्यो नहीं ? घोड़ेके ऊपरी दाँत भी क्यो
होते हैं ? कुत्तोके दूधके दाँत क्यो नही गिरते ? घोड़ेके स्तन क्यो नहीं होते ? बैलके
स्तन अंडकोषोके पास क्यो होते हैं ? पुरुषोमे स्तनोंका क्या प्रयोजन है ? घोड़ेके
पैरमें परोके चिह्न क्यो हैं ? बच्चा पैदा होते समय घोड़ीकी जीभ क्यो गिर जाती
है और दूसरे जानवरोकी जीभ क्यो नहीं गिरती ? स्त्री जाति अस्थियाँ क्यो नही
उत्पन्न कर सकती ? यदि यन्त्रके सिद्धान्तपर प्राणियोका विकास हुआ है तो कछुए
और साँपकी अपेक्षा पक्षी और स्तनधारी क्यो कम जीते हैं ? अधिक जीनेवालोका
कम जीनेवालोसे गर्भवास कम क्यो है ? अतः परिस्थितिसे ही प्राणी एक जातिसे
अन्य जातिका नहीं हो जाता । कोई प्राणी अपनी मूलजातिसे इतनी दूर नही हो
सकता जहाँ समान-प्रसव, समान-भोग, समान आयुका सिलसिला भी बंद
हो जाय । स्त्री पुरुषकी बनावट भी परिस्थितिके सिद्धान्तका खण्डन करती है ।
आयुके सिद्धान्तसे ही यान्त्रिक सिद्धान्त खण्डित होता है ।
लुप्त-जन्तु
यह भी कहा जाता है कि 'पृथ्वीकी तहोमे लुप्त हुए पाषाणमय प्राणियो-
की खोजसे भी विकास सिद्ध होता है । प्राणियोकी शृङ्खलाकी कुछ कड़ियाँ
नहीं मिलती क्योकि वे आज लुप्त हो चुकी हैं। 'लुप्त-जन्तु-शास्त्र' से वर्तमान-
कालमें अविद्यमान लुप्त जन्तुओंका पता लगाया जाता है । एल० म्यूजियममे
घोड़ेकी, साउथ कैन्सिगटनमें हाथी-दाँतोकी, ब्रूसेल्समें इग्वेनोडसकी और
क्रिस्टल् पैलेस, न्यूयार्क, लन्डन, जेयनामें अन्य प्राणियोकी पाषाणीभूत

प्राप्त अस्थियाँ एकत्र की गयी हैं । घोड़ेकी समस्त कड़ियाँ ठीक हो गयी हैं ।
'आर्किओप्टेरिक्स' नामका एक ऐसा प्राणी मिला है जिससे सर्पवर्ग और पक्षीवर्गके
बीचकी कड़ी सिद्ध हो जाती है । अस्थिहीन प्राणी मरनेपर मिट्टीमें मिल जाते
हैं। पर अस्थियुक्त प्राणियोंकी हड्डियाँ मिट्टीमें नष्ट नहीं हो जातीं, हजारों वर्ष
पुरानी हड्डियाँ मिलती हैं । इन्हें ही 'फौसिल' कहते हैं । इनसे सब कड़ियाँ
पूरी हो सकती थीं, परंतु पृथ्वीके अधिक भागमें समुद्र होनेके कारण एवं
शीत-उष्ण कटिबंधोंमें सर्दी-गर्मीकी अधिकताके कारण खुदाईका काम हो ही
नहीं सकता । अच्छे स्थानोंसे भी कुत्ते, शृगाल आदि अस्थियोंको नष्ट कर देते
हैं । इन्हीं कारणोंसे 'लुप्त जन्तु-शास्त्र'के पूर्ण प्रमाण नहीं मिलते । प्राकृतिक
परिवर्तनों, नदियोंके कटावों, अग्नि, प्रपातोंसे बहुत-सी हड्डियाँ गल गयीं; बहुत-
सी जल गयीं, बहुत-सी पिघल जाती हैं । बिना हड्डीवाले जन्तु तो नष्ट हो ही जाते
हैं । पृथ्वीकी विभिन्न तहोंमे उपलब्ध अस्थियोंसे उन प्राणियोंके समयका निर्णय
करना 'लुप्त-जन्तु-शास्त्र' का मुख्य विषय है ।'
"परंतु पृथ्वीकी आयुका निर्णय करनेके लिये काल्पनिक सिद्धान्तोंके
अतिरिक्त वैज्ञानिकोंके पास कोई प्रबल साधन नहीं है । पृथ्वीकी आयुके
सम्बन्धमें भूगर्भ-शास्त्रके अनुसार प्राणियोंकी उत्पत्तिसे अबतक (दस करोड़)
वर्ष हुए । वैज्ञानिक सूर्यकी गरमीके आधारपर जो समय निकालते हैं, वह इससे
कम है, किंतु प्रो० पेरीने रेडियमकी खोजसे जो समय निकाला है, वह बहुत
अधिक है । 'भूगर्भ-विद्याके अनुसार पृथ्वीकी चार तहें हैं । सबसे निचली तहमें
हड्डीरहित प्राणी रहे होंगे । दूसरी तहमें प्राणियोंकी अस्थियाँ हैं, पर वे प्राणी
मत्स्य-मण्डूक श्रेणीके हैं । तीसरी तहमें उन्नत प्राणियोंकी भी अस्थियाँ पायी जाती
हैं । चौथी तहमें वर्तमान कालके सभी प्रकारके प्राणियोंके अवशेष पाये जाते
हैं । इससे सिद्ध होता है कि जिस कालमें जो प्राणी थे केवल वही थे और वड़े
विशालकाय थे । उनकी अनेक उपजातियाँ भी थीं । जब मत्स्य थे, तब सर्प
नहीं थे । सर्पके समयमें सब सर्प ही थे । किसी समय अनेक जातिकी
छिपकलियाँ थीं, जो ८० मनतककी बतलायी जाती हैं, यह उनकी हड्डियाँ देखनेसे
सिद्ध होता है । मिस्र देशमें प्राणियोंके सिर भी मिलते हैं, जिनमें मांस,
चर्म-नस, नाड़ी आदि सभी अवयव विद्यमान हैं । 'मत्स्यपुराण' में आयी
उड़नेवाले सर्पोंकी कथा गलत नहीं ।
"इन सर्प-श्रेणीके पक्षियोंसे ही पक्षियोंकी उत्पत्ति हुई है। जर्मनीमें पाषाणीभूत
घोंघोंके कवच अनेक तहोंमें मिलते हैं । उनसे विकास-क्रमका पता लगता
है । घोड़ेके विकासका भी क्रम मिलता है । भिन्न-भिन्न तहोंमें मिले हुए प्राणियोंके
पंजों और सुमों (घोड़ोंके अवयव-विशेष) के मिलानसे पता लगता है कि

१६६ मार्क्सवाद और रामराज्य
'घोडे किन प्राणियोसे विकसित होकर इस रूपमे आये हैं।' ऊपरकी तहमें
वर्तमान घोडे-जैसा ही जन्तु मिलता है । मध्य-स्तरमें वह ३-४ अंगुलीवाला
मिलता है । निचली तहोंमें उसका आकार शशकके समान और ५ अंगुलीवाले
पंजोंका मिलता है । गाय, भैंसको पाँचमेंसे जिस तरह चार ही अंगुलियाँ रह
गयीं, उसी तरह इस जानवरकी भी अगुलियाँ क्रमशः घटते-घटते बीचकी
अँगुली टाप बन गयी । घोडेके आदिपूर्वजका अबतक पता नहीं लगा;
परंतु ज्ञात होता है कि वह पाँच अंगुलीवाला था । इसी तरह हाथी और हरिणके
आद्यवशंजोसे लेकर वर्तमान समयतककी विकास परम्परा ज्ञात होती है । लुप्त
कड़ियोंका उदाहरण 'ओप्टेरिक्स' है । यह पखयुक्त उडनेवाला सर्प है। इसका
सिर छोटा, जबडा बडा और दाँत साँप जैसे हैं; परंतु पंख एव पजे पक्षियो-
सरीखे हैं । इसी तरह एक प्राणी 'टेरोडिक्टिल' है । इसके हाथोकी एक-एक
अगुंली बहुत बड़ी है, जिससे पखको सहारा मिलता है । इसमें सर्प, पक्षी तथा
स्तनधारियोकी थोडी-थोडी बाते मिली हुई हैं । इसी प्रकार कँगारू, ओपोसम
आदि इस अन्वेषणमें सहायक हैं।"
उपर्युक्त बातोपर विचार करनेपर भी विकास सिद्ध नही होता । यह सिद्ध
है कि वर्तमान साधनोसे पृथ्वीकी आयुका पता नहीं लगता और सारी पृथिवीका
खोजना भी सम्भव नहीं । अस्थियोका नष्ट हो जाना, पिघल जाना आदि भी
सम्भव है । फिर इस लुप्त-शास्त्रके बलपर विकासवाद कैसे सिद्ध होगा ?
अस्थियोके मेलका सिद्धान्त भी गलत है । यदि घोड़ा, गधा, जेब्रा एक ही
जगह मिले तो विकासवादी तीनोंके पजरोको एक ही कह सकता है । फिर भी
तीनो एक नहीं, अतः अस्थियोके मेल मिलाकर शृङ्खला मिलाना असगत है ।
'घोडेकी कडियाँ मिल गयीं' यह बात भी गलत है । घोड़ेकी कड़ियोपर
विकासवादियोका दृढ़ विश्वास है । यूरोप, अमेरिकाकी खुदाईसे मिले हुए भिन्न
समयोंके विचित्र जातिके अस्थि-पंजरोको मिलाकर यह दिखलानेकी कोशिश
की जाती है कि 'ये सब घोडेके पूर्वज उसके विकासकी कड़ियाँ हैं ।' हक्सले
साहबने इसे महत्त्व दिया है; परंतु आधुनिक खोजसे इसका खण्डन हो गया ।
सर जे० डब्ल्यू० डासनने अपनी 'माडर्न आइडिया ऑफ इवोल्यूशन'
(विकासकी आधुनिक भावना) नामक पुस्तकसे अच्छी तरह सिद्ध किया है कि
'अमेरिका एव यूरोपके इन जन्तुओमें जिन्हें घोड़ेका पूर्वज कहा जाता है, परस्पर
कुछ भी सम्बन्ध नहीं है ।' घोड़ा बड़ा ही विचित्र जानवर है। पाँच बाते उसमें अन्य
तृणाहारी पशुओंसे विलक्षण हैं- (१) नीचे-ऊपर दोनो तरफ दाँत, (२)
प्रसवके समय घोडीकी जीभका गिरना, (३) घोड़ेके अगले पैरोके गाँठोंमें
परोंका निशान होना, (४) नर घोड़ेके स्तन न होना और (५) खुरकी

जगह टाप होना। कहा जाता है कि 'घोड़ेकी चार अंगुलियाँ लुप्त हो गयीं;
बीचकी अँगुली टाप बन गयी । गाय-भैंसके अगल-बगलकी चार अंगुलियाँ
मौजूद हैं, बीचवाली लुप्त हो गयी ।' जो अँगलियाँ विद्यमान हैं, उनमें दो
तो फटे हुए खुरको बतलाया जाता है और दो उठी हुई मदनखुरी
बतायी जाती है । यह कैसा उलटा-पुलटा विकास ? किसीमें चारों
अंगुलियाँ लुप्त होकर बीचकी अँगुली टाप बन गयी तो किसीमें सब रहीं,
केवल बीचकी ही लुप्त ! गधे, घोड़े और खच्चरके पञ्जरोंमें धोखा हो सकता है,
वनबिलाव और चीतेके बच्चेके पंजरोंमें भी धोखा हो सकता है । इसी तरह
सभी पंजर मिलनेवाली जातियोंको एक ही जातिके स्थिर करनेमें भी धोखा
हो सकता है । मि० डे० क्वाडर फेगस अपनी 'लेस अम्यूलस डे डारविन'
पुस्तकमें लिखते हैं कि 'घोड़ोंकी कड़ियाँ न तो इस प्रकारके जिंदा जानवरोंसे
पूरी होती हैं और न प्रस्तरीभूत अस्थिपञ्जरोंसे ही । ऐसे प्राणियोंका अस्तित्व
कल्पनामात्र है ।' इसी तरह जोन्म वोसनने नवम्बर सन् १९२२ ई० के 'न्यू एज'
पत्रमें लिखा है कि 'ब्रिटिश म्यूजियमका अध्यक्ष कहता है कि “इस म्यूजियममें
एक कण भी ऐसा नहीं, जो यह सिद्ध कर सके कि जातियोंमें परिवर्तन हुआ
है । विकासविषयक दर्शनमें नौ बातें निःसार हैं । परीक्षणका आधार
स्वच्छन्दता और निरीक्षणपर बिल्कुल अवलम्बित नहीं । संसारभरमें ऐसी कोई
सामग्री नहीं, जो विकास-सिद्धान्तकी सहायक हो ।' इस तरह लुप्त-जन्तु-शास्त्रके
आधारपर विकासका सिद्ध होना असम्भव हो गया है ।
यदि विकास होता तो बर्फीले स्थानोंमें कोई साङ्गोपाङ्ग ऐसा प्राणी
मिलता, जिससे विकास सिद्ध होता । पृथ्वीकी तहोंकी आयुका भी अभी
हिसाब नहीं बैठा । तहोंके प्रस्तरीभूत प्राणियोंकी आयु जाननेके लिये तहोंकी
आयुका जानना आवश्यक है । जब पृथ्वीकी ही आयुका ठीक ज्ञान नहीं,
तब तहकी आयुका ज्ञान कैसे होगा ? फिर एक तहके प्राणी कितने समयमें
प्रस्तरीभूत हुए, यह जाननेका क्या साधन है ? आधुनिक विज्ञान यह भी
नहीं बतला सकता कि मनुष्योंको पैदा हुए कितने दिन हुए । फिर समस्त
कड़ियोंकी वर्ष संख्या मिलाकर पृथ्वीकी आयुके साथ मेल बैठानेका
विकासवादियोंके पास कोई साधन नहीं । पृथ्वीकी अमुक बनावट किन साधनोंसे
होती है, उन साधनोंका निर्माण किससे होता है, इन बातोंतक अभी विज्ञान
पहुँचा ही नहीं । यदि जगत्की रचनाके कारणोंका ज्ञान, उन कारणोंकी
गति, शक्ति तथा परिणामके मापका ज्ञान होता, तो पृथ्वीकी आयु निश्चित
होती । परंतु इनका ठीक ज्ञान नहीं । कल्पनाके द्वारा निकाला सिद्धान्त
विश्वसनीय नहीं होता । अगस्त सन् १९२३ के 'थियोसोफिकल पत्र' में हैनसनने

१६८ मार्क्सवाद और रामराज्य
लिखा है कि 'नेवादा में जॉन टी० रीडको एक आदमीका पदचिह्न और एक
अच्छी तरह बना हुआ जूतेका तला मिला है, जिसे वह अपने चट्टानविषयक
भूगर्भ-विद्या-सम्बन्धी ज्ञानसे ५० लाख वर्ष पुराना बतलाता है। उस तलेमें ऐसी
सिलाई, धागोंके मरोड़ और धागोंके माप मिलते हैं, जो आजकलके अच्छे-से-अच्छे
बने हुए जूतोंके समान पक्के और सूक्ष्म हैं। इससे सिद्ध हुआ कि ५० लाख वर्षसे
तो मनुष्य जूता पहनता है और वह सुई, सूत, सिलाई, नपाईका ज्ञान प्राप्त कर
चुका था।' विकासके अनुसार यह ज्ञान बहुत दिनोंमें हुआ होगा। इस
विचारसे मनुष्यकी उत्पत्तिका समय आजसे यदि एक करोड़ वर्ष पूर्व माने और
हेकलके मतानुसार प्राणियोंकी २१ कड़ियोंके बाद मनुष्यकी उत्पत्ति माने एवं
प्रत्येक कड़ीको यदि एक करोड़ वर्षका समय दे तो प्रथम प्राणीकी उत्पत्तिसे
मनुष्यकी उत्पत्तितक २२ करोड़ वर्ष और आजतक २३ करोड़ वर्ष होते हैं।
लोकमान्य तिलक ने 'गीता-रहस्य'में डॉ० गेडाका मत उद्धृत करते हुए लिखा है कि
'मछलीसे मनुष्य होनेमें ५३ लाख ७५ हजार पीढियाँ बीती हैं। इतनी ही पीढियाँ
अमीबासे मछली बननेमें बीती होगी अर्थात् अमीबा अबतक लगभग एक
करोड़ पीढियाँ बीती। कोई पीढ़ी एक दिन, तो कोई सौ वर्ष जीती है। यदि
औसत प्रति पीढ़ी २५ वर्ष भी मान ले तो इस हिसाबसे भी प्राणियोंकी उत्पत्ति-
का समय २५ करोड़ वर्ष होता है।' यह भी सिद्ध है कि पृथिवी उत्पन्न होनेके
करोड़ों वर्ष बाद उसपर प्राणियोंकी उत्पत्ति हुई होगी। यह संख्या विकास-
वादियोंकी निर्धारित संख्यासे बहुत आगे जाती है।
विकासवादी पृथिवीकी प्राणियोंवाली तहोंकी आयु १० करोड़ वर्ष बतलाते
हैं। वे अमीबाको सादी रचनावाला कहते हैं, परन्तु यह ठीक नहीं है। वह
तो क्लिष्ट रचनावाला ही प्राणी है। अपने शरीरमें हर जगह छिद्र कर लेना क्या
साधारण बात है ? वनस्पतिकी ही रचना सादी है। सिद्धान्ततः भोग्य सादी
रचनावाले और भोक्ता क्लिष्ट-रचनावाले हैं। पृथिवीकी नीचेवाली तहमें हड्डीवाले
प्राणी नहीं मिलते, अतः कहा जाता है कि 'पहले बिना हड्डीवाले प्राणी हुए।'
परंतु इसपर यह भी तो कहा जा सकता है कि 'पृथिवीके दबावसे नीचेवाली तह
तथा उसके साथ हड्डियाँ भी पिघल गयी होगी।' अतः 'पहले हड्डियाँ नहीं थीं'
यह कल्पना भी गलत है। फिर इससे यह सिद्ध नहीं होता कि अस्थिहीनोंसे ही
अस्थिवालोंकी उत्पत्ति हुई। हड्डी अपने आप ही उत्पन्न होती है यह पीछे कहा
जा चुका है। यदि यह सत्य हो कि 'जिस समय जो प्राणी थे, वही थे और वे
भीमकाय थे,' तो वर्तमान प्राणियोंका उनसे उत्पन्न होना सिद्ध नहीं होता।
किंतु सबसे प्रथम उत्पन्न एक कोष्ठवाला अमीबा भी अबतक मौजूद है। इतना
ही नहीं, वे अन्तिम प्राणी मनुष्यसे भी अधिक हैं। अतः यह सत्य नहीं है कि

विकासवाद १८९
'जब जो थे, तब वही थे।' पृथिवीकी खुदाईमे भी यह बात पायी नही जाती।
जिस तहमे जो हड्डियाँ पायी जाती हैं, वह तह उस सिद्धान्तानुसार उन्हीं जन्तुओमे
पटी होनी चाहिये, क्योकि 'उस समय वही थे और दीर्घकाय (विशालकाय)
थे।' पर ऐसा है नहीं, बहुत गहरा खोदनेपर भी एक तहमें थोड़े ही
जन्तु एक प्रकारके पाये जाते हैं। उन प्राणियोका विशालकाय होना तो
विकासवादके विरुद्ध ही होगा, क्योकि उसके अनुसार तो बहुत छोटे प्राणियोसे
ही विकासका आरम्भ होता है। जब छोटे प्राणी ऐसे विशालकाय हुए कि एक
छिपकली ही अस्सी मन वजनकी हुई और वृक्ष इतने बड़े हुए कि खदानोंमें
कोयलाके पहाड बन गये तो उसी नियमानुसार आरम्भिक मनुष्योंकी लाशे
ऐसी क्यो नही मिलीं ? वह भी कम-से-कम ताडके पेडके बराबर तो होनी ही
चाहिये थी। छिपकली उतनी क्यो बढ़ी और आदि प्राणी अमीवा और अन्तिम
प्राणी मनुष्य उतना क्यों न बढ़ा ? क्यो भैसके बराबर चीटियाँ देखनेको न
मिलीं ? और जीवित प्राणियोंमे आज वैसे भीमकाय क्यों नहीं ? हो सकता है कि
कुछ योनियाँ पहले भीमकाय रही हों, परन्तु उनके वंशका आज पता नहीं
लगता। वे सपरिवार नष्ट हो गयी होंगी।
शास्त्रीय दृष्टिसे तो विकासकी अपेक्षा ह्रास पक्ष ही संगत जँचता है।
सत्ययुगके प्राणी आजके प्राणियोंकी अपेक्षा बहुत बडे थे। युग ह्राससे सबमे
ह्रास हो रहा है। जो गाये पहले बड़ी होती थीं, वे भी आज छागप्राय हो
रही हैं—'छागप्रायासु धेनुषु' (भागवत १२।२।१४)। किंतु विकासवादका
कहना है 'भीमकाय प्राणी भी अमीबाके ही विकास थे, परिस्थिति प्रतिकूल होनेसे
वे नष्ट हो गये।' यदि यह सत्य हो तो विकासवादका यान्त्रिक सिद्धान्त असत्य
ठहरता हे। विशालकाय प्राणी नष्ट हो गये और अल्पकाय जी रहे हैं। जिस प्रकार
दीर्घजीवी कछुआने अल्पजीवी कबूतरको उत्पन्न किया, उसी प्रकार भीमकाय
छिपकलीने अल्पकाय छिपकली उत्पन्न की। यद्यपि आज अस्सी मनकी छिपकलीका कहीं
पता नहीं लगता, पर क्या यह यन्त्रोका सुधार एव उन्नति हुई अथवा उनका बिगाट
एव अवनति हुई ? वस्तुतः कर्मोंके अनुसार जिन प्राणियोने जितना बडा शरीर
जितने दिनोके लिये पाया, उतने दिन वे उसे भोगकर चले गये। अब संसार
जिन शरीरोके योग्य है, वे बचे हुए हैं और कर्मफल भोग रहे है। 'मत्स्यपुराण' के
पक्षयुक्त सर्प भी विकासके साधक नहीं हो सकते। चमगादड़ पशु एव पक्षियोके
बीचका क्यो माना जाता है ? पक्षी एकदम चमगादड़ बनकर स्तनधारी हो
गये या धीरे-धीरे ? यदि धीरे-धीरे, तब तो इस प्रकारकी आगे-पीछे हजारो
कड़ियाँ दिखलानी होगी। यह कहनेसे काम नही चलेगा कि 'आगे-पीछेकी
हजारो कड़ियाँ नष्ट हो गयीं।' पहली कडियाँ तो बादवाली कडियोंसे कमजोर

१७० मार्क्सवाद और रामराज्य
थीं, वे नष्ट हो सकती थीं; परंतु बादवाली कड़ियाँ क्यों नष्ट हो गयीं ? वे तो योग्य
होनेसे ही विकसित हुई थीं। वर्तमान चमगादडसे उसके बादकी कड़ियाँ, फिर
आगे-पीछेकी सब कड़ियोंको हटाकर एकमात्र चमगादड ही कैसे बच रहा ? ये बातें
विकासवादके साथ कैसे संगत होगी ? पुराणोंके अनुसार तो घोड़ों और पहाड़ोंके भी
उड़नेकी बात पायी जाती है। क्या विकासवादी उसे भी मानेंगे ? वस्तुतः जिन्हें संधि-
योनियाँ या मध्य-कड़ियाँ कहा जाता है, वे चमगादड़, उड़नेवाले सर्प आदि स्वतन्त्र
योनियाँ ही हैं। अतः 'लुप्त-जन्तु शास्त्र' के आधारपर विकासवाद सिद्ध नहीं होता ।

गर्भ-शास्त्र

कहा जाता है कि "गर्भ-शास्त्र' के आधारपर विकास सिद्ध होता है ।
पानीमें पड़े हुए पत्तों या लकड़ियोंपर जो लसदार काले चिकने कण दिखायी
पड़ते हैं, वे मेंढकोंके अंडे हैं । तीन-चार दिनमें ये कण या पिण्ड पूँछदार
और चपटे सिरवाले जन्तुका आकार धारण कर लेते हैं। फिर इनके गलेके
पास मछलियोंकी तरह श्वास लेनेके गलफड़े बन जाते हैं। ये सब बातें अंडेमे
ही हो जाती हैं। इसके बाद बच्चे अंडोंको छोड़कर पानीपर तैरने लगते हैं।
वे उस समय गलफड़ोंसे श्वास लेते हैं। उन्हें पूँछ भी होती है। वे एक प्रकारकी
मछली ही-जैसे लगते हैं। शीत ऋतु आते ही वे किसी बंद जगहमें छिप जाते
हैं। वर्षाका आरम्भ होते ही वे फिर बढ़ने लगते हैं। धीरे-धीरे पूँछ लुप्त हो
जाती है और पैर निकल आते हैं। फेफड़े बनने लगते हैं और वे गलफड़से
श्वास लेना बंद कर देते हैं । तब ये पूरे मेंढक बन जाते हैं। इस इतिहाससे
मालूम पड़ता है कि प्राणीको अपनी उन्नतिके लिये विकासके पूरे चक्रमें घूमना
पड़ता है। जिस-जिस जातिमे घूमता हुआ प्राणी जिस अन्तिम योनिमें पहुँचा
है, गर्भसे लेकर वृद्धितकके समयमे ही उसे उन सभी चक्रोंमें घूमना पड़ता है।
मुर्गोंका अंडा भी एक कोष्ठवाले अमीवासे ही प्रारम्भ होता है । इसमें भी
मछलियोंकी तरह गलफड़े होते हैं। अंडेसे बाहर आनेपर भी गलेके पास इसके
चिह्न रहते हैं। इससे यही अनुमान होता है कि पक्षी भी मछली और मेंढकके
रूपोंमें होता हुआ ही पक्षी बना है । यद्यपि गर्भके परिवर्तन बहुत संक्षिप्त
होते हैं तथापि वे अपनी पूर्व पीढ़ियोंका सब इतिहास दिखला देते हैं । सूअर,
गौ, खरगोश और मनुष्यादि स्तनधारियोंके गर्भ सब एक ही प्रणालीसे
विकसित होते हैं। मानवगर्भ क्रमशः मछली, मेंढक, सर्प और पक्षीके आकारका
होकर तब स्तनधारियोंकी अवस्थामें आता है। इससे ज्ञात होता है कि मनुष्यका
इन योनियोंसे सम्बन्ध है । चाहे लाखों वर्ष लगे हों, पर मनुष्यकी उत्पत्ति
अमीवासे ही हुई है । यह प्रत्यक्ष प्रमाण है । प्रकृति इससे अधिक क्या
प्रमाण दे सकती है ? कीड़ोंके प्रथम पिण्ड सब समान ही होते हैं । उस दशामें

विकासवाद १७१
नहीं पहचाना जा सकता कि यह तितली, भौंरा, ततैया अथवा कनखजूरा
क्या है ? तितली और रेशमके कीड़े भी, जो अपनी वृद्धिमें अनेक रूप दिखलाते
हैं, प्राथमिक दशामें एक ही समान रहते हैं। इससे यही मालूम होता है कि ये
सब एक ही पूर्वजोंकी संतति ह, जो अपनी पीढ़ियोंका पूरा चक्कर लगा
रहे हैं। गर्भके बढ़नेका क्रम इस प्रकार है—पहले एक कोष्ठ, फिर दो कोष्ठ,
फिर दोके चार, इस तरह चारके आठ और आठके सोलह कोष्ठ हो जाते हैं ।
कोष्ठ सदैव दूने क्रमसे बढ़ते हैं। इसी प्रकार अंडा भी दूने क्रमसे बढ़ता है।
अमीबा एक कोष्ठधारी और हाइड्रा दो कोष्ठवारी होता है। इस तरह गर्भ शास्त्रसे
मालूम पड़ता है कि 'पहले प्राणी सरल रचनाके और फिर क्लिष्ट रचनावाले
होते हैं।'
उपर्युक्त बातोंपर विचार करनेसे भी विकास सिद्ध नहीं होता । गर्भमें
जो सादी रचनाके बाद क्लिष्ट रचना दिखलायी पड़ती है, उसका कारण
विकासकी उत्पत्तिका पुनर्दर्शन नहीं, प्रत्युत यन्त्र बनानेका एक साधारण सा
नियम है । किसी भी यन्त्रके बनानेके लिये उसके सूक्ष्म एवं क्लिष्ट
पुर्जोंको अटकानेके लिये एक सीधा सादा आधार आवश्यक होता है ।
चर्खेके निर्माणमें गराडीमें नलिनियोंको डालकर रखा जाता है ।
साधारण रूलजैसा डंडा उसका आधार है । इसके बाद दो खूँटे एक
सीधी-सादी पटियामें गाड़कर रक्खे जाते हैं । यह पटिया ही चर्खेका मूल है
अर्थात् एक सीधे मूल आधारपर ही सूक्ष्म, क्लिष्ट पुर्जे जमाये जाते हैं। मोटरमें
भी धुरी, कमानी आदि मुख्य आधार है, वह सादा ही है। मनुष्यके शरीररूपी
यन्त्रमें भी एक पीठको आधार माना जाता है। उसीको विकासवादी मछली
कहने लगते हैं। उसीमें सिर, हाथ, पैर जुड़ जानेपर उसे ही मेढक कहने लगते हैं।
पीठकी हड्डीके आधार बिना सिर, हाथ, पैर, हृदय, फुफ्फुस आदि शारीरयन्त्र
किस प्रकार एकमें जोड़े जा सकते थे ? क्या विकासवादी कोई ऐसा यन्त्र
बतला सकते हैं, जिसके क्लिष्ट पुर्जे किसी आधारपर रक्खे बिना यन्त्ररूप होकर
काम दे रहे हो ? क्या पीठकी हड्डी (रीढ़) के बिना शरीरके अवयवोंसे
शरीर-पंजर काम लायक बन सकता है ? छोटे-छोटे कीड़ोंमें भी जोड़का
आधार आवश्यक होता है। वही आधार रीढ़की हड्डी है। अतएव गर्भकी रचना
पीढ़ियोंका चक्कर नहीं, प्रत्युत यन्त्र-रचनाके नियमोंका अत्यावश्यक अनुवर्तनमात्र है।
यह बतलाया जा चुका है कि अमीबा भी सादा नहीं, अपितु बड़ी क्लिष्ट
रचनावाला है। जैसे वटबीजके भीतर सूक्ष्मरूपसे साङ्गोपाङ्ग समूचा वृक्ष विद्यमान
रहता है, वैसे ही अमीबाके छोटे स्वरूपमें ही बारीकीके साथ सभी अवयव
संनिविष्ट रहते हैं। बालोंमें रहनेवाले लीख, जूँ, खटमल या चींटीके शरीरमें

१७२ मार्क्सवाद और रामराज्य
भी बड़ी ही सूक्ष्म कारीगरी होती है। उन्हें भी सादी-रचनावाले नहीं कहा जा
सकता । अतएव 'मैन्युअल ऑफ़ जियालॉजी' में मि० निकलसनका कहना
है कि 'अमीबा नामक क्षुद्र जन्तु अकल्य, सूक्ष्म कण ही है, परंतु उसकी
पाचन-शक्ति क्लिष्ट-से-क्लिष्ट रचनावाले प्राणियोंकी पाचन-क्रियाके यन्त्रोंसे कम
नहीं। वह अपने अंदर भोजन लेता है और बिना किसी पृथक् अवयवके
उसे पचा जाता है। सबसे बड़ी नात तो यह है कि वह भोजनमेसे पोषकभाग
रख लेता है और अनुपयोगी भाग निकाल डालता है।'
हक्सलेका भी 'प्राणियोंके वर्गीकरण' की भूमिकामें कहना है कि
“ग्रेगारिनीडा-वर्गके जन्तुओसे नीचे दर्जेके अन्य जन्तु नहीं हैं। परंतु 'रीजोपोडा'
वर्गके सूक्ष्म जन्तु उनसे भी अधिक सादी रचनाके हैं । सूक्ष्म-वीक्षण-यन्त्रसे
देखा गया है कि इनमें शरीर-जैसी कोई गठन नहीं होती । ये तो पतले किये
हुए सरेसके एक परमाणु-जैसे ही हैं । परंतु इनमें भी जीवन-शक्तिके
समस्त गुण रहते हैं। ये अपने ही-जैसे प्राणीसे उत्पन्न होते हैं, भोजन पचा
सकते हैं और हलचल करते हैं। इतना ही नहीं, ये अपने घुसनेकी छींट, जो
बिल्कुल क्लिष्ट-रचनायुक्त होती है, बना लेते हैं। जेलीका यह एक कण
प्राकृतिक शक्तियोंको इस प्रकार काबूमें करके ऐसी गणितयुक्त रचना (छींट)
बना सकता है, यद्यपि स्वयं रचनारहित और अवयवविहीन है । मेरे लिये
यह एक असाधारण सारयुक्त वस्तु है।'
इन बातोंसे कौन कह सकता है कि अमीबामें क्लिष्ट-रचना नहीं है ? अतः
भोग्य और भोक्ता ही क्रमशः सादी और क्लिष्ट रचनावाले हैं । कर्म-ज्ञानहीन
वृक्ष भोग्य और ज्ञानहीन कर्मयुक्त पशु भोक्ता है एव च ज्ञान-हीन पशु भोग्य
और ज्ञान-कर्म-युक्त मनुष्य भोक्ता है। विकासवादी वनस्पति और पशुओंकी
साथ-साथ उत्पत्ति मानते हैं । यदि प्राणियोंकी उत्पत्तिका चक्कर गर्भमें
लगता है तो मनुष्य प्राणी गर्भमें सिरके बल उलटा क्यो लटकता है ? विकासवादी
नहीं जानते, पर कहा जा सकता है कि वह वृक्षोंका नमूना है। ज्ञान-कर्म-रहित
वृक्ष नीचे सिरवाले होते हैं। पैदा होनेके बाद शिशु हाथ-पैरके बलसे तिरछा
चलता है. यह कर्म-युक्त ज्ञान-रहित पशु दशा है । ज्ञानका उदय होनेपर वह
खड़ा होकर मनुष्य हो जाता है। गर्भका सिर नीचे रहनेका यही कारण है।
यही वृक्षोंकी पहले उत्पत्तिका प्रमाण भी है। वस्तुतः गर्भमें पिछली योनियोंके
चक्करकी बात गलत है । मुर्गीका इतिहास दिया गया है। मुर्गी पक्षी-जातिका
प्राणी है। इसके पूर्व मछली, मेढक और सर्प जातिके प्राणी हो चुके हैं।
मुर्गीके गलफडोंने मछलीका रूप दिखलाया और पैर, सिर निकलनेपर
मान लिया जाय कि मेढकका रूप दिग्बलाया । परंतु तीसरे सर्पणशीलोका रूप

क्या है ? पक्षी सर्पोंमें बहुत नजदीक हैं, पक्षीका विकास सर्पणशील प्राणीसे
हुआ है; अतः उचित था कि उन सर्पणशील प्राणियोंके गुण पक्षियोंमें हों। परन्तु
पक्षियोंमें क्या सर्पणशील प्राणियों-सरीखे दाँत होते हैं ! एक चमगादड़को
छोड़कर किसी अन्य पक्षीके दाँत नहीं हैं। परन्तु चमगादड़ सर्पणशीलसे पक्षी नहीं
हो रहा है, उसके लिये तो पशुओंसे पक्षी होनेकी बात कहना अधिक संगत है
क्योंकि उसके स्तन और कान होते हैं। जब सर्पोंमें सर्पणशीलोंके गुण नहीं
तब पिछली योनियोंमें उसके चक्कर काटनेकी बात कैसे सिद्ध होगी ? केवल
एक-दो बातें देखकर कल्पनाका इतना बड़ा महल खड़ा करना दुस्साहस ही है।
उसी तरह मण्डूक यदि मछलीसे हुआ होता तो उसको पैर न होने चाहियें
थे । वह बढ़नेके समय ही गलफड़ोंसे श्वास लेता है। उसकी यह अवस्था गर्भावस्था
ही है। गर्भावस्थामें तो मनुष्यका बच्चा भी नालके द्वारा प्राण और पोषण पाता
है। इतनेहीसे क्या उसे मछली कहा जा सकता है ? यदि ऐसा होता तो सभी
बच्चे पहले गलफड़ेसे श्वास लेते, क्योंकि विकासवादीके अनुसार सभीका विकास
[L

१७४ मार्क्सवाद और रामराज्य
इस भेदका क्या कारण है ? गर्भकी विचित्रता, महत्ता भी ईश्वरी कारीगरीका एक
नमूना है । एक नगण्य शुक्र-शोणित-बिन्दु क्रमेण वृद्धिगत होकर हस्त, पाद,
नेत्र, श्रोत्र, बुद्धियुक्त होकर ज्ञानवान् हो जाय, यह ईश्वरकी अघटित-घटना-
पटीयसी मायाशक्तिका वैचित्र्य है । गर्भके विकासवादी इतिहासपर विज्ञान-वेत्ताओ-
को भी पूरा विश्वास नही है । हक्सले और हेकलका कहना है कि 'गर्भका
इतिहास अति संक्षिप्त एव अधूरा है ।' प्रश्न हो सकता है कि ऐसा क्यों ?
यदि गर्भ-इतिहास प्राणियोंके विकास-क्रमकी पाठमाला है तो इसमे गडबड़ी
कैसे ? बीचमे गर्भ बेसिलसिले क्यो भासित होने लगे ? मण्डूकसे सर्पणशील होकर
पक्षी होना, पर सर्पोंकी हालतका पता नही । बीचमें पुच्छल ताराकी शकल क्यो
आ गयीं ? विकासवादी कहते हैं कि 'इस गर्भावस्थाके इतिहासमें जहाँ समानताएँ
समाप्त होकर भिन्न-भिन्न मागोंका अवलम्बन करती हुई प्रतीत होती हैं, वहाँ
वे स्थान बतलाते हैं कि प्राणियोने परिस्थितिके अनुसार भिन्न-भिन्न मागोंसे
चलना आरम्भ किया ।' शायद इसका मतलब यह है कि जहाँसे घास खानेवाले
स्तनधारियोके बाद स्तनधारियोमें मास खानेकी प्रवृत्ति हुई, वही प्रक्षेप है ।
परन्तु यह बहुत भद्दा समाधान है । क्या घास खानेवालेसे एकदम मास खानेवाले
हो गये ? क्या गायके बछड़ोमेंसे एक भेड़िया हो गया, क्योकि मछलीसे मेढक
होना जितना कठिन है, बछड़ेसे भेड़िया होना उतना कठिन नही । वस्तुतः
प्रत्येक जातिके स्वतन्त्र गर्भ होते हैं । इसमे पुरानी पीढ़ियोंके चक्करकी बात
सर्वथा व्यर्थ है । इसीलिये 'विकासवाद' पुस्तकमें हारकर लिखा गया है कि 'किसी'
भी प्राणीकी गर्भावस्थाका इतिहास पूर्णतया हम नही जानते और न किसीकी
गर्भावस्थाके सब परिवर्त्तन देखे ही गये है अथवा न उनका सार्थक कारण पूर्णतया
बतलाया जा सकता है ।'
विकासवादी कहते है कि 'तुलनात्मक दृष्टि, मनुष्यकी शरीर-रचना, गर्भ-
परिवर्त्तन, चट्टानोंमे प्राप्त मनुष्यके अवयव आदिसे प्रतीत होता है कि यन्त्रकी
भाँति मनुष्य भी उन्हीं प्राकृतिक नियमोके अधीन रहता है, जिनके अधीन अन्य
प्राणी हैं । मनुष्य-देहका भी उन्हीं तत्त्वोंसे निर्माण हुआ है, जिनसे औरोका ।
स्तनधारी श्रेणीकी बदर कक्षावाली बनमानुष उपजातिमें ही मनुष्यका स्थान है ।
वानर कक्षाकी विशेषताएँ ये है—( १ ) गर्भनाल झिल्लीसे सम्बन्ध रखता है, ( २ )
हाथों, पैरोके अँगूठे चारो ओर फिर सकते हैं, अतएव वे पैरसे भी पकड़ सकते
हैं, ( ३ ) वृक्षोंपर रहते हैं, ( ४ ) इनके दूधके दाँत और स्थिर अन्य दाँत
होते हैं, ( ५ ) वानर-कक्षाके भिन्न वंशोंमें दाँतोकी संख्या नियत होती है, ( ६ )
हाथमें पाँच अंगुलियाँ, नाखून और पंजे होते हैं, ( ७ ) हँसुलीकी अस्थियाँ दृढ
एव उन्नत होती है और ( ८ ) प्रत्येकके दो स्तन होते हैं । पूर्णतया सीधे खड़े

विकासवाद १७५
होकर चलना, मस्तिष्कका बहुत विकास, वाणी-द्वारा स्पष्ट बोलनेकी शक्ति और
विचार करनेकी शक्ति यह चार मनुष्यकी विशेषताएँ हैं। पहली दोनों विशेषताएँ
तात्त्विक नहीं प्रत्युत परिणामकी हैं अर्थात् छोटाई-बड़ाईका ही अन्तर है। खड़े
होकर चलना भी मस्तिष्ककी उन्नतिका परिणाम है।
'वानरोंकी जातियाँ, उपजातियाँ तथा वंश अनेक हैं। लीमर अर्धबंदर है,
जो हाथ-पैरसे ही बंदर प्रतीत होता है। मामोंसेट भी आकारमें लीमर-सदृश
होता है, पर वह वानरोंसे अधिक मिलता है। इसके नाखून पंजेदार होते हैं।
सामान्य बंदर प्रसिद्ध ही है। वनमानुष भी इसी कक्षाका वंश है। इसके पाँच
प्रकार हैं—गिवन, ओरांग, औटांग, चिपाजी और गोरिल्ला। इनके दाँत
मनुष्यों-जैसे होते हैं। नाक पीछेकी ओर झुकी होती है, पर अंदरकी ओर दो
छिद्र नहीं होते। इनके हाथ पैरोंसे अधिक लंबे होते हैं। गालकी थैली और
पूँछ बिल्कुल नहीं होती। गिवन जातिकी मादा अपने बच्चेका मुँह धोती है।
चिपाजी शरीरसे बहते हुए खूनको बंद करनेकी चेष्टा करता है। वैज्ञानिकोंका
कहना है कि चिपाजीकी बुद्धि नौ महीनेके बालकके समान होती है। मनुष्यकी
खास विशेषताएँ दो ही

पूरे काम कर रहे हैं, जो कि मनुष्योंसे लुप्त हो रहे हैं, पर किसी-किसीमें मौजूद है ।
"भौंहें चढ़ाना; माथा सिकोड़ना; होंठ, गाल और नाकको मनमाना नचाना
मनुष्यमें अबतक बना हुआ है । अन्न-नलिकाके अन्तमें एक थैली होती है, जो जानवरों-
को तो काम देती है, पर मनुष्यके लिये निष्प्रयोजन है । कभी-कभी तो गुठली
( बीया ) आदि कठोर पदार्थ उसमें चले जानेसे वह घातक भी सिद्ध होती है ।
छठे महीने गर्भके बालकका शरीर बालोंसे छा जाता है, जो वानरका पूर्वरूप है ।
बंदरके बच्चे माँके पेटसे चिपके हुए रहते हैं, अतः जन्म होते ही बालकके हाथ-
की मुट्ठी इतनी मजबूतीसे बँधी होती है कि वह रस्सी पकड़कर लटका रह
सकता है । मनुष्यकी रीढ़की अन्तिम गाँठको ही पूँछका चिह्न कहा जाता
है । पूँछवाले मनुष्योंमें यह गाँठ आठ-दस इचतक बढ़ी हुई पायी जाती है ।
यह केवल मास-स्नायुयुक्त होती है, इसमें हड्डी नहीं होती । मनुष्यकी अस्थियाँ
पृथिवीकी तीसरी तहमें मिलती हैं । पहले मनुष्यकी ऐसी-ऐसी जातियाँ हो

विकासवाद १७७

अंदर एक दूसरा कोष्ठ तैयार होता है और अलग होनेके पहलेतक दोनो ही
कोष्ठ एकट्ठेही रहते हैं। ऐसी स्थितिमें उसे एक कोष्ठधारी क्यों कहा जाता है।
इसी तरह कई कोष्ठवाले प्राणीके प्रत्येक कोष्ठ अमीबाकी तरह आठो काम अलग-
अलग नहीं करते, भिन्न-भिन्न कोष्ठोंके काम भिन्न-भिन्न हो जाते हैं। ऐसी
स्थितिमें यह कैसे कहा जाता है कि ये कोष्ठ भी अमीबाके कोष्ठ-जैसे ही कोष्ठ हैं ?
अनेक कोष्ठवाले प्राणियोंमें सम्हाल पाया जाता है और सबको सम्हालनेवाला
एक ही कोष्ठ विदित होता है, क्योंकि यदि सभी कोष्ठ प्रबन्ध करने लग जायं
तो शरीरमें अव्यवस्था हो जायगी। अतः किसी एक कोष्ठको ही चेतन मानना
ठीक है।
वेदान्तमतमें तो भौतिक तत्त्वोंसे भिन्न व्यापक आत्मा स्वतन्त्र मान्य है।
अन्तःकरणकी उपाधिसे सब व्यवस्था उत्पन्न होती है। विकासवादमें तो
कोष्ठाके अंदरका रस ही चैतन्य कहा जाता है, जो सर्वथा असंगत है। अनेक
संयुक्त चैतन्योंसे देहकी व्यवस्था उत्पन्न नहीं हो सकती। मनुष्य स्तनधारियोंकी
श्रेणीमें भले हों, परन्तु न उनके परस्पर संयोगसे वंश चलता है, न सबकी समान
आयु है, न तो समान भोग और न समान गर्भवास ही, यह कहा जा चुका है।
ऐसी दशामें मनुष्यका बदरादिके साथ मेल मिलाना उनमें पशुताके संस्कार लाने-
के प्रयत्नके सिवा कुछ नहीं। बालोंसे युक्त पैदा होनेवाले मनुष्य भिन्न प्राणियोंके
बालोंमें मृत्युतक कोई परिवर्तन नहीं होता। जो गाय जिस रंगकी होती है, आजीवन
उसी रंगकी रहती है। यही दशा घोड़ा, गधा, बकरी, भैंस आदिकी है। बंदर
और वनमनुष्य भी जिस रंगके पैदा होते हैं, मृत्युपर्यन्त उसी रंगके रहते हैं।
परंतु मनुष्यके बालोंके रंग जीवनमें चार बार बदलते हैं—पैदा होनेपर सुनहरे
रंगके, यौवनमें काले, वृद्धावस्थामें सफेद और अतिवृद्धतामें वे पिंगल हो जाते हैं।
पशुओं और मनुष्योंमें यह भी अन्तर है कि सभी पशु पानीमें पड़ते ही तैरने
लगते हैं, बदरकी भी यही हालत है, परंतु मनुष्यको तैरना सीखना पड़ता
है। बिना सीखे पानीमें पड़नेपर वह डूबकर मर जाता है। दो पैरपर खड़े होना,
स्पष्ट बोलना, विचार करना, हँसना-रोना, गाना आदि मनुष्योंमें ही लक्षित
होते हैं, पशुओंमें नहीं। बिना शिक्षाके सब काम कर लेना पशुओमें ही है,
मनुष्योंमें नहीं। इससे स्पष्ट है कि वह पशुश्रेणीका प्राणी नहीं है। इसी तरह
पशुओं और वनस्पतियोंमें भी अन्तर है। पशु आड़े शरीरके हैं और वृक्ष उलटे
शरीरवाले अर्थात् उनका सिर नीचेको रहता है। दूसरा अन्तर यह है कि पशुओंके
देखने-सुनने आदिके लिये आँख-कान आदि इन्द्रियाँ होती हैं, वृक्षोंके नहीं। सबमे
विरोधी अन्तर खुराकका है। वृक्ष जिस दूषित वायुको खाकर जीते हैं, अन्य
प्राणी उसे खाकर मर जाते हैं। वृक्ष प्राणप्रद वायु देते हैं और प्राणनाशक

मा० रा० ६२—

१७८ मार्क्सवाद और रामराज्य
वायुका भक्षण करते हैं। अन्य प्राणियोंका क्रम इसके विपरीत है। इसी तरह
वनस्पति एव पशुओका कोई भी शरीरसम्बन्धी उत्पादक सम्बन्ध कुछ भी
प्रतीत नहीं होता। अतः मनुष्य न तो पशुश्रेणीका है और न वनस्पतिश्रेणीका
ही, अतः तीनोका ही कार्य-कारणभाव सर्वथा असंगत है ।
वानर-कक्षाकी जो आठ विशेषताएँ दिखलायी गयी हैं, वे केवल वानरोकी ही
नहीं, उनमें आधीसे अधिक सब प्राणियोंमें पायी जाती हैं। जो दो-चार
विशेषताएँ हैं, वे मनुष्यको पृथक् ही सिद्ध करती हैं। गर्भनाल भैसका भी
लगा रहता है। अँगूठेके घूमनेसे भी बदर मनुष्यसे भिन्न जातिका सिद्ध होता
है। वृक्षोंपर तो चिड़ियाँ और कीड़े भी रहते हैं। दूधके और स्थायी दाँत
गाय, भैंस आदिके भी होते हैं। दाँतोकी संख्या अन्य पशुओमें भी अलग-
अलग होती है। इसी तरह पाँच अँगलियाँ गिलहरीके भी होती हैं। दो स्तन
बकरीके भी होते हैं। इसी तरह मस्तिष्ककी बड़ाई भी मनुष्यता नहीं है।
आधुनिक वैज्ञानिक भी चींटीको बहुत बुद्धिमान् मानते हैं, उसकी-जैसी
प्रबन्ध-शक्ति अन्यत्र नहीं देखी जाती। इससे 'बड़े या स्पष्ट मस्तिष्कसे ही बुद्धि
और विचारोंकी उत्पत्ति होती है' यह नहीं कहा जा सकता । वस्तुतः लीमर,
मार्मोसेट आदि प्राणी स्वतन्त्र योनियाँ ही हैं। विकासक्रम दिखलानेके लिये
ही उन्हें वानरकोटिमे मान लिया जाता है। इनका परस्पर वंश नहीं चलता,
अतः ये वानरजातिके नहीं हैं। वनमानुषोका भी बदरके साथ नाममात्रका
ही मेल है, वस्तुतः इनका एक-दूसरेके साथ कुछ भी वास्ता नहीं है । यदि
गिबनकी माता अपने बच्चेका मुँह धोती है तो गाय-भैस चाट-चाटकर ही
अपने बच्चेको साफ़-सुथरा रखती है। चिड़िया दाना लाकर अपने बच्चोको
खिलाती है। यदि चिम्पेञ्जी घाव दबाकर खून बंद करनेकी चेष्टा करता
है, तो कुत्ता भी घास खाकर जुलाब लेता और चाटकर घावोको ठीक कर
लेता है। हाथी भी अपना इलाज आप कर लेता है। चिम्पेञ्जी नौ महीनेके
बालककी बुद्धि रखता है, परंतु चींटी सब संसारका प्रबन्ध करनेकी बुद्धि
रखती है। अतः मनुष्य वनमनुष्यकी श्रेणीका भी नही। मस्तिष्कका सिद्धान्त
चींटीके दृष्टान्तसे कट जाता है, चींटीको मस्तिष्क होता ही नहीं। यदि चींटीको
मस्तिष्क हो तो भी चिम्पेञ्जी आदिकी अपेक्षा तो नगण्य ही होगा। जब
चींटी मस्तिष्कके बिना ही सब काम करती है, तब 'मनुष्य चौड़े मस्तिष्कसे
ही सब काम करता है' यह नहीं कहा जा सकता।
इसी तरह दो पैरपर सीधे खड़े होनेसे आँतकी बीमारी होनेकी कहानी भी
व्यर्थ है । यदि खड़े होनेसे वह बीमारी होती, तो करोडो वर्ष पहले भी यह
बीमारी होना और फिर इसके डरसे मनुष्य सीधा खड़ा क्यो होता ? वस्तुतः

विकासवाद १७९
यह रोग अधिक भोजनकी लोलुपताके कारण ही होता है। पशु बिना भूखके
नहीं खाता। डा० ई० टू कूनेका 'चिकित्साका नूतन विज्ञान' ( न्यू साइन्स
ऑफ हीलिंग ) पुस्तकमें कहना है—'आँत उतरनेकी बीमारी पेटके भीतर
विकृत द्रव्यके बोझकी खिंचावट है। आमाशयकी झिल्ली उन स्थानोंमें जहाँ जरा भी
रुकावट मिल जाती है, अँतड़ियाँ आन्तरिक दबावके कारण छेद कर देती हैं और
बाहर निकल आती हैं, भिन्न-भिन्न पुरुषोंकी झिल्ली फटनेके स्थान भिन्न-भिन्न होते
हैं, परंतु कारण सदैव एक ही रहता है। अतः इस रोगका कारण चोटखाना, गिर पड़ना,
अथवा अन्य कोई बतलाना भूल है। झिल्ली अन्य कारणोंसे भी फट सकती है,
परंतु आँत उतरनेका कारण चोट आदि नहीं है। युक्त चिकित्सा रीतिसे विकृत
द्रव्यको शरीरसे निकाल देनेपर इस प्रकारके छिद्रोंमें आराम हो जाता है। फिर
'चौपायेसे द्विपाद होनेके कारण आँत उतरनेका रोग होने' की कल्पना सिर्फ
बालकपन ही है। वनमनुष्य भी जबतक दो पैरसे खड़ा नहीं हो जाता, तबतक
वह द्विपाद नहीं चतुष्पाद ही कहा जायगा। बदरके हाथ कहनेको ही हाथ हैं,
वस्तुतः वे पैर ही हैं। बदर पैरसे भी वस्तु पकड़ता है। जगली स्त्री भी पैरसे वस्तु
उठा लेती है। इससे यह सिद्ध नहीं होता कि वनमानुप बंदरजातिका है।
अभ्यास करनेसे तो बाजीगर आँखसे पैसा उठा लेता है और भानुमती पानीके
अन्दर मुँह डालकर जीभसे नथमें मोती पिरो देती है। क्या यह सब बंदरोंमें सम्भव
है ? अच्छे पहलवान पैरसे दाँव चलाते हैं, सरकसवाले पैरसे कितने ही अद्भुत
काम कर लेते हैं। क्या यह सब बदरोंके चिह्न हैं ? उसी तरह अकलदाढकी बात
है। जंगली लोगोंमें यह जल्दी निकलती है, इससे भी मनुष्यके बदरसे विकसित
होनेकी बात सिद्ध नहीं होती। अङ्गोंका शीघ्र स्फुटित होना खाद्य, पेय, आचार,
व्यवहार एवं जलवायुपर निर्भर होता है। जंगली मनुष्योंमें अकलदाढ कच्चे अन्न,
कच्चे मास खानेके कारण शीघ्र निकलती है, इसीलिये वह बड़ी भी होती है।
किसी-किसीके शरीरपर बालोंकी अधिकता गर्भमें पुरुष-शक्तिकी
अधिकताकी द्योतक है। पुरुष-शक्ति अधिक होनेसे कभी-कभी स्त्रियोंके
भी दाढी-मूँछ निकल आते हैं। पुरुष-शक्ति कम होनेसे पुरुषोंमें भी दाढी-मूँछ
कम होते हैं। रोम, बाल, हड्डी, स्नायु आदि कठिन पदार्थ पितृ-शक्तिका परिणाम
है। अतः किसीमें बाल अधिक देखकर बदरोंकी संतान होनेकी कल्पना भी गलत
है। बाल होना यदि वानरोंका चिह्न है, तब तो जिन पुरुषोंके दाढी-मूँछ नहीं होती
या जिन स्त्रियोंको होती है, वे किसके विकास माने जायेंगे ? क्या ऐसे भी बदर दिखायी
देते हैं, जिनकी दाढीपर बाल स्त्रियोंकी भाँति बिल्कुल न हों ! रहा वंश-परम्परागत
बालोंका होना, सो वह तो सहज ही सिद्ध है। जब एक बार संतानके बाल निकल आये,
तो वे धीरे-धीरे दस पाँच पीढ़ियोंके बाद ही जाते हैं। ऐन्यू लोगोंकी सन्तानोंमें