मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)
Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहुई । मनुष्योंसे करोड़ों गुने अधिक गिजाई, मच्छर, मकोड़े तथा जलजन्तु
हैं । सर्पणशील जन्तु तो पक्षी हो गये, परन्तु जोड़वाले कीड़ा, भौरों, ततैया,
मक्खी आदिके पंख किस तरह हो गये ? उड़नेवाली मछलियोंको पंख किस
तरह पैदा हो गये ? इनसे पक्षियोंके शरीरकी तुलना कैसे होगी ? कृमियों,
मछलियोंके साथ पक्षियोंका सम्बन्ध कैसे हुआ ? क्या कोई पक्षी इन पंखधारी
कीड़ों एवं मछलियोंसे वंश चलायेगा ? क्या बन्दर और मनुष्यसे वंश
स्थापित होगा ?
यह तो हो सकता है कि पहले सादी रचनावाले प्राणी बने हों और बादमें
क्लिष्ट रचनावाले प्राणी, किंतु सादी रचनावाले ही क्लिष्ट रचनावाले हो जाते हैं,
यह कहना निष्प्रमाण है । वैसे तो कीटावस्थामें भी उड़नेवाले कीड़ों और
मछलियोंकी पक्षियों-जैसी क्लिष्ट रचना देखी जाती है । कनखजूरे सरीखी क्लिष्ट
रचना साँपकी नहीं होती, तितलियोंकी-सी कारीगरी कौओंमें नहीं पायी जाती;
परन्तु विकासवादके अनुसार तितली और कनखजूरा कौवे तथा साँपसे पहले ही
उत्पन्न हो गये । ऐसी स्थितिमें सादी और क्लिष्ट रचनाका कुछ भी मूल्य नहीं
रहता । यदि विकासवाद तितलीकी रचनाको क्लिष्ट रचना न माने, केवल
अस्थिवाले प्राणियोंकी ही रचनाको क्लिष्ट रचना कहे तो यह भी निराधार है ।
देखनेमें तो अस्थिवाले प्राणियोंसे वृक्षोंकी ही रचना अधिक क्लिष्ट है । विचित्र
पत्रों, पुष्पों, स्तवकों, फलोंकी सुन्दरता, सरसता, मधुरता अस्थिवाले उष्ट्रमें
कहाँ है ? मनुष्यका शरीर भी वृक्षोंकी शाखाओं, उपशाखाओं, पल्लवों, पुष्पों,
फलोंकी विचित्रताके सामने नगण्य है । एक फूलके रंग, बनावट और
सुगंधके सामने मनुष्य-रचनाका कोई महत्त्व नहीं, परन्तु पशुओं,
पक्षियों-जैसी स्वतन्त्रता और मनुष्य-जैसा ज्ञान वृक्षोंमें नहीं है । इसीलिये वे
सादी रचनावाले समझे जा सकते हैं । कर्मानुसार प्राणी ही भोग्य और भोक्ता
होता है । सादी रचनावाले भोग्य और क्लिष्ट रचनावाले भोक्ता होते हैं । वनस्पति
यदि भागनेमें स्वतन्त्र हों तो पशु कैसे जी सकते हैं ? घोड़ा यदि मनुष्यसे
अधिक बुद्धिमान् हो तो वह सवारीके काम कैसे आ सकता है ? इस व्यवस्थाके
अनुसार पहले वनस्पति फिर पशु उत्पन्न होते हैं । पशुओंमें ही हाथीसे
लेकर कृमिपर्यन्त आ जाते हैं, अन्तमें मनुष्यकी उत्पत्ति हुई । यह सिद्धान्त
अति प्राचीन है और वेदों, उपनिषदों आदिद्वारा स्वीकृत है—भगवान्ने
अपनी अजा-मायाशक्तिके द्वारा विविध प्रकारके वृक्ष, सरीसृप, पशु, खग,
दंश, मत्स्य आदि शरीररूपी पुरोंको बनाया तो भी उनसे संतुष्ट न हुए । फिर
ब्रह्मज्ञान-सम्पादनयोग्य मनुष्यको बनाकर संतुष्ट हुए ।
सृष्ट्वा पुराणि विविधान्यजयाऽऽत्मशक्त्या
वृक्षान् सरीसृपपशून् खगदंशमत्स्यान्
भा० ११।९। २१—