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मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished866 पृष्ठ

पृष्ठ 192, कुल 866 में से

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पृष्ठ 192

विकासवाद १७९
यह रोग अधिक भोजनकी लोलुपताके कारण ही होता है। पशु बिना भूखके
नहीं खाता। डा० ई० टू कूनेका 'चिकित्साका नूतन विज्ञान' ( न्यू साइन्स
ऑफ हीलिंग ) पुस्तकमें कहना है—'आँत उतरनेकी बीमारी पेटके भीतर
विकृत द्रव्यके बोझकी खिंचावट है। आमाशयकी झिल्ली उन स्थानोंमें जहाँ जरा भी
रुकावट मिल जाती है, अँतड़ियाँ आन्तरिक दबावके कारण छेद कर देती हैं और
बाहर निकल आती हैं, भिन्न-भिन्न पुरुषोंकी झिल्ली फटनेके स्थान भिन्न-भिन्न होते
हैं, परंतु कारण सदैव एक ही रहता है। अतः इस रोगका कारण चोटखाना, गिर पड़ना,
अथवा अन्य कोई बतलाना भूल है। झिल्ली अन्य कारणोंसे भी फट सकती है,
परंतु आँत उतरनेका कारण चोट आदि नहीं है। युक्त चिकित्सा रीतिसे विकृत
द्रव्यको शरीरसे निकाल देनेपर इस प्रकारके छिद्रोंमें आराम हो जाता है। फिर
'चौपायेसे द्विपाद होनेके कारण आँत उतरनेका रोग होने' की कल्पना सिर्फ
बालकपन ही है। वनमनुष्य भी जबतक दो पैरसे खड़ा नहीं हो जाता, तबतक
वह द्विपाद नहीं चतुष्पाद ही कहा जायगा। बदरके हाथ कहनेको ही हाथ हैं,
वस्तुतः वे पैर ही हैं। बदर पैरसे भी वस्तु पकड़ता है। जगली स्त्री भी पैरसे वस्तु
उठा लेती है। इससे यह सिद्ध नहीं होता कि वनमानुप बंदरजातिका है।
अभ्यास करनेसे तो बाजीगर आँखसे पैसा उठा लेता है और भानुमती पानीके
अन्दर मुँह डालकर जीभसे नथमें मोती पिरो देती है। क्या यह सब बंदरोंमें सम्भव
है ? अच्छे पहलवान पैरसे दाँव चलाते हैं, सरकसवाले पैरसे कितने ही अद्भुत
काम कर लेते हैं। क्या यह सब बदरोंके चिह्न हैं ? उसी तरह अकलदाढकी बात
है। जंगली लोगोंमें यह जल्दी निकलती है, इससे भी मनुष्यके बदरसे विकसित
होनेकी बात सिद्ध नहीं होती। अङ्गोंका शीघ्र स्फुटित होना खाद्य, पेय, आचार,
व्यवहार एवं जलवायुपर निर्भर होता है। जंगली मनुष्योंमें अकलदाढ कच्चे अन्न,
कच्चे मास खानेके कारण शीघ्र निकलती है, इसीलिये वह बड़ी भी होती है।
किसी-किसीके शरीरपर बालोंकी अधिकता गर्भमें पुरुष-शक्तिकी
अधिकताकी द्योतक है। पुरुष-शक्ति अधिक होनेसे कभी-कभी स्त्रियोंके
भी दाढी-मूँछ निकल आते हैं। पुरुष-शक्ति कम होनेसे पुरुषोंमें भी दाढी-मूँछ
कम होते हैं। रोम, बाल, हड्डी, स्नायु आदि कठिन पदार्थ पितृ-शक्तिका परिणाम
है। अतः किसीमें बाल अधिक देखकर बदरोंकी संतान होनेकी कल्पना भी गलत
है। बाल होना यदि वानरोंका चिह्न है, तब तो जिन पुरुषोंके दाढी-मूँछ नहीं होती
या जिन स्त्रियोंको होती है, वे किसके विकास माने जायेंगे ? क्या ऐसे भी बदर दिखायी
देते हैं, जिनकी दाढीपर बाल स्त्रियोंकी भाँति बिल्कुल न हों ! रहा वंश-परम्परागत
बालोंका होना, सो वह तो सहज ही सिद्ध है। जब एक बार संतानके बाल निकल आये,
तो वे धीरे-धीरे दस पाँच पीढ़ियोंके बाद ही जाते हैं। ऐन्यू लोगोंकी सन्तानोंमें